भारत की युद्ध तत्परता रक्षा-तकनीक स्टार्टअप्स पर निर्भर करती है. हथियारों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में तनाव के बीच स्वदेशीकरण अब विकल्प नहीं बल्कि ज़रूरत बन गया.
Image Source: Getty
रक्षा उद्योगों की तकनीकी प्रसार की चुनौती ये है कि इसकी सफलता काफ़ी हद तक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है. यूक्रेन और ग़ाज़ा में चल रही जंग ने रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं की महत्वपूर्ण कमज़ोरियों को उजागर किया है. भू-राजनीतिक अस्थिरता के अप्रत्याशित स्वभाव के कारण ये आपूर्ति श्रृंखलाएं किसी भी समय बाधित की जा सकती हैं. इसलिए, भारत की रणनीतिक आवश्यकता आयात पर निर्भरता से स्वदेशी नवाचार की ओर बदलाव में निहित है. भविष्य के युद्धों के लिए राष्ट्र की तत्परता को आत्मनिर्भरता में बदलने के लिए ऐसा किया जाना बहुत ज़रूरी है. यही वो क्षेत्र है, जहां रक्षा उत्पादन में तकनीक से जुड़े स्टार्टअप महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
मौजूदा दौर के युद्ध अनुभव ये दर्शाते हैं कि इस प्रकार का नवाचार इकोसिस्टम ना सिर्फ प्रभावी और लागत-दक्ष हैं बल्कि लंबे और छोटे सैन्य संघर्षों को भी बनाए रखने की क्षमता रखता है. 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव, साथ ही हालिया 'ऑपरेशन सिंदूर' इस तथ्य का उदाहरण है कि समकालीन सैन्य संचालन की स्वभाव अधिकतर अस्थिर हो सकता है. इसमें चीन की भागीदारी की संभावना हो सकती है. इस तरह की परिस्थिति, विरोधी ख़तरों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए समन्वित संयुक्त कार्रवाई की ज़रूरत पर ज़ोर देती है. संघर्ष का वैश्विक अनुभव, जैसे रूस-यूक्रेन जंग या ग़ाज़ा युद्ध, भी इसी तरह का अनुभव साझा करता है. भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति मौलिक रूप से रक्षा प्रौद्योगिकी में निजी पूंजी का लाभ उठाने पर निर्भर करती है.
भारत की रणनीतिक आवश्यकता आयात पर निर्भरता से स्वदेशी नवाचार की ओर बदलाव में निहित है.
पारंपरिक युद्ध की तैयारी प्रक्रियात्मक खरीद चक्र (प्रोसीजिरियल प्रोक्योरमेंट साइकल) या आपातकालीन खरीद (ईपी) तंत्र के माध्यम से होती है. ये खरीद रक्षा मंत्रालय (एमओडी) द्वारा संचालित होती है, विशेष रूप से उसके बाद जब कोई घटना उच्च-स्तरीय निर्णय लेने की आवश्यकता पैदा करती है. हालांकि, इस प्रकार की प्रक्रिया में अक्सर युद्ध के विकासशील पहलुओं और इसके साथ जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों के बारे में भविष्य की सोच की कमी होती है. आज युद्ध में सटीकता, गति और तकनीकी श्रेष्ठता शामिल है, जो युद्ध के मैदान को बहुत ही तेज़ी से बदल देती है. तेज़ बदलाव के साथ लगातार चुनौतियों का सामना करने के लिए एक ऐसा इकोसिस्टम ज़रूरी है, जो अनुकूलनशील, सक्षम और हमेशा क्रियाशील हो. स्वायत्त प्रणालियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ख़तरे की पहचान, साइबर क्षमताएं और ड्रोन तकनीक जैसी प्रमुख तकनीक भी एक समान पारिस्थितिकी तंत्र की मांग करती हैं.
देश ने आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी पहल के माध्यम से स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं. हाल के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए आवंटन 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6.81 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है. इसमें 70 प्रतिशत स्वदेशी खरीद का लक्ष्य है. रक्षा उपकरण निर्यात में भी वृद्धि हो रही है. 2014 में ये 686 करोड़ रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 23,622 करोड़ रुपये हो गया है. उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का रक्षा बजट में 5 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लक्ष्य वैश्विक बाज़ार के अवसरों में सैकड़ों अरबों का निर्माण करता है. सरकार ने भी रक्षा उत्पाद निर्यात का समर्थन करने वाली नीतियां बनाई हैं. इस नीतिगत ढांचे में रक्षा निर्यात संवर्धन नीति (iDEX) और एसिंग डेवलपमेंट ऑफ इनोवेटिव टेक्नोलॉजीज विद iDEX यानी (ADITI 1.0) शामिल हैं. अब इस इकोसिस्टम में 1,000 से ज़्यादा डिफेंस स्टार्टअप और 147 सैन्य तकनीकी कंपनियां हैं. आयात प्रतिबंध सूची भी महत्वपूर्ण रक्षा घटकों में स्वदेशीकरण को बढ़ावा दे रही हैं. इससे भारत एक आत्मनिर्भर हथियार निर्माता और एक महत्वपूर्ण वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित हो रहा है.
वेंचर कैपिटल और रक्षा तकनीक का एक दीर्घकालिक संबंध है. कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रौद्योगिकियां, जैसे कि इंटरनेट, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और सेमीकंडक्टर्स, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर से, विशेषकर बाद में 1940 के दशक में सिलिकॉन वैली के नवाचारों से विकसित हुई हैं. ये नवाचार परिवेश कई देशों में समान रूप से उभरा है. इजराइल में करीब 300 रक्षा स्टार्टअप्स की बाज़ार मूल्य 330 मिलियन डॉलर है. इसी तरह भारत ने रक्षा तकनीक में स्टार्टअप्स के उदय को देखा है. ये स्टार्टअप भारत की रक्षा क्षमताओं को और मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं. हाल ही में भारत में Raphe mPhibr जैसी कंपनियों का उदय हुआ है, जो भारत के सबसे मूल्यवान रक्षा तकनीक स्टार्टअप में से एक बन गई हैं. पिछले पांच साल में, लगभग 1,000 ऐसे स्टार्टअप अस्तित्व में आए हैं. हालांकि, नीति निर्माताओं के लिए एक व्यवस्थित और सतत पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत करने की बहुत गुंजाइश है. भारत के सामने आने वाली रणनीतिक चुनौतियों के लिए नवाचार और तकनीकी समाधानों को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है. इससे नौकरशाही प्रक्रियाओं को सरल बनाने, उद्योग-शैक्षिक अकादमी के सहयोग को बढ़ाने और शुरुआती अनुदानों से आगे स्थायी वित्तीय स्रोत बनाने में मदद मिलेगी.
वर्तमान में, भारत के रक्षा-तकनीक क्षेत्र को परिपक्व तकनीकी नेतृत्व और पर्याप्त बाज़ार की मांग का लाभ मिल रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) जैसे प्रमुख संस्थानों के पृष्ठभूमि वाले कुशल उद्यमियों के उभरने से विशेषज्ञों की एक ऐसी आपूर्ति श्रृंखला बनी है, जो तकनीकी शोध को व्यावहारिक कार्यान्वयन क्षमताओं के साथ जोड़ती है. तकनीक आधारित क्षमताएं, पर्याप्त खरीद बजट और प्रौद्योगिकी को एक एजेंडे के रूप में अपनाने के अस्तित्व ने विकास के लिए एक मज़बूत आधार स्थापित किया है. दोहरे उपयोग की तकनीक की संभावनाएं इस अवसर को और बढ़ा देती हैं. इससे स्टार्टअप को वाणिज्यिक और सैन्य उपकरणों के लिए राजस्व के स्रोतों को विविधता मिलती है. Incs42 के व्यापक सर्वेक्षण के अनुसार, हार्डवेयर/रक्षा-प्रौद्योगिकी 2025 की दूसरी छमाही में सबसे निवेश के लिए सबसे पसंदीदा क्षेत्र में से एक के रूप में उभरा है. निवेशकों के लिए प्राथमिकता के मामले में इससे ऊपर सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है.
भारत में Raphe mPhibr जैसी कंपनियों का उदय हुआ है, जो भारत के सबसे मूल्यवान रक्षा तकनीक स्टार्टअप में से एक बन गई हैं. पिछले पांच साल में, लगभग 1,000 ऐसे स्टार्टअप अस्तित्व में आए हैं.
डिफेंस स्टार्टअप की कई प्रमुख सफलताओं में आइडिया फोर्ज की सफल प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) शामिल है, जिसने शेयर बाज़ार में 94 प्रतिशत प्रीमियम प्राप्त किया. इसके साथ ही, पारस डिफेंस की सार्वजनिक लिस्टिंग भी हुई. कई चुनौतियों के बावजूद अजनालेंस और सागर डिफेंस जैसी उभरती कंपनियां व्यावसायिक व्यवहार्यता का प्रदर्शन कर रही हैं. इन चुनौतियों में जटिल खरीद प्रक्रियाएं, वेंचर कैपिटल की बार-बार होने वाली सॉफ्टवेयर सेवा (SaaS) मॉडल के प्रति प्राथमिकता की तुलना में आय का चक्रीय स्वभाव शामिल है. इसके अलावा, लंबी निर्माण अवधि और मिलिट्री एप्लीकेशन के लिए तय बीटा उत्पादों से संबंधित ज़ोखिम शामिल हैं. इन संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के लिए, सफल रक्षा-तकनीक कंपनियां रणनीतिक समाधानों को अपना रही हैं. इन समाधानों में हेलसिंग-सााब मॉडल के तहत बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ साझेदारी करना, कंपनी की शुरुआत से ही निर्यात पर ध्यान केंद्रित रखना, और ग्रेने रोबोटिक्स के इंद्रजाल सिस्टम जैसी एकीकृत समाधानों का विकास करना, ना कि स्वतंत्र घटकों का. इसके साथ ही रणनीतिक अधिग्रहण भी किया जा रहा है. अडानी डिफेंस द्वारा अल्फा डिजाइन और दक्ष द्वारा कोरोमंडल का अधिग्रहण शामिल है. इसके अलावा, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा घरेलू विक्रेताओं को 7,572 करोड़ रुपये की खरीद के ऑर्डर देना भी बढ़ते बाज़ार की जरूरतों को दिखाता है.
इस पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में, भारत-अमेरिका डिफेंस एक्सीलेरेशन इकोसिस्टम (INDUS-X) और महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत की पहल (iCET) शामिल हैं. अमेरिका के बाज़ार तक पहुंच के लिए और इज़राइल की यूनिट 8,200 स्टार्टअप इकोसिस्टम से भी बहुत कुछ सीखा जा रहा है. यूक्रेन के BRAVE1 प्लेटफ़ॉर्म के सफल मॉडल को देखकर 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश और 2024 में 8 गुना वृद्धि के साथ भारत धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. भारत अब राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए निजी तकनीकी नवाचार का लाभ उठाने की स्थिति में आ गया है. यह प्रवृत्ति 2047 तक भारत को एक वैश्विक रक्षा-तकनीकी केंद्र बनने की दिशा में ले जा सकती है.
अंकित के गृह मंत्रालय से सम्बद्ध राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल रिलेशन के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. वो युद्ध, तकनीक और रणनीति में विशेषज्ञता रखते हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Ankit K is New Delhi-based analyst who specialises in the intersection of Warfare and Strategy. He has formerly worked with a Ministry of Home Affairs ...
Read More +