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Published on Feb 20, 2026 Updated 3 Days ago

AI हेल्थ केयर की दुनिया को बदलने वाला है. बुजुर्गों की देखभाल, बीमारों की मदद, घरेलू काम सब आसान हो सकता है... लेकिन क्या होगा अगर ये बदलाव औरतों पर ही भारी पड़ जाए?  फिर भी मौका तो है ही. अगर सही से किया जाए तो AI देखभाल को बेहतर बना सकता है, करोड़ों नई नौकरियां दे सकता है लेकिन सवाल है कि क्या हम औरतों को साथ लेकर चलेंगे, या पुरानी गैरबराबरी और बढ़ा देंगे?

हेल्थकेयर में AI: महिलाएं नंबर 2 या बराबरी की राह पर?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को आज दुनिया भर में हेल्थ केयर सिस्टम की बढ़ती दिक्कतों का हल बताकर पेश किया जा रहा है लेकिन ग्लोबल साउथ के कई देशों में हेल्थ केयर सिस्टम पहले से ही निवेश की कमी और असंगठित कामकाज से तो जूझ ही रहे हैं, साथ ही वे औरतों की मेहनत पर ज्यादा टिके हैं. ऐसे माहौल में AI लाना कोई सीधा-सादा तकनीकी बदलाव नहीं है. अगर इन बुनियादी हालात को ध्यान में ना रखा गया तो AI बराबरी लाने के बजाय पुरानी गैर-बराबरी को और मजबूत कर देगा.

जनसंख्या में हो रहे बदलाव से हेल्थ और सोशल हेल्थ केयर सिस्टम पर दबाव बढ़ रहा है. लोग ज्यादा उम्र तक जी रहे हैं. लंबी बीमारियां बढ़ रही हैं. इससे इलाज और देखभाल की मांग बढ़ रही है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन यानी WHO का कहना है कि 2030 तक दुनिया में 1 करोड़ 10 लाख हेल्थ वर्करों की कमी हो सकती है. यानी, जरूरत ज्यादा है और लोग कम हैं. इसी दबाव में AI को तेजी से अपनाया जा रहा है लेकिन इसमें ज्यादा जोर काम तेज करने और खर्च घटाने पर है. इस पर कम ही ध्यान है कि लोगों की नौकरी परमानेंट नहीं है और हेल्थ केयर सिस्टम औरतों पर टिका हुआ है.

आधी आबादी पर टिकी पूरी देखभाल

AI की बात करने से पहले यह समझना जरूरी है कि केयर का काम ज्यादातर औरतें ही करती हैं. इसका भी एक बड़ा हिस्सा असंगठित होता है या बेगारी वाला. दुनिया भर में औरतें मर्दों से 3.2 गुना ज्यादा समय देखभाल की ऐसी ही बेगारी में लगाती हैं. यह काम ज्यादातर घरों में होता है, और बड़ी ही बेतरतीबी से होता है. सिर्फ घरेलू कामकाज में ही दुनिया भर में 7 करोड़ 56 लाख लोग लगे हैं. इनमें से 81 फीसदी लोग अनौपचारिक तरीके से काम करते हैं. इसमें से करीब 82 फीसदी लोग विकासशील और उभरते देशों में हैं.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन यानी WHO का कहना है कि 2030 तक दुनिया में 1 करोड़ 10 लाख हेल्थ वर्करों की कमी हो सकती है. यानी, जरूरत ज्यादा है और लोग कम हैं. इसी दबाव में AI को तेजी से अपनाया जा रहा है लेकिन इसमें ज्यादा जोर काम तेज करने और खर्च घटाने पर है.

गरीब देशों में बेगारी वाली केयर सिर्फ बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल नहीं है. इसमें पानी भरना, लकड़ी या ईंधन लाना जैसे जरूरी काम भी शामिल हैं. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक औरतें और लड़कियां रोज मिलकर करीब 20 करोड़ घंटे सिर्फ पानी लाने में खर्च करती हैं. इसक असर उनकी पढ़ाई, सेहत और नौकरी के मौकों पर पड़ता है.

देखभाल के जिस काम में मेहनताना मिलता है, वैसे काम भी ज्यादातर औरतें करती हैं. दुनिया भर में हेल्थ और सोशल केयर वर्कफोर्स का करीब 70 फीसदी हिस्सा औरतों का है. वे करीब 5 अरब लोगों को जरूरी सेवाएं देती हैं. उनकी मेहनत की सालाना कीमत 3 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा आंकी गई है. लेकिन ज्यादातर औरतें कम वेतन वाले और फ्रंटलाइन काम में हैं. लीडरशिप रोल में उनकी हिस्सेदारी महज 25 फीसदी के आसपास है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और WHO के सर्वे के मुताबिक इन सेक्टरों में औरतों को मर्दों से 24 फीसदी कम वेतन मिलता है.

AI के खतरे

जब हेल्थ केयर सिस्टम में AI लाया जाता है, तो सावधानी जरूरी है. क्योंकि देखभाल का काम पहले से ही जेंडर आधारित है और काफी हद तक अनौपचारिक है. एक धारणा यह है कि केयर के काम में भावनाएं और इंसानी जुड़ाव होता है, इसलिए मशीन उसे पूरी तरह नहीं कर सकती. दूसरी तरफ AI रूटीन के कई घरेलू काम कर सकता है. अंदाजा है कि अगले 10 साल में घरेलू काम का 40 फीसदी हिस्सा मशीनें कर सकती हैं.

ये दोनों बातें अलग-अलग तरह के केयर के काम पर लागू होती हैं. घर के लिए मशीन समय बचा सकती है. लेकिन जिनकी कमाई घरेलू काम पर टिकी है, उनके लिए मशीन आने से काम और कमाई- दोनों कम हो सकते हैं. सबसे बड़ा मसला डिजिटल खाई है. यही तय करती है कि AI से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान. निम्न और मध्यम आय वाले देशों में औरतें मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल मर्दों से 14 फीसदी कम करती हैं. करीब 88 करोड़ 50 लाख औरतें इंटरनेट की दुनिया से बाहर हैं. इनमें से ज्यादातर दक्षिण एशिया और सब-सहारा अफ्रीका में हैं.

एक धारणा यह है कि केयर के काम में भावनाएं और इंसानी जुड़ाव होता है, इसलिए मशीन उसे पूरी तरह नहीं कर सकती. दूसरी तरफ AI रूटीन के कई घरेलू काम कर सकता है.

समाज की सोच, कम पढ़ाई और बिना पैसे वाला ज्यादा काम, ये सब वजहें हैं. इससे तय होता है कि कौन AI से जुड़े नए काम सीख पाएगा और कौन ऐसे कामों में फंसा रहेगा, जिसे मशीन बदल सकती है.

अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए केयर के काम को औपचारिक बनाने की बात होती है. इसकी भी तस्वीर साफ नहीं है. भारत में जैसे उबर घरेलू मदद भी मुहैया करा रहा है. ऐसे प्लेटफॉर्म काम में लचीलापन देते हैं, लेकिन केयर वर्कर अक्सर सोशल सिक्योरिटी से बाहर रहते हैं. उन्हें कम वेतन मिलता है. नौकरी की पक्की गारंटी नहीं होती. मोलभाव की ताकत कम होती है. साथ ही एल्गोरिदम के जरिए भेदभाव का खतरा भी रहता है.

तय करनी होगी सुरक्षा

अगर सुरक्षा इंतजाम न हों, तो ऐसे प्लेटफॉर्म गैर-बराबरी कम करने के बजाय उसे और बढ़ा सकते हैं. AI सिस्टम का डिजाइन भी पुरानी गैर-बराबरी को दोहरा सकता है. कई मॉडल ऐसे डेटा पर ट्रेन होते हैं जिसमें बेगारी वाला और अनौपचारिक केयर काम कम दर्ज होता है. 2024 में यूनेस्को ने बड़े लैंग्वेज मॉडल का अध्ययन किया. उसमें पाया गया कि औरतों को घरेलू और केयर रोल से जोड़ा जाता है. मर्दों को अधिकार और आर्थिक लीडरशिप से जोड़ा जाता है. अगर ऐसे पैटर्न पॉलिसी या प्रशासन से जुड़े AI टूल में चले जाएं, तो केयर के काम की अहमियत कम होने की पुरानी सोच और मजबूत हो सकती है.

र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि अगर केयर और सोशल जॉब में 3.1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हो, तो अमेरिका की GDP को बड़ा फायदा मिल सकता है और 1 करोड़ से ज्यादा नौकरियां बन सकती हैं.

गवर्नेंस भी एक बड़ा मसला है. AI से चलने वाली केयर टेक्नोलॉजी घरों जैसे निजी माहौल में काम करती है. यह सेहत, घर की दिनचर्या और निगरानी से जुड़ा संवेदनशील डेटा इकट्ठा करती है. अगर मजबूत नियम न हों, तो औरतों, खासकर घरेलू कामगार, अनौपचारिक केयरगिवर और जिनकी देखभाल हो रही है, उन सबका इस डेटा पर बहुत कम नियंत्रण होता है. डेटा कैसे इकट्ठा होगा, कैसे बांटा जाएगा या उससे पैसा कैसे कमाया जाएगा, इस पर उनका अधिकार कम होता है.

बराबरी वाला रास्ता

AI का सही फायदा तभी मिलेगा जब पॉलिसी के फैसले साफ तरीके से लिए जाएं. सिर्फ टेक्नोलॉजी लाना काफी नहीं है. केयर इकॉनमी को विकास का मुख्य हिस्सा मानना होगा. अकेले भारत में केयर इकॉनमी 2030 तक 300 अरब डॉलर से ज्यादा की हो सकती है. इससे 6 करोड़ से ज्यादा नौकरियां बन सकती हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि अगर केयर और सोशल जॉब में 3.1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हो, तो अमेरिका की GDP को बड़ा फायदा मिल सकता है और 1 करोड़ से ज्यादा नौकरियां बन सकती हैं.

अगर सोच-समझकर AI को लगाया जाए, तो यह काम में दोहराव कम कर सकता है और ज्यादा बराबरी वाला नतीजा दे सकता है. लेकिन सबसे पहले औरतों पर पड़े उस बोझ को कम करना होगा, जो उन पर बिना मेहनताने वाले केयर के काम और स्किल का पड़ता है. 2025 की WEF रिपोर्ट कहती है कि बेगारी वाली केयर के काम औरतों को AI से जुड़े नए कौशल सीखने से रोकते हैं. उनके पास समय नहीं होता. अगर सब्सिडी वाला चाइल्डकेयर, लचीली नौकरी और आसान ट्रेनिंग न हो, तो AI बदलाव से औरतें बाहर रह जाएंगी.

बच्चों, बुजुर्गों और अनौपचारिक देखभाल पाने वालों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा जरूरी है. अगर सरकार देखभाल के लिए पैसा लगाए, काम करने वालों की सुरक्षा करें और अच्छे नियम बनाए तो AI से देखभाल की व्यवस्था मजबूत और औरतों के हिसाब से कदरन बेहतर हो सकती है.

डिजिटल खाई को पाटना भी जरूरी है. अगर औरतों के लिए डिजिटल स्किल सीखने और नौकरी से जुड़ी ट्रेनिंग में निवेश नहीं होगा, तो AI का फायदा सिर्फ डिजिटल रोल वाले लोगों को मिलेगा. भारत डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों का इस्तेमाल कर सकता है. राज्य अपने हालात के हिसाब से ट्रेनिंग चला सकते हैं ताकि औरतें AI से जुड़े काम कर सकें. जैसे-जैसे केयर का काम डिजिटल प्लेटफॉर्मों के जरिए होगा, वे बराबरी लाने में मदद कर सकते हैं. ये डिजिटल ट्रेनिंग दे सकते हैं. काम का बंटवारा साफ रख सकते हैं. वेतन की जानकारी खुली रख सकते हैं. इससे AI गैर-बराबरी बढ़ाने के बजाय औपचारिक और बेहतर मौके दे सकता है.

और अंत में

आखिर में, AI की डिजाइन, खरीद और गवर्नेंस ही असली फर्क तय करेगी. टूल का पूरा हिसाब होना चाहिए कि वह औरतों के मेहनताने वाले और बेगार के काम पर क्या असर डालता है. क्या वह निगरानी बढ़ाता है? केयर से जुड़ा डेटा बेहद संवेदनशील होता है. इसलिए मजबूत डेटा नियम जरूरी है. साफ सहमति, डेटा का सीमित इस्तेमाल और कम से कम डेटा इकट्ठा करना जरूरी है. बच्चों, बुजुर्गों और अनौपचारिक देखभाल पाने वालों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा जरूरी है. अगर सरकार देखभाल के लिए पैसा लगाए, काम करने वालों की सुरक्षा करें और अच्छे नियम बनाए तो AI से देखभाल की व्यवस्था मजबूत और औरतों के हिसाब से कदरन बेहतर हो सकती है.


शेरोन सारा थावनी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष (डेवलपमेंट स्टडीज) निलांजन घोष की एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट हैं.

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