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आर्थिक सुस्ती और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच चीन अपनी आगे की आर्थिक दिशा तय कर रहा है. सेंट्रल इकोनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस दिखाती है कि विकास, तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा अब एक साझा रणनीति बन चुके हैं.
साल खत्म होने को है, इसी बीच सभी की निगाहें चीन की राजनीति के एक अहम आयोजन पर जाती हैं—सेंट्रल इकोनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस. इस बैठक में देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति, उस पर असर डालने वाले घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारक और आगे की नीति दिशा पर चर्चा की गई. भले ही यह बैठक बंद दरवाज़ों के पीछे होती है लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भाषण और सरकारी मीडिया की टिप्पणियों से नीति संकेत मिलते हैं.
इस वर्ष यह बैठक ऐसे दौर में हुई जब चीन और अमेरिका के बीच व्यापार तनाव अपने चरम पर था. डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद, वॉशिंगटन ने फिर से ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति को आक्रामक रूप से लागू करना शुरू किया. इस नीति के तहत अमेरिका ने चीन की आर्थिक और औद्योगिक नीतियों पर सख़्त रुख अपनाया. विशेष रूप से तकनीक हस्तांतरण, बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन, सरकारी सब्सिडी, मुद्रा नीति और व्यापार घाटे जैसे मुद्दों को लेकर चीन पर लगातार दबाव बनाया गया.
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद, वॉशिंगटन ने फिर से ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति को आक्रामक रूप से लागू करना शुरू किया. इस नीति के तहत अमेरिका ने चीन की आर्थिक और औद्योगिक नीतियों पर सख़्त रुख अपनाया.
ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य केवल व्यापार घाटा कम करना नहीं था बल्कि चीनी विनिर्माण और तकनीकी उन्नति को भी सीमित करना था. इसी रणनीति के तहत टैरिफ को एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया. कुछ चरणों में अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाकर 145 प्रतिशत तक कर दिया, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी आयात पर 125 प्रतिशत तक शुल्क लगा दिए. इस टैरिफ युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया और दोनों अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ाया.
हालाँकि, लगातार बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी रहे. अक्टूबर में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद दोनों देशों ने अस्थायी रूप से टैरिफ घटाने पर सहमति बनाई.
कुछ चरणों में अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाकर 145 प्रतिशत तक कर दिया, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी आयात पर 125 प्रतिशत तक शुल्क लगा दिए. इस टैरिफ युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया और दोनों अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ाया.
सम्मेलन में तकनीकी नवाचार को केंद्र में रखकर एक आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था बनाने पर ज़ोर दिया गया. इसे पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए निर्यात नियंत्रण, सप्लाई चेन में बाधाओं और चीन के अनुसार हो रहे “तकनीकी घेराव” की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. यह सम्मेलन केवल आर्थिक नीति तक सीमित नहीं था बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में चीन की एक रणनीतिक सोच को भी दर्शाता है. घरेलू नवाचार तंत्र को मज़बूत करना, अहम सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना और विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटाना अब राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गया है.
सम्मेलन में तकनीकी नवाचार को केंद्र में रखकर एक आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था बनाने पर ज़ोर दिया गया. इसे पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए निर्यात नियंत्रण, सप्लाई चेन में बाधाओं और चीन के अनुसार हो रहे “तकनीकी घेराव” की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है.
साथ ही, चीन विदेशी निवेश को आकर्षित करने की बात भी कर रहा है, यह मानते हुए कि विदेशी पूंजी और तकनीक अब भी उपयोगी हैं लेकिन यह खुलापन अब चयनात्मक है. वही निवेश प्राथमिकता पा रहे हैं जो चीन के औद्योगिक उन्नयन में सहायक हों जबकि संवेदनशील क्षेत्रों में सख़्त नियंत्रण बनाए रखे जा रहे हैं.
सम्मेलन में घरेलू खपत को बढ़ाना चीन की आर्थिक नीति की एक प्रमुख प्राथमिकता के रूप में उभरा. विश्व बैंक के अनुसार, कमजोर उपभोग अब चीन की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती बन चुका है. आबादी के बूढ़े होने, आय में असमानता, रोज़गार को लेकर अनिश्चितता और रियल एस्टेट क्षेत्र की सुस्ती ने लोगों की खर्च करने की क्षमता और इच्छा दोनों को प्रभावित किया है. इसी कारण सरकार उपभोक्ता मांग को फिर से सक्रिय करने के लिए कई उपायों पर काम कर रही है.
सम्मेलन में घरेलू खपत को बढ़ाना चीन की आर्थिक नीति की एक प्रमुख प्राथमिकता के रूप में उभरा. विश्व बैंक के अनुसार, कमजोर उपभोग अब चीन की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती बन चुका है.
सरकार बड़े उपभोक्ता सामानों—जैसे घरेलू उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स—की खरीद को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय संस्थानों की भूमिका बढ़ा रही है और ‘ट्रेड-इन’ जैसी योजनाओं को आगे बढ़ा रही है. इसके साथ ही सेवा क्षेत्र में भी नए अवसर तलाशे जा रहे हैं. पर्यटन, शिक्षा, खानपान और बुज़ुर्ग देखभाल जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष वित्तीय उत्पाद और नीतिगत समर्थन विकसित किए जा रहे हैं, ताकि रोज़गार के अवसर बढ़ें और घरेलू अर्थव्यवस्था को गति मिले.
China Daily और क़ियूशी (Qiushi) में प्रकाशित विश्लेषण इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उपभोग बढ़ाने का रास्ता केवल सब्सिडी देने तक सीमित नहीं है. असली चुनौती लोगों की आय बढ़ाने, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने और भविष्य को लेकर भय के कारण होने वाली ज़्यादा बचत को कम करने की है. जब नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और रोज़गार की स्थिरता पर भरोसा मिलता है, तभी वे आत्मविश्वास के साथ ज़्यादा खर्च करने के लिए तैयार होते हैं.
यह उपभोग-आधारित संरचनात्मक बदलाव चीन की ड्यूल सर्कुलेशन रणनीति से सीधे जुड़ा है. इस रणनीति में घरेलू आर्थिक चक्र को विकास का मुख्य आधार बनाया गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चक्र उसे सहारा देता है.
इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए चीन को एक एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ार तैयार करना होगा, हुकौ (घरेलू पंजीकरण) प्रणाली में सुधार करना होगा, परिवहन और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना होगा, और बाज़ार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करनी होगी. तभी घरेलू मांग मज़बूत होगी और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक स्थिरता मिल सकेगी.
सम्मेलन में “तकनीकी नवाचार को केंद्र में रखकर एक आधुनिक औद्योगिक प्रणाली” को तेज़ी से विकसित करने पर ज़ोर दिया गया. इसे पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए निर्यात नियंत्रण, सप्लाई चेन में रुकावटों और चीन के अनुसार हो रहे “तकनीकी घेराव” की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. इस नज़रिए से देखें तो यह सम्मेलन केवल एक आर्थिक बैठक नहीं था बल्कि बदलते और बिखरते वैश्विक व्यवस्था में चीन की एक रणनीतिक प्रतिक्रिया भी था. घरेलू नवाचार तंत्र को मज़बूत करना, अहम सप्लाई चेन को सुरक्षित करना और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना अब सिर्फ़ आर्थिक नीति का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल बन गया है. यह बात 2025 में जारी दस्तावेज़ न्यू एरा में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा में भी साफ़ तौर पर कही गई है.
यह उपभोग-आधारित संरचनात्मक बदलाव चीन की ड्यूल सर्कुलेशन रणनीति से सीधे जुड़ा है. इस रणनीति में घरेलू आर्थिक चक्र को विकास का मुख्य आधार बनाया गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चक्र उसे सहारा देता है.
साथ ही, सम्मेलन में “विदेशी निवेश को प्रभावी ढंग से आकर्षित और उपयोग करने” की बात भी कही गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी पूंजी, तकनीक और प्रबंधन विशेषज्ञता अब भी चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं—खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक कंपनियाँ अपनी सप्लाई चेन पर फिर से विचार कर रही हैं. लेकिन अब यह खुलापन चुनिंदा और रणनीतिक होता जा रहा है. वही निवेश प्राथमिकता पा रहे हैं जो चीन के औद्योगिक उन्नयन के लक्ष्यों के अनुकूल हों, जबकि संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों में नियम और सख़्त किए जा रहे हैं.
जैसे-जैसे चीन 2026 की ओर बढ़ रहा है, वह एक अहम मोड़ पर खड़ा है. जल्द ही 15वीं पंचवर्षीय योजना सामने आएगी, जो दशक के अंत तक देश की दिशा तय करेगी और 2027 में होने वाली 21वीं पार्टी कांग्रेस की पृष्ठभूमि भी बनाएगी. इस योजना का दीर्घकालिक लक्ष्य और भी बड़ा है—चीन के विकास मॉडल को नए सिरे से गढ़ना, तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल करना और एक अधिक प्रतिस्पर्धी वैश्विक माहौल के लिए अर्थव्यवस्था को तैयार करना.
कल्पित ए. मनकीकर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम में फेलो हैं।
अमित रंजन आलोक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं।
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Kalpit A Mankikar is a Fellow with Strategic Studies programme and is based out of ORFs Delhi centre. His research focusses on China specifically looking ...
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Amit Ranjan Alok is a Research Intern at ORF. He is a second-year PhD candidate in Chinese political economy at the Centre for East Asian ...
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