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Published on Jun 18, 2025 Updated 0 Hours ago

चुनावी राजनीति के मोहरों और कल्याणकारी संस्थाओं के पीछे छुपकर जमात-ए-इस्लामी (JeI) असल में एक सभ्यतावादी एजेंडा चला रही है और दक्षिण एशिया के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को चुनौती दे रही है.

जमात-ए-इस्लामी का वैचारिक डीप स्टेट: दक्षिण एशिया में धर्मनिरपेक्षता के संकट की मज़हबी बुनियाद

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हाल ही में आई एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ बांग्लादेश के राजनीतिक रूप से ज्वलंत माहौल में बहुत जल्द जमात-ए-इस्लामी चुनावी मैदान में फिर से दाख़िल होने जा रही है. 2013 से ही जमात-ए-इस्लामी के ऊपर बांग्लादेश में चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगी हुई है. इसकी वजह इस संगठन की मज़हबी बुनियाद और 1971 के नरसंहार में इसके नेताओं की भूमिका रही है. लेकिन, अब अपने नए मोहरे सामने लाकर जमात एक बार फिर से अपने लिए सियासी वैधता तलाश रही है. बांग्लादेश में ये बदलाव बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और उनकी पार्टी पर बढ़ते दबाव के बीच हो रहा है, जिससे उन वैचारिक शक्तियों को फिर से ताक़तवर होने के लिए बढ़िया मौक़ा मिल गया है, जिनके बारे में पहले ये माना जा रहा था कि उनकी हैसियत ख़त्म कर दी गई है. हालांकि, जमात-ए-इस्लामी की चुनावी राजनीति में वापसी को चुनावी मौक़ापरस्ती के तौर पर देखना, एक और ख़तरनाक सच्चाई से मुंह मोड़ना है. हक़ीक़त ये कि जमात-ए-इस्लामी सिर्फ़ एक सियासी पार्टी भर नहीं है. असल में ये सभ्यतावादी परियोजना है. एक ऐसा महत्वाकांक्षी वैचारिक आदर्शवादी आंदोलन है, जिसका मक़सद सामाजिक आर्थिक ढांचे को मज़हबी व्यवस्था में तब्दील करना है.

दशकों तक सरकारों के ज़ुल्म, अदालतों की पाबंदियों और ठोस राजनीतिक विरोध झेलने के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और जम्मू कश्मीर में ज़बरदस्त सामरिक पुनरावतार और सैद्धांतिक इच्छाशक्ति बनाए रखने की असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया है.

दशकों तक सरकारों के ज़ुल्म, अदालतों की पाबंदियों और ठोस राजनीतिक विरोध झेलने के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और जम्मू कश्मीर में ज़बरदस्त सामरिक पुनरावतार और सैद्धांतिक इच्छाशक्ति बनाए रखने की असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया है. जमात की वैचारिक दृढ़ता, संस्थागत लचीलापन और पर्दे के पीछे से प्रभाव का भू-राजनीतिक असर छोड़ने वाला एक ऐसा जटिल जाल है, जिसको कम करके आंकने का जोखिम क्षेत्रीय ताक़तें और ख़ास तौर से भारत नहीं ले सकता है. इस लेख में जमात-ए-इस्लामी के मज़हबी ढांचे, पर्दे के पीछे से चलाए जाने वाले अभियानों और सभ्यतावादी एजेंडे की पड़ताल की गई है और ये तर्क रखा गया है कि जमात कोई छोटा मोटा कट्टरपंथी संगठन नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक वैचारिक विद्रोह है.

मज़हब पर आधारित ब्लूप्रिंट: मौदूदी का सिद्धांत और जमात-ए-इस्लामी का सभ्यता बदलने का मिशन

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में मौलाना अबुल अला मौदूदी ने की थी. ये संगठन कभी भी केवल चुनावी भागीदारी से संतुष्ट नहीं रहा है. इसकी महत्वाकांक्षाएं हमेशा से ही बहुत अधिक रही हैं: ये संगठन समाज को दैवीय आधार पर चलाना चाहता है, जिसके लिए ये क़ानून, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और प्रशासन को मज़हबी व्यवस्था में तब्दील करने का ख़्वाहिशमंद है. पारंपरिक जिहादी संगठन मोटे तौर पर उग्रवाद के भरोसे चलते हैं. लेकिन उनके उलट जमात-ए-इस्लामी का तरीक़ा बिल्कुल अलग है. जमात बड़ी सावधानी से तैयार की गई दूरगामी रणनीति पर अमल करती है, जिसका मक़सद वैचारिक ग़ुलामी को लागू करना है. जिसे मौलाना मौदूदी ने ‘ज़मीनी स्तर से सांस्कृतिक क्रांति’ लाने का नाम दिया था. अपनी विचारधारा को स्कूलों, मस्जिदों, कल्याणकारी ट्रस्टों और छात्र संगठनों जैसे समाज में सक्रिय संगठनों के साथ जोड़कर जमात-ए-इस्लामी ने एक स्थायी वैचारिक ढांचा खड़ा कर लिया है.

धर्मनिरपेक्ष आधुनिकता को ख़ारिज करना इसका बुनियादी उसूल है. जमात की नज़र में लोकतंत्र एक ग़ैर मज़हबी चीज़ है. हां, अगर इसको ईश्वरीय न्याय व्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाए, तब ये जमात को क़ुबूल है. फिर भी, विडम्बना ये है कि जमात-ए-इस्लामी अक्सर लोकतांत्रिक क्षेत्र में दाख़िल होती है. हालांकि, उसका मक़सद लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में ईमानदारी से भाग लेना नहीं, बल्कि, भीतर से ही उन्हें खोखला बनाना है. जमात-इस्लामी अपनी लोकतांत्रिक वैधता का इस्तेमाल लोकतंत्र की आलोचना की मुहिम छेड़ने के लिए ही करती है और वो ऐसे नज़रिए को आगे बढ़ाती है, जो आख़िर में संवैधानिक व्यवस्था को ख़त्म करके शरीयत को लागू करने वाली है.

पाकिस्तान: फौजी तंत्र के साथ परजीवी साझेदारी

जिस तरह पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी और हुकूमत के ढांचे के बीच आपसी सहयोग का रिश्ता है, वैसा कहीं और नहीं देखने को मिलता है. वैसे तो जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान में कभी कोई बड़ी चुनावी कामयाबी नहीं मिली. लेकिन, जमात लंबे समय से पाकिस्तान के सैन्य सत्ताधारियों की वैचारिक शाखा रही है. जनरल ज़िया उल हक़ के दौर की इस्लामीकरण की मुहिम के दौरान जमात-ए-इस्लामी ने ख़ुद को देश के बौद्धिक और शैक्षणिक ढांचे में अच्छे से पैवस्त कर लिया था. जनरल ज़िया के दौर में जमात ने पाठ्यक्रम तैयार किए, अफ़सरशाही के अहम ओहदों पर क़ब्ज़ा जमा लिया और मदरसे के विशाल नेटवर्क पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था.

पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा इस्लामी जमीयत-ए-तलबा (IJT) अभी भी विश्वविद्यालयों में एक ताक़तवर संगठन है, जो अक्सर रूढ़िवादी नैतिकता को ताक़त के दम पर लागू करता है और वैचारिक कार्यकर्ताओं को भर्ती करता है.

पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा इस्लामी जमीयत-ए-तलबा (IJT) अभी भी विश्वविद्यालयों में एक ताक़तवर संगठन है, जो अक्सर रूढ़िवादी नैतिकता को ताक़त के दम पर लागू करता है और वैचारिक कार्यकर्ताओं को भर्ती करता है. वैचारिक ताक़त की इस गहरी बुनियाद के दम पर जमात सार्वजनिक परिचर्चाओं को आकार देती है, इस्लामिक नैरेटिव को आगे बढ़ाती है और एक ऐसी परछाईं जैसी हुकूमत को चलाती है, जो चुनावी मैदान में झटकों के बावजूद ज़िंदा रहती है. पाकिस्तान में फ़ौजी हुकूमत हो या फिर सिविलियन सरकार, जमात-ए-इस्लामी की वैचारिक मशीनरी जस की तस ताक़तवर बनी रहती है और सरकारी संरक्षण और मज़हबी झुकाव से इसको ताक़त मिलती है.

बांग्लादेश में दमन के बाद नई ब्रांडिंग

बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी की तारीख़ पर 1971 के नरसंहार में उसकी भूमिका के गहरे ख़ूनी दाग़ लगे हुए हैं. उस दौरान जमात की हथियारबंद शाखा अल बद्र ने पाकिस्तानी फौज के साथ मिलकर बांग्लादेशी अवाम पर ज़ुल्म ढाए थे. वैसे तो आज़ादी के बाद बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी पर पाबंदी लग गई थी. लेकिन, बाद में राजनीतिक समझौते और बदलती भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के तहत उस पर लगी पाबंदी हटा ली गई थी. 2008 के बाद अवामी लीग की सरकार ने जमात के ऊपर युद्ध अपराध के मुक़दमे चलाए थे. उसका मक़सद जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक विरासत को ख़त्म करना था. इस अभियान के आख़िर में जमात-ए-इस्लामी के कई नेताओं को मौत की सज़ा दी गई थी.

बांग्लादेश में इतने बड़े पैमाने पर दमन के बावजूद जमात-ए-इस्लामी की केंद्रीय विचारधारा बची रह गई. इसकी छात्र शाखा छात्र शिबिर अभी भी शैक्षणिक संस्थानों में सक्रिय है. वहीं, जमात-ए-इस्लामी के नियंत्रण वाले कारोबारी और कल्याणकारी संगठन ग्रामीण और दूर दराज़ के क्षेत्रों में सामाजिक सेवाएं देते हैं. अब एक नए बैनर तले चुनाव में उम्मीदवार उतारने का जमात का फ़ैसला कोई रास्ते से भटकने वाला क़दम नहीं, बल्कि अपनी विचारधारा को नक़ाबपोश तरीक़े से आगे बढ़ाने की उसकी पुरानी रणनीति का ही हिस्सा है. संवैधानिक प्रतिबंधों के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी ने कभी भी पूरी तरह से सियासी मैदान को अलविदा नहीं कहा; उसने बस अपना चेहरा बदल लिया. जब बांग्लादेश की सरकार आर्थिक संकट से पैदा हुई नाराज़गी और राजनीतिक विरोध का सामना कर रही है, तो जमात-ए-इस्लामी की चुनाव मैदान में दोबारा एंट्री सिर्फ़ मौक़ापरस्ती नहीं, बल्कि उससे आगे की बात है. असल में ये बांग्लादेश में मज़हबी राजनीति की आग को फिर से सुलगाने का प्रयास है.

जम्मू-कश्मीर: विरोध के लिए मज़हब का इस्तेमाल

भारत के जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी ने एक राजनीतिक संघर्ष को इस्लामिक सभ्यता के संघर्ष में तब्दील करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है. 1987 के चुनाव के बाद लोगों की बेज़ारी का फ़ायदा उठाते हुए जमात ने ऐसे इस्लामिक नैरेटिव का प्रचार किया, जिसने धर्मनिरपेक्ष प्रतिरोध को अवैध बनाया और धार्मिकता पर आधारित उग्रवाद को बढ़ावा दिया. जमात-ए-इस्लामी की रणनीति में एक समानांतर नागरिक ढांचा- यानी मस्जिदें, स्कूल और कल्याणकारी ट्रस्ट- खड़ा करना था, जिन्होंने सत्ता की ताक़त को चुनौती दी और सामाजिक नियमों को पुनर्परिभाषित किया. 

जमात-ए-इस्लामी केवल ऐसा संगठन नहीं है, जिस पर पाबंदी लगाने भर से काम चल जाएगा; असल में ये एक वैचारिक जाल है, जो कश्मीरी पहचान को मज़हबी राष्ट्रवाद के इर्द गिर्द खड़ा करता है.

कई बार पाबंदियां लगने के बावजूद-जमात पर हाल में 2019 में पाबंदी लगाई गई थी- जमात-ए-इस्लामी का बौद्धिक ढांचा इस इलाक़े की सामाजिक राजनीतिक ताने बाने से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है. मस्जिदों के जाल, मदरसा व्यवस्था और कल्याणकारी ढांचे के नेटवर्क का बड़े शातिराना तरीक़े से प्रसार करके जमात ने एक समानांतर सिविल सोसाइटी तैयार कर ली है, जो सत्ता में आने के लिए तैयार ऐसी ताक़त के तौर पर सक्रिय रहती है, जो आगे चलककर नियम क़ायदों को नए सिरे से समझाएगी. जमात-ए-इस्लामी केवल ऐसा संगठन नहीं है, जिस पर पाबंदी लगाने भर से काम चल जाएगा; असल में ये एक वैचारिक जाल है, जो कश्मीरी पहचान को मज़हबी राष्ट्रवाद के इर्द गिर्द खड़ा करता है. इस वैचारिक ढांचे का लगातार बने रहना, भारत के लिए सुरक्षा और एकीकरण की दूरगामी चुनौतियां कड़ी करता है, ख़ास तौर से तब और जब कश्मीर में एक नया राजनीतिक शून्य उभर रहा है.

भू-राजनीतिक परिणाम: भारत की सामरिक दुविधा

बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी का फिर से सक्रिय होना और पाकिस्तान में उसकी गहरी वैचारिक पैठ के अलावा जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध के बावजूद जमात की सोच का फलते फूलते रहना, भारत के क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के लिए तिहरी चुनौती है. सीमाओं के आर-पार सक्रिय जिहादी नेटवर्कों के उलट, जमात-ए-इस्लामी ऐसे स्थानीय संस्थानों के साथ काम करता है, जिनके वैश्विक वैचारिक संबंध होते हैं. शैक्षणिक प्रचार प्रसार, सामाजिक कल्याण, और मज़हबी परिचर्चा की इसकी सॉफ्ट पावर, जमात को आतंकवाद निरोध के पारंपरिक ढांचे की पकड़ में आने से बचा लेती हैं.

यही नहीं, जमात-ए-इस्लामी मुस्लिम उम्मा की व्यापक धारा के प्रसार के माध्यम के तौर पर काम करती है और इसकी विचारधारा पूरे दक्षिणी और मध्य एशिया में ऐसे ही अन्य वैचारिक संगठनों से काफ़ी मिलती जुलती है. बांग्लादेश में ख़ास तौर से राजनीतिक तौर पर नाज़ुक दौर में जमात-ए-इस्लामी का फिर से ताक़तवर होना इस इलाक़े को अस्थिर बना सकता है. ये बांग्लादेश और भारत के सामरिक समीकरण को परिवर्तित कर सकता है. कश्मीर में भारत के आतंकवाद निरोधक प्रयास भी तब तक अधूरे रहेंगे, जब तक वो जमात-ए-इस्लामी के उस वैचारिक इकोसिस्टम से नहीं निपटता जिसको पिछले कई दशकों से पाल-पोसकर मज़बूत किया गया है.

निष्कर्ष: जमात एक प्रतिबंधित संगठन ही नहीं, एक वैश्विक विश्वदृष्टि भी है

जमात-ए-इस्लामी को एक कट्टरपंथी पार्टी के तौर पर देखना इसको लेकर बुनियादी तौर पर नासमझी है. असल में जमात एक आदर्शवादी उग्रवाद है, जो समाज के भीतर बैठी हुई है और एक वैचारिक डीप स्टेट की तरह काम करती है, जो धर्मनिरपेक्ष संविधानवाद की जड़ें काटती रहती है. इसके सदस्य केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक इंजीनियर हैं, जो भीतर से राज्य के संस्थानों को परिवर्तित करने में जुटे हुए हैं. जमात-ए-इस्लामी जो चुनौती पेश करती है, उसको केवल चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाकर या फिर संगठन को प्रतिबंधित करके ख़त्म नहीं किया जा सकता है.

पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही, बांग्लादेश में लोकतांत्रिक तानाशाही और भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की अलग अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं में जमात-ए-इस्लामी का अस्तित्व बचाए रखना, इसकी एक ख़तरनाक सच्चाई को रेखांकित करते हैं

नीति निर्माताओं को जमात-ए-इस्लामी के परिचालन के तमाम पहलुओं को संपूर्णता में देखना होगा. इसके छात्र संगठन, कल्याणकारी संस्थाएं, प्रकाशन करने वाली कंपनियां और शैक्षणिक नेटवर्क को समग्रता में समझना होगा. इसके ख़िलाफ़ वैचारिक युद्ध स्कूलों, समुदायों, धार्मिक मंचों और नीतिगत परिचर्चाओं में छेड़ना होगा. जमात-ए-इस्लामी को किसी भी तरह से मुख्यधारा में शामिल करना, उसके जाल में फंसना है. इससे तो उसकी रणनीति कामयाब होगी और वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर वैधता हासिल करने की रणनीति अपनाते हुए दूरगामी घुसपैठ बनाती रहेगी. जमात-ए-इस्लामी टकराव के ज़रिए संचालित नहीं होती, बल्कि वो दबे छुपे क़दमों से चोट पहुंचाती है.

पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही, बांग्लादेश में लोकतांत्रिक तानाशाही और भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की अलग अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं में जमात-ए-इस्लामी का अस्तित्व बचाए रखना, इसकी एक ख़तरनाक सच्चाई को रेखांकित करते हैं; ये एक राजनीतिक संगठन नहीं है, बल्कि असल में एक सहनशील विश्वदृष्टि है. इसका ख़ात्मा करने के लिए रणनीति से ही काम नहीं चलेगा, इसके लिए एक वैचारिक साहस की आवश्यकता होगी.

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