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दिसंबर 2025 में पुतिन की भारत यात्रा, भारत-रूस साझेदारी को नई दिशा देने वाला निर्णायक मोड़ बन सकती है. ऊर्जा, रक्षा और व्यापार में सहयोग को मजबूती देने के साथ ये शिखर सम्मेलन रणनीतिक दोस्ती को ठोस समझौतों में बदलने का अवसर होगा.
Image Source: Getty Images
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 4-5 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली आ रहे हैं. दिसंबर 2021 के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी. आगामी शिखर सम्मेलन का एजेंडा व्यापक है और उसमें ऊर्जा, रक्षा से लेकर व्यापार व निवेश तक, साथ ही ज़मीनी स्तर पर भागीदारी बढ़ाने जैसे कई विषय शामिल हैं. कई साझा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के अलावा, इस शिखर वार्ता में उन चुनौतियों से निपटने पर भी चर्चा होगी, जो दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग में रुकावटें डाल रही हैं.
साल 2022 के बाद से, द्विपक्षीय संबंध को आगे बढ़ाने में सबसे ज़्यादा योगदान ऊर्जा क्षेत्र का रहा है. अब भारत सबसे अधिक कच्चा तेल रूस से मंगवाने लगा है. रूसी कंपनियां भी कई तरह के प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों को तेल भेजती रही हैं. बड़ी रूसी तेल कंपनियों (रोसनेफ़्ट और लुकोइल) पर अमेरिका द्वारा लगाए गए हालिया प्रतिबंधों ने रूस की तेल-आपूर्ति में बाधाएं पैदा की हैं. इस वज़ह से मौजूदा आपूर्ति शृंखलाओं को नए सिरे से तय करना ज़रूरी हो गया है. हालांकि, इन सबसे भारत-रूस तेल संबंधों पर कोई असर पड़ने की आशंका नहीं है, जिसकी वज़हें हैं.
“साल 2022 के बाद से, द्विपक्षीय संबंध को आगे बढ़ाने में सबसे ज़्यादा योगदान ऊर्जा क्षेत्र का रहा है.”
सबसे पहली, मॉस्को को पूरा विश्वास है कि तेल भेजने का कोई न कोई उपाय हो ही जाएगा और भारत कई मध्यस्थों व वैकल्पिक व्यवस्थाओं के माध्यम से तेल को परोक्ष रूप से ख़रीदने में सफल हो सकेगा. दूसरी, नई दिल्ली ने अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े क्षेत्रों में अमेरिकी दबाव के आगे झुकने में कोई उत्साह नहीं दिखाया है और सरकारी कंपनियां गैर-प्रतिबंधित संस्थाओं से रूसी तेल आयात करने की बातें लगातार दोहरा रही हैं. इसीलिए, भारत और रूस अपने पारस्परिक लाभकारी संबंधों को बनाए रखने का ही प्रयास करेंगे, भले ही यह प्रक्रिया कुछ जटिल हो जाएगी.
जैसा कि कहा गया है, 21 नवंबर से लागू हुए नए अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद नई दिल्ली मॉस्को के साथ तेल संबंधी अपना कारोबार कम कर सकता है. यह ऐसा विषय नहीं है, जिसकी घोषणा भारत सरकार पुतिन के नई दिल्ली आने पर करना चाहेगी, हालांकि 2026 में ऐसा कुछ हो सकता है. मगर, रूस के नीति-निर्माता निश्चित रूप से यही चाहेंगे कि भारत उनका लंबे समय तक ग्राहक बना रहे, क्योंकि इससे उन्हें अपने बजट अनुमानों को स्थिर करने और सबसे बड़े तेल निर्यातक देश के रूप में चीन पर बढ़ती निर्भरता को कम करने में मदद मिल सकती है. इसलिए, रूस अपने तेल बाज़ार को लेकर नए उपाय करने की सोच रहा है, जिसमें काफ़ी अधिक छूट देने से लेकर नई-नई कंपनियों व बिचौलियों के माध्यम से कारोबार करना- सब कुछ शामिल है. उसे उम्मीद है कि इन सबसे मौजूदा ‘ठहराव’ के बाद ‘कामकाज को वापस सामान्य’ बनाना संभव हो सकेगा.
“भारत-रूस रक्षा संबंध में 2022 और 2024 के बीच अनिश्चितता देखने को मिली थी, लेकिन अब यह रिश्ता फिर से पटरी पर लौट आया है.”
रूस कच्चे तेल के अलावा, भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग में भी आगे बढ़ना चाहता है और रोसाटॉम बड़े व छोटे परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजनाओं के स्थानीयकरण में मदद करने को तैयार है. तमिलनाडु के कुडनकुलम NPP के दूसरे व तीसरे चरण को पूरा करने के अलावा, यह रूसी कंपनी लंबे समय से यह सुझाव दे रही है कि भारत एक नया संयंत्र शुरू करे, हालांकि साइट की मंजूरी में फिलहाल देरी हो रही है. रोसाटॉम का एक अन्य प्रस्ताव भारतीय क्षेत्रों में ग्रिड के सीमित बुनियादी ढांचे या कोयला आधारित ग्रिड की चरणबद्ध समाप्ति के साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) बनाने का है. हालांकि, अप्रैल 2025 में कंपनी ने थोरियम आधारित SMR के लिए महाराष्ट्र सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन यह किस तरह क्रियान्वित हो सकेगा, इस पर सबकी नज़र बनी हुई है, क्योंकि नई दिल्ली अमेरिका और फ्रांस जैसे अपने अन्य सहयोगी देशों के साथ यही तकनीक ख़रीदने पर विचार कर रही है. रूस और भारत रूपपुर NPP को भी मिलकर बनाने पर काम रहे हैं, जो बांग्लादेश में है. यहां के लिए रोसाटॉम ने भारतीय कंपनियों से परियोजनाओं से जुड़े कुछ ज़रूरी उपकरण ख़रीदे हैं.
भारत-रूस रक्षा संबंध में 2022 और 2024 के बीच अनिश्चितता देखने को मिली थी, लेकिन अब यह रिश्ता फिर से पटरी पर लौट आया है. इस शिखर सम्मेलन में नए सौदों को अंतिम रूप दिया जा सकता है, हालांकि इसका खुलासा शायद ही किया जाए. संभावित सौदों के तहत भारत द्वारा S-400 वायु रक्षा प्रणालियों की नई ख़रीद हो सकती है, जिसने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सफल प्रदर्शन किया था. संकेत यही है कि नई दिल्ली अपनी वायु रक्षा क्षमताओं को मज़बूत बनाने के लिए इन सुरक्षा प्रणालियों पर भरोसा कर रही है. भारतीय रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में S-400 के लिए ‘बड़ी संख्या में ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों’ की ख़रीद के लिए, जिनकी मारक क्षमता 120, 200, 250 और 380 किलोमीटर है, शुरुआती स्वीकृति दी है. हालांकि, S-400 के लिए यदि किसी नए अनुबंध पर दस्तख़्त होते हैं, तब भी भारत को हाल-फिलहाल में यह शायद ही मिल सकेगा, क्योंकि 2018 के समझौते के तहत शेष बची दो प्रणालियों की आपूर्ति में भी देरी हो रही है.
“इस शिखर सम्मेलन में व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर ख़ास तौर पर चर्चा हो सकती है.”
S-400 वायु रक्षा प्रणालियों का संयुक्त उत्पादन और Su-57 लड़ाकू विमानों का सौदा शिखर सम्मेलन का अन्य एजेंडा हो सकते हैं. हालांकि, दोनों पर बातचीत शुरुआती दौर में ही जान पड़ती है और इनको अपने अंजाम तक पहुंचने में समय लगेगा. रूस 2021 से भारत को S-400 बेचने की कोशिश कर रहा है, जब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव ने कहा था कि भारत ‘संभावित रूप से’ इस रक्षा प्रणाली को पाने वाला पहला विदेशी प्राप्तकर्ता देश होगा. S-400 के लिए मिसाइलों का सिलसिलेवार उत्पादन 2021 के मध्य में शुरू हुआ था, जबकि इन प्रणालियों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन की घोषणा अप्रैल 2022 में की गई थी. हालांकि, रूस ने अपनी वायु रक्षा के लिए कितने S-400 तैनात किए हैं, इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. इसलिए यह देखते हुए कि अपने सुरक्षा बलों की ज़रूरतों को पूरा करना मॉस्को की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, S-400 का निर्यात फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है.
हालांकि, Su-57E पर समझौते की संभावना थोड़ी अधिक है, जो Su-57 लड़ाकू विमान का निर्यात संस्करण है. मुश्किल यह है कि भारत ने 2018 में रूस के साथ संयुक्त पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (FGFA) कार्यक्रम से अपने हाथ खींच लिए थे, क्योंकि उसके मुताबिक, इस विमान की स्टील्थ व सुपरक्रूज क्षमताएं नाकाफ़ी हैं और रूस सीमित प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की बात कहता रहा है. मगर बेड़े की क्षमता में आई कमी को दूर करने और स्क्वाड्रन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय वायु सेना (IAF) एक संभावित ‘अस्थायी’ समाधान के रूप में Su-57 ख़रीद सकती है. मौके की नज़ाकत को देखते हुए रूस भारत की मांगों को पूरा करने की इच्छा दिखा रहा है और बिना किसी रुकावट के प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण व भारतीय ज़मीन पर विमानों के उत्पादन पर सहमत होता नज़र आने लगा है. Su-57 विमान पहले से ही विदेशी मित्र राष्ट्रों को आपूर्ति किए जा रहे हैं, और 2009 के सौदे के तहत अल्जीरिया को 12 में से दो विमान पहले ही दिए जा चुके हैं. हालांकि, सभी प्रयासों के बाद भी, भारतीय विशेषज्ञों के बीच Su-57 की विश्वसनीयता को लेकर अब भी कई तरह के संदेह हैं, क्योंकि रूस ने खुद एक तय सीमा तक ही इस विमान का इस्तेमाल किया है. यदि भारत इस समझौते पर आगे बढ़ता भी है, तब भी तकनीक में तालमेल बनाने और भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों के मुताबिक विमान में फेरबदल करने से यह पूरी प्रक्रिया लंबी हो सकती है.
इस शिखर सम्मेलन में व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर ख़ास तौर पर चर्चा हो सकती है. कुछ हफ़्ते पहले, पुतिन ने प्रथम उप-प्रधानमंत्री और भारत-रूस अंतर सरकारी आयोग के सह अध्यक्ष डेनिस मंटुरोव को व्यापार असंतुलन सहित द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों की पड़ताल करने और समाधान सुझाने का काम सौंपा था. उम्मीद है कि रूस भारतीय कंपनियों की अपने बाज़ार तक पहुंच बढ़ाने के लिए कई उपाय कर सकता है, ताकि मशीनरी, दूरसंचार से जुड़े उपकरण, रसायन, खाद्य और दवा उत्पादों से जुड़े भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिल सके.
“इरादों को व्यावहारिक समझौतों में बदलना नई दिल्ली और मॉस्को, दोनों की प्राथमिकता बनी रहेगी.”
यूरेशियाई आर्थिक संघ (EAEU) के साथ भारत की व्यापार वार्ता में आई तेज़ी संकेत है कि द्विपक्षीय उपायों को आगे बढ़ाया गया है. अगस्त 2025 में 18 महीने की कार्ययोजना को लेकर एक सशर्त हस्ताक्षर किए गए है, जिसमें भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME), किसानों और मछुआरों के लिए नए EAEU बाज़ार खोलने के लिए प्रयास करने पर सहमति बनी है.
बैंकिंग में एकीकरण भी बढ़ रहा है और कई बड़े रूसी बैंक भारत में न सिर्फ़ आ रहे हैं, बल्कि अपना संचालन भी बढ़ा रहे हैं. अब आपसी व्यापार में ‘राष्ट्रीय मुद्राओं’ का अधिक इस्तेमाल होने लगा है. इस आर्थिक संबंध को और मज़बूत बनाने के लिए, रूस का केंद्रीय बैंक भारत में एक प्रतिनिधि कार्यालय खोलने की योजना बना रहा है, जिसका मुख्य मक़सद भुगतान और वित्तीय प्रणालियों में साझेदारी को आगे बढ़ाना है, जो आधिकारिक सूत्रों के अनुसार ‘धीरे-धीरे’ आगे बढ़ भी रही है.
परियोजनाओं में निवेश, संयुक्त उद्यमों और साथ-साथ उत्पादन के प्रयासों पर सहमति शिखर सम्मेलन की अन्य उपलब्धियां हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, भारत द्वारा उर्वरकों की टिकाऊ आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए रूस में एक यूरिया निर्माण फैक्टरी लगाने की घोषणा की जा सकती है. नागरिक उड्डयन क्षेत्र में, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो SJ-100 विमान के उत्पादन से जुड़ा है. उल्लेखनीय है कि यह दो इंजन वाला छोटा यात्री विमान है, जो छोटी दूरी की उड़ानों के लिए बनाया गया है.
समुद्री सहयोग को भी मज़बूत करने के लिए रूस कई तरह की सहायता देने का प्रस्ताव दे रहा है. रूसी समुद्री बोर्ड के अध्यक्ष निकोले पेत्रुशेव ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान मुंबई और चेन्नई के बंदरगाहों में रूस की भागीदारी के साथ जहाज़ बनाने और मरम्मत केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था. अन्य पहलों की बात करें, तो बर्फ तोड़ने वाले गैर-परमाणु जहाज़ों के निर्माण, चालक दल के प्रशिक्षण में सहयोग और समुद्री खोज-पड़ताल की वैज्ञानिक गतिविधियों में रूसी सहायता प्रमुख है. रूस ‘हरित नौवहन’ के विकास में भी मदद करना चाहता है.
भले ही, दोनों देश अभी भू-राजनीतिक मुश्किलों से जूझ रहे हैं और उनके आपसी संबंधों पर बाहरी दबाव भी बहुत अधिक है, फिर भी इस शिखर सम्मेलन के सफल होने की उम्मीद ज़्यादा है. इरादों को व्यावहारिक समझौतों में बदलना नई दिल्ली और मॉस्को, दोनों की प्राथमिकता बनी रहेगी. प्रस्तावित कुछ परियोजनाओं को आपसी संबंधों को मज़बूत बनाने के लिए तैयार किया गया है, जबकि अन्य को प्रतिबंधों से बचने के लिए जान-बूझकर कम महत्व दिया जाएगा. चूंकि अमेरिकी टैरिफ़ और चीन-अमेरिका संबंध (G-2) क्षेत्रीय समीकरणों को नया आकार दे रहे हैं, इसलिए यही सही वक़्त है कि भारत और रूस अपनी साझेदारी में नई जान फूंकने का प्रयास करें.
(अलेक्सी ज़खारोव ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में रूस और यूरेशिया विभाग के फेलो हैं)
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Aleksei Zakharov is a Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the geopolitics and geo-economics of Eurasia and the Indo-Pacific, with particular ...
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