क्या लॉस एंजिल्स का 'मैनशन टैक्स' जैसा कोई मॉडल भारत की शहरी आवासीय समस्या को कम कर सकता है? इस सवाल का जवाब जानने से पहले 'मैनशन टैक्स' के बारे में समझना ज़रूरी है.
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अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े शहर लॉस एंजिल्स (एलए) ने कुछ साल पहले एक नया टैक्स लागू किया. यूनाइटेड टू हाउस एलए (मेजर यूएलए)को आम तौर पर 'मैनशन टैक्स' के रूप में जाना जाता है. नवंबर 2022 में, जब इस टैक्स का प्रस्ताव लाया गया तो नगर परिषद में 58 प्रतिशत ने पक्ष और 42 प्रतिशत ने विपक्ष में वोट दिया. 1 अप्रैल 2023 से लागू ये टैक्स 50 लाख डॉलर से अधिक मूल्य के संपत्ति लेनदेन पर अतिरिक्त कर लगाता है. लॉस एंजिल्स 50 लाख से 100 लाख डॉलर के बीच की संपत्ति की बिक्री पर 4 प्रतिशत और 100 लाख डॉलर या उससे ज़्यादा की बिक्री पर 5.5 प्रतिशत टैक्स लगाता है. ये 'मैनशन टैक्स' लॉस एंजिल्स द्वारा सभी अचल संपत्ति लेन-देन पर पहले से लगाए जा रहे 0.45 प्रतिशत टैक्स के अतिरिक्त है, और शहर के भीतर सभी तरह की अचल संपत्तियों पर लागू होता है. इसका भुगतान आमतौर पर विक्रेता द्वारा किया जाता है. ये लाभ पर टैक्स नहीं है, बल्कि ये पूरी तरह से बिक्री मूल्य पर आधारित है.
'मैनशन टैक्स' का एक व्यापक सामाजिक उद्देश्य है. इसका मक़सद बेघर लोगों को घर दिलाना और लॉस एंजिल्स में किफायती आवासों की संख्या बढ़ाना है. अमेरिका में लॉस एंजिल्स सबसे ज़्यादा बेघर आबादी वाला शहर बन गया है. इस टैक्स के तहत जमा राजस्व का 70 प्रतिशत हिस्सा किफायती आवासों के निर्माण, पुनर्वास और संरक्षण के लिए आवंटित किया जाएगा. बाकी 30 प्रतिशत रकम एक महत्वाकांक्षी 'बेघरता निवारण कार्यक्रम' के लिए समर्पित है. इसका उद्देश्य निम्न आय वर्ग के किरायेदारों, मुख्य रूप से वृद्ध व्यक्तियों और विकलांग व्यक्तियों को स्थिर करना और उन्हें उनके घरों से विस्थापित होने से रोकना है.
लॉस एंजिल्स 50 लाख से 100 लाख डॉलर के बीच की संपत्ति की बिक्री पर 4 प्रतिशत और 100 लाख डॉलर या उससे ज़्यादा की बिक्री पर 5.5 प्रतिशत टैक्स लगाता है. ये 'मैनशन टैक्स' लॉस एंजिल्स द्वारा सभी अचल संपत्ति लेन-देन पर पहले से लगाए जा रहे 0.45 प्रतिशत टैक्स के अतिरिक्त है, और शहर के भीतर सभी तरह की अचल संपत्तियों पर लागू होता है.
हावर्ड जार्विस टैक्सपेयर्स एसोसिएशन (एचजेटीए) और अन्य लोगों ने इस टैक्स को अदालत में चुनौती दी. उन्होंने तर्क दिया कि ये टैक्स राज्य के संविधान और शहर के चार्टर दोनों का उल्लंघन करता है. हालांकि, न्यायपालिका ने इन तर्कों को खारिज़ कर दिया और कहा कि नगर परिषद को संपत्ति हस्तांतरण टैक्स लगाने का संवैधानिक अधिकार है. फैसले में कहा गया कि, "हम ये निष्कर्ष निकालते हैं कि शहर के मतदाताओं के बहुमत से पारित मेजर यूएलए जनता की पहल शक्ति का वैध प्रयोग था."
मैनशन टैक्स से बेघर लोगों की समस्या काफ़ी हद तक कम हुई. दिसंबर 2025 तक, इस टैक्स से लॉस एंजिल्स आवास विभाग को 1.03 अरब डॉलर की कमाई हुई. परिषद ने हाल ही में किफायती आवास परियोजनाओं के लिए 300 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि को मंजूरी दी है, जिसमें 1,700 इकाइयों का निर्माण और बेघरपन की रोकथाम शामिल है. इसमें एक आपातकालीन किराया सहायता कार्यक्रम भी शामिल है, जिसने बेघरों को अपने घरों में रहने में मदद की. आय सहायता कार्यक्रम के तहत लगभग 500 पात्र परिवारों को 20,000 डॉलर की नकद सहायता भी प्रदान की गई, जिनमें मुख्य रूप से किराए के बोझ तले दबे वरिष्ठ नागरिक और बेदखली के खतरे का सामना कर रहे विकलांग व्यक्ति शामिल थे. लॉस एंजिल्स बेघर सेवा प्राधिकरण द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला है कि, मैनशन टैक्स लागू होने से पहले, 2020 से बेघरता में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. फरवरी 2022 में, लॉस एंजिल्स काउंटी में 69,144 लोग बेघर थे. शहर में आश्रय पाने वाले लोगों की संख्या में भी 2020 की तुलना में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे अस्थायी आवास में रहने वाले लोगों की संख्या 13,522 तक पहुंच गई. 2025 में, लॉस एंजिल्स में 43,699 बेघर लोग थे, जो 2022 की तुलना में 25,445 कम थे. दीर्घकालिक बेघरता में 22 प्रतिशत की कमी आई.
टैक्स से कई फायदों के बावजूद, इसकी कड़ी आलोचना हो रही है. विरोधियों का कहना है कि इस टैक्स से लॉस एंजिल्स के रियल एस्टेट बाज़ार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इसके लागू होने के बाद से सभी प्रकार के आवासीय निर्माण में गिरावट आई है. इस टैक्स के कारण आलीशान मकान मालिकों ने अपने घर बेचने के बजाय नवीनीकरण को प्राथमिकता दी है, जिससे बिक्री कम हुई है और आपूर्ति संबंधी समस्याएं और बढ़ गई हैं. 2018-2019 के स्तर की तुलना में, किफायती आवास इकाइयों के निर्माण में 70 प्रतिशत की गिरावट आई है.
लॉस एंजिल्स बेघर सेवा प्राधिकरण द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला है कि, मैनशन टैक्स लागू होने से पहले, 2020 से बेघरता में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. फरवरी 2022 में, लॉस एंजिल्स काउंटी में 69,144 लोग बेघर थे. शहर में आश्रय पाने वाले लोगों की संख्या में भी 2020 की तुलना में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे अस्थायी आवास में रहने वाले लोगों की संख्या 13,522 तक पहुंच गई.
कुल मिलाकर, रियल एस्टेट सेक्टर में 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि लॉस एंजिल्स में हर साल लगभग 1,900 यूनिटों का निर्माण रुक सकता है, जिनमें कम से कम 160 किफायती आवास शामिल हैं. इस स्थिति ने शहर में प्रॉपर्टी टैक्स कलेक्शन को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. नगर परिषद को हर साल 25 मिलियन डॉलर के राजस्व नुकसान का अनुमान है. इसके अलावा, मैनशन टैक्स से भी अपेक्षित राजस्व नहीं मिल रहा है. 2024 के अंत तक, इससे 480 मिलियन डॉलर ही जुटाए गए, जो 600 मिलियन डॉलर से 1.1 अरब डॉलर के अपेक्षित दायरे से काफी कम है.
आवास बाज़ार की मंदी को दूर करने के लिए, कई पार्षदों ने मैनशन टैक्स में एक महत्वपूर्ण संशोधन का प्रस्ताव रखा. इसमें नए निर्माण पर 15 साल की छूट और 2025 में पैलिसेड में लगी भीषण जंगल की आग के पीड़ितों के लिए राहत प्रदान करने का प्रावधान शामिल था. पैलिसेड्स में लगी आग में 6,845 इमारतें नष्ट हो गईं और 975 मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे, जबकि 12 लोगों की जान भी चली गई थी. इस संशोधन पर काफ़ी बहस हुई, लेकिन ये प्रस्ताव पास नहीं हो सका.
भारत में इस तरह का टैक्स नगर निगम नहीं लगा सकते. ये उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है. भारत में नए टैक्स लगाने का अधिकार राज्य या केंद्र सरकार के पास है. इसके अलावा, भारत में संपत्ति के लेन-देन पर पहले से ही बहुत ज़्यादा टैक्स लगता है. संपत्ति खरीदने या बेचने पर लगने वाले स्टांप शुल्क की दर देश भर में अलग-अलग है, जो आमतौर पर कुल राशि का 5 से 7 प्रतिशत होता है. सभी संपत्ति लेन-देन पर लगभग 1 प्रतिशत का पंजीकरण शुल्क भी लगता है.
भारतीय शहरों में किफायती आवास के लिए उच्च मूल्य वाली संपत्ति की बिक्री पर एक टैक्स लगाना समय की ज़रूरत प्रतीत होती है, लेकिन इसके साथ ही ये भी सुनिश्चित करना होगा कि इस टैक्स से मिली रकम का इस्तेमाल सिर्फ किफायती आवास के लिए ही किया जाए.
हालांकि, स्टांप शुल्क से मिली रकम को किफायती आवास के लिए आरक्षित नहीं किया जाता है, ना ही इसे इस उद्देश्य से एकत्र किया जाता है. इसलिए दुनिया भर के अन्य शहरों की तरह, भारतीय शहरों को भी 'किफायती आवास की समस्या' का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा, चूंकि आवास भारत के संविधान के तहत 'राज्य का विषय' है, इसलिए इसके प्रावधान के लिए राज्य सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं. हालांकि, इस मामले में राज्यों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत के शीर्ष आठ शहरों में 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले किफायती आवास इकाइयों का हिस्सा 2018 में 52.4 प्रतिशत से घटकर 2025 तक 17 प्रतिशत रह गया है. वहीं दूसरी ओर, अनुमान है कि 2030 तक ऐसे आवासों की मांग 3 करोड़ इकाइयों तक पहुंच जाएगी.
ये बात स्पष्ट है कि, अगर किफायती आवास निर्माण को बाज़ार की शक्तियों पर छोड़ दिया जाए, तो इस निजी क्षेत्र के खिलाड़ी उस पैमाने पर किफायती आवास नहीं बनाएंगे, जितने की ज़रूरत है. इसके लिए सरकार को दख़ल देना होगा. भारत सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) ने गांवों और छोटे शहरी क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है. हालांकि, ज़मीन की कमी के कारण प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई-यू) महानगरों में सफल नहीं हो पाई है, जबकि शहरों में ही किफायती आवास की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
ये स्थिति दिखाती है कि शहरी आवास की गंभीर कमी को दूर करने के लिए स्थानिक पुनर्गठन और आसान शर्तों पर लोन दिए जाने की आवश्यकता है. इसके अलावा केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, अर्धसरकारी संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के बीच मज़बूत समन्वय की भी ज़रूरत है. भारतीय शहरों में किफायती आवास के लिए उच्च मूल्य वाली संपत्ति की बिक्री पर एक टैक्स लगाना समय की ज़रूरत प्रतीत होती है, लेकिन इसके साथ ही ये भी सुनिश्चित करना होगा कि इस टैक्स से मिली रकम का इस्तेमाल सिर्फ किफायती आवास के लिए ही किया जाए.
रामनाथ झा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं.
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Dr. Ramanath Jha is Distinguished Fellow at Observer Research Foundation, Mumbai. He works on urbanisation — urban sustainability, urban governance and urban planning. Dr. Jha belongs ...
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