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Published on Dec 08, 2025 Updated 5 Days ago

भारत में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद स्थानीय स्वशासन विकेंद्रित शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण साधन बन गया है जो लोकतंत्र को गहरा कर रहा है और ज़मीनी स्तर पर लोगों को सशक्त बना रहा है. 

जानें कैसे 73वां और 74वां संशोधन बदल रहा ग्रामीण भारत?

सत्ता का विकेंद्रीकरण लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की पहचान है. भारत में स्थानीय स्वशासन ज़मीनी स्तर पर स्थानीय हितधारकों को सशक्त बनाकर विकेंद्रित शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण साधन बनकर उभरी है. 73वां और 74वां संविधान संशोधन प्रमुख विधायी साधन के रूप में काम करते हैं जिन्होंने पिछले तीन दशकों के दौरान इस उल्लेखनीय परिवर्तन को आसान बनाया है. 1993 में पारित इन संशोधनों ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय स्वशासन की स्थापना को अनिवार्य बनाते हुए उनकी फंडिंग का एक सुव्यवस्थित तरीका भी बनाया है. इन संशोधनों ने एक त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था की प्रणाली निर्धारित की यानी ग्रामीण क्षेत्रों में गांव, ब्लॉक और ज़िला जबकि शहरी क्षेत्रों में शहरी पंचायत, नगरपालिका और नगर निगम. इनका कार्यकाल पांच वर्षों के लिए तय किया गया (भंग होने की स्थिति में छह महीनों में नया चुनाव). ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के इस संस्थागत रूप ने देश भर में उनकी बनावट और काम-काज को लेकर बेहद आवश्यक एकरूपता सुनिश्चित की है. 

  • स्थानीय शासन को समावेशी बनाया गया—SC/ST आरक्षण और महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें सुनिश्चित की गईं।
  • ग्रामीण-शहरी निकायों के 30+ लाख प्रतिनिधि सशक्त हुए, जिनमें 13 लाख महिलाएं हैं।
  • कोविड-19 में नीचे-से-ऊपर मॉडल ने राहत दी और स्थानीय सरकारों ने नियामक-कल्याणकारी दोनों भूमिकाएँ निभाईं।

इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि इसने सुनिश्चित किया है कि स्थानीय शासन व्यवस्था की संरचना समावेशी हो. इसने आरक्षण के माध्यम से SC/ST को प्रतिनिधित्व प्रदान किया है, साथ ही ये भी सुनिश्चित किया है कि एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो. इसके अलावा भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची में 29 विषयों को विशेष रूप से सूचीबद्ध किया गया है जिनकी ज़िम्मेदारी स्थानीय निकायों को सौंपी जा सकती है. 1996 के पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम या PESA ने आदिवासी समुदायों को सशक्त बनाने के लिए संविधान की 5वीं अनुसूची के तहत सूचीबद्ध क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन का नियम लाने का काम किया. दो लाख से ज़्यादा ग्रामीण पंचायत निकायों और करीब 4,000 शहरी नगर निकायों के लगभग 30 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों को स्थानीय स्वशासन में भाग लेने का अधिकार दिया गया है. 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में से 13 लाख महिलाएं हैं. संविधान संशोधनों ने न केवल ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक सशक्तिकरण को आसान बनाया है बल्कि महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने और शासन व्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है. इसकी गहन पड़ताल की आवश्यकता है. 

73वें–74वें संशोधन के बाद स्थानीय स्व-शासन लोकतंत्र को गहरा कर रहा है और ज़मीनी स्तर पर लोगों को सशक्त बना रहा है।

ज़मीनी स्तर पर सशक्त संस्थान

ज़मीनी स्तर पर संस्थागत स्वायत्तता को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्वशासन को लेकर कानून के तहत राज्यों के लिए पंचायतों और नगर निकायों को अधिकार देना आवश्यक है ताकि वो “स्वशासन के संस्थान के रूप में काम करने में सक्षम हों”. पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन और समावेशी भागीदारी के माध्यम से स्थानीय संसाधनों का लाभ उठाकर ज़मीनी स्तर पर आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने में ग्राम सभा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसके अलावा ग्राम सभा (पंचायत प्रणाली का सबसे निचला स्तर) की वैधानिक ग्राम-स्तरीय स्थायी समिति यानी ग्राम उन्नयन समिति की स्थापना के लिए 1973 के पंचायत अधिनियम में एक संशोधन 2003 में पारित किया गया. ग्राम उन्नयन समिति कल्याणकारी लाभों को लागू करने, रखरखाव और न्यायसंगत वितरण में ज़मीनी स्तर पर लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती है. मोटे तौर पर स्थानीय स्वशासन की सफलता को परिभाषित करने वाले चार प्रमुख तत्व हैं- कुशल कल्याणकारी वितरण, शासन व्यवस्था के लिए नीचे से ऊपर की ओर का दृष्टिकोण, महिला सशक्तिकरण और शासन व्यवस्था की नई पहल. 

सत्ता का विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की पहचान है, और 73वां-74वां संशोधन पिछले तीन दशकों में इस बदलाव के प्रमुख साधन बने हैं।

कुशलता से भलाई प्रदान करना 

भारत में स्थानीय शासन व्यवस्था के काम-काज की समीक्षा विकास के मामले में उनके सकारात्मक प्रभाव को उजागर करती है. वो अलग-अलग सरकारी पहलों के माध्यम से स्थानीय आर्थिक विकास, सामाजिक-आर्थिक उद्धार और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देती हैं. इसमें उनके काम-काज के क्षेत्रों के लिए स्थानीय विकास योजना तैयार करना; स्वास्थ्य, शिक्षा, ग़रीबी उन्मूलन, आवास जैसे क्षेत्रों में शहरी और ग्रामीण स्तर पर विभिन्न प्रकार की योजनाओं को लागू करना शामिल है. गांव के अभिलेखों (रिकॉर्ड) का रखरखाव और सड़कों, तालाबों एवं कुओं का निर्माण, देखरेख तथा मरम्मत समेत उनकी प्रशासनिक गतिविधियां भी ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वो लोगों की शिकायतों का समाधान करने और छोटे-मोटे सिविल एवं आपराधिक मामलों की सुनवाई करने के लिए अपने न्यायिक काम-काज के माध्यम से इंसाफ भी देती हैं. इसके लिए अलग न्याय पंचायत या ग्राम पंचायत होती हैं.  

नीचे से ऊपर की ओर दृष्टिकोण 

स्थानीय शासन के नीचे से ऊपर की ओर दृष्टिकोण ने कोविड-19 महामारी जैसे अप्रत्याशित संकट में राहत प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि इस दौरान शासन व्यवस्था का ऊपर से नीचे का मॉडल अपर्याप्त साबित हुआ. इसने न केवल स्थानीय स्तर पर आवश्यक नेतृत्व सुनिश्चित किया बल्कि ख़तरों को कम करने और तुरंत चिकित्सा सहायता प्रदान करने में भी मदद की. स्थानीय सरकारों ने नियामक और कल्याणकारी- दोनों तरह के काम-काज किए. लॉकडाउन के दौरान उन्होंने कंटेनमेंट ज़ोन स्थापित किए, परिवहन की व्यवस्था की, लोगों को क्वॉरंटीन करने के लिए इमारतों की पहचान की और प्रवासी कामगारों के लिए खाने-पीने का प्रावधान किया. उन्होंने क्वॉरंटीन सेंटर में सख्त निगरानी रखने और घरों में लक्षणों पर नज़र रखने के लिए समुदाय-आधारित निगरानी प्रणाली भी बनाई जिसमें गांव के बुजुर्ग, युवा और स्वयं-सहायता समूह (SHG) शामिल थे. इसके अलावा MGNREGA (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम) 2005 जैसे कल्याणकारी कार्यक्रमों और योजनाओं को लागू करने के उनके लगातार प्रयासों ने संकट के दौरान कमज़ोर लोगों को सहायता प्रदान की. महामारी से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करने में ग्राम सभाओं की भूमिका और समितियों के माध्यम से आशा एवं आंगनवाड़ी कर्मियों जैसे अग्रिम मोर्चे के कामगारों के साथ नियमित भागीदारी ने लोगों तक प्रभावी ढंग से सेवा पहुंचाना सुनिश्चित किया. 

महिला सशक्तिकरण 

लोकतंत्र की सच्ची भावना के अनुरूप काम करने हुए स्थानीय सरकारों ने ज़मीनी स्तर की कमज़ोर महिलाएं को सशक्त बनाया है और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से जोड़ने, उनकी आवाज़ सुनने और भागीदारी के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है. स्थानीय स्वशासन महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में सहायता प्रदान करती है. उदाहरण के लिए, केरल में कुदुंबश्री एक व्यापक, महिला-केंद्रित और हिस्सेदारी वाली योजना है जिसका उद्देश्य ग़रीबी को समाप्त करना है. ये कार्यक्रम महत्वपूर्ण असर छोड़ने में काफी प्रभावी साबित हुआ है. आरक्षण के प्रावधानों की वजह से ज़मीनी स्तर की शासन व्यवस्था के संस्थानों में महिलाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. निर्वाचित प्रतिनिधियों में उनका हिस्सा लगभग 37 प्रतिशत है और कुछ राज्यों में तो ये आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है. महिला नेताओं की प्रभावी राजनीतिक भागीदारी की अनगिनत कहानियां हैं जिसका नतीजा स्थानीय शासन व्यवस्था पर उल्लेखनीय प्रभाव के रूप में निकला है. इसमें सार्वजनिक बुनियादी ढांचे एवं सेवा वितरण में व्यापक सुधार शामिल है. विशेष रूप से स्वास्थ्य एवं शिक्षा का बुनियादी ढांचा मज़बूत किया गया है और स्कूलों में लड़कियों का अधिक नामांकन सुनिश्चित करके तथा देश के कई दूर-दराज के क्षेत्रों में लिंग अनुपात में सुधार करके दीर्घकालिक सामाजिक कायाकल्प हुआ है. 

आरक्षण ने महिला नेतृत्व को मज़बूत बनाया, जिससे सार्वजनिक सेवाओं व बुनियादी ढांचे में सुधार आया।

शासन व्यवस्था को लेकर नई तरह की पहल 

स्थानीय स्तर पर अच्छी शासन व्यवस्था के कई नए मॉडल हैं. उदाहरण के लिए, बिहार में एनखां भिमनीचक ग्राम कचहरी सौहार्दपूर्ण माहौल में कई प्रकार की स्थानीय विवादों को सुलझाने के लिए समय पर न्याय देती है. पिछले कुछ वर्षों में 100 से ज़्यादा मुकदमे सुलझाने का श्रेय इसको दिया जाता है. दिलचस्प बात ये है कि गांवों में महिलाएं शराब की अवैध बिक्री या घरेलू झगड़े जैसे मुद्दों को लेकर अधिक शिकायत दर्ज कराती हैं. उन्हें लगता है कि ये व्यवस्था न्याय पाने के लिए एक प्रभावी रास्ता प्रदान करती है. एक और दिलचस्प उदाहरण कर्नाटक के दो गांवों की ग्राम पंचायत का है जिन्होंने अन्य बातों के अलावा सड़कों पर रोशनी, अधिक कुशल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), ज़्यादा शौचालय सुनिश्चित करने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया है. नागरिकों को  बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए उन्होंने हर महीने निगरानी की प्रणाली भी बनाई है. राज्य की दूसरी ग्राम पंचायतें भी इसको लागू करने की योजना बना रही हैं. मध्य प्रदेश के मंडला ज़िले के आदिवासी गांव बरखेड़ा के ग्रामीणों ने सार्वजनिक संसाधनों की उपेक्षा और बदहाली को रोकने के लिए स्वशासन की उल्लेखनीय पहल की. विशेषज्ञों और ग्राम सभा की सहायता से गांव के लोगों ने समुदाय के लाभ के लिए सार्वजनिक संसाधनों के ज़िम्मेदारी से उपयोग की दिशा में सकारात्मक बदलाव किया. 

विकेंद्रित शासन व्यवस्था की आवश्यकता

स्थानीय स्वशासन की प्रणाली ने निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोगों की अधिक सार्थक भागीदारी को आसान बनाकर न केवल लोकतंत्र की जड़ों को गहरा किया है बल्कि हाशिए पर पड़े तबकों को प्रतिनिधित्व का एक मंच भी प्रदान किया है. इसके अलावा उनके प्रभावी प्रशासन और काम-काज की वजह से पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक विकास और कल्याण हुआ है. स्थानीय स्वशासन को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिनके प्रभावी समाधान के लिए लक्ष्य आधारित हल की आवश्यकता है. इसमें राज्य सरकारों के अत्यधिक नियंत्रण से छुटकारे के लिए अधिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना, महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी में आने वाली बाधाओं को दूर करना, विकेंद्रित नियोजन पर अधिक ज़ोर देना और PESA अधिनियम की हदों को दूर करने की आवश्यकता शामिल हैं. लोकतांत्रिक, स्वायत्त, वित्तीय रूप से मज़बूत स्थानीय संस्थाओं का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर के दृष्टिकोण के माध्यम से मज़बूत लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का वादा करता है. ये भागीदारीपूर्ण शासन व्यवस्था की भावना से लोगों के लिए जवाबदेह स्थानीय प्रशासन भी सुनिश्चित करता है. इसलिए एक सशक्त स्थानीय शासन की संरचना विकेंद्रित शासन व्यवस्था के लिए अनिवार्य है. 

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