Published on Sep 20, 2023 Updated 0 Hours ago

जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां गंभीर होती जा रही हैं, और हरित संक्रमण के लिए वित्तीय संसाधन भी सीमित हैं, ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा की उच्च लागत और उसमें लगने वाले अत्यधिक भूमि संसाधन को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि नेट ज़ीरो कार्बन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी नाभिकीय ऊर्जा एक बेहतर विकल्प है.

जॉन कैरी की चीन यात्रा, जलवायु परिवर्तन और भारत की ऊर्जा आवश्यकताएं

जलवायु परिवर्तन मुद्दे को लेकर अमेरिका के विशेष दूत, जॉन कैरी, ने हाल ही में चीन का दौरा किया था, जो बिना किसी ठोस प्रगति के 20 जुलाई को समाप्त हो गया. राष्ट्रपति शी ने स्पष्ट रूप से कहा कि चीन को अपने जलवायु लक्ष्यों कोस्वयं निर्धारित करना चाहिए, और किसी भी हाल में उसे दूसरों के प्रभाव में नहीं आना चाहिए.” दोनों देशों के बीच तनाव का असर ये है कि इसने नई दिल्ली में G20 सम्मेलन या साल के आखिर में दुबई में COP28 सम्मेलन में किसी नतीजे पर पहुंचने की संभावनाओं को धूमिल कर दिया है.

चीन और विकसित देश वैश्विक कार्बन बजट का 80 फ़ीसदी हिस्सा पहले ही खर्च कर चुके हैं. चूंकि इन देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की दर भारत की तुलना में कहीं ज्यादा है, इसलिए शेष कार्बन बजट में भी इनकी असमान हिस्सेदारी बनी हुई है.

ऊर्जा संक्रमण शेष कार्बन बजट में हिस्सेदारी की लड़ाई है. चीन और विकसित देश वैश्विक कार्बन बजट का 80 फ़ीसदी हिस्सा पहले ही खर्च कर चुके हैं. चूंकि इन देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की दर भारत की तुलना में कहीं ज्यादा है, इसलिए शेष कार्बन बजट में भी इनकी असमान हिस्सेदारी बनी हुई है. अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन क्रमशः 16.06 टन, 7.1 टन, 6.41 टन और 1.9 टन है.

नेटज़ीरो कार्बन का लक्ष्य

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन में बिजली क्षेत्र का हिस्सा 45 प्रतिशत है. नेट-ज़ीरो कार्बन के लक्ष्य के लिए डी-कार्बोनाइजेशन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए बिजली क्षेत्र के अलावा दूसरे क्षेत्रों पर भी ध्यान देना होगा. जैसे-जैसे विभिन्न क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा आधारित विद्युतीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा, वैसे-वैसे बिजली की मांग तेजी से बढ़ती जाएगी. 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए न्यूनतम कितनी बिजली की आवश्यकता होगी? विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) द्वारा किए गए एक अध्ययन और आईआईटी बॉम्बे द्वारा तैयार किए गणितीय मॉडल के अनुमान के मुताबिक 2070 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करने के लिए न्यूनतम 24,000-30,000 TWhr बिजली की आवश्यकता होगी. IEA की एक रिपोर्ट के अनुसार 2040 में बिजली की मांग 3400 TWhr तक पहुंच सकती है. नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2020 में भारत की ऊर्जा खपत 6,292 TWhr थी. क्या यह मान लेना सही होगा कि आने वाले दो दशकों में भारत की ऊर्जा खपत 2020 की तुलना में घटकर लगभग आधी हो जाएगी जबकि महामारी के कारण 2020 में आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं?

VIF के दूसरे अध्ययन के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा आधारित संयंत्र की स्थापना में 152 खरब अमेरिकी डॉलर का खर्च आएगा, वहीं परमाणु संयंत्र की लागत 112 खरब अमेरिकी डॉलर होगी. बिजली की स्तरीय लागत (LCOE) के आधार पर देखें तो नवीकरणीय बिजली संयंत्र सस्ते मालूम पड़ेंगे. हालांकि यह पद्धति बिजली संतुलन की लागत (बिजली की मांग और आपूर्ति में संतुलन की लागत) सहित सिस्टम की लागत को शामिल नहीं करती है. डिस्कॉम द्वारा इस खर्च का वहन किया जाता है और इसे बिजली शुल्क में शामिल नहीं किया जाता.

विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) द्वारा किए गए एक अध्ययन और आईआईटी बॉम्बे द्वारा तैयार किए गणितीय मॉडल के अनुमान के मुताबिक 2070 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करने के लिए न्यूनतम 24,000-30,000 TWhr बिजली की आवश्यकता होगी.

फोरम ऑफ रेगुलेटर्स द्वारा 2021 में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से बिजली उत्पादन की अनुमानित लागत को 2.12 रुपये प्रति यूनिट बताया गया था. इसमें अगर बिजली शुल्क (2 रुपए प्रति यूनिट) को भी जोड़ लिया जाए तो यह कोयले (3.25 रुपए प्रति यूनिट) या परमाणु ऊर्जा (3.47 रुपए प्रति यूनिट) की तुलना में कहीं अधिक महंगा हो जाएगा. OECD के एक अध्ययन में पाया गया है कि 100 मेगावाट क्षमता वाला परमाणु संयंत्र 600 मेगावाट क्षमता वाले नवीकरणीय बिजली संयंत्र के बराबर बिजली का उत्पादन करता है क्योंकि परमाणु संयंत्र का प्लांट लोड फैक्टर कम होता है. नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में उच्च क्षमता वाले संयंत्र के निर्माण की आवश्यकता इसे खर्चीला बना देती है. चीन और अमेरिका के उदाहरणों पर आधारित MIT के एक शोध में कहा गया है कि परमाणु ऊर्जा के ज़रिए एक ग्राम CO2/किलोवाट के उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने की लागत गैर-परमाणु ऊर्जा स्रोतों की तुलना में लगभग आधी होती है.

नवीकरणीय ऊर्जा

चरम मौसमी घटनाएं नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भरता को जोख़िम भरा बना देती हैं. सितंबर 2021 में जब उत्तरी सागर से चलने वाली हवाओं की गति धीमी हो गई, तो यूनाइटेड किंगडम (यूके) में बिजली की लागत पांच गुना बढ़ गई, जबकि जर्मनी के मामले में वे दोगुनी हो गईं. दोनों देशों के बीच ये अंतर क्यों है? दोनों मामलों में, बिजली उत्पादन में पवन ऊर्जा का योगदान लगभग 20 प्रतिशत है. हालांकि, जर्मनी अपनी महाद्वीपीय स्थिति के कारण क्षेत्रीय ग्रिड से बिजली ले सकता है. लेकिन यूके पास ये सुविधा नहीं है. भारत एक उपमहाद्वीप होने के बावजूद यूके जैसी स्थिति में है. वह क्षेत्रीय ग्रिड से बिजली नहीं खींच सकता क्योंकि उसके ज्यादातर पड़ोसी ऊर्जा की कमी से जूझते हैं. भूटान भारत को बिजली निर्यात करता है लेकिन भारत की मांग को पूरा करने में असमर्थ है.

जर्मनी ने परमाणु ऊर्जा उत्पादन को चरणबद्ध ढंग से समाप्त किया है, लेकिन उसके उपयोग को नहीं. वह फ्रांस और चेक गणराज्य से बिजली का आयात करता है, जहां अधिकांश बिजली का उत्पादन परमाणु ऊर्जा द्वारा किया जाता है. प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में जर्मनी में नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार सबसे अधिक (46.9 प्रतिशत) है, लेकिन यहां बिजली का शुल्क दुनिया में सबसे ज्यादा है.

नवीकरणीय ऊर्जा की ट्रांसमिशन लागत भी बहुत अधिक होती है. भविष्य में यह समस्या और भी ज्यादा गंभीर हो जाएगी क्योंकि कुछ प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को कच्छ के रण और लद्दाख जैसे दूरदराज के स्थानों में स्थापित करना होगा. इसका मतलब ट्रांसमिशन लाइनें और ज्यादा लंबी होगी और लागत में बढ़ोतरी होगी. मैकिन्से इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के मुताबिक, 2100 में बिजली की वितरण लागत में इसका योगदान 80 फीसदी होगा.

फ्रांस और चेक गणराज्य से बिजली का आयात करता है, जहां अधिकांश बिजली का उत्पादन परमाणु ऊर्जा द्वारा किया जाता है. प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में जर्मनी में नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार सबसे अधिक (46.9 प्रतिशत) है, लेकिन यहां बिजली का शुल्क दुनिया में सबसे ज्यादा है.

नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में अत्यधिक भूमि संसाधन का उपयोग होता है. VIF रिपोर्ट में एक दिलचस्प बात का उल्लेख है कि मुख्य रुप से नवीकरणीय ऊर्जा आधारित बिजली उत्पादन के लिए 412,033 वर्ग किमी भूमि की आवश्यकता होगी. यह भारत में उपलब्ध कुल भूमि से दोगुना (2,00,000 वर्ग किमी) है. परमाणु ऊर्जा के मामले में 183,565 वर्ग किमी भूमि की आवश्यकता होगी.

कार्बन उत्सर्जन के उच्चतम स्तर तक जल्दी ही पहुंचने का दबाव बढ़ता ही जा रहा है. जापान के हिरोशिमा में G7 शिखर सम्मेलन में प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से कहा गया कि वे 2025 तक उत्सर्जन के ‘चरम स्तर’ तक पहुंच जाएं. चीन ने 2030 तक इस स्थिति तक पहुंचने के प्रति सहमति जताई है. भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (1100 यूनिट) वैश्विक औसत का एक तिहाई है. हरित संक्रमण से पहले चरम कार्बन उत्सर्जन को अपनाने से उसकी विकास यात्रा प्रभावित होगी.

आगे की राह

जहां एक तरफ़ विकसित देश अधिक सख़्त जलवायु लक्ष्यों को अपनाने पर ज़ोर दे रहे हैं, लेकिन उन्होंने वित्तीय सहायता को बढ़ाने के प्रति ऐसी कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखाई है. मैकिन्से के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक स्तर पर सालाना 95 खरब अमेरिकी डॉलर के वित्तपोषण की आवश्यकता होगी, जिसमें 35 खरब अमेरिकी डॉलर का अतिरिक्त वित्तपोषण भी शामिल है. G20 के अध्यक्ष के रूप में भारत ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा संक्रमण के लिए हर साल 40 खरब अमेरिकी डॉलर के वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी. विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने जैसे उपाय नाकाफ़ी हैं. दुर्भाग्य से, MDB (बहुपक्षीय विकास बैंक) सुधारों से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती. उनसे बहुत ज्यादा संसाधन नहीं जुटाए जा सकते. लैरी समरएन.के.सिंह की रिपोर्ट ने वार्षिक ऋण को तीन गुना बढ़ाकर 400 अरब अमेरिकी डॉलर करने की सिफारिश की है. विश्व बैंक के इक्विटी और ऋण के अनुपात को 20 प्रतिशत से घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया जाए तो भी इससे केवल 5 अरब अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त पूंजी ही जुटाई जा सकती है. वित्तीय संसाधनों के लिए आंतरिक स्तर पर ही प्रयास करने होंगे. इसके लिए डिस्कॉम कंपनियों की हालत में सुधार लाना होगा. निजी पूंजी के रूप में हरित वित्त को जुटाने के लिए बिजली के दाम बढ़ाने होंगे.

वैश्विक स्तर पर सालाना 95 खरब अमेरिकी डॉलर के वित्तपोषण की आवश्यकता होगी, जिसमें 35 खरब अमेरिकी डॉलर का अतिरिक्त वित्तपोषण भी शामिल है. G20 के अध्यक्ष के रूप में भारत ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा संक्रमण के लिए हर साल 40 खरब अमेरिकी डॉलर के वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी.

ट्रांसमिशन लागत को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा को वितरित ऊर्जा समाधान के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए. परमाणु ऊर्जा के विस्तार के लिए सरकारी समर्थन की आवश्यकता होगी क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने का भार अकेले न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) पर नहीं छोड़ा जा सकता. यूके और संयुक्त अरब अमीरात ने दीर्घकालिक टैरिफ गारंटी की सुविधा के साथ निजी कंपनियों (इसमें विदेशी कंपनियां भी शामिल हैं) को परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने और संचालित करने की अनुमति दी है. इसके लिए परमाणु ऊर्जा कानून को संशोधित करने की आवश्यकता होगी. मौजूदा कानून के तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को NPCIL के साथ संयुक्त उद्यम चलाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.