दुनिया के कई अन्य देशों की तरहं अब चीन पर भी आइएसआइएस का खतरा मंडरा रहा है।
विगत 1 मार्च को, पहली बार, तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) ने एक वीडियो जारी किया जिसमें चीन के अशांत झिंजियांग प्रांत के उईघुर जातीय अल्पसंख्यक समुदाय के आतंकवादियों को उनके ओहदे के अनुसार पंक्तिबद्ध रूप में खौफनाक तरीके से दर्शाया गया है। वीडियो में आईएसआईएस के गुर्गों को चीन में हिंसक घटनाओं को अंजाम देने की सीधी धमकी देते हुए दिखाया गया है। इतना ही नहीं, वीडियो में इस आतंकवादी संगठन के उईघुर सदस्यों द्वारा एक कथित मुखबिर को सरेआम फांसी देते हुए भी दिखाया गया है।
साइट इंटेलिजेंस समूह द्वारा पुष्टि किए गए छिटपुट अनुवादों के अनुसार वीडियो में यह खुलेआम धमकी दी गई है, “ओह, तुम चीनी यह समझ ही नहीं पाते हो कि लोग आखिरकार क्या कहते हैं। हम खलीफा के लड़ाके हैं। हम अपने हथियारों की जुबान के साथ तुम्हें सब कुछ साफ-साफ समझाने, नदियों की तरह रक्त बहाने और दमन का बदला लेने तुम्हारे पास अवश्य ही आएंगे।”
वीडियो जारी करने का ठीक यही समय संभवत: जानबूझकर तय किया गया था क्योंकि पिछले ही महीने चीन ने अपने उस झिंजियांग प्रांत में अपनी ताकत का जमकर प्रदर्शन किया था जहां धार्मिक स्वतंत्रता एवं जातीय स्वायत्तता के मुद्दों को लेकर उईघुर मुस्लिम आए दिन सरकार से उलझते अथवा टकराते रहते हैं। यही नहीं, कुछ अलगाववादवादी इस्लाम धर्मप्रचारक इस क्षेत्र में एक कट्टरपंथी इस्लामी मुल्क स्थापित करने की नापाक इच्छा भी रखते हैं। इसी का नतीजा है कि जहां एक ओर झिंजियांग में कई स्थानीय लोगों पर चाकू से हमले किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर चीन की सरकार उईघुर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बदले की कार्रवाई करती रही है, क्योंकि प्राप्त खबरों के अनुसार इन्होंने पिछले दस वर्षों में सैकड़ों लोगों की जान ले ली है।
हालांकि, इसी तरह के ज्यादातर चरमपंथी आंदोलनों की भांति ही झिंजियांग में जिहादियों के तेवर केवल विरोध जताने भर जैसे ही नहीं रहे हैं। आईएसआईएस का नया वीडियो चीन के पश्चिमी मोर्चे पर अवस्थित इस क्षेत्र के लिए एक नए खतरे का सूचक है क्योंकि आईएसआईएस के लौट रहे गुर्गों के साथ-साथ पहले ही वहां अपने पांव जमा चुके लड़ाकों को भी आईएसआईएस के चिन्ह के तहत ऐसा करने के लिए ऑनलाइन मत प्रचार-प्रसार के जरिए प्रभावित किया जा सकता है। जहां एक ओर यह वीडियो चीन पर आईएसआईएस के मंडराते खतरे को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर देश में जिहादवाद की अगुवाई अब तक मुख्य रूप से तुर्कस्तान इस्लामिक पार्टी (जो पहले पूर्वी-तुर्कस्तान इस्लामिक मूवमेंट के रूप में जानी जाती थी) द्वारा की जाती रही है, जो पूर्वी-तुर्कस्तान (या उईघुरस्तान) नामक एक स्वतंत्र राष्ट्र के गठन के लिए चीन की सरकार के खिलाफ जंग लड़ती रही है। तुर्कस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआईपी) को मुख्यत: अल कायदा की एक सहयोगी के रूप में जाना जाता रहा है जो ओसामा बिन लादेन के आधिपत्य के दौरान झिंजियांग प्रांत में अपनी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए धन प्राप्त करती रही थी। इतना ही नहीं, प्राप्त खबरों के अनुसार टीआईपी के गुर्गे अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों में ही जिहादियों से प्रशिक्षण भी प्राप्त करते रहे हैं।
हालांकि, पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के दो साल बाद वर्ष 2013 में टीआईपी ने आईएसआईएस के खलीफा के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा की थी और इतना ही नहीं, वह अपना जाल फैलाने के मकसद से उज्बेकिस्तान इस्लामिक मूवमेंट (आईएमयू) जैसे अन्य उज्बेक जिहादी समूहों में भी शामिल हो गई। इससे ठीक एक साल पहले वर्ष 2012 में चीन के मेजर जनरल यिन जियांग ने उईघुर-सीरिया की नापाक मिलीभगत की संभावनाओं का पहली बार जिक्र किया था और ‘पूर्वी तुर्कस्तान’ आंदोलन से जुड़े समूहों पर उत्तरी सीरिया में हो रहे गृहयुद्ध में भाग लेने का दोषी ठहराया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ये समूह सीरिया में हो रहे गृहयुद्ध में भाग लेने के लिए दक्षिण पूर्व एशिया और तुर्की से होते हुए तस्करी मार्गों का उपयोग करते रहे थे। तुर्की द्वारा अब भी पूर्वी तुर्कस्तान आंदोलन को अपना ऐतिहासिक समर्थन कमोबेश जारी रखने के साथ-साथ इस देश द्वारा टीआईपी का समर्थन करने वाले आकाओं को बड़े पैमाने पर पनाह देने के मद्देनजर यदि कभी भी आईएसआईएस चीन पर बड़े हमले करने की जिम्मेदारी लेता है तो उसमें निश्चित तौर पर तुर्की की भी अहम भूमिका मानी जाएगी। विगत वर्षों के दौरान कुछ चीनी पर्यवेक्षकों ने तुर्की द्वारा टीआईपी के इस तरह के आकाओं को कथित तौर पर पनाह दिए जाने की तुलना अफगानिस्तान के तालिबान से की है जो कई वर्षों तक ओसामा बिन लादेन की जान बचाने के लिए मजबूत ढाल बनता रहा था।
चीन में सीरिया के राजदूत इमाद मौस्तफा ने वर्ष 2013 में दिए गए एक साक्षात्कार में चीन के ग्लोबल टाइम्स समाचार पत्र को बताया था कि सीरिया को यह पक्की खुफिया सूचना मिली है कि 30 से ज्यादा उईघुर जिहादी पाकिस्तान के एक आतंकवाद प्रशिक्षण शिविर से तुर्की की सुराखदार सीमा होते हुए सीरिया आ धमके हैं। वर्ष 2015 में अल मॉनिटर के स्तंभकार मेटिन गुर्कान ने यह खुलासा किया था कि खुफिया स्रोतों के अनुसार मध्य एशिया के 1,500 जिहादी, जिनमें उईघर्स भी शामिल थे, आईएसआईएस के साथ मिलकर आतंकी घटनाओं को अंजाम देते रहे थे। उसी साल संयुक्त अरब अमीरात के अल मस्दार न्यूज ने एक उईघुर आतंकवादी की मौत होने की घोषणा की थी जो ‘अब्बास अल-तुर्कस्तानी’ के नाम से कुख्यात था और उसे कथित तौर पर हमा प्रांत में सीरियाई सेना द्वारा मार गिराया गया था। मौस्तफा के अनुसार, सीरियाई सरकार जंग के मैदान से प्राप्त इस तरह के समस्त उदाहरणों और खुफिया जानकारियों को चीन के साथ साझा कर रही है। वर्ष 2016 में अपने पूर्ववर्ती विचारों के बावजूद टीआईपी के अमीर अब्द अल-हक्क अल-तुर्कस्तानी ने आईएसआईएस को “नाजायज” बताते हुए उसकी कटु निंदा की थी। हालांकि, यह अब भी बहस का मुद्दा बना हुआ है कि अमीर की राय पर टीआईपी के आकाओं के बीच किस हद तक मतभेद हैं क्योंकि प्राप्त खबरों के अनुसार अमीर ने यह राय पाकिस्तान के उत्तर वजीरिस्तान में ड्रोन हमले में गंभीर रूप से घायल होने के छह साल बाद व्यक्त की है (उल्लेखनीय है कि टीआईपी ने आईएसआईएस के साथ सांठ-गांठ कर ली, जबकि अल-हक्क को अक्षम माना जाता था)।
सीरिया के गृहयुद्ध में कोहराम मचाने वाले आईएसआईएस या अन्य समूहों में शामिल होने वाले उईघुरों की संख्या बेहद कम होने के बावजूद झिंजियांग में चीन के लिए इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हो सकते हैं। झिंजियांग में खुद उईघुर भी टीआईपी जैसे समूहों द्वारा समर्थित किए जा रहे आंदोलनों के बारे में एक राय नहीं रखते हैं। जहां एक ओर कुछ उईघुर एक कट्टरपंथी इस्लामी देश बनाने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अन्य उईघुर चीन के शासन या प्रणाली के तहत और अधिक स्वायत्तता पाने के लिए जारी लड़ाई में एकजुट नहीं हैं। यहां तक कि कुछ उईघुर तो झिंजियांग पर चीन के रुख से पूरी सहमति जताने को भी तैयार हैं क्योंकि वे देश की आर्थिक कामयाबी की गाथा का हिस्सा बनना और झिंजियांग से अपना पल्ला झाड़ना चाहते हैं, जो अपने-आप में चीन की नजर में एक खतरा है।
जहां एक ओर अधिकारों के लिए उईघुर की ऐतिहासिक लड़ाई के भीतर दरारें नजर आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर जिहादियों के बीच भी अनेक मुद्दों पर तीखे मतभेद देखे जा रहे हैं। आईएसआईएस के नाम से जारी वीडियो में खुद टीआईपी से ही लड़ने वाले जिहादियों को भी आगाह किया गया है। इससे यह साफ पता चलता है कि टीआईपी में किस हद तक परस्पर विरोधी विचार पनप चुके हैं क्योंकि कोई आईएसआईएस का दामन थामे रखना चाहता है तो कोई इसे छोड़ने का मन बना चुका है। हालांकि, इस तरह के मतभेदों के बावजूद वापस लौट रहे लड़ाकों के साथ-साथ ऑनलाइन ढंग से मत के प्रचार-प्रसार के कारण इनके सीरियाई जिहाद से परे हटने तथा अब और ज्यादा कट्टरता एवं युद्ध करने के वास्तविक अनुभव के साथ झिंजियांग के जटिल जातीय सामाजिक ताने-बाने में वापस आकर इसे छिन्न-भिन्न कर देने का खतरा है। ऐसे में तथाकथित ‘इस्लामिक स्टेट’ के झंडे तले चीन में आतंकवादी गतिविधियों के न केवल झिंजियांग, बल्कि प्रमुख तटीय केंद्रों (हब) में भी बड़े पैमाने पर फैल जाने का अंदेशा है। वैसे, यह प्रतीत होता है कि चीन की सरकार इस तरह के खतरे का सामना करने के लिए कमर कस रही है।
कबीर तनेजा सामरिक अध्ययन कार्यक्रम से जुड़े एक एसोसिएट फेलो हैं। उनका अनुसंधान पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों पर केंद्रित है। वह विशेष रूप से घरेलू राजनीतिक गतिशीलता, आतंकवाद, गैर-सरकारी आतंकवादी तत्वों और इस क्षेत्र के सामान्य सुरक्षा परिप्रेक्ष्य पर अपना ध्यान केंद्रित करते रहे हैं।
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