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चीन की डिजिटल दीवार सिर्फ़ सेंसरशिप नहीं बल्कि राज्य शक्ति का विस्तार है- जहाँ निजी कंपनियाँ भी निगरानी और नैरेटिव नियंत्रण का औज़ार बन जाती हैं. KnownSec लीक बताता है कि सूचना के इस युद्ध में तकनीक, व्यापार और राजनीति चीन में एक ही रणनीति का हिस्सा हैं.
चीन में सूचना नियंत्रण की व्यवस्था लंबे समय से वैश्विक ध्यान का विषय रही है. हाल ही में चीनी साइबर सुरक्षा कंपनी KnownSec से जुड़े लीक ने राज्य और निजी कंपनियों के गहरे रिश्ते को उजागर किया है. 2023 के एक पुराने डेटा उल्लंघन से सामने आए दस्तावेज़ बताते हैं कि KnownSec का ढांचा चीन की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों से जुड़ा है. इसमें ZoomEye जैसे निगरानी प्लेटफॉर्म का उल्लेख है जो भारत सहित कई देशों की महत्वपूर्ण डिजिटल संरचनाओं की मैपिंग करता है. ये खुलासे दिखाते हैं कि चीन का साइबर सेक्टर सिर्फ व्यावसायिक नहीं बल्कि राज्य की शक्ति का विस्तार है, जो घरेलू नियंत्रण और विदेशी सूचना अभियानों दोनों में भूमिका निभाता है. यह घटना केवल डेटा लीक का मामला नहीं है. यह चीन की ग्रेट फ़ायरवॉल रणनीति को दिखाती है जो दोहरे तरीके से काम करती है- देश के भीतर जानकारी को नियंत्रित और छांटती है और बाहर की दुनिया में अपने पक्ष की कहानियाँ फैलाती है, मिलकर ये तंत्र एक ऐसा दुष्प्रचार तंत्र बनाते हैं, जो लोकतांत्रिक देशों में पारदर्शिता और बहुलता को चुनौती देता है.
ये खुलासे दिखाते हैं कि चीन का साइबर सेक्टर सिर्फ व्यावसायिक नहीं बल्कि राज्य की शक्ति का विस्तार है, जो घरेलू नियंत्रण और विदेशी सूचना अभियानों दोनों में भूमिका निभाता है.
चीनी तकनीकी कंपनियाँ आम तौर पर स्वतंत्र रूप से काम नहीं करती बल्कि कानून और राजनीति के कारण उन्हें राज्य की सुरक्षा एजेंसियों के साथ सहयोग करना पड़ता है. KnowSec का मामला इसी का उदाहरण है, जहाँ कंपनी का जुड़ाव पुलिस और सेना से दिखता है. लीक से पता चलता है कि इसके डेटा जुटाने वाले टूल-जो सोशल मीडिया और अन्य जानकारियाँ इकट्ठा करते हैं-सूचना फैलाने और प्रभाव बनाने के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं. इससे साफ होता है कि चीन में तकनीकी कंपनियों के साधन अक्सर राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों के लिए काम में लाए जाते हैं.
चीन का ग्रेट फ़ायरवॉल सेंसरशिप और निगरानी की एक संगठित व्यवस्था है. इसमें कानून, तकनीक और विचारधारा-तीनों का इस्तेमाल कर जानकारी पर नियंत्रण रखा जाता है. यह विदेशी सोशल मीडिया को रोकता है, बाहरी कंटेंट को फ़िल्टर करता है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री हटाता है. यह कोई साधारण दीवार नहीं बल्कि ऐसी स्मार्ट प्रणाली है जो मशीन लर्निंग की मदद से तुरंत दखल दे सकती है. इसके ज़रिये चीन में इंटरनेट पर सीमित और नियंत्रित बहस की अनुमति दी जाती है, लेकिन असहमति को दबा दिया जाता है. इस ढांचे में KnownSec जैसी कंपनियाँ डेटा इकट्ठा करने और लोगों के व्यवहार पर नजर रखने की तकनीक उपलब्ध कराती हैं. ZoomEye और WeChat जैसे टूल, जो दिखने में साइबर सुरक्षा के लिए हैं, असल में निगरानी और जानकारी जुटाने में भी इस्तेमाल होते हैं. यह व्यवस्था चीन की “साइबर संप्रभुता” की सोच को दिखाती है, जिसे साइबरस्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ चाइना (CAC) के तहत केंद्रीकृत किया गया है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी मानती है कि हर देश को अपने देश के भीतर सूचना पर पूरा नियंत्रण रखने का अधिकार है. इस तरह इंटरनेट शासन को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बना दिया गया है, जिससे निजी कंपनियों को भी राज्य की विचारधारात्मक नीतियों को लागू करने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
चीन में सूचना प्रबंधन केवल सेंसरशिप तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की सोच को दिशा देने का एक तरीका है. सरकार से जुड़े ऑनलाइन टिप्पणीकार, जिन्हें “50-सेंट आर्मी” कहा जाता है, बड़ी संख्या में ऐसे पोस्ट करते हैं जो आलोचना का जवाब देने के बजाय लोगों का ध्यान राष्ट्रवाद, मनोरंजन या भावनात्मक मुद्दों की ओर मोड़ देते हैं. इससे असहमति की आवाज़ें दब जाती हैं, बिना सीधे टकराव के. KnownSec लीक में सामने आए निगरानी और डेटा विश्लेषण उपकरण इस प्रचार तंत्र को और मजबूत बनाते हैं, क्योंकि इनके ज़रिए सरकार जनभावनाओं पर नज़र रख सकती है और संदेशों को उसी अनुसार ढाल सकती है. इससे प्रचार अधिक व्यापक और व्यक्तिगत बन जाता है.
चीन का ग्रेट फ़ायरवॉल सेंसरशिप और निगरानी की एक संगठित व्यवस्था है.
चीनी दुष्प्रचार लोकतांत्रिक देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. खुले समाज पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर टिके होते हैं, लेकिन यही बातें उन्हें भ्रम और हेरफेर के प्रति कमजोर भी बनाती हैं. चीन इन कमजोरियों का फायदा उठाकर असली समस्याओं को गढ़ी हुई कहानियों के साथ मिलाता है, जिससे लोकतांत्रिक बहस की विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है.
चीन अपनी सीमाओं से बाहर भी सूचना और प्रचार के तरीकों का इस्तेमाल विदेश नीति के औज़ार के रूप में करता है. CGTN, शिन्हुआ और चाइना डेली जैसे सरकारी मीडिया के ज़रिए वह खुद को एक जिम्मेदार और सकारात्मक वैश्विक शक्ति के रूप में दिखाता है. इसके साथ-साथ, सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउंट्स और नेटवर्क के माध्यम से गुप्त दुष्प्रचार भी किया जाता है, जैसा कि 2020 की Graphika रिपोर्ट में बताए गए “Spamouflage Dragon” नेटवर्क से सामने आया.चीन का यह सूचना अभियान “कम्प्यूटेशनल प्रोपेगैंडा” पर आधारित है, जिसमें ऑटोमेशन और डेटा विश्लेषण का इस्तेमाल कर जनमत को प्रभावित किया जाता है. इसका उद्देश्य लोगों को तुरंत मनाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सूचना प्रणालियों पर भरोसा कमज़ोर करना है, ताकि भ्रम, अविश्वास और संशय फैलाया जा सके.
चीन का प्रभाव केवल जानकारी के प्रवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि इंटरनेट की भौतिक और संस्थागत संरचना तक भी फैला हुआ है. डिजिटल सिल्क रोड पहल के तहत चीनी कंपनियाँ विकासशील देशों को दूरसंचार नेटवर्क, निगरानी तकनीकें और प्रशिक्षण कार्यक्रम उपलब्ध कराती हैं. इससे ऐसे देशों को चीन की तरह डिजिटल शासन का मॉडल अपनाने में मदद मिलती है, जहाँ इंटरनेट पर कड़ा नियंत्रण और निगरानी की जाती है.
चीनी दुष्प्रचार लोकतांत्रिक देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.
साइबर संप्रभुता की अवधारणा को बढ़ावा देकर बीजिंग इंटरनेट नियंत्रण को दमन नहीं, बल्कि राज्य की वैध शक्ति के रूप में पेश करता है. यह सोच उन सरकारों को आकर्षित करती है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर असहमति को दबाना चाहती हैं. KnownSec लीक से यह भी सामने आता है कि घरेलू निगरानी के लिए बनाई गई तकनीकें-जैसे कमजोरियों की मैपिंग और व्यवहार विश्लेषण-को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा सेवाओं के रूप में बेचा जा रहा है- इस तरह चीन की ‘ग्रेट फ़ायरवॉल’ अब एक वैश्विक मॉडल बनती जा रही है, जो सत्तावादी व्यवस्था को मजबूत करने का साधन है.
चीन की सूचना-व्यवस्था के नैतिक प्रभाव गहरे हैं। देश के भीतर यह नागरिकों पर लगातार निगरानी और व्यवहार नियंत्रण लागू करती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सच और भरोसे को कमजोर करती है। ग्रेट फ़ायरवॉल और उससे जुड़े बाहरी मॉडल स्वतः स्वतंत्रता नहीं बढ़ाते, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले राज्य की मंशा को ही मजबूत करते हैं- यही इसका विरोधाभास है.
KnownSec लीक ने ऐसे तंत्र को उजागर किया है जहाँ व्यावसायिक नवाचार राजनीतिक निगरानी से, रक्षात्मक साइबर सुरक्षा आक्रामक शोषण से, और राष्ट्रीय सुरक्षा वैचारिक नियंत्रण से जुड़ जाती है.
भू-राजनीतिक रूप से, सूचना पर चीन का नियंत्रण “सॉफ्ट दबाव” का एक साधन बन गया है. जो देश और कंपनियाँ चीनी तकनीक पर निर्भर हैं, वे सेंसरशिप और आज्ञाकारिता के उसके नियमों में फँसने का जोखिम उठाती हैं. डिजिटल सिल्क रोड के जरिए साइबर-शासन के ये मानक निर्यात होना, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक सूक्ष्म लेकिन दूरगामी चुनौती है. KnownSec लीक ने ऐसे तंत्र को उजागर किया है जहाँ व्यावसायिक नवाचार राजनीतिक निगरानी से, रक्षात्मक साइबर सुरक्षा आक्रामक शोषण से, और राष्ट्रीय सुरक्षा वैचारिक नियंत्रण से जुड़ जाती है. पारदर्शिता की कमी यह सुनिश्चित करती है कि चीन के भीतर और बाहर दोनों जगह की कहानी, सीसीपी के अनुसार ही गढ़ी जाए.
KnownSec डेटा लीक से यह साफ होता है कि चीन की सूचना रणनीति में निजी कंपनियाँ भी राज्य की नीतियों का औज़ार बनकर काम करती हैं-चाहे वह निगरानी हो या आक्रामक साइबर गतिविधियाँ. भारत ने डिजिटल सुरक्षा के लिए कई स्तरों की व्यवस्था विकसित की है, लेकिन इनके बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है. इसके लिए एक साझा डिजिटल समन्वय ढांचा बनाना ज़रूरी है, ताकि अलग-अलग एजेंसियाँ मिलकर तेज़ी से काम कर सकें, खासकर चुनाव या संकट के समय. साथ ही, भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ सूचना साझा करने और CERT-स्तर पर सहयोग को भी मजबूत करना चाहिए.आखिरकार, चीन के नियंत्रित सूचना मॉडल और लोकतांत्रिक खुलेपन के बीच टकराव केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है-यह सवाल है कि सच को गढ़ा जाए या स्वतंत्र रूप से सामने आने दिया जाए.
Soumya Awasthi ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (Observer Research Foundation) में सेंटर फ़ॉर सिक्योरिटी, स्ट्रैटेजी एंड टेक्नोलॉजी की फ़ेलो हैं.
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Dr Soumya Awasthi is Fellow, Centre for Security, Strategy and Technology at the Observer Research Foundation. Her work focuses on the intersection of technology and national ...
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