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इस साल NDA में 17 महिला कैडेटों की औपचारिक मौजूदगी सिर्फ़ परेड का हिस्सा नहीं बनी...यह भारतीय सैन्य इतिहास में बदलाव की पहली ठोस आहट है. यह लेख बताता है कि कैसे यह कदम भारत की सुरक्षा व्यवस्था को पुरुषवादी ढांचे से आगे ले जाकर एक अधिक समावेशी और संतुलित भविष्य की ओर मोड़ सकता है.
Image Source: Wikipedia
30 मई, 2025 को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में 17 महिला कैडेटों ने पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया. भारत के सैन्य इतिहास में यह एक ऐतिहासिक मौका था जिसने भारतीय सशस्त्र बलों की पुरुष-प्रधान संरचना में बदलाव का संकेत दिया. यह सर्वोच्च न्यायालय के 2021 के फ़ैसले के कारण संभव हुआ है जिसमें NDA को लैंगिक समानता वाली प्रवेश प्रक्रिया लागू करने का निर्देश दिया गया था. इसने सैन्य प्रशिक्षण में महिलाओं के लिए समान अवसरों की आवश्यकता पर भी बल दिया जिससे संस्थान के भीतर व्यवस्थागत परिवर्तनों की राह तैयार हुई है.
NDA की पासिंग आउट परेड में 17 महिला कैडट—भारतीय सैन्य इतिहास में बदलाव का संकेत।
सुप्रीम कोर्ट के 2021 आदेश ने NDA में लैंगिक समानता का रास्ता खोला।
सैन्य प्रशिक्षण में महिलाओं के समान अवसरों ने संरचनात्मक बदलावों की नींव रखी।
महिलाओं को अक्सर स्थायी कमीशन और युद्ध की अग्रिम पंक्ति से दूर रखा गया है. वे मुख्य रूप से प्रशासनिक या सहायक ज़िम्मेदारियों तक ही सीमित रही हैं. ऐसे में, इन 17 कैडेटों का सफल प्रशिक्षण किसी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक है. यह भारतीय सेना को आधुनिक और विविध बनाने की ओर किया गया एक सार्थक प्रयास है.
“महिलाओं को अक्सर स्थायी कमीशन और युद्ध की अग्रिम पंक्ति से दूर रखा गया है. वे मुख्य रूप से प्रशासनिक या सहायक ज़िम्मेदारियों तक ही सीमित रही हैं.”
रणनीतिक अभियानों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सैन्य नेतृत्व में उनकी बदलती भूमिकाओं का संकेत है. इसका एक बड़ा उदाहरण दो वरिष्ठ महिला अधिकारियों- कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की मीडिया ब्रीफिंग देना है. यह बताता है कि महत्वपूर्ण सैन्य योजनाओं में महिलाओं की ज़िम्मेदारी बढ़ रही है. फिर भी, समग्र प्रतिनिधित्व के मामले में उनकी हिस्सेदारी सीमित है. सशस्त्र बलों में अधिकारियों के पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी अभी 7 प्रतिशत से भी कम है. सक्रिय संघर्ष या युद्ध में उनकी भागीदारी नगण्य और काफ़ी हद तक प्रतीकात्मक है. ज्यादातर महिलाएं चिकित्सा और प्रशासनिक क्षेत्रों में ही काम करती हैं.
यह सही है कि प्रतीकात्मक उपलब्धियों का भी अपना महत्व होता है लेकिन असलियत में उनको शामिल करने के लिए ढांचागत बदलाव ज़रूरी है. इसके लिए युद्ध भूमिकाओं के साथ ही वरिष्ठ नेतृत्व पदों पर उनकी नियुक्ति ज़रूरी है. इसके अलावा, लैंगिक एकीकरण में बाधा डालने वाली संस्थागत सोच का समाधान भी निकालना होगा. पारंपरिक सैन्य ढांचे पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास करते हैं इसलिए सैन्य और कूटनीतिक कामों के लिए आवश्यक होने के बावजूद महिलाओं को नीतिगत विमर्शों में किनारे कर दिया जाता है.
कूटनीति में महिलाओं को आमतौर पर राजदूतों और वरिष्ठ अधिकारियों की पत्नियों के रूप में ही देखा गया है न कि स्वतंत्र राजनयिकों के रूप में. भले ही उन्होंने सॉफ्ट पावर बढ़ाने और सांस्कृतिक गतिविधियों में बड़ा योगदान दिया है लेकिन पेशेवर राजनयिकों के रूप में महिलाओं की भूमिकाएं सीमित रखने की सोच दिखी है. आज, भारत की महिलाएं राजदूतों, वरिष्ठ अधिकारियों और वैश्विक मंचों पर प्रमुख वार्ताकारों के पद पर हैं. भारत की विदेश नीति को आगे बढ़ाने और आकार देने में उनकी मुख्य भूमिकाएं हैं. ऐसे में केवल पत्नियों के रूप में उनके योगदान को देखना पुरानी लैंगिक भूमिकाओं को ही मजबूत करना होगा.
“सशस्त्र बलों में अधिकारियों के पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी अभी 7 प्रतिशत से भी कम है. सक्रिय संघर्ष या युद्ध में उनकी भागीदारी नगण्य और काफ़ी हद तक प्रतीकात्मक है.”
विकासशील देशों में सैन्य ठिकानों पर आमतौर पर लिंग और व्यवसाय के बीच एक चिंताजनक संबंध दिखता है. ये ठिकाने शोषण के क्षेत्र बन सकते हैं जहां गरीबी और सपोर्ट की कमी के कारण स्थानीय महिलाएं यौन कार्यों में धकेल दी जाती हैं. ये सैन्यीकरण से जुड़ा गहरा सामाजिक नुकसान है. सेना अक्सर युद्ध और शांति को शक्ति और नियंत्रण के नज़रिये से देखती है इसीलिए वह मानवाधिकारों और लैंगिक असुरक्षा को नज़रंदाज़ कर देती है. वह इस बात को नहीं मान पाती कि संघर्षों के दौरान महिलाओं को कई तरह की चुनौतियों से जूझना पड़ता है. जैसे- बोस्नियाई युद्ध में यौन हिंसा को एक रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया गया और 35,000 महिलाओं का बलात्कार किया गया. इस तरह की हिंसक कार्रवाई सामुदायिक संबंधों को कमज़ोर करती है.
सैन्य प्रशासन की एक बड़ी कमज़ोरी नेतृत्व की भूमिकाओं में महिलाओं की कमी है. नीति-निर्माण में उनकी गैर-मौजूदगी ऐसी व्यवस्थाओं को जन्म देती है जो जेंडर से जुड़ी चिंताओं की अनदेखी करती हैं. इस कारण संतुलित व समावेशी सुरक्षा रणनीतियां अक्सर नहीं बन पातीं. वैश्विक कूटनीति, शांति स्थापना और विश्व राजनीति में भारत का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, पर महिला शांति और सुरक्षा (WPS) एजेंडा को लेकर इसकी भागीदारी सीमित है. यह एजेंडा दुनिया भर में संघर्ष समाधान और शांति निर्माण में महिलाओं की सक्रिय भूमिका पर ज़ोर देता है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र मिशनों में महिला शांति सैनिकों को तैनात किया है. फिर भी, इसने राष्ट्रीय स्तर पर WPS सिद्धांतों को लागू करने के लिए कोई कार्ययोजना नहीं बनाई है जबकि, इन सिद्धांतों को आगे बढ़ाने से भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिकाओं को नया आकार मिल सकता है. यह बदलाव केवल संख्या नहीं बढ़ाएगा बल्कि नेतृत्व और निर्णय लेने की उनकी ताक़त भी बढ़ाएगा.
NDA से 17 महिलाओं का निकलना—सैन्य संस्कृति बदलाव की शुरुआत।
घरेलू रक्षा नीतियों को वैश्विक प्रतिबद्धताओं के अनुसार बनाने से लैंगिक समानता के मामले में भारत की साख बढ़ेगी. इससे उसके अंतरराष्ट्रीय रुख़ और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्थाओं के बीच तालमेल दिखेगा. शांति का अर्थ केवल युद्ध का न होना ही नहीं होना चाहिए बल्कि इसमें निष्पक्षता, समावेशिता और न्याय भी शामिल होना चाहिए. सेना और कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से संघर्ष के बजाय सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे भविष्य में होने वाली हिंसा की व्यापकता और गंभीरता को कम करने में मदद मिल सकेगी.
दुनिया भर में रक्षा नीतियों पर नए नज़रिये से सोचा जा रहा है. इसमें नारीवादी विदेश नीति एक प्रभावशाली मॉडल है, जिसे स्वीडन की पूर्व विदेश मंत्री मार्गोट वॉलस्ट्रॉम ने पेश किया है. यह नीति सीमाओं की रक्षा के बजाय लोगों की रक्षा पर ज़ोर देती है. इसमें गरिमा, सुरक्षा और मानवाधिकारों को शामिल करके सुरक्षा की नई परिभाषा तय की गई है. सैन्य नज़रिये से यह नीति युद्ध और रक्षा के पारंपरिक विचारों पर सवाल उठाती है और महिलाओं को पीड़ित के रूप में नहीं बल्कि शांति और रणनीति में सक्रिय योगदानकर्ता मानने की वकालत करती है. यह इस बात का समर्थन करती है कि विविध और समावेशी सशस्त्र बल न केवल अधिक निष्पक्ष होते हैं, बल्कि व्यवहार-कुशल भी होते हैं.
नेतृत्व में महिलाओं की कमी से जेंडर-संवेदनशील नीति नहीं बन पाती।
इस लिहाज से देखें तो NDA से 17 महिलाओं का स्नातक होना एक महत्वपूर्ण कदम है. समय के साथ यह सैन्य संस्कृति को बदलने में मददगार हो सकता है. उनकी उपस्थिति कठोर पुरुषवादी मानदंडों को चुनौती देती है और संवाद व संयम वाली वैकल्पिक रणनीतियों को बढ़ावा देती है. बेशक, महिलाएं अकेले संघर्ष को नहीं रोक सकतीं, लेकिन उनकी व्यापक भागीदारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अधिक मानवीय नज़रिये को प्रोत्साहित करती है.
(कल्पेश पाटकर, पुणे के लवासा परिसर स्थित क्राइस्ट (मानित विश्वविद्यालय) के विधि संकाय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं)
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Kalpesh Patkar is an Assistant Professor & Faculty of Political Science at the School of Law, Christ (Deemed to be University), Pune Lavasa Campus. He ...
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