ऐसा लग रहा है कि ब्रिक्स (BRICS) का अंतरिक्ष अन्वेषण संघ बनाने को लेकर भारत का दृष्टिकोण अब हक़ीक़त बनने की दिशा में बढ़ चला है. क्योंकि, रूस की परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटोम ने चांद पर छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर लगाने के लिए देशों के बीच साझा प्रयास करने का संकेत दिया है
व्लादिवोस्तोक में हाल ही में हुई 2024 के ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक में रोसाटोम के महानिदेशक एलेक्सी लिखाचेव की तरफ से एक ऐसा सनसनीख़ेज़ बयान दिया गया, जिसने दुनिया भर में सुर्ख़ियां बटोरीं. उन्होंने कहा कि, ‘हमें जिस नए समाधान को लागू करने के लिए कहा जा रहा है वो चांद पर परमाणु ऊर्जा का प्लांट लगाने का है, जिसकी क्षमता लगभग आधे मेगावाट की होगी. वैसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भागीदारी के साथ, हमारे चीनी और भारतीय साझीदार इस विचार में काफ़ी दिलचस्पी दिखा रहे हैं. हम कई अंतरिक्ष परियोजनाओं की आधारशिला रखने की कोशिश कर रहे हैं.’ उनके इस बयान के बाद ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि क्या सच में भारत, रूस और चीन किसी अंतरिक्ष परियोजना के लिए साथ आने जा रहे हैं. क्या ये भारत और चीन के बीच तनाव कम करने की कोई व्यवस्था है, जिसमें रूस मध्यस्थता कर रहा है, और ये प्रस्ताव किस तरह से चांद पर छोटे मॉड्यूलर एटमी रिएक्टर ले जाने की दिशा में उठा एक क़दम है.
ये ऐसा रिएक्टर होगा, जिसे किसी अंतरिक्ष यान से चांद पर भेजा जाएगा और फिर इंसानों के निर्देशन में ये रिएक्टर चांद पर तैनात किया जाएगा.
रोसाटोम और उसके ज़रिए रूस की सरकार ने जो प्रस्ताव रखा है, उसके तहत 0.5 मेगावाट क्षमता वाले बेहद छोटे मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर के निर्माण के लिए रिसर्च और विकास करना है. ये ऐसा रिएक्टर होगा, जिसे किसी अंतरिक्ष यान से चांद पर भेजा जाएगा और फिर इंसानों के निर्देशन में ये रिएक्टर चांद पर तैनात किया जाएगा. चांद से जुड़े रिसर्च में लगने वाले संसाधनों को अलग रखें, तो भी आज तक दुनिया ने इतनी कम क्षमता वाले परमाणु रिएक्टर को नहीं देखा है. रोसाटोम का प्रस्तावित न्यूक्लियर रिएक्टर तो अब तक के सबसे छोटे और विकसित किए जा रहे ऑरोरा नाम के उस माइक्रो मॉड्यूलर रिएक्टर के 1.5 मेगावाट क्षमता से कम है, जिसे विकसित करने के लिए अमेरिका की निजी कंपनी ओक्लो इनकॉर्पोरेशन अभी रिसर्च कर रही है. इस प्रस्तावित माइक्रो मॉड्यूलर रिएक्टर की बिजली बनाने की क्षमता रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर्स से कहीं ज़्यादा है, जिनका इस्तेमाल सुदूर अंतरिक्ष की खोज के लिए भेजे जाने वाले यानों में किया जाता है. ये जेनरेटर 500 वाट से भी कम बिजली बनाते हैं. माइक्रो मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर बहुत ही छोटे हों. उनके कल-पुर्ज़े भी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) से कहीं ज़्यादा छोटे होंगे. SMR की क्षमता 10 से 500 मेगावाट बिजली बनाने की होती है. इस मामले में हमें ‘छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर’ को लेकर हो रही चर्चा से प्रभावित होकर ये नहीं मान लेना चाहिए कि माइक्रो मॉड्यूलर रिएक्टर भी वही हैं. क्योंकि ऐसा है नहीं.
एलेक्सी लिखाचोव ने जिन माइक्रो रिएक्टर्स का ज़िक्र किया था वो बिल्कुल अलग हैं और SMR से उनका कोई वास्ता नहीं है. एटमएक्सपो 2024 के दौरान रोसाटोम ओवरसीज़ ने कहा कि वो भारत के परमाणु तंत्र के साथ बातचीत कर रहे हैं, ताकि भारत को छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर की तकनीक बेची जा सके. तो, अगर SMR की तकनीक रूस से भारत को मार्च 2024 में बेची जा रही थी, तो सितंबर 2024 में इसके संयुक्त विकास के प्रस्ताव का उससे कोई संबंध नहीं हो सकता है. माइक्रो मॉड्यूलर रिएक्टर असल में रिएक्टरों का नया वर्ग है, जो SMR से अलग है और इसका मक़सद सामरिक वैज्ञानिक और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए रिएक्टर बनाना है.
पिछले चार वर्षों के दौरान चीन ने इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (ILRS) की दिशा में काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. चीन ने कई देशों की भागीदारी वाले चांद संबंधी इस रिसर्च स्टेशन वाली विशाल परियोजना की घोषणा 2016 में की थी. ILRS वास्तव में चीन की अगुवाई वाली परियोजना है, जिसमें 2021 में जाकर रूस भी भागीदार बना था. 2020 तक रूस, चांद की संयुक्त रूप से खोज की भावना के तहत अमेरिका की अगुवाई वाले आर्टेमिस कार्यक्रम का हिस्सा बनने के प्रस्ताव में दिलचस्पी ले रहा था. आज रूस और चीन को छोड़ दें तो ILRS के भागीदार देशों में वो देश हैं, जिन्होंने चांद पर उतरने और वहां कोई अभियान चलाने की क्षमता स्वतंत्र रूप से नहीं विकसित की है. इस योजना के लिए एक और सक्षम साझीदार की ज़रूरत है और इस दुर्लभ क्षमता वाला एक ही देश है, जो भारत है.
इस वक़्त रूस का पूरा ध्यान चांद पर उतरने की अपनी योजना को कामयाब बनाने पर है; जहां तक ILRS की बात है, तो इसके चार मिशन में से चीन को दो यानी चैंग’ये 4 और चैंग’ये 6 में कामयाबी हासिल हुई है. वहीं रूस के पास केवल लूना 26 नाम का एक ही मिशन बचा हुआ है, जिसको लेकर रूस को अपेक्षा है कि वो कामयाब होगा. बदक़िस्मती से लूना 25, चांद पर उतरते वक़्त टकरा गया था. चांद से जुड़े चीन और रूस के इन चार मिशनों में से ILRS के मिशन के मौजूदा डैशबोर्ड में एक छद्म पाकिस्तानी मिशन का भी ज़िक्र है. हालांकि, सच्चाई ये है कि ये चीन का एक छोटा सैटेलाइट आईक्यूब-क़मर है. ILRS में पाकिस्तान की इस नक़ली और ज़बरदस्ती जुटाई गई भागीदारी की वजह से भारत इस समूह से और भी दूरी बनाकर रखेगा. वहीं चीन ने हिफेई में इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना करके इस पर अपना शिकंजा और कस लिया है. ये रूस को पसंद आने वाली बात नहीं होगी. क्योंकि, इन क़दमों से रूस, धीरे धीरे ILRS का छोटा और चीन का मातहत भागीदार नज़र आने लगा है. अगर कोई ये समझना चाहे, तो रोसाटोम के एलेक्सी लिखाचोव के बयान में जो संदेश छुपा है वो ये कि उन्होंने चांद के लिए रूस की योजनाओं में भारत की संभावित भागीदारी का ये बयान ‘व्लादिवोस्टोक’ से दिया, जो पहले से ही रूस और चीन के रिश्तों में कांटा बना हुआ है. भारत तो शायद ILRS में शामिल न हो. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि भारत ने रूस के प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया है; हां, इसके तौर तरीक़े शायद अलग होंगे.
चीन ने हिफेई में इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना करके इस पर अपना शिकंजा और कस लिया है. ये रूस को पसंद आने वाली बात नहीं होगी. क्योंकि, इन क़दमों से रूस, धीरे धीरे ILRS का छोटा और चीन का मातहत भागीदार नज़र आने लगा है.
2023 में दक्षिण अफ्रीका में हुए BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष की खोज के लिए ब्रिक्स देशों का संघ बनाने का एक असाधारण प्रस्ताव रखा था. इस समूह में शायद वो देश शामिल होंगे जो अपने तकनीकी, वित्तीय और मानव संसाधन लगाएंगे और अपनी सरकारी और निजी संस्थाओं के ज़रिए चंद्रमा और अंतरिक्ष के दूसरे हिस्सों की तलाश में मिलकर हिस्सा ले सकेंगे. तो, अगर देशों का कोई बड़ा समूह अंतरिक्ष में इंसानों के लंबे समय तक रह सकने की आधारशिला या ढांचा रखेगा, तो चांद पर इस प्रस्तावित मानव केंद्र के निर्माण और संचालन के लिए ज़रूरी तकनीक में सक्षम देश भी सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा के वो संसाधन मुहैया कराने में अपना फ़ायदा देखेंगे, जिनका प्रस्ताव रोसाटोम ने सामने रखा है. चांद पर ऊर्जा के केवल दो स्रोत हो सकते हैं. सौर ऊर्जा की बैटरी और परमाणु ऊर्जा, और अगर हम बिजली उत्पादन की लागत, अंतरिक्ष के मौसम और छोटे मोटे उल्का पिंडों के ख़तरे और सौर ऊर्जा के पैनलों के कचरे के लिहाज से देखें, तो परमाणु ऊर्जा कहीं ज़्यादा मुफ़ीद मालूम देती है.
अपने अस्तित्व के पिछले 15 वर्षों में ब्रिक्स एक समझदार बहुपक्षीय संगठन के तौर पर उभरा है, जिसने वैज्ञानिक सहयोग के लिए काफ़ी गुंजाइशें पैदा की हैं. ब्रिक्स के भीतर तीन कार्यकारी समूह बने हैं, जो प्रस्तावित माइक्रो मॉड्यूलर रिएक्टर के साझा मक़सद पर समानांतर रूप से काम कर रहे हैं.
ब्रिक्स का एस्ट्रोनॉमी वर्किंग ग्रुप विश्वविद्यालयों, रिसर्च के संस्थानों और देशों की प्रमुख प्रयोगशालाओं के बीच आपसी सहयोग से एस्ट्रोनॉमी के रिसर्च में सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है. 2023 में इस वर्किंग ग्रुप की मीटिंग के दौरान सदस्यों ने दो अहम पहलुओं पर फ़ैसला किया था: पहला, इस कार्यकारी समूह को रिसर्च की सोसाइटी या एसोसिएशन में तब्दील करना और दूसरा, खगोल शास्त्र के ज्ञान को आपस में साझा करने के बजाय इसकी समझ बढ़ाने के संसाधनों का संयुक्त रूप से विकास करना था.
2024 में रूस की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने पहले न्यूक्लियर मेडिसिन फोरम की स्थापना की गई, जो अब रेडियो फार्मास्यूटिकल्स का इस्तेमाल करके कैंसर और दूसरी बीमारियों के इलाज के अवसर तलाश रहा है. अब ये मंच तमाम देशों में क्लिनिकल ट्रायल के केंद्र स्थापित करेगा और इन देशों के रेडियो फार्मास्यूटिकल्स संबंधी और क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों से जुड़े अलग अलग नियम क़ायदों के बीच तालमेल स्थापित करेगा और सभी देशों के यहां विशेषज्ञों के निरीक्षण की प्रक्रिया तय करेगा.
चाहे कितना भी छोटा हो, पर किसी शांतिपूर्ण, वैज्ञानिक परमाणु ठिकाना निर्मित करने के लिए दुनिया भर में भरोसे के निर्माण की ज़रूरत होगी.
रिसर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड मेगा साइंस प्रोजेक्ट्स को लेकर ब्रिक्स का वर्किंग ग्रुप 2015 में अपनी स्थापना के बाद से ही मेगा-साइंस के रिसर्च करने के लिए सदस्य देशों की गिनी चुनी प्रयोगशालाओं तक पहुंच बनाने के लिए एक साझा मंच मुहैया करा रहा है. ये वर्किंग ग्रुप सदस्य देशों की सरकारों की मंज़ूरी वाली प्रयोगशालाओं से जुड़ा है, और अब ऐसी मेगा परियोजनाओं की पहचान करने में लगा हुआ है, जिसे सदस्य देश मिलकर निर्मित और संचालित कर सकते हैं, और उनके दरवाज़े ब्रिक्स से बाहर के देशों के लिए खोले जा सकें.
तो अगर किसी माइक्रो मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर का ख़्वाब पूरा करना है, तो अंतरिक्ष की खोज के प्रस्तावित समूह को इन मौजूदा बहुपक्षीय तकनीकी कार्यकारी समूहों से काफ़ी मदद मिल सकती है. खगोलशास्त्र का कार्यकारी समूह धरती पर टेलिस्कोप स्थापित करके अंतरिक्ष के हालात के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद कर सकता है, जिससे किसी रिएक्टर का निर्माण और संचालन बहुत सहजता से किया जा सके. न्यूक्लियर मेडिसिन का फोरम स्पेस बायोलॉजी, रेडिएशन बायोलॉजी और स्पेस मेडिसिन पर रिसर्च की पहलों में बहुत मददगार साबित हो सकता है, ताकि अंतरिक्ष में रहने वालों और उनके आवास की अच्छी सेहत सुनिश्चित की जा सके. मेगा प्रोजेक्ट का वर्किंग ग्रुप, माइक्रो रिएक्टर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बहुपक्षीय वैज्ञानिक महा-परियोजना की बुनियाद रख सकता है. ये फोरम ब्रिक्स को अपनी सदस्यता वाले देशों से इतर दूसरे देशों को भी इस विशाल परियोजना में भागीदार बनने में सहायक साबित हो सकता है.
चाहे कितना भी छोटा हो, पर किसी शांतिपूर्ण, वैज्ञानिक परमाणु ठिकाना निर्मित करने के लिए दुनिया भर में भरोसे के निर्माण की ज़रूरत होगी. अगर ब्रिक्स इस परियोजना के निर्माण और संचालन की अगुवाई करने का फ़ैसला करता, तो भी इसके निरीक्षण, सुरक्षा के उपायों और देशों के बीच आपसी भरोसा बनाने वाले उपायों के मामले में उसे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा स्थापित नियमों का पालन करना ही होगा. ये भी संभावना है कि आर्टेमिस कार्यक्रम के कुछ भागीदार देश भी इस परियोजना में दिलचस्पी दिखाएं या फिर ऐसा ही, पर प्रतिद्वंदिता न करने वाला रिएक्टर बनाने की कोशिश करें. ये रिएक्टर बनाने के प्रयास तो शायद होंगे ही. क्योंकि रॉल्स रॉयस पहले से ही चांद पर ऐसा रिएक्टर लगाने की परियोजना पर काम कर रही है. ऐसे सारे क़दम उठाए जाने चाहिए, ताकि ऐसी कोई भी परियोजना मानवता के सामूहिक वैज्ञानिक हित वाली हो और अंतरिक्ष में दबदबा क़ायम करने की होड़ लगाने वाले दो समूहों का खेल न बन जाए.
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Dr. Chaitanya Giri is a Fellow at ORF’s Centre for Security, Strategy and Technology. His work focuses on India’s space ecosystem and its interlinkages with ...
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