म्यांमार की जुंटा ने आपातकालीन शासन को ख़त्म कर दिया है, लेकिन इसका उद्देश्य लोकतंत्र की बहाली नहीं है. सेना इसके ज़रिए धांधली वाले चुनावों और बढ़ती वैश्विक जांच से पहले देश पर अपना नियंत्रण फिर से मज़बूत करना चाहती है.
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31 जुलाई 2025 को, म्यांमार की सैन्य सरकार ने देश में आपातकाल ख़त्म करने का ऐलान किया. जुंटा सरकार के राष्ट्रपति जनरल मिन आंग ह्लाइंग के दस्तख़त से आदेश संख्या 1/2025 पारित किया गया. इस आदेश के माध्यम से 1 फरवरी 2021 को हुए सैन्य तख्तापलट को उचित ठहराने के लिए शुरू किए गए आदेश संख्या 1/2021 को रद्द किया गया. इसके साथ ही म्यांमार में आपातकाल औपचारिक रूप से समाप्त हुआ. सरकारी एमआरटीवी के अनुसार, म्यांमार की राष्ट्रीय रक्षा एवं सुरक्षा परिषद (एनडीएससी) ने राज्य प्रशासन परिषद (एसएसी) को भंग कर दिया. न्यो साव को प्रधानमंत्री घोषित कर उनके नेतृत्व में एक नई संघीय सरकार का गठन किया गया. इसके साथ ही वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग की अध्यक्षता में एक राज्य सुरक्षा एवं शांति आयोग का गठन किया. इसी घोषणा में मिन आंग ह्लाइंग की देखरेख में 11 सदस्यीय आयोग का गठन भी शामिल था. इससे नई सरकार में उनका नियंत्रण और मज़बूत हुआ. इसके अलावा, सैनिक शासकों ने एक सैन्य जनरल की देखरेख में तथाकथित 'अनुशासित बहुदलीय चुनाव' की तैयारी भी शुरू कर दी है. ये चुनाव दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में कराए जाने हैं.
लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध और बढ़ती वैश्विक जांच के बीच सैन्य शासन द्वारा आपातकाल करने का फैसला एक गहरा सवाल उठाता है: क्या ये राजनीतिक शासन की शुरुआत है, या फिर सैन्य शासन की रणनीति का एक और नया दिखावा मात्र है?
आपातकालीन शासन का अंत भले ही एक संवैधानिक मील का पत्थर हो, लेकिन इसे म्यांमार में वास्तविक परिवर्तन समझना जल्दबाजी होगा. ज़्यादातर लोग इसे जुंटा यानी सैन्य सरकार की रणनीतिक चाल बता रहे हैं. इससे फिलहाल ज़मीनी स्तर पर बदलाव नहीं आएगा. ऐसा लगता है कि जुंटा ने ये फैसला सैन्य नियंत्रण को नए सिरे से परिभाषित करने, अंतर्राष्ट्रीय वैधता सुनिश्चित करने और सावधानीपूर्वक आयोजित चुनावों के लिए ज़मीन तैयार करने के लिए लिया है. लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध और बढ़ती वैश्विक जांच के बीच सैन्य शासन द्वारा आपातकाल करने का फैसला एक गहरा सवाल उठाता है: क्या ये राजनीतिक शासन की शुरुआत है, या फिर सैन्य शासन की रणनीति का एक और नया दिखावा मात्र है?
जुंटा के प्रवक्ता ने आधिकारिक तौर पर दावा किया है कि आपातकालीन शासन ने 'अपना काम पूरा कर दिया है'. अब वक्त आ गया है कि देश में चुनाव के लिए लंबे समय से जो तैयारी की जा रही थी, उसे पूरा किया जाए. सतही तौर पर देखें तो इसे सामान्य संवैधानिक स्थिति की वापसी का दिखावा करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है. यह 2008 के संविधान के अनुरूप है, जिसके अनुसार आपातकाल हटने के छह महीने के भीतर चुनाव कराने अनिवार्य हैं.
बहरहाल, ये बदलाव संवैधानिक से ज़्यादा रणनीतिक लगता है. कहने को तो एनडीएससी संवैधानिक रूप से एक नागरिक-सैन्य निकाय है, लेकिन इसमें सेना का ही दबदबा बना हुआ है. इसके 11 में से छह सदस्यों को सैन्य सरकार से नियुक्त सदस्य हैं. इनमें कमांडर-इन-चीफ और प्रमुख सुरक्षा मंत्री भी शामिल हैं. इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि ये निकाय पूरी तरह से मिन आंग ह्लाइंग और उनके कमांडरों के नियंत्रण में बना हुआ है. गौर करने वाली बात ये है कि सत्ता का कोई बड़ा हस्तांतरण नहीं हुआ है. जुंटा ने सत्ता नहीं बदली, सिर्फ नैरेटिव बदलने की कोशिश की है.
आपातकालीन नियम हटाकर, सैन्य शासन ने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद की छवि सुधारने की कोशिश की है. जुंटा की प्रयास है कि दुनिया उसे मार्शल लॉ के ज़रिए नहीं बल्कि वैध तरीके से सत्ता पर काबिज़ रहने वाले शासन के तौर पर थे. इसीलिए चुनावी लोकतंत्र की तैयारी की जा रही है. जुंटा के दो स्पष्ट लक्ष्य है: पहला, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और क्षेत्रीय दबाव को कम करना और दूसरा, घरेलू जनता को आश्वस्त करने और आंतरिक नियंत्रण को मज़बूत करने के लिए राजनीतिक तौर पर सामान्य स्थिति और संस्थागत परिवर्तन का दिखावा करना.
नैरेटिव सुधारने को लेकर की जा रही कुछ पैंतरेबाज़ी निश्चित रूप से कुछ गहरी कमज़ोरियों को छुपाती हैं. 2023 के अंत में थ्री ब्रदरहुड अलायंस द्वारा ऑपरेशन 1027 शुरू किए जाने के बाद से, जुंटा को कई बड़े क्षेत्रीय और रणनीतिक झटके लगे हैं. उसने उत्तरी शान, रखाइन, चिन और सागाइंग क्षेत्रों के प्रमुख कस्बों और सीमावर्ती व्यापार चौकियों पर नियंत्रण खो दिया है. 2024 और 2025 तक, अराकान आर्मी (एए) ने पश्चिमी म्यांमार के काफ़ी इलाकों पर कब्जा कर लिया ता, जबकि काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (केआईए) और उसके सहयोगी संगठनों ने उत्तर और पूर्व में जुंटा की उपस्थिति को चुनौती देना जारी रखा हुआ है.
सेना का कार्यबल तनावग्रस्त है. कथित तौर पर मनोबल कम है, और सेना छोड़ने वालों की संख्या बढ़ गई है. मिलिशिया समूहों की अनौपचारिक भर्ती, सेवानिवृत्त सैनिकों की फिर से भर्ती, और जबरन भर्ती, ये सभी दबाव में चल रही व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं. इस संदर्भ में देखें तो आपातकाल हटाने के फैसले को सैन्य पुनर्गठन के लिए एक सामरिक विराम के रूप में भी देखा जा सकता है, लेकिन सत्ता पर बिना किसी प्रशासनिक नियंत्रण को छोड़े बिना. सैनिक शासकों का व्यापक उद्देश्य उन क्षेत्रों में सीमित और कड़ाई से नियंत्रित चुनाव आयोजित कराना हो सकता है, जहां अभी भी उनका शासन है. इससे प्रगति का भ्रम पैदा होगा और साथ ही उनकी बची हुई सत्ता भी मज़बूत होगी. जुंटा के लिए चुनाव अपनी सत्ता बचाने का एक साधन है, लक्ष्य नहीं.
आपातकाल हटने के बाद संभावित चुनावों की घोषणा को जुंटा का लोकतंत्र के प्रति प्रेम नहीं मान लेना चाहिए. सैन्य शासन का इतिहास बताता है कि चुनावों का इस्तेमाल अक्सर एक वास्तविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय एक राजनीतिक हथियार के रूप में ज़्यादा किया जाता है. सेना द्वारा तैयार किया गया 2008 का संविधान, तत्मादाव (म्यांमार की सेना) को 25 प्रतिशत संसदीय सीटें और संवैधानिक संशोधनों के लिए पर्याप्त वीटो शक्ति प्रदान करता है. इस तरह के ढांचे के तहत किसी भी चुनावी प्रक्रिया के निष्पक्ष होने की उम्मीद नहीं है. नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) और शान नेशनलिटी लीग फॉर डेमोक्रेसी (एसएनएलडी) जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया है. इन पार्टियों के बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया है या चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया गया है. ऐसे में निष्पक्ष या समावेशी परिणाम देने की संभावना ना के बराबर है.
इसके अलावा, अगर चुनाव सीमित क्षेत्रों में होते हैं, तो भी उनमें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों को शामिल नहीं किया जाएगा. ये वो इलाके हैं, जहां प्रतिरोध बलों ने नियंत्रण कर लिया है. गौरतलब है कि 1 अगस्त को काचिन, करेनी (काया), करेन, रखाइन, शान और चिन राज्यों के अधिकांश हिस्सों के साथ-साथ सागाइंग, मांडले और माग्वे क्षेत्रों में तीन महीने का मार्शल लॉ लागू कर दिया गया है. जुंटा का फैसला बताता है कि ये क्षेत्र विवादित और अस्थिरता से जूझ रहे हैं. ये बहिष्कारवादी दृष्टिकोण बता रहा है कि एक देश के अंदर अब दो इलाके बन चुके हैं. एक वो जहां सैनिक शासकों द्वारा नियंत्रित बस्तियां है और दूसरा प्रतिरोध बलों द्वारा प्रशासित क्षेत्र. ज़ाहिर है दो अलग तरह की संप्रभुता वाला एक विभाजित म्यांमार में राष्ट्रीय सुलह अभी भी दूर की कौड़ी है.
क्षेत्रीय गुट - दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) - ने मुख्य रूप से अपने 5-सूत्री सहमति के माध्यम से सैनिक शासकों को एक तरह से सार्थक वार्ता या युद्ध विराम के लिए मज़बूर किया है. हालांकि थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे सदस्य देशों द्वारा की गई कई कोशिशों के बावजूद सैनिक शासकों ने बड़े पैमाने पर बदलावों को नजरअंदाज करना जारी रखा है. आपातकालीन शासन को हटाने का जुंटा का इशारा आंशिक रूप से आसियान आलोचकों को खुश करना हो सकता है. ऐसा करने से क्षेत्रीय मंचों में उसका फिर से प्रवेश सुनिश्चित करने का उद्देश्य पूरा हो सकता है. म्यांमार को 2021 से ही आसियान से बाहर रखा गया है और 2024 में केवल आंशिक रूप से पुनः एकीकृत किया गया.
चीन ने म्यांमार के सैन्य शासकों के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखें. चीन ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अपने निवेश और प्रभाव की रक्षा के लिए जातीय सशस्त्र संगठनों (ईएओ) और राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) के साथ अपने संबंधों का विस्तार भी किया है. इसके साथ ही, ऐसा भी लग रहा है कि चीन जातीय सशस्त्र संगठनों (ईएओ) पर शांति वार्ता में शामिल होने का दबाव बनाकर सेना का पक्ष ले रहा है. चीन का ऐसा करने का उद्देश्य संघर्ष की स्थिति को स्थिर करना और संभावित धांधली वाले चुनावों को समर्थन देना हो सकता है. दोनों पक्षों के साथ बातचीत करते हुए भी, भारत सतर्क बना हुआ है. अपनी पूर्वोत्तर सीमा पर बढ़ती अस्थिरता की चिंता के साथ भारत अपने सुरक्षा हितों को संतुलित कर रहा है. हालांकि भारत ने कई मौकों पर सैन्य शासन से स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव कराने की अपील की है, लेकिन सैन्य शासन की वर्तमान चुनावी योजनाओं के बारे में भारत ने अब तक कोई स्पष्ट बयान जारी नहीं किया है. ये जटिल क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के बीच उसके सतर्क रुख को दर्शाता है. जापान ने म्यांमार में प्रस्तावित चुनावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और ज़ोर देकर कहा है कि देश में चल रहे संघर्ष और प्रमुख हितधारकों के बहिष्कार के बीच इन चुनावों को वैध नहीं माना जा सकता. जापान की दलील है कि कई बड़े राजनीतिक नेता अभी भी हिरासत में हैं. पश्चिमी देशों की सरकारें भी जुंटा के इस कदम को संदेह की दृष्टि से देखेंगी. पश्चिमी देश भी चाहते हैं कि म्यांमार में एक समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया की दिशा में वास्तविक कदम उठाए जाएं.
एनयूजी और प्रतिरोध समूहों के लिए, आपातकालीन शासन हटने से ज़मीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आएगा. प्रतिरोध बलों ने दावा किया है कि वे आगामी चुनावों का बहिष्कार करेंगे, लेकिन उन्हें आशंका है कि इससे उनकी स्थिति में कोई सार्थक बदलाव नहीं आएगा. कई इलाकों में सशस्त्र संघर्ष और समानांतर प्रशासन बेरोकटोक जारी रहेगा. हालांकि, सैनिक शासकों के इस निर्णय से नई कूटनीतिक रणनीतियों के लिए रास्ता खुल सकता है. अंतर्राष्ट्रीय हितधारकों पर वास्तविक रूप से समावेशी वार्ता प्रक्रिया के लिए और अधिक दबाव डालने का दबाव बनेगा, जिसमें एनयूजी, जातीय नेता और नागरिक समाज शामिल हों.
चीन का ऐसा करने का उद्देश्य संघर्ष की स्थिति को स्थिर करना और संभावित धांधली वाले चुनावों को समर्थन देना हो सकता है. दोनों पक्षों के साथ बातचीत करते हुए भी, भारत सतर्क बना हुआ है.
इसके साथ ही, इस कदम से प्रतिरोध बल ये महसूस कर सकते हैं कि जुंटा का शासन कमज़ोर हो रहा है. अगर इसे ताक़त की बजाए हताशा के संकेत के रूप में देखा जाए, तो ये विपक्षी शक्तियों के बीच समन्वय को बढ़ा सकता है, विशेष रूप से बाकी बचे जुंटा संस्थानों को ख़त्म करने के अभियानों में इससे उनका मनोबल बढ़ सकता है.
कुल मिलाकर, म्यांमार की सैन्य सरकार द्वारा आपातकाल हटाने को ना तो लोकतांत्रिक परिवर्तन का अग्रदूत माना जा सकता है और ना ही सद्भावना का संकेत. ये बढ़ते घरेलू दबाव और अंतर्राष्ट्रीय जांच के बीच सेना को फिर से मज़बूत करने की एक सामरिक पैंतरेबाजी भर है. जैसे-जैसे जुंटा देश के कुछ हिस्सों में कड़े नियंत्रण वाले चुनावों की तैयारी कर रहा है, उससे ये ख़तरा है कि इन सतही बदलावों को कहीं ठोस सुधार ना समझ लिया जाए. म्यांमार में सच्ची शांति और लोकतंत्र की राह आसान बनाने के लिए सिर्फ़ नियमों में बदलाव ही नहीं, बल्कि उन्हें लिखने वालों में भी परिवर्तन आना ज़रूरी है.
श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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