भारत के तटीय किनारों पर मैंग्रोव अब सिर्फ पेड़ नहीं बल्कि तूफानों और जलवायु संकट से लड़ने वाली प्राकृतिक ढाल हैं- इन्हें बचाने में अब कॉर्पोरेट निवेश और ब्लू कार्बन जैसी पहल नई कहानी लिख रही हैं. जानें कैसे कंपनियां, सरकार और स्थानीय समुदाय मिलकर तकनीक और निवेश के जरिए तटों की सुरक्षा, रोजगार और नेट-ज़ीरो लक्ष्य को एक साथ आगे बढ़ा रहे हैं.
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भारत ने 2030 तक 2.5–3 अरब टन का कार्बन सिंक बनाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है जिसके लिए हर वर्ष लगभग 15 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी. यह निजी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती होने के साथ-साथ एक अनोखा अवसर भी है. भारत में लगभग 5,000 वर्ग किलोमीटर में फैले मैंग्रोव जंगल कई तरह की जीव-जंतुओं और पौधों को रहने की जगह देते हैं. ये चक्रवात, तेज तूफानी लहरें, सुनामी और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा भी करते हैं और कार्बन को बड़ी मात्रा में सोखकर वातावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं इसलिए मैंग्रोव को बचाने में पैसा और प्रयास लगाना आर्थिक, पर्यावरणीय और नैतिक, तीनों कारणों से जरूरी है. भारत के लंबे तटीय इलाकों के पास मौजूद कंपनियों को ऐसी योजनाओं में सक्रिय भाग लेना चाहिए जिससे उनकी अपनी सुरक्षा बढ़े, स्थानीय लोगों को रोजगार और आजीविका मिले और भारत के 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य को पाने में मदद हो.
जैसे-जैसे नेट-ज़ीरो लक्ष्य पास आ रहे हैं, कंपनियां कार्बन ऑफसेट के नए तरीके खोज रही हैं. मैंग्रोव संरक्षण एक अच्छा विकल्प है. तटीय क्षेत्रों में बंदरगाह, फैक्ट्री या पर्यटन सुविधाएँ रखने वाली कंपनियां मैंग्रोव लगाने और बचाने में निवेश करें, जिससे जलवायु आपदाओं का खतरा कम हो और उनकी सुरक्षा बढ़े.
भारत में लगभग 5,000 वर्ग किलोमीटर में फैले मैंग्रोव जंगल कई तरह की जीव-जंतुओं और पौधों को रहने की जगह देते हैं. ये चक्रवात, तेज तूफानी लहरें, सुनामी और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा भी करते हैं और कार्बन को बड़ी मात्रा में सोखकर वातावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं इसलिए मैंग्रोव को बचाने में पैसा और प्रयास लगाना आर्थिक, पर्यावरणीय और नैतिक, तीनों कारणों से जरूरी है.
ऐसे कदम साफ-साफ मापे जा सकते हैं और तय समय में पूरे किए जा सकते हैं. इस काम में बैंक और बीमा कंपनियां अच्छी साझेदार बन सकती हैं, क्योंकि जोखिम कम करने वाली परियोजनाएँ उनके कर्ज और बीमा से जुड़े खतरे को भी घटाती हैं. इससे उनकी सुरक्षा भी बढ़ती है. वे पैरामीट्रिक बीमा जैसे नए बीमा उत्पाद बनाने में मदद कर सकती हैं. इस तरह के बीमा में पहले से तय नियम होते हैं, इसलिए किसी आपदा के बाद भुगतान जल्दी हो जाता है. बस यह देखना होता है कि घटना तय स्तर तक पहुँची या नहीं. तेज़ मदद मिलने से लोगों और कंपनियों को दोबारा खड़े होने में आसानी होती है.
स्थानीय समुदायों, मूल्य-श्रृंखला भागीदारों और सरकारों के साथ बहु-हितधारक सहयोग को बेहतर बनाने के लिए ‘ब्लू कार्बन चैंपियनशिप’ पुरस्कारों के माध्यम से योगदानों को मान्यता दी जा सकती है. इससे कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) फंड, स्वैच्छिक योगदान और परोपकारी दान को आकर्षित करने में मदद मिलेगी. मैंग्रोव कार्बन संचयन के उत्कृष्ट क्षेत्र हैं. इसके अलावा, जैसे-जैसे वैश्विक कार्बन बाजार विकसित हो रहे हैं, ‘ब्लू कार्बन क्रेडिट्स’ को प्रीमियम मूल्य पर व्यापार किया जा सकता है.
मैंग्रोव का सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व केवल उनकी सुरक्षा प्रदान करने वाली भूमिका तक सीमित नहीं है. वे सतत उद्यमों में नवाचार के लिए एक उपजाऊ आधार प्रदान करते हैं. दवा उद्योग, जैव प्रौद्योगिकी, कृषि और खाद्य क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए मैंग्रोव के सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए नवाचारी पायलट परियोजनाएँ शुरू कर सकती हैं. ऐसी परियोजनाओं में अनुसंधान और तकनीक के क्षेत्र के वैश्विक विशेषज्ञों की रणनीतिक भागीदारी शामिल हो सकती है, ताकि इन पारिस्थितिक तंत्रों से प्राप्त नए उत्पादों की पहचान, संग्रहण और उन्हें बाजार तक पहुँचाने का कार्य किया जा सके.
अगर स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर लाभ बांटने का सही मॉडल बनाया जाए, तो मैंग्रोव विकास में निजी निवेश बढ़ेगा. इससे कंपनियां टिकाऊ और नैतिक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़कर सभी की समृद्धि बढ़ा सकती हैं.
उच्च लवणता सहने वाली नई पौधों की किस्मों से, जो तटीय कृषि को बढ़ावा दे सकती हैं, लेकर टिकाऊ हस्तशिल्प वस्तुओं के निर्माण और औषधीय व कॉस्मेटिक उपयोग के लिए प्रकृति-आधारित उत्पादों के विकास तक, कई व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य आजीविका अवसरों की खोज की जा सकती है. अगर स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर लाभ बांटने का सही मॉडल बनाया जाए, तो मैंग्रोव विकास में निजी निवेश बढ़ेगा. इससे कंपनियां टिकाऊ और नैतिक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़कर सभी की समृद्धि बढ़ा सकती हैं.
भारत की तकनीकी क्षमता मैंग्रोव पुनर्जनन और संरक्षण के परिणामों को नई दिशा दे सकती है. उपग्रह आधारित मौसम निगरानी, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता/मशीन लर्निंग आधारित आईटी प्लेटफॉर्म का उपयोग भारत के मुख्य भूभाग और द्वीपों में मैंग्रोव पुनर्जनन के लिए उपयुक्त स्थानों की सटीक पहचान करने में किया जा सकता है. तटीय क्षेत्र की तैयारी, बीजारोपण, आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराना, विकास के चरणों का प्रबंधन, कटाई, उत्पादों के स्रोत का पता लगाना और ब्लू कार्बन की मात्रा व गुणवत्ता का लेखा-जोखा और प्रमाणन-इन सभी प्रक्रियाओं के माध्यम से भारत विश्व के लिए नए मॉडल प्रस्तुत कर सकता है. यह क्षेत्र कॉर्पोरेट कंपनियों, स्टार्ट-अप्स, शिक्षण संस्थानों और शोध प्रयोगशालाओं को तकनीकी विकास, वित्त जुटाने और नीतिगत सुझाव देने के लिए सहयोग का मंच भी प्रदान कर सकता है.
सरकार ऐसे मंच बना सकती है जो कंपनियों, निवेशकों और वित्त देने वाली संस्थाओं को समुदाय आधारित मैंग्रोव परियोजनाओं से जोड़ें. इससे निवेश बढ़ेगा, साझेदारी मजबूत होगी और मैंग्रोव संरक्षण के लिए स्थायी धन मिलेगा, जिससे तटीय क्षेत्रों का विकास और सुरक्षा बढ़ेगी.
सरकारी पहलों जैसे इंटीग्रेटेड मैंग्रोव फिशरी फार्मिंग सिस्टम (IMFFS), मैंग्रोव वनीकरण परियोजनाएँ, और MISHTI (मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स) के साथ-साथ बहुपक्षीय संस्थानों और भारत की विकसित व लोकप्रिय JAM ट्रिनिटी आधारित फिनटेक व्यवस्था की भागीदारी से मिश्रित वित्त (ब्लेंडेड फाइनेंस) के साधन तैयार किए जा सकते हैं. फर्स्ट-लॉस गारंटी, डेब्ट-फॉर-नेचर स्वैप और इम्पैक्ट बॉन्ड जैसे उपाय संभावित निवेश के जोखिम को कम कर सकते हैं और मैंग्रोव आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास के लिए बड़े पैमाने पर उद्यमशील पूंजी आकर्षित कर सकते हैं. ऐसे वित्तीय साधनों में किसी विशेष क्षेत्र, समय और समुदाय की जरूरतों के अनुसार लचीलापन भी हो सकता है.
WWF विज़न के एक अध्ययन के अनुसार, केवल सुंदरबन पारिस्थितिकी क्षेत्र में ही यदि अभी मैंग्रोव पुनर्जनन, कौशल विकास और टिकाऊ आवास जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटे निवेश किए जाएँ, तो इस सदी के अंत तक बहुत बड़े लाभ मिल सकते हैं. सरकार ऐसे मंच बना सकती है जो कंपनियों, निवेशकों और वित्त देने वाली संस्थाओं को समुदाय आधारित मैंग्रोव परियोजनाओं से जोड़ें. इससे निवेश बढ़ेगा, साझेदारी मजबूत होगी और मैंग्रोव संरक्षण के लिए स्थायी धन मिलेगा, जिससे तटीय क्षेत्रों का विकास और सुरक्षा बढ़ेगी.
प्रसाद अशोक ठाकुर आईआईटी बॉम्बे और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र हैं.
लाबन्या प्रकाश जेना लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (एलएसई) में विजिटिंग सीनियर फेलो और क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी इनिशिएटिव (सीएसआई) की निदेशक हैं.
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Prasad Ashok Thakur is a CIMO scholar and has authored a book and several articles published with The World Bank Asian Development Bank Institute United ...
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Labanya Prakash Jena is Director at the Climate and Sustainability Initiative (CSI) and a visiting senior fellow at the London School of Economics and Political ...
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