जापान धीरे-धीरे, आबादी घटने के दबाव में, विदेशी श्रमिकों को अपना रहा है. देश में बहस है कि भारतीयों समेत विदेशी कामगारों को कितनी और कैसे जगह मिले. लेख के जरिए जानें कि यह बदलाव जापान की छवि और भारत-जापान सहयोग को कैसे प्रभावित करता है.
जापान को बाहर से देखने वाले कई लोगों को आज भी वह एक बंद और एकरूप समाज लग सकता है जिसे आव्रजन में खास रुचि नहीं है लेकिन देश के भीतर तस्वीर अलग है. यहाँ इस बात पर गंभीर और गहन बहस हो रही है कि विदेशी श्रमिकों और निवासियों को कितनी संख्या में और कितनी तेज़ी से स्वीकार किया जाए. जापानी मीडिया में प्रकाशित संपादकीय और विचार लेख अब केवल आर्थिक ज़रूरतों पर ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता, सुरक्षा और जनसंख्या घटने के दौर में जापानी होने के अर्थ जैसे सवालों पर भी चर्चा कर रहे हैं.
जापान की मौजूदा स्थिति को समझना ज़रूरी है. आज भी देश की कुल आबादी में विदेशी निवासियों की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत ही है जो यूरोप या उत्तरी अमेरिका के मुक़ाबले काफ़ी कम है. डायमंड ऑनलाइन में प्रकाशित एक हालिया लेख, जो सह-अस्तित्व की तीन कुंजियों पर केंद्रित है और फ्रांसीसी अनुभव से तुलना करता है, जापान को अब भी एक छोटा आव्रजन देश बताता है. इसमें जापान के 3 प्रतिशत विदेशी निवासियों की तुलना फ्रांस के लंबे और गहरे आव्रजन इतिहास से की गई है.
जापानी मीडिया में प्रकाशित संपादकीय और विचार लेख अब केवल आर्थिक ज़रूरतों पर ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता, सुरक्षा और जनसंख्या घटने के दौर में जापानी होने के अर्थ जैसे सवालों पर भी चर्चा कर रहे हैं.
इसलिए जापान को पूरी तरह बंद देश मानने की धारणा अब पुरानी होती जा रही है. जापान धीरे-धीरे और कई बार हिचकिचाते हुए, एक आव्रजन देश बनने के प्रयोग कर रहा है. यह प्रक्रिया उसकी अपनी भाषा, मीडिया और स्थानीय राजनीति में खुले तौर पर विवाद और बहस का विषय बनी हुई है. इसी बीच, क्षेत्रीय अख़बारों के संपादकीय बताते हैं कि विदेशी श्रमिक और निवासी अब कई प्रतीकात्मक सीमाएं पार कर चुके हैं. क्योतो शिम्बुन ने चेतावनी दी कि विदेशी श्रमिकों की संख्या अब 20 लाख से अधिक हो चुकी है और कुल विदेशी निवासी 32 लाख से ऊपर हैं. अख़बार ने 10 प्रतिशत विदेशी-निवासी समाज की संभावना पर डर के बजाय शांत और राष्ट्रीय स्तर की बहस की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.
मुख्यधारा का मीडिया भी अब मानने लगा है कि आव्रजन जापानी समाज का हिस्सा बन चुका है. 2024 में माइनिची शिंबुन के एक संपादकीय में बताया गया कि विदेशी निवासियों की संख्या लगभग 34 लाख यानी कुल आबादी का करीब 2.7 प्रतिशत है. ये लोग अब सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाक़ों में भी श्रमिक, माता-पिता और पड़ोसी के रूप में रह रहे हैं. नीति विश्लेषण मंच निप्पोन डॉट कॉम तो यहाँ तक कहता है कि 2019 में शुरू किया गया स्पेसिफ़ाइड स्किल्ड वर्कर वीज़ा और स्थानीय पहलों का जाल जापान को व्यवहार में पहले ही एक आव्रजन देश बना चुका है. वह सरकार से इस सच्चाई को खुले तौर पर स्वीकार करने और नागरिकों को नीति बदलाव समझाने की मांग करता है. इन तथ्यों के आधार पर जापान के भीतर बहस दो बड़े खेमों में बंट जाती है.
नीति विश्लेषण मंच निप्पोन डॉट कॉम तो यहाँ तक कहता है कि 2019 में शुरू किया गया स्पेसिफ़ाइड स्किल्ड वर्कर वीज़ा और स्थानीय पहलों का जाल जापान को व्यवहार में पहले ही एक आव्रजन देश बना चुका है.
एक ओर व्यावहारिक एकीकरण समर्थक हैं जो मानते हैं कि अगर जापान को अपनी कल्याणकारी व्यवस्था और क्षेत्रीय समुदायों को बनाए रखना है तो नियमों के तहत नियंत्रित आव्रजन ज़रूरी है. क्योतो शिंबुन का 10 प्रतिशत समाज वाला लेख विदेशी श्रमिकों को स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य मानता है. निप्पोन डॉट कॉम ने गुनमा, टोक्यो के शिंजुकु और कोच्चि जैसे क्षेत्रों के उदाहरण दिए हैं जहाँ दीर्घकालिक बसावट के लिए बहुसांस्कृतिक सह-अस्तित्व परिषदें, स्थानीय नियम और जापानी भाषा सहायता कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. जुलाई 2025 में कोबे शिम्बुन के एक संपादकीय ने विदेशियों के ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने वाली भाषा से बचने और राजनीति से ऊपर उठकर साथ रहने की नीतियों पर ज़ोर दिया. यह बहस भारत-जापान सहयोग की आवश्यकता दिखाती है, जहाँ भाषा प्रशिक्षण, पारदर्शी भर्ती, श्रमिक अधिकार और कौशल मान्यता सुनिश्चित करना ज़रूरी है.
दूसरी ओर सतर्क प्रतिबंध समर्थक” हैं, जिन्हें डर है कि अगर विदेशी निवासियों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी तो सामाजिक दबाव, अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं. सांकेई शिम्बुन में छपे एक लेख में सवाल उठाया गया कि विदेशी आबादी का उपयुक्त अनुपात क्या होना चाहिए और अगर यह 10 प्रतिशत तक पहुँच गया तो क्या होगा. प्रेज़िडेंट ऑनलाइन ने अगले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में श्रमिकों को स्वीकार करने की योजनाओं को मतदाताओं की स्पष्ट सहमति के बिना “पिछले दरवाज़े से आव्रजन नीति” बताया. वेज ऑनलाइन ने चीनी समुदाय की तेज़ बढ़त पर चिंता जताई और सुरक्षा के संभावित ख़तरों की ओर ध्यान दिलाया. वहीं तोयो केइज़ाई ऑनलाइन में एक रिपोर्ट ने निर्वासन का सामना कर रहे एक कुर्द प्रवासी के मामले के ज़रिये अवैध आव्रजन की मानवीय जटिलताओं और सरकार के सख़्त रुख़ दोनों को दिखाया. यूमिउरी शिंबुन के एक संपादकीय ने इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि नियमों और अपेक्षाओं को साफ़-साफ़ बताना ज़रूरी है, तभी “सह-अस्तित्व” एक नारा भर नहीं रहेगा.
भारतीय पाठकों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि इस बदलते परिदृश्य में भारतीय श्रमिक कहाँ खड़े हैं. हालाँकि जापान में भारतीय समुदाय की संख्या चीनी, वियतनामी या फ़िलिपीनी समुदायों की तुलना में कम है लेकिन इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है. जापान में भारतीय दूतावास के अनुसार, वहाँ 50,000 से अधिक भारतीय रहते हैं. इनमें से कई आईटी, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, वित्त और वैज्ञानिक शोध से जुड़े हैं जबकि एक नया वर्ग सेवा क्षेत्र, विनिर्माण और आतिथ्य उद्योग में काम कर रहा है. नीतिगत स्तर पर भारत और जापान ने पहले ही ठोस ढाँचे तैयार कर लिए हैं. 2017 का तकनीकी इंटर्न प्रशिक्षण कार्यक्रम (TITP) युवाओं को जापानी कंपनियों में काम के दौरान कौशल सीखने का अवसर देता है. वहीं 2021 का स्पेसिफ़ाइड स्किल्ड वर्कर (SSW) समझौता भारतीय श्रमिकों को नर्सिंग केयर, बिल्डिंग क्लीनिंग, जहाज़ निर्माण, कृषि और खाद्य सेवाओं सहित 14 क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर प्रदान करता है.
आने वाले वर्षों में भारत-जापान सहयोग में मानव संसाधन और श्रमिक आवाजाही भी रक्षा, तकनीक और बुनियादी ढांचे जैसे पारंपरिक मुद्दों के साथ एक अहम स्तंभ बनकर उभर सकती है.
कुल मिलाकर, जापान की आव्रजन बहस और उसमें भारतीय श्रमिकों की उभरती भूमिका यह दिखाती है कि जनसंख्या संकट, श्रम बाज़ार और राष्ट्रीय पहचान किस तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं. आने वाले वर्षों में भारत-जापान सहयोग में मानव संसाधन और श्रमिक आवाजाही भी रक्षा, तकनीक और बुनियादी ढांचे जैसे पारंपरिक मुद्दों के साथ एक अहम स्तंभ बनकर उभर सकती है. दिल्ली से देखा जाए तो जापान में चल रही यह बहस कम से कम तीन कारणों से महत्वपूर्ण है.
यह बहस तीन अहम बातों को सामने लाती है. पहला, जापान को एक पूरी तरह बंद देश मानने की धारणा अब पुरानी पड़ रही है. घटती आबादी के दबाव में जापान धीरे-धीरे, कभी सतर्क तो कभी असंगठित ढंग से, आव्रजन की ओर बढ़ रहा है जिस पर उसकी मीडिया और राजनीति में तीखी बहस चल रही है. दूसरा, यह भारत-जापान के बीच मज़बूत नीतिगत सहयोग की ज़रूरत को रेखांकित करती है. TITP और SSW के विस्तार के साथ भाषा प्रशिक्षण, पारदर्शी भर्ती, श्रमिक अधिकार और कौशल मान्यता दोनों के साझा हित हैं. तीसरा, यह बहस यूरोप जैसे वृद्ध लोकतंत्रों के लिए भी आईना है जहाँ इसी तरह की चिंताएँ उभर रही हैं, फर्क बस इतना है कि जापान इस दौर से अभी शुरुआती चरण में गुजर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अध्येताओं के लिए जापान की आव्रजन बहस-और उसमें भारतीय श्रमिकों की उभरती भूमिका-एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है. यह दिखाती है कि एक गैर-पश्चिमी लेकिन अत्यधिक औद्योगिक लोकतंत्र में जनसांख्यिकीय दबाव, श्रम बाज़ार की जरूरतें और राष्ट्रीय पहचान किस तरह आपस में जुड़ती हैं. साथ ही यह संकेत भी देती है कि भविष्य के इंडो-पैसिफ़िक को आकार देने में भारत-जापान सहयोग में मानव संसाधन और श्रमिक आवाजाही, रक्षा, तकनीक और बुनियादी ढांचे जैसे पारंपरिक विषयों के साथ एक अहम स्तंभ बनकर उभरेगी.
केंटा हाराडा जापान स्थित एक सलाहकार और शोधकर्ता हैं जो CHORD कॉर्पोरेशन में जापान-भारत संबंधों, प्रवासन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हैं.
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Kenta Harada is a Japan-based consultant and researcher focusing on Japan–India relations, migration, and international security. He currently works at CHORD Corporation, a boutique consulting ...
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