आम बजट 2026 भारत के समुद्री क्षेत्र के लिए एक अहम मोड़ है जिसमें बंदरगाहों, जलमार्गों और जहाज निर्माण पर नया ज़ोर दिया गया है. जानें कैसे ये फैसले व्यापार, रोज़गार और राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करते हुए भारत के समुद्री भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं.
भारत का आम बजट 2026 देश के समुद्री इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण पल है. इसमें शिपिंग, जहाज बनाने, कंटेनर का निर्माण और जलमार्गों पर नए सिरे से ज़ोर दिया गया है. ऐसा करके बजट में ये स्वीकार किया गया है कि आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और ग्लोबल कॉम्पिटिशन में इन क्षेत्रों की अहम भूमिका है. वर्तमान में वैश्विक व्यापार के रास्ते बदल रहे हैं, आपूर्ति श्रृंखलाओं को फिर से आकार दिया जा रहा है. ऐसे में बजट 2026 साफ संकेत देता है कि भारत का समुद्री भविष्य अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करते हुए घरेलू ताकत पर फोकस करेगा.
बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) की भूमिका बढ़ने के साथ, बजट में वित्त वर्ष 26-27 के लिए 5,165 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं जो पिछली बार से लगभग 48 प्रतिशत ज़्यादा है. यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार समुद्री व्यापार, बुनियादी ढांचा और परिवहन प्रणालियों को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता को दिखाता है. अगर इनका प्रभावी कार्यान्वयन किया गया तो ये उपाय समुद्री क्षेत्र में भारत की औद्योगिक क्षमता को बढ़ा सकते हैं, साथ ही समुद्रों की सांस्कृतिक भूमिका को भी वापस ला सकते हैं.
बजट भारत के लिए राष्ट्रीय जलमार्गों को एक व्यावहारिक, टिकाऊ और सतत परिवहन के विकल्प के तौर पर बढ़ावा देता है. अगले पांच सालों में 20 और राष्ट्रीय जलमार्ग शुरु करने का प्रस्ताव है जिसकी शुरुआत ओडिशा में राष्ट्रीय जलमार्ग-5 से होगी. यह भारत के नदी परिवहन नेटवर्क को बढ़ाने के इरादे को दिखाता है. ये जलमार्ग तलचर और अंगुल जैसे खनिज से भरपूर इलाकों को पारादीप और धामरा जैसे बंदरगाहों से जोड़ने में भी मदद करेंगे जिससे माल ढुलाई की लागत कम होगी. इसके अलावा, कार्गो ट्रैफिक में 21 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर(सीएजीआर) से 700 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ, जलमार्गों की ऑपरेशनल लंबाई 2,716 किमी से बढ़ाकर 5,155 किमी से ज़्यादा कर दी गई है. इससे सड़क और रेल नेटवर्क पर भीड़ कम हुई है.
बजट में ये स्वीकार किया गया है कि आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और ग्लोबल कॉम्पिटिशन में इन क्षेत्रों की अहम भूमिका है. वर्तमान में वैश्विक व्यापार के रास्ते बदल रहे हैं, आपूर्ति श्रृंखलाओं को फिर से आकार दिया जा रहा है.
अभी, अंतर्देशीय जलमार्ग एक्ट, 2016 द्वारा पहचाने गए देश भर के 111 राष्ट्रीय जलमार्ग में से 32 सक्रिय हैं. इनमें से, गंगा-भागीरथी-हुगली रूट पर राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पहले ही व्यावसायिक तौर पर फायदेमंद बन गया है. इसके अलावा, टर्मिनल अपग्रेड और पश्चिम बंगाल में 830 करोड़ रुपये से ज़्यादा के नए जलमार्ग और रेलवे परिवहन से जुड़ी हालिया घोषणा हुगली नदी के आसपास के इलाके के बढ़ते महत्व को दिखाती है. बजट में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में विभिन्न संपर्क पहलों पर भी ज़ोर दिया गया है जिसमें औद्योगिक गलियारे और पर्यटन केंद्र शामिल हैं.
बजट में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के ज़रिए मल्टी मॉडल इंटीग्रेशन पर ज़ोर दिया गया है. पश्चिम बंगाल के डानकुनी से सूरत तक प्रस्तावित ईस्ट-वेस्ट फ्रेट कॉरिडोर का मक़सद रेल, सड़क, अंदरूनी जलमार्ग और बंदरगाहों को एक निर्बाध ढुलाई कॉरिडोर से जोड़ना है. अंदरूनी जहाज़ों के लिए स्थानीय क्षमता बनाने और नदी-आधारित परिवहन का विस्तार करने के लिए वाराणसी और पटना में जहाज़ मरम्मत सुविधाओं की भी योजना बनाई जा रही है. इन उपायों का मकसद भारी माल ढुलाई को धीरे-धीरे सड़क और रेल से हटाकर जल परिवहन पर लाना है. केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे बड़े जलमार्ग वाले दूसरे राज्यों में भी ऐसी परियोजनाओं को बढ़ाना बहुत ज़रूरी होगा. हालांकि, बजट का दूरगामी लक्ष्य 2047 तक अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय शिपिंग का हिस्सा 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करना है. ये लक्ष्य महत्वाकांक्षी लग सकता है, लेकिन इससे भारत को ज़्यादा टिकाऊ और मज़बूत लॉजिस्टिक्स फ्रेमवर्क बनाने में मदद मिलेगी.
पांच सालों में 10 हज़ार करोड़ रुपये की कंटेनर निर्माण सहायता योजना के साथ बजट में समुद्री सेक्टर में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है. भारत अभी भी कंटेनर के आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. समुद्री व्यापार भारत के कुल व्यापार का मात्रा के हिसाब से लगभग 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से लगभग 70 प्रतिशत है. फिर भी, भारत का ग्लोबल शिपबिल्डिंग आउटपुट अभी 1 प्रतिशत से भी कम है जबकि भारत का लक्ष्य 2047 तक दुनिया के टॉप पांच जहाज निर्माण करने वाले देशों में शामिल होना है. इन क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित करने से आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती बढ़ेगी. इतना ही नहीं, इससे समुद्री अमृत काल के विज़न 2047 के तहत सोचे गए वैश्विक ढुलाई आपूर्ति श्रृंखला में भारत को प्रतिस्पर्धी बढ़त मिलेगी. इसके लिए, बजट में GIFT IFSC (गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज़ सेंटर) और ऑफशोर बैंकिंग यूनिट्स के लिए बढ़े हुए टैक्स बेनिफिट्स भी दिए गए हैं. इसके साथ ही, जहाजी बेड़ों के विस्तार और घरेलू मालिकाना हक को बढ़ावा देने के लिए जहाजों पर सीमा शुल्क में छूट को भी संशोधित किया गया है.
इन उपायों का मकसद भारी माल ढुलाई को धीरे-धीरे सड़क और रेल से हटाकर जल परिवहन पर लाना है. केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे बड़े जलमार्ग वाले दूसरे राज्यों में भी ऐसी परियोजनाओं को बढ़ाना बहुत ज़रूरी होगा.
यह पहल सिर्फ़ एक औद्योगिक प्रोत्साहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े आत्मनिर्भर भारत विज़न का हिस्सा है. इसका मकसद कंटेनर निर्माण, बंदरगाह विकास, अंतर्देशीय जलमार्ग, लॉजिस्टिक्स पार्क और शिप बिल्डिंग में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है. इसका मतलब होगा 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से ज़्यादा अप्रत्यक्ष नौकरियों का पैदा होना. एक फायदा ये भी होगा कि, भारत पर ग्लोबल शिपिंग में बाहरी झटकों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. इसके अलावा, बजट में स्वदेशी सी-प्लेन मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशन के लिए भी प्रोत्साहन दिए गए हैं जिससे आखिरी छोर तक संपर्क को बेहतर बनाया जा सके और दूरदराज और द्वीपीय इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके. यह अनूठी पहल दिखाती है कि भारत अपने परिवहन व्यवस्था में विविधता लाना चाहता है.
इसके अलावा, बजट में मानव पूंजी और क्षमता निर्माण में एक साथ निवेश का वादा किया गया है. अंतर्देशीय जलमार्ग और समुद्री संचालन में प्रशिक्षण के लिए रीजनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस प्रस्तावित है. इसका मक़सद नदी और तटीय इलाकों में कुशल कर्मचारी तैयार करना है.
बजट में भारत की समुद्री विरासत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति के तौर पर भी दिखाया गया है. इसमें 15 पुरातात्विक स्थलों को पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित करने का प्रस्ताव है, जिसमें लोथल और धोलावीरा शामिल हैं. लोथल की गिनती दुनिया के सबसे पुराने डॉकयार्ड में से एक के तौर पर की जाती है, और यह सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख बंदरगाह था. अभी गुजरात में भारत के महत्वाकांक्षी 400 एकड़ के राष्ट्रीय समुद्री विरासत कॉम्प्लेक्स (एनएचएमसी)बनाया जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत 4,500 करोड़ रुपये है.
एक फायदा ये भी होगा कि, भारत पर ग्लोबल शिपिंग में बाहरी झटकों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. इसके अलावा, बजट में स्वदेशी सी-प्लेन मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशन के लिए भी प्रोत्साहन दिए गए हैं जिससे आखिरी छोर तक संपर्क को बेहतर बनाया जा सके और दूरदराज और द्वीपीय इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके.
MoPSW की अगुवाई में, एनएचएमसी को एक विश्व स्तरीय संग्रहालय और नॉलेज हब के तौर पर डेवलप किया जा रहा है, जिससे भारत के समुद्री व्यापार और नेविगेशन के साथ लंबे समय से चले आ रहे जुड़ाव को दिखाया जा सके. कॉम्प्लेक्स का विस्तार करने और इसके आस-पास के इलाकों को विकसित करने से समुद्री विरासत पर्यटन और जागरूकता को काफी बढ़ावा मिल सकता है. इसके अलावा, एनएचएमसी में पहले से ही शोध का काम भी चल रहा है. धोलेरा में बन रहा ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को लोथल तक सीधे हवाई कनेक्टिविटी देगा.
जर्मनी, नीदरलैंड, वियतनाम, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, थाईलैंड और पुर्तगाल जैसे देशों के साथ इसे लेकर कुछ समझौते भी हए हैं. ये दिखाता है कि भारत अब एनएचएमसी की वैश्विक प्रासंगिकता, समुद्री विरासत संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी में बढ़ते नेतृत्व को गंभीरता से ले रहा है. लोथल और धोलावीरा जैसी जगहों को विकसित किए जाने से भारत की सांस्कृतिक पहचान भी मज़बूत होगी. इससे पर्यटन और शिक्षा को सहयोग मिलेगा. भारत की पुरानी समुद्री परंपराएं उसकी समुद्री महत्वाकांक्षाओं से जुड़ सकेंगी.
आम बजट 2026 भारत की समुद्री नीति पर सोच-समझकर दोबारा विचार करने का सुझाव देता है. बुनियादी ढांचा, निर्माण, कौशल विकास और विरासत को जोड़ने के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण पर ज़ोर देता है. इसके साथ ही, बजट का ध्यान घरेलू क्षमताओं को बनाने और इस क्षेत्र में नए रोज़गार के मौके पैदा करने पर भी है. बेहतर अंतर्देशीय जलमार्ग कनेक्टिविटी से ढुलाई की लागत घटाने और पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे असर को कम करने में मदद मिल सकती है. इससे भारत को प्रतिस्पर्धी बढ़त मिलेगी. समुद्री विरासत में निवेश भारत के सांस्कृतिक प्रभाव और सॉफ्ट पावर को मज़बूत करता है.
हालांकि, असली परीक्षा इसे प्रभावी ढंग से लागू करने और बड़े पैमाने पर फायदे सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश में इसे सही तरीके से फैलाने में होगी. सफलता और नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि संस्थानों के बीच किस तरह का तालमेल होगा, समय पर आर्थिक मदद, श्रमबल मुहैया कराने और गति बनाए रखने पर कितना काम किया जा सकता है. अगर लोगों को केंद्र में रखकर इसे अच्छे तरीके से लागू किया जाता है, तो ये कोशिशें आर्थिक और रणनीतिक दोनों लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकती हैं. इसके साथ ही, भारत की समुद्री विरासत को वैश्विक समुद्री भविष्य की संभावनाओं से जोड़ सकती हैं.
अनुषा केसरकर गवांकर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...
Read More +