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गाज़ा संकट के बाद यूरोप में इज़राइल के हथियार कम बिक रहे हैं तो अब उसकी नजर एशियाई बाज़ार—भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया—पर है. भारत–इज़राइल रक्षा गठजोड़ के साथ, इज़राइल एशिया में अपनी पकड़ और रणनीतिक अवसर बढ़ा रहा है.
पिछले कई दशकों से हथियारों का निर्यात इज़राइल की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा और आय का बड़ा स्रोत रहा है. आकार में छोटा होने के बावजूद, इज़राइल दुनिया के प्रमुख हथियार निर्यातकों में शामिल है. वर्ष 2020-2024 के दौरान वह वैश्विक स्तर पर आठवाँ सबसे बड़ा हथियार निर्यातक रहा और उसकी हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत रही. 2024 में इज़राइल का हथियार निर्यात बढ़कर 14.8 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया जो 2023 में 13 अरब डॉलर था. उसके रक्षा उपकरण यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में लोकप्रिय हैं. 2024 में निर्यात का बड़ा हिस्सा वायु रक्षा प्रणालियों, मिसाइलों और रॉकेटों (47 प्रतिशत) का था. इसके बाद सैन्य वाहन, उपग्रह, रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ शामिल थीं. इन हथियारों की माँग उन सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाती है जिनका सामना इज़राइल के ग्राहक देशों-जिनमें भारत भी प्रमुख है-को करना पड़ रहा है. यह लेख गाज़ा संकट के बाद इज़राइल के हथियार निर्यात में आए बदलावों पर प्रकाश डालता है जहाँ यूरोप में माँग घटने के साथ-साथ भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे एशियाई बाज़ार नए अवसर बनकर उभरे हैं.
“वर्ष 2020–2024 के दौरान वह वैश्विक स्तर पर आठवाँ सबसे बड़ा हथियार निर्यातक रहा और उसकी हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत रही.”
इज़राइल के लिए हथियारों का लगातार निर्यात बेहद महत्वपूर्ण है. भले ही उसकी सेना घरेलू हथियारों का उपयोग करती हो लेकिन अधिकांश उत्पादन विदेशों में निर्यात किया जाता है जिससे रक्षा अनुसंधान और विकास के लिए ज़रूरी विदेशी आय मिलती है. हथियार व्यापार में किसी भी तरह की रुकावट से सरकारी और निजी, दोनों तरह के रक्षा उद्योग प्रभावित हो सकते हैं इसलिए इज़राइल अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग और साझेदारी को प्राथमिकता देता है. भारत–इज़राइल रक्षा संबंध इसका प्रमुख उदाहरण हैं जो अब खुलकर सामने आ चुके हैं. इसी तरह वियतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे एशियाई देशों के साथ भी उसका सैन्य सहयोग तेज़ी से बढ़ा है. पिछले वर्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसके कुल हथियार निर्यात का 23 प्रतिशत हिस्सा गया. दूसरी ओर, इज़राइल के हथियार निर्यात पर मानवाधिकार संगठनों और कई सरकारों की कड़ी निगरानी रहती है जो गाज़ा संकट के बाद और बढ़ गई. स्पेन, जर्मनी और इटली जैसे कुछ यूरोपीय देशों ने हथियार बिक्री पर रोक या सीमाएँ लगाने की घोषणा की. इसके बावजूद, 2024 में यूरोप इज़राइल का सबसे बड़ा हथियार निर्यात बाज़ार बना रहा, जहाँ कुल निर्यात का 54 प्रतिशत गया.
जैसे-जैसे कुछ यूरोपीय देशों ने इज़राइल से रक्षा आयात कम करना शुरू किया है, वैसे-वैसे एशिया इज़राइली हथियारों के लिए एक अहम बाज़ार बनकर उभर रहा है. पिछले वर्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इज़राइल के कुल रक्षा निर्यात का 23 प्रतिशत गया. यह रुझान क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों और हथियारों व रक्षा अनुसंधान पर बढ़ते खर्च से जुड़ा है. हथियार ख़रीद के अलावा भारत, वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश तकनीक हस्तांतरण, संयुक्त उपक्रमों और लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के ज़रिए रक्षा उद्योग में साझेदारी बढ़ा रहे हैं, जिससे आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता की ओर झुकाव दिखता है.
“2024 में यूरोप इज़राइल का सबसे बड़ा हथियार निर्यात बाज़ार बना रहा, जहाँ कुल निर्यात का 54 प्रतिशत गया.”
हालाँकि इन देशों के अमेरिका, रूस और चीन जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ मज़बूत रक्षा संबंध बने हुए हैं, फिर भी इज़राइल ने हाल के वर्षों में अपनी जगह मज़बूत की है. भारत के अलावा वियतनाम, फिलीपींस, थाईलैंड और सिंगापुर में भी इज़राइली हथियार और तकनीक तेज़ी से लोकप्रिय हो रही हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया में ये सौदे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने, चीन के बढ़ते प्रभाव को सीमित करने और क्षेत्रीय स्थिरता मज़बूत करने की रणनीति से जुड़े हैं. बिना राजनीतिक शर्तों के रक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की इज़राइल की नीति और इन देशों की आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने की इच्छा ने आपसी रक्षा सहयोग और हथियार सौदों को और मजबूत किया है.
हाल के वर्षों में, जब यूरोप के कई प्रमुख देशों ने इज़राइल से हथियारों की ख़रीद कम की, तब एशिया-खासकर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया-में नए रक्षा समझौते सामने आए. 2024 के अंत में इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ (IAI) ने वियतनामी कंपनियों के साथ संयुक्त विकास और तकनीक हस्तांतरण पर सहयोग किया. दोनों देशों के बीच लगभग 680 मिलियन अमेरिकी डॉलर का सौदा हुआ, जिसके तहत इज़राइल से दो उन्नत निगरानी उपग्रह वियतनाम को दिए गए. इससे उसकी खुफिया क्षमताएँ बढ़ेंगी और घरेलू रक्षा उद्योग को भी समर्थन मिलेगा. नवंबर 2023 में थाईलैंड के डिफेंस टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट और इज़राइल की राफेल कंपनी के बीच स्पाइक मिसाइल के दो संस्करणों के संयुक्त उत्पादन का समझौता हुआ. वहीं, गाज़ा संकट को लेकर विरोध के बावजूद, सिंगापुर ने नवंबर में एल्बिट सिस्टम्स के हर्मीस 900 ड्रोन को अपनाने की घोषणा की, जो पुराने हर्मीस 450 की जगह लेंगे.
“पिछले वर्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इज़राइल के कुल रक्षा निर्यात का 23 प्रतिशत गया.”
हालाँकि 2025 में एक चिंताजनक स्थिति तब बनी, जब फिलीपींस ने इज़राइल के साथ नए हथियार समझौते रोक दिए. यह कदम गाज़ा संकट और दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस की समुद्री सीमाओं को लेकर मतभेदों से जुड़ा माना जा रहा है. दक्षिण-पूर्व एशिया में इज़राइल का अहम ग्राहक होने के कारण, लंबे समय तक बना गतिरोध उसके लिए राजनीतिक और आर्थिक नुकसान ला सकता है. ऐसे में इज़राइल को फिलीपींस के साथ संबंधों को कूटनीतिक समझदारी से संभालना होगा क्योंकि इस तरह के साझेदार को खोना रणनीतिक और व्यावसायिक रूप से नुकसानदेह होगा.
दक्षिण एशिया में भारत–इज़राइल हथियार व्यापार दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की मज़बूत नींव रहा है. 2024 में यह व्यापार लगभग 185 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था. 2020–2024 के बीच इज़राइल ने भारत के कुल हथियार आयात का करीब 13 प्रतिशत आपूर्ति की जबकि इज़राइल के कुल रक्षा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 34 प्रतिशत रही. पाकिस्तान और चीन के साथ तनाव के कारण भारत की रक्षा ख़रीद बनी हुई है. स्वदेशी रक्षा उत्पादन बढ़ने के बावजूद, उन्नत तकनीक विकसित करने वाले इज़राइल जैसे साझेदार भारत के लिए अब भी अहम हैं.
“भारत–इज़राइल हथियार व्यापार दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की मज़बूत नींव रहा है.”
4 नवंबर 2025 को हस्ताक्षरित भारत–इज़राइल रक्षा सहयोग समझौता ज्ञापन के तहत दोनों देशों ने सह-उत्पादन, सह-विकास, रक्षा उद्योग, प्रशिक्षण, तकनीकी नवाचार, एआई और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. बराक-8 मिसाइलें और हार्पी ड्रोन जैसी संयुक्त प्रणालियों की प्रभावशीलता हाल के अभियानों में दिखी है. मेक इन इंडिया के तहत IWI और अडानी समूह द्वारा भारतीय सेना के लिए सीक्यूबी कार्बाइन राइफलों के निर्माण और एयर लोरा व आइस ब्रेकर मिसाइलों की संभावित ख़रीद से यह स्पष्ट होता है कि भारत–इज़राइल रक्षा सहयोग गहरा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है.
हालाँकि यूरोपीय बाज़ार इज़राइल के हथियार निर्यात के लिए आगे भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे लेकिन बदलती सुरक्षा चुनौतियों के बीच बढ़ती रक्षा ज़रूरतों के कारण एशियाई देश—खासकर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया-भी समान अवसर प्रदान करते हैं. इन देशों के रक्षा आत्मनिर्भरता कार्यक्रम अभी शुरुआती दौर में हैं और आपूर्ति में देरी का सामना कर रहे हैं इसलिए आने वाले वर्षों में वे अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहेंगे. ऐसे में इज़राइल को क्षेत्रीय देशों के साथ अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को मज़बूत करने पर ज़ोर देना चाहिए, ताकि व्यापक द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम मिले और रक्षा सहयोग को गति मिले.
इज़राइल का ‘एशिया की ओर झुकाव’, जिसे 2000 के दशक के अंत में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तेज़ किया था, अब केवल अवसरवादी नहीं बल्कि रणनीतिक और संस्थागत रूप लेना चाहिए. जैसे-जैसे एशियाई रक्षा बाज़ार बढ़ रहे हैं और आधुनिकीकरण तेज़ हो रहा है, इज़राइल को सीधे हथियार बेचने के बजाय तकनीक हस्तांतरण और सह-उत्पादन को प्राथमिकता देनी चाहिए. अंततः इज़राइल के रक्षा निर्यात की स्थिरता यूरोप की जगह एशिया को विकल्प बनाने से कम और मज़बूत, परस्पर लाभकारी साझेदारियाँ बनाने पर अधिक निर्भर करेगी.
अल्वाइट निंगथौजम सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़, सिम्बायोसिस इंटरनेशनल (डीम्ड यूनिवर्सिटी), पुणे में उप-निदेशक एवं सहायक प्रोफेसर हैं.
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Dr. Alvite Ningthoujam is an Assistant Professor at the Symbiosis School of International Studies (SSIS) Symbiosis International (Deemed University) Pune Maharashtra. Prior to this he ...
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