दिल्ली सरकार ने लाडली योजना को ‘लखपति बिटिया योजना’ में बदला जिसमें अब लड़कियों को पढ़ाई और जीवन के अहम पड़ावों पर बढ़ी हुई नकद मदद मिलेगी. जानिए कैसे डिजिटल और उच्च शिक्षा तक फैली यह योजना लड़कियों को अधिक सीखने और सफल होने का मौका देती है.
दिल्ली सरकार द्वारा 2008 में शुरू की गई लाडली योजना को ‘लखपति बिटिया योजना’ बनाने का फ़ैसला लिया गया है, जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होगी. हालांकि, यह सिर्फ़ नाम बदलना नहीं है. इसमें रक़म बढ़ाई गई है, उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहन अधिक किया गया है, पैसे देने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल बना दी गई है और लंबे समय से लटके भुगतानों का समाधान तलाशा गया है. हालांकि, यह योजना लड़कियों के लिए वास्तव में एक संसाधन बन सकेगी या नहीं, या पुरानी योजना जैसी कम परिणाम देगी, यह इससे तय होगा कि उपयोगी शैक्षिक सहायता और समय पर कैश ट्रांसफर के साथ इसे किस तरह जोड़ा जाए कि लड़कियां अधिक सीख सकें और सफल हो सकें.
इसमें पिछली योजना की तुलना में चार सुधार किए गए हैं.
पहला- नई योजना में, सरकार अब हर योग्य लड़की के लिए 56,000 रुपये अलग-अलग किस्तों में जमा करेगी. ये किस्तें लड़की की पढ़ाई और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण चरणों पर दी जाएंगी. ब्याज सहित यह राशि 1 लाख रुपये हो सकती है. लाडली योजना की तुलना में, जिसमें 36,000 रुपये दिए जाते थे, यह 55 प्रतिशत अधिक रक़म है. नई योजना के मुताबिक, जन्म के समय 11,000 रुपये, कक्षा 1, 6, 9 और 12 में दाख़िले पर हर बार 5,000 रुपये, दसवीं कक्षा पास करने पर 5,000 रपये और ग्रेजुएशन या मान्यता प्राप्त डिप्लोमा के दौरान किस्तों में कुल 20,000 रुपये दिए जाएंगे.
यह योजना लड़कियों के लिए वास्तव में एक संसाधन बन सकेगी या नहीं, या पुरानी योजना जैसी कम परिणाम देगी, यह इससे तय होगा कि उपयोगी शैक्षिक सहायता और समय पर कैश ट्रांसफर के साथ इसे किस तरह जोड़ा जाए कि लड़कियां अधिक सीख सकें और सफल हो सकें.
दूसरा- शिक्षा का दायरा पहले स्कूल तक था, जिसे बढ़ाकर स्नातक या डिप्लोमा कर दिया गया है. यदि लड़की उच्च शिक्षा पाती है, तो अब 20,000 रुपये की अतिरिक्त किस्तें जमा की जाएंगी, और 21 वर्ष या उससे अधिक उम्र में स्नातक या डिप्लोमा पूरा करने के बाद उसे मूलधन व ब्याज सहित पूरी रक़म दे दी जाएगी. यह इसलिए मायने रखता है, क्योंकि भारत में लड़कियों के लिए चुनौती अब सेकेंडरी स्कूल पूरा करने की नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा पूरा करने की है, क्योंकि इसमें पैसे और समाज की रुकावटें ज़्यादा हैं, भले ही नौकरी मिलने पर उच्च शिक्षित होने की वज़ह से लड़कियों की आमदनी अधिक हो.
तीसरा- योजना अब पूरी तरह से डिजिटल होगी. दिल्ली सरकार ने बताया है कि पुरानी योजना में 1.86 लाख खाते ऐसे हैं, जिन पर किसी ने दावा नहीं किया. इससे पता चलता है कि पिछली योजना में दावा करने में कितनी दिक्क़तें आया करती थीं.
चौथा- इसमें योग्यता का मापदंड भले ही पहले जैसा है, लेकिन आय की सीमा बढ़ाकर अब 1.2 लाख रुपये सालाना कर दी गई है. इससे योजना का कवरेज़ कुछ बढ़ गया है.
भारत में जब बच्चियों को आर्थिक सुरक्षा देने वाली योजनाएं शुरू की गई थी, तब उनका मक़सद था, लिंग अनुपात में सुधार लाना, बच्चियों का जीवन बचाना और माता-पिता का व्यवहार बदलना. 1990 के दशक में शुरू की गई हरियाणा की ‘अपनी बेटी अपना धन’ योजना देश की पहली बड़ी ‘सशर्त नकद हस्तांतरण’ (CCT) योजना थी. इसमें सेविंग बॉन्ड दिए गए थे, जिसे 18 वर्ष की उम्र में भुनाया जा सकता था, बशर्ते लड़की अविवाहित रहे. परिवार अक्सर इसे विवाह संबंधी सुरक्षा के रूप में देखते थे, न कि शिक्षित करने के माध्यम के रूप में.
समय के साथ, नकद राशि सीधे स्कूल में दाख़िले व पढ़ाई से जोड़ दी गई और महिला सशक्तिकरण, उम्र पर शादी व सामाजिक सुरक्षा महत्वपूर्ण मुद्दे बनते गए. 2000 के दशक में, कई राज्यों ने लाडली और लक्ष्मी-आधारित योजनाएं शुरू कीं, जिनमें नकद राशि को स्कूल में दाख़िले और प्रगति के महत्वपूर्ण चरणों से जोड़ा गया, और अक्सर 18 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद ब्याज सहित मूल राशि दी जाने लगी. भारत सरकार की धन लक्ष्मी योजना (2008), दिल्ली की लाडली योजना (2008), मध्य प्रदेश की लाडली लक्ष्मी योजना (2006), कर्नाटक की भाग्यलक्ष्मी योजना (2006) और हिमाचल प्रदेश की बेटी है अनमोल योजना (2010) इसके उदाहरण हैं. लिंग अनुपात में असंतुलन और प्राथमिक शिक्षा की सभी तक पहुंच बनाने के लिए राज्यों ने इस तरह की योजनाएं शुरू की थी. हालांकि, इनसे प्राथमिक शिक्षा का प्रसार ज़रूर हुआ, पर कुछ कमियां भी बनी रहीं, जैसे- प्रशासनिक जटिलता, कम जागरूकता, परिपक्वता राशि पाने में दिक्क़तें आदि.
2000 के दशक में, कई राज्यों ने लाडली और लक्ष्मी-आधारित योजनाएं शुरू कीं, जिनमें नकद राशि को स्कूल में दाख़िले और प्रगति के महत्वपूर्ण चरणों से जोड़ा गया, और अक्सर 18 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद ब्याज सहित मूल राशि दी जाने लगी.
2010 के दशक की शुरुआत में, इन नीतियों के माध्यम से किशोरावस्था तक लड़कियों को स्कूल में बनाए रखने पर ज़ोर दिया जाने लगा. इससे माध्यमिक शिक्षा महत्वपूर्ण हो गई. राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा प्रोत्साहन योजना (NSIGSE) के तहत कक्षा 9 में दाख़िला लेने पर 3,000 रुपये की एक निश्चित रक़म देकर लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचाने का प्रयास किया गया, जिसमें कुछ ख़ास शर्तों को पूरा करने के बाद रक़म निकाली भी जा सकती थी. इसी तरह, पश्चिम बंगाल की कन्याश्री प्रकल्प (2013) किशोरावस्था से जुड़ी कैश ट्रांसफर की सबसे प्रमुख योजना बनकर उभरी. हालांकि, कन्याश्री से लड़कियों का स्कूलों में दाख़िला तो बढ़ा, लेकिन उनमें सीखने की ज़रूरी क्षमता विकसित नहीं हो पाई, जिसकी वज़ह शायद स्कूलों में छात्र-छात्राओं की बढ़ती संख्या और शिक्षकों की गैर-मौज़ूदगी रही.
अगला दौर तब शुरू हुआ, जब यह बहस शुरू हुई कि नकद प्रोत्साहन सिर्फ़ स्कूली शिक्षा तक ही क्यों सीमित रहे. इसके बाद ही उच्च शिक्षा पर ज़ोर दिया गया. मगर बढ़ते ख़र्च, आने-जाने की दिक्क़तें और श्रम बाज़ार की अनिश्चितता आज भी बड़ी रुकावटें बनी हुई है. हालांकि, इन चुनौतियों को किस तरह दूर किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण तमिलनाडु की पुधुमई पेन योजना है. एक साथ पूरे पैसे देने के बजाय इस योजना में उच्च शिक्षा के दौरान लड़कियों को हर महीने 1,000 रुपये दिए जाते हैं, ताकि कॉलेज में उन्हें पैसों की दिक्क़त न हो.
इन सब बातों का निचोड़ यही है कि भारत में लड़कियों के लिए सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाएं तीन दशक से भी अधिक समय से चल रही हैं, पर इनसे कुछ ज़रूरी सबक भी मिलते हैं-
समय का ख़ास महत्व है, क्योंकि इस तरह की मदद प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के समय सबसे अधिक प्रभावी होती है.
नकद राशि देने से स्कूलों में दाख़िला तो बढ़ता है, पर उनकी शिक्षा उस तरह नहीं सुधरती. यानी, शिक्षा में सुधार के बिना ऐसी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता.
योजना इस तरह बननी चाहिए कि लाभार्थियों के लिए पैसे पाना आसान हो.
उच्च शिक्षा में पैसों की दिक्क़त न हो और योजना वायदे पर न टिकी हो.
परिणामों में पारदर्शिता ज़रूरी है, क्योंकि केवल दाख़िला बढ़ना सफलता नहीं है.
ताकि प्रभावी हो योजना
निगरानी के लिए सरकार को एक आसान और सर्वसुलभ डैशबोर्ड बनाना चाहिए, जो नामांकित लड़कियों की संख्या, उनका पढ़ाई छोड़ना, उच्च शिक्षा में दाख़िला आदि सबको ट्रैक करें. इसमें सीखने की उनकी समझ कितनी बढ़ी है, इसका भी एक मापदंड होना चाहिए. हालांकि, यह सटीक व्यवस्था नहीं है, पर कक्षा 10 और 12 की सफलता दरें कुछ हद तक बता सकती हैं कि योजना कितनी सफल है. ये सब जानकारियां यदि सार्वजनिक होंगी, तो जवाबदेही मजबूत हो सकेगी और ज़रूरी सुधार करना आसान हो सकेगा.
दिल्ली की लाडली लखपति जैसी योजना बहुत ज़रूरी है, लेकिन यह बात भी साफ़ है कि पैसे देकर लड़कियों को स्कूलों में रोका जा सकता है, लेकिन इससे उनमें कौशल का विकास नहीं हो पाता. इसलिए ऐसी योजना को मानव-पूंजी में निवेश के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए.
ट्रैकिंग करने के बाद, संसाधनों को उन चरणों में बांटा जा सकता है, जहां ड्रॉपआउट (पढ़ाई छोड़ने की दर) सबसे अधिक है. दिल्ली में पहले से ही कक्षा 1, 6, 9, 10 और 12 में भुगतान किया जाता है, जबकि सबसे अधिक ड्रॉपआउट आमतौर पर कक्षा 9 और कक्षा 11 में या कॉलेज में दाख़िले के समय होता है.
डिजिटलीकरण के साथ-साथ लाभ देने की प्रक्रिया भी ऑटोमेटिक होनी चाहिए. सिस्टम को लाभार्थियों पर नज़र रखनी चाहिए और उनको समय-समय पर जानकारी देकर लाभ पाने में मदद करनी चाहिए. नकद राशि देने के साथ-साथ उनको पढ़ाई-लिखाई में भी मदद करनी चाहिए, ताकि लड़कियां न केवल दाख़िला ले सकें, बल्कि सीख सकें और सफल हो सकें. पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी सलाह और करियर संबंधी मार्गदर्शन भी उनको दिए जाने चाहिए.
उच्च शिक्षा के समय, रक़म को एक निश्चित पुरस्कार के रूप में देने के बजाय मासिक सहायता के तौर पर दिया जाना चाहिए. तमिलनाडु का मासिक वज़ीफ़ा मॉडल इसका बढ़िया उदाहरण है. भले ही दिल्ली इसे पूरी तरह न अपनाए, लेकिन वह स्नातक स्तर की शिक्षा से जुड़े 20,000 रुपये को छोटी-छोटी किस्तों में ज़रूर बांट दे, ताकि लड़कियां आर्थिक दिक्क़तों के कारण पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर न हों. कुल मिलाकर, दिल्ली की लाडली लखपति जैसी योजना बहुत ज़रूरी है, लेकिन यह बात भी साफ़ है कि पैसे देकर लड़कियों को स्कूलों में रोका जा सकता है, लेकिन इससे उनमें कौशल का विकास नहीं हो पाता. इसलिए ऐसी योजना को मानव-पूंजी में निवेश के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए.
अर्पण तुलस्यान ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.
1. भारत में प्रमाण यही हैं कि सामाजिक और ढांचागत रुकावटों के कारण, शिक्षा सुधरने पर भी श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी हमेशा नहीं बढ़ती. हालांकि, जब महिलाएं नौकरी पाती हैं, तो उच्च शिक्षित होने के कारण उन्हें आर्थिक लाभ अधिक मिलते हैं, जो उन योजनाओं का मानव पूंजीगत आधार है, जिनका मक़सद लड़कियों को उच्च शिक्षा में दाख़िला दिलवाना और उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करना है.
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Arpan Tulsyan is a Senior Fellow at ORF’s Centre for New Economic Diplomacy (CNED). With 16 years of experience in development research and policy advocacy, Arpan ...
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