Author : Lavanya Mani

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 25, 2026 Updated 1 Days ago

ट्रंप की बहुपक्षवाद नीति का सटीक उदाहरण है, मादुरो के ख़िलाफ़ चलाया गया अभियान. इसमें कानूनी दांव-पेच, ख़ास मामलों में भागीदारी और नियमों की उपेक्षा- सब कुछ स्पष्ट दिख रहा है.

नया अमेरिकी मॉडल: सैन्य कार्रवाई, कानूनी जामा

हर कुछ वर्षों में, अमेरिका एकतरफ़ा सैन्य कार्रवाइयां करता है जिनसे संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर दुनिया भर में बहस शुरू हो जाती है. इसके साथ ही, ऐसी कार्रवाइयों को रोकने में संयुक्त राष्ट्र की असमर्थता पर भी सवाल उठने लगते हैं. यह रहस्य नहीं है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो मोरोस और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ने के लिए की गई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से पहले भी, सुरक्षा परिषद की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र चार्टर का कई बार ऐसा ही उल्लंघन हो चुका है. इराक, सीरिया आदि इसके उदाहरण हैं. हालांकि, यहां एक घटना ख़ास भी है. असल में, 1989 में जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश प्रशासन ने पनामा के नेता मैनुअल नोरीगा को गिरफ़्तार किया था, जिस घटना को वेनेजुएला में की गई कार्रवाई का आधार बताया गया है. अफ़ग़ानिस्तान, इराक या सीरिया में सैन्य लक्ष्य बड़े थे, लेकिन इनके उलट, नोरीगा और मादुरो के मामलों को अमेरिका ने कानूनी कार्रवाई बताया और संघीय कानूनों के तहत उनको ‘आपराधिक भगोड़ा’ के रूप में पेश किया. इससे विदेशी ज़मीन पर सैन्य कार्रवाई को जायज़ ठहराना आसान हो गया. हालांकि, दोनों मामलों में एक बड़ा अंतर भी है. नोरीगा के समय बड़े पैमाने पर आक्रमण किया गया था और फिर तख़्ता पलट किया गया, जबकि मादुरो के मामले में ‘लक्षित सैन्य कार्रवाई’ की गई. ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि इसे लोकतांत्रिक रूप से सत्ता-परिवर्तन बताया जा सके.

अंतरराष्ट्रीय कानून: सिर्फ़ दिखावटी

23 दिसंबर, 2025 को अमेरिकी न्याय विभाग को भेजे ज्ञापन (गैसर मेमो) में ‘मादुरो ऑपरेशन’ के लिए जो कानूनी वज़ह बताई गई, वह लाभ-हानि के गणित पर की जाने वाली कार्रवाई का मामला है. अमेरिकी आरोप (2020 में) के तहत एक आपराधिक भगोड़े पर ‘न्यायिक कार्रवाई’ बताकर, इसे एक सीमित और लक्षित कानूनी कार्रवाई के रूप में पेश किया गया, भले ही इसमें सेना का प्रयोग किया गया हो. इस ज्ञापन में नोरीगा मामले और कानूनी सिद्धांतों की बात कहते हुए यह कहा गया कि अमेरिकी संघीय अदालतों में मादुरो पर मुक़दमा चलाने के लिए उनकी गिरफ़्तारी का तरीका कोई रुकावट नहीं माना जाएगा.

यह रहस्य नहीं है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो मोरोस और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ने के लिए की गई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से पहले भी, सुरक्षा परिषद की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र चार्टर का कई बार ऐसा ही उल्लंघन हो चुका है. इराक, सीरिया आदि इसके उदाहरण हैं.

दरअसल, अमेरिकी नौसेना और वायु सेना ने 2025 में कैरेबियाई और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में ड्रग तस्करों के जहाज़ों पर सिलसिलेवार सैन्य हमले किए थे, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और अमेरिका द्वारा युद्ध शुरू करने से पहले कांग्रेस (संसद) की मंजूरी को लेकर सवाल उठे थे. इसके बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका इस क्षेत्र में ड्रग तस्करों के साथ ‘गैर-अंतर्राष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष’ (NIAC) में उतर चुका है. फिर, दिसंबर 2025 में नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (डोनरो सिद्धांत- जो मुनरो सिद्धांत को संशोधित करके ट्रंप ने तैयार किया है) जारी की गई, जिसमें नार्को-आतंकवाद और रणनीतिक महत्व के मद्देनज़र पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी सुरक्षा क्षेत्र घोषित किया गया और ड्रग तस्करों के ख़िलाफ़ ‘घातक कार्रवाई’ को उचित बताया गया. 16 नवंबर, 2025 को मादुरो और उनके क़रीबी लोगों पर ‘कार्टेल डे लॉस सोल्स’ नामक ड्रग कार्टेल चलाने का आरोप लगाया गया और इसे ‘विदेशी आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया गया. इस तरह मादुरो को ‘नार्को आतंकवादी’ बताया गया और उनके सभी कूटनीतिक अधिकार ख़त्म कर दिए गए. इस अभियान को ‘न्यायिक कार्रवाई’ और मादुरो को ‘आपराधिक भगोड़ा’ बताकर अमेरिका ने तीसरे जिनेवा कन्वेंशन (जो NIAC के मामले में लागू होता है) के तहत मादुरो को ‘युद्धबंदी’ मानने से भी इंकार कर दिया. इससे उनको मिलने वाली छूट ख़त्म हो जाती है. यानी, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मिलने वाली कूटनीतिक सुरक्षा और ‘युद्धबंदी’ के रूप में मिलने वाली राहतों को मादुरो से इसलिए छीन लिया गया, ताकि उनको न्यूयॉर्क की संघीय अदालत में अभियुक्त के रूप में पेश किया जा सके. हालांकि, वेनेजुएला अभियान ऐसा नहीं था. उसमें बुनियादी ढांचे और हवाई सुरक्षा तंत्र पर बड़े पैमाने पर बमबारी की गई, जिसमें कम से कम 83 लोग मारे गए. आम नागरिकों की मौत को लेकर तो अभी कुछ भी नहीं बताया गया है.

गैसर मेमो मुख्य रूप से घरेलू कानूनी कार्रवाई को सही बताता है. भले ही इसमें संप्रभुता और ‘न्यायिक कार्रवाई’ में बल प्रयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानूनों की चिंता की गई है, फिर भी सीमित बल प्रयोग की ज़रूरत बताकर उन चिंताओं पर चुप्पी भी साध ली गई है. अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानते हुए भी, इसमें अमेरिका की संवैधानिक स्थिति बताई गई है और कहा गया है कि अमेरिका जिन समझौतों का एक पक्ष है, वे घरेलू कानून के बराबर हैं, भले ही अमेरिकी अदालतों में उनकी अलग-अलग व्याख्या की जाती हो. इस मेमो में संभावित प्रतिरोध, क्षेत्रीय अस्थिरता, नागरिकों के नुक़सान और वेनेजुएला सरकार के पतन से जुड़े ख़तरों का भी ज़िक्र किया गया है, लेकिन अमेरिकी कार्रवाई के तुरंत बाद वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ को शपथ दिलाकर, सरकार की निरंतरता सुनिश्चित की गई, ताकि मादुरो के बिना वेनेजुएला से अधिक टिकाऊ द्विपक्षीय संबंध विकसित किए जा सकें. इसके कुछ दिनों के बाद 3 से 5 करोड़ बैरल तेल का सौदा करके अमेरिका ने मेमो में बताए गए ख़तरों को टाल दिया है. वेनेजुएला के तेल की पहली बिक्री से मिले 50 करोड़ डॉलर की रकम से वाशिंगटन को वैकल्पिक ख़रीदारों की तलाश करने और रूसी तेल का विकल्प उपलब्ध कराने में मदद मिली है. रोड्रिगेज़ सरकार की मंजूरी, तेल सौदा और तेल-कमाई की ‘वापसी’ को उपलब्धि बताया गया है और इसे अंतरराष्ट्रीय निंदा व संभावित कानूनी चुनौतियों के ख़िलाफ़ ढाल बनाया जा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) ‘किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या सैन्य हमले की धमकी को रोकता है.’ हालांकि, इसके लिए चार्टर में दो अपवाद भी हैं- (1) अनुच्छेद 51, जिसके माध्यम से देश ‘सशस्त्र हमले’ की स्थिति में अपना बचाव कर सकते हैं. (2) अनुच्छेद 42, जिसके माध्यम से सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए सभी ज़रूरी साधनों के इस्तेमाल की अनुमति दे सकती है. चूंकि वेनेजुएला की तरफ़ से न कोई सशस्त्र हमला किया गया और न ही इसकी धमकी दी गई थी, इसलिए अमेरिका अनुच्छेद 51 के तहत अपना कानूनी बचाव नहीं कर सकता था, जैसा कि उसने अफ़ग़ानिस्तान और इराक के मामले में किया था. और यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि अनुच्छेद 42 के तहत बचाव का दावा करने के लिए सुरक्षा परिषद की अनुमति लेना उसके लिए असंभव होता.

चीन और रूस ने सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक में अमेरिकी कार्रवाई की निंदा की और इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर व अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया. हालांकि, वह दक्षिण अफ्रीका (गैर-स्थायी देश) था, जिसने अनुच्छेद 2(4) (संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता) और अनुच्छेद 2(7) (किसी अन्य देश के घरेलू मामलों में दख़ल न करना) के तहत अमेरिका द्वारा किए गए उल्लंघनों का मामला उठाया. अमेरिका ने, जैसा कि तय था, आत्मरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा व गैसर मेमो में बताए गए मादुरो के अपराधों का ज़िक्र किया और अपनी कार्रवाई को उचित बताया. हालांकि, सुरक्षा परिषद में दक्षिण अफ्रीका के तर्क कानूनी रूप से ज़रूर उचित थे, लेकिन व्यावहारिक रूप से बेअसर रहे. फिर भी, उसने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कानून के मामलों में खुद को एक ‘समझदार’ देश के रूप में पेश किया, ठीक उसी तरह जैसे उसने इज़रायल-फ़लस्तीन संघर्ष के समय किया था. ऐसे वक्त में, जब वैश्विक शासन व्यवस्था में बड़े देश सत्ता-संघर्ष में उलझे हुए हैं, मध्यम ताक़तें ‘समझदार’ बनकर उभरी हैं.

ट्रंप प्रशासन के नज़रिये में निरंतरता और सामंजस्य की जो कमी दिख रही है, वह किसी तंत्र की ख़ामी के कारण नहीं है, बल्कि उसके काम करने का तरीका ही यही है. विवादित मुद्दों पर मक़सद समझने के लिए ट्रंप और उनके प्रशासन की रणनीति व कामकाज में तालमेल ढूंढने के बजाय, सभी देशों के लिए बेहतर यही होगा कि वे ख़ास मौकों पर जान-बूझकर की गई गड़बड़ी की रूपरेखा समझने का प्रयास करें और उन ख़ामियों को पहचानने की कोशिश करें.

यदि वेनेजुएला सरकार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में शिकायत दर्ज़ करने में सफल हो जाती, तब भी उसे शायद ही सफलता मिलती, क्योंकि 1986 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अमेरिका को निकारागुआ की क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करने का दोषी माना था, जिसके बाद वाशिंगटन ने खुद को अदालत के अनिवार्य क्षेत्राधिकार से अलग कर लिया है. इसके बावजूद, यदि वेनेजुएला यूक्रेन की तरह, जिसे रूस के ख़िलाफ़ सफलता मिली थी, अमेरिका को दोषी ठहराने में सफल हो जाता, तब भी उसे अमल में लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 94 के तहत सुरक्षा परिषद की ज़रूरत पड़ती, जहां अमेरिका अपने वीटो अधिकार का उपयोग करता. रूस ने भी यूक्रेन के ख़िलाफ़ यही रणनीति अपनाई थी. साफ़ है, अंतरराष्ट्रीय शासन प्रणाली में कई ख़ामिया हैं, क्योंकि इसमें जवाबदेही से बचने के लिए चोर दरवाज़े भी हैं.

बड़ी तस्वीर: ट्रंप प्रशासन का बहुपक्षवाद के प्रति नज़रिया

वैश्विक शासन प्रणालियों को लेकर ट्रंप प्रशासन क्या सोचता है, यह मादुरो ऑपरेशन से स्पष्ट है. जिस तरह इसमें कानूनी दांव-पेच खेला गया, चुनिंदा संस्थागत भागीदारी निभाई गई और अंतरराष्ट्रीय नियमों की जान-बूझकर अनदेखी की गई, उससे ट्रंप प्रशासन की बहुपक्षवाद नीति साफ़ हो जाती है. राष्ट्रपति ट्रंप ख़ास-ख़ास वैश्विक शासन संस्थाओं में इसलिए भागीदारी निभाते हैं, क्योंकि उनसे मिलने वाले फ़ायदे, उनमें चुकाई जा रही क़ीमतों से अधिक है. ट्रंप प्रशासन के नज़रिये में निरंतरता और सामंजस्य की जो कमी दिख रही है, वह किसी तंत्र की ख़ामी के कारण नहीं है, बल्कि उसके काम करने का तरीका ही यही है. विवादित मुद्दों पर मक़सद समझने के लिए ट्रंप और उनके प्रशासन की रणनीति व कामकाज में तालमेल ढूंढने के बजाय, सभी देशों के लिए बेहतर यही होगा कि वे ख़ास मौकों पर जान-बूझकर की गई गड़बड़ी की रूपरेखा समझने का प्रयास करें और उन ख़ामियों को पहचानने की कोशिश करें, जिनका इस्तेमाल मनचाहा नतीजा पाने के लिए किया जा रहा है. चाहे कोई इसे ट्रंप और उनके प्रशासन का ख़ास तरीका माने या वैश्विक शासन संबंधी मसलों पर अमेरिकी रणनीति में आया बदलाव, पर इतना तय है कि अमेरिकी प्रशासन द्वारा पैदा की गई मुश्किलों का असर ट्रंप कार्यकाल के बाद भी बना रहेगा.


लावण्या मणि ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में फेलो हैं.

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