जर्मनी अपने रक्षा-तंत्र को नया रूप दे रहा है. हमारे पास मौका है कि हम उसके इस विकास में भागीदार बनकर रूस पर अपनी निर्भरता घटा सकते हैं.
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शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ (USSR) के पतन के करीब साढ़े तीन दशक बाद भी रूस उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के लिए एक बड़ी रणनीतिक और सुरक्षा चुनौती बना हुआ है. 1990 के दशक के दौरान बाल्कन में NATO के हस्तक्षेप और उसके बाद पूर्व की ओर उसके विस्तार का रूस ने कड़ा विरोध किया था. समय के साथ, NATO के विस्तार के ख़िलाफ़ मॉस्को का विरोध सीधी सैन्य कार्रवाई के रूप में सामने आने लगा. उसने 2008 में जॉर्जिया पर आक्रमण किया, 2014 में यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर क़ब्ज़ा जमाया और फिर 2022 में यूक्रेन के ख़िलाफ़ एक पूर्ण युद्ध की शुरुआत कर दी, जो आज तक जारी है. इस सूरत में, यूरोप के शक्ति संतुलन को बनाए रखने में जर्मनी की भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाती है. साल 2024 में, बर्लिन ने रक्षा पर 88 अरब अमेरिकी डॉलर ख़र्च किए और सेना पर ख़र्च करने वाला दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश बन गया. हालांकि, यह देखते हुए कि NATO अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम दो प्रतिशत फ़ौज पर ख़र्च करता है, बर्लिन का ख़र्च कुछ कम ज़रूर है, फिर भी यह उम्मीद भरा संकेत है कि जर्मनी एक सामरिक ताक़त के तौर पर अपनी भूमिका निभाना शुरू कर रहा है.
यह पूर्व में लिए गए फ़ैसलों के बिना संभव नहीं था. दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1949 से जर्मनी दो हिस्सों में बंट गया था- एक, पूर्वी भाग (जो सोवियत संघ के क़ब्ज़े में था) और दूसरा, पश्चिमी भाग (जो अमेरिका के नेतृत्व वाले NATO गठबंधन का हिस्सा था). 1950 के दशक में रक्षा ख़र्च संबंधी आंकड़े बहुत कम या न के बराबर मिलते हैं, पर 1960 के बाद से सैन्य ख़र्च बताते हैं कि जर्मन राज्य का केवल आधा हिस्सा होने के बावजूद, पश्चिम जर्मनी की अहमियत शीत युद्ध (CW) के दौरान सोवियत से मिलने वाले सैन्य ख़तरे के ख़िलाफ़ यूरोप के शक्ति संतुलन में काफ़ी थी.
नव निर्वाचित जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने ज़ोर देकर कहा भी है कि उनका देश कम से कम पिछले तीन दशकों से ‘फ्री राइडर’ था, यानी कोई भुगतान किए बिना लाभ लेता रहा, क्योंकि जर्मनी की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी अमेरिका देता था. मगर अब अपनी वह प्रतिबद्धता अमेरिका पूरा करने को तैयार नहीं है.
1960 से 1991 के दौरान जर्मनी अपनी सेना पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.3 प्रतिशत औसतन ख़र्च करता रहा, जो USSR के पतन के बाद के दशकों की तुलना में काफ़ी अधिक है. आज यूरोप विशेष तौर पर यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. पहले के वर्षों में भले ही जर्मनी को अपने पड़ोसियों से ख़तरा था, लेकिन आज पड़ोसी देशों से उसके अच्छे रिश्ते हैं. नव निर्वाचित जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने ज़ोर देकर कहा भी है कि उनका देश कम से कम पिछले तीन दशकों से ‘फ्री राइडर’ था, यानी कोई भुगतान किए बिना लाभ लेता रहा, क्योंकि जर्मनी की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी अमेरिका देता था. मगर अब अपनी वह प्रतिबद्धता अमेरिका पूरा करने को तैयार नहीं है. बुंडेसवेहर (जर्मनी की सशस्त्र सेना) आज भी रूसी सैन्य ताक़त के सामने कमज़ोर है. नतीजतन, जर्मनी अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने के लिए अपनी वह नीति बदल रहा है, जिसमें ख़र्च के लिए कर्ज़ की सीमा तय की गई थी. वह अपने रक्षा उद्योग व अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाना चाहता है. इन सबसे जहां एक तरफ़ यह सबक मिलता है कि जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में उस बदलाव के प्रति किस हद तक सुस्ती रही, जिस तरफ़ वह आज आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ़ यह भी पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में जर्मनी की सैन्य क्षमताएं काफ़ी कमज़ोर हुई हैं. आज, राष्ट्रपति ट्रंप के शासन-काल में अमेरिका ने NATO सदस्यों से अह्वान किया है कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 5 प्रतिशत ख़र्च करें, जिसे पूरा करना जर्मनी सहित ज़्यादातर देशों के लिए संभव नहीं है. फिर भी, जर्मनी ने 2029 तक कम से कम 3.5 प्रतिशत ख़र्च करने का लक्ष्य तय किया है.
रूस की सीमा पर स्थित NATO के सदस्य देशों को मिल रही चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसा किया जाना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इनमें से कई देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर काफ़ी ज़्यादा निर्भर है. समय के साथ, ये देश सैन्य सहायता के लिए जर्मनी की ओर देख सकते हैं. अगर बर्लिन साल-दर-साल अपने रक्षा ख़र्च को सकल घरेलू उत्पाद के 3.5 प्रतिशत पर बनाए रखता है, तो वह अपने पड़ोसियों को बड़े पैमाने पर सुरक्षा उपलब्ध करा सकता है, ख़ास तौर से विसेग्राद राष्ट्रों (चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, हंगरी और पोलैंड) से लेकर मोल्दोवा, रोमानिया, यूक्रेन और रूस की सीमा से लगे बाल्टिक देशों जैसे अगली पंक्ति के राष्ट्रों तक. रूस की सीमा से लगे कई देशों के सामने ख़तरे हैं, जिनसे निपटने के लिए यह बदलाव किया जाना चाहिए. कई NATO सदस्य, जो सैन्य सहायता के लिए अमेरिका पर बेहद निर्भर हैं, समय के साथ जर्मनी की ओर बढ़ सकते हैं. अगर बर्लिन 3.5 प्रतिशत की दर से अपना रक्षा ख़र्च हर साल बनाए रखता है, तो वह चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, हंगरी और पोलैंड सहित अपने कई पड़ोसी देशों, और यूक्रेन की सीमा से लगे मोल्दोवा व रोमानिया जैसे अन्य प्रमुख देशों को भी बड़े पैमाने पर सुरक्षा मुहैया करा सकता है. वह यूक्रेन के साथ-साथ रूस से सीमा बांटने वाले बाल्टिक देशों के लिए भी मददगार साबित हो सकता है.
यूरोप के शक्ति संतुलन और सुरक्षा पर असर डालने के अलावा, बर्लिन की बढ़ती सैन्य ताक़त भारत के साथ भी सहयोग का एक प्रमुख ज़रिया बन सकती है. सैन्य ख़र्च में बढ़ोतरी से जर्मनी का रक्षा उद्योग मज़बूत हो सकता है, जिससे यह देश हमारे लिए संभावनाओं से भरा साझेदार बन सकता है. नई दिल्ली का जर्मन रक्षा उद्योग के साथ सहयोग का पुराना इतिहास है. अतीत का पश्चिमी जर्मनी या जर्मनी का संघीय गणराज्य (FRG), जो 1990 में एक होने के बाद FRG कहा जाने लगा, हमारे लिए तकनीकी विशेषज्ञता का एक महत्वपूर्ण स्रोत था और संपूर्ण हथियार प्लेटफॉर्मों व सैन्य उप-प्रणालियों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता भी था. भारत जब अर्जुन मुख्य युद्ध टैंक (MBT) बनाना चाहता था, तब 1980 के दशक की शुरुआत में FRG ने ही भारत को इसके लिए शुरुआती डिजाइन उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य मदद पहुंचाई थी. 1983 में, जर्मन निर्माता क्रॉस-माफ़ेई ने अर्जुन MBT के डिजाइन, विकास, परीक्षण और मूल्यांकन के लिए लड़ाकू वाहन अनुसंधान और विकास प्रतिष्ठान (CVRDE) के सलाहकार के रूप में काम किया था. अर्जुन के उन्नत संस्करण में भी कई कल-पुर्जे जर्मनी के बने हैं, जैसे कि रेंक RK 304-I ट्रांसमिशन सिस्टम, अर्जुन को ताक़त देने वाली MTU MB838 1,400 cc डीजल इंजन, और बॉश गन कंट्रोल सिस्टम.
भारत जब अर्जुन मुख्य युद्ध टैंक (MBT) बनाना चाहता था, तब 1980 के दशक की शुरुआत में FRG ने ही भारत को इसके लिए शुरुआती डिजाइन उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य मदद पहुंचाई थी.
1986 से 1994 के बीच, FRG ने भारतीय नौसेना को टाइप 209 की आपूर्ति की थी, जिसे ‘शिशुमार’ श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां कहा जाता है. उम्मीद यही है कि जर्मनी की हॉवाल्ड्सवर्के-डॉयचे वेर्फ़्ट (HDW) द्वारा बनाई गई ये पनडुब्बियां अगले 10-15 वर्षों तक और सेवा दे सकती हैं. प्रोजेक्ट 75I के तहत भारतीय नौसेना द्वारा भविष्य में ख़रीदी जाने वाली पनडुब्बियां जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) कंपनी से मंगवाई जाएंगी, जो भारतीय कंपनी मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड (MDL) के साथ साझेदारी करके एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम (AIPS) तकनीक से लैस पनडुब्बियां विकसित कर रही है. यह संकेत है कि नई दिल्ली एक तरफ़ रूस पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है, तो दूसरी तरफ़ यूरोप के एक प्रमुख रक्षा साझेदार के साथ आपसी सहयोग मज़बूत बनाना चाहती है. TKMS तो रक्षा मंत्रालय के रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल के तहत MDL के साथ एक संयुक्त उद्यम (JV) के रूप में प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिए भी तैयार है. एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जर्मनी की डाइहल और रिलायंस डिफेंस कंपनियों के बीच जून 2025 में हुआ रणनीतिक समझौता है, जिसके तहत 155 मिमी वल्केनो प्रिसिज़न-गाइडेड गोलाबारूद का घरेलू उत्पादन किया जाएगा. ये हथियार लंबी दूरी के सटीक हमले करने में सक्षम माने जाते हैं. अनुमान है कि लंबे समय में इस सौदे से करीब 10,000 करोड़ रुपये या 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की आमदनी हो सकती है.
मर्ज़ सरकार के दौरान जर्मनी की सैन्य प्रौद्योगिकियों के विकास में नई दिल्ली एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभा सकता है. इसमें सभी प्लेटफॉर्मों से लेकर भारतीय सशस्त्र सेवाओं के लिए उप-प्रणालियों और अवयवों तक की सैन्य प्रौद्योगिकियां हो सकती हैं. सैन्य बजट बढ़ने का मतलब सिर्फ़ जर्मन सैन्य ताक़त व रक्षा उद्योग का विकास नहीं है, बल्कि संयुक्त उद्यमों के लिए नई राहों का खुलना भी होगा, जिससे हम अपनी लागत को कम कर सकेंगे. हथियारों को लेकर संयुक्त उद्यमों के लिए भारत और रूस का रक्षा सहयोग इसमें एक मॉडल का काम कर सकता है. उल्लेखनीय है कि भारत और रूस ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों और AK-203 असॉल्ट राइफलों को मिलकर विकसित करने के लिए संयुक्त उद्यम बनाए थे, जिस कारण लागत और जोखिमों का बंटवारा अधिक समान रूप से हो सका. ‘बिक्री के बाद ज़रूरत के समय बेहतर मदद’ करने के लिए 2019 में भारत और रूस ने अंतर-सरकारी समझौता किया था, जिससे ‘रूसी/सोवियत मूल के हथियारों और रक्षा उपकरणों से संबंधित पुर्जों, अवयवों, कार्य-क्षमता बढ़ाने वाले कल-पुर्जे और अन्य सामग्रियों के साझा निर्माण में पारस्परिक सहयोग’ संभव हो सका.
इसके अलावा, जर्मनी हमारे लिए एक ऐसे समय में रूस का विकल्प बनता दिख रहा है, जब नई दिल्ली की मॉस्को पर निर्भरता काफ़ी बनी हुई है. निश्चय ही, जर्मनी की निर्यात नियंत्रण प्रतिबंधों जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं, जिनमें कुछ ढील की ज़रूरत होगी, ताकि प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण (ToT) हो सके, फिर चाहे बर्लिन और नई दिल्ली के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने में साझा-विकास संबंधी समझौते अधिक से अधिक उत्पादक ब्लू प्रिंट के रूप में क्यों न काम करें.
जर्मनी हमारे लिए एक ऐसे समय में रूस का विकल्प बनता दिख रहा है, जब नई दिल्ली की मॉस्को पर निर्भरता काफ़ी बनी हुई है.
हालांकि, भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का मुकाबला करने के लिए जर्मनी से IRIS-T वायु रक्षा प्रणाली (ADS) की आपूर्ति के लिए किया गया पाकिस्तान का सामरिक-सहयोग समझौता नई दिल्ली और बर्लिन के बीच बढ़ते रक्षा संबंधों में कुछ खटास ला सकता है, मगर TKMS और L&T का सौदा बताता है कि हम अब भी सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. तकनीकी विशेषज्ञता हासिल करने के अलावा, भारत को बातचीत की मेज़ पर और अधिक समर्थन जुटाने की ज़रूरत होगी, और जर्मनी को पुर्जों व अवयवों के लिए पारस्परिक आपूर्ति व्यवस्था की पेशकश करनी होगी. भारत अपने कुशल तकनीशियनों की फ़ौज को भी एक स्रोत के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, जो TKMS जैसे जर्मन रक्षा निर्माताओं को वेल्डिंग, पाइपवर्क और विद्युतीय काम में मदद कर सकती है. ये ऐसे कुशल श्रम हैं, जिसकी कमी अमेरिका न सिर्फ़ उच्च-स्तरीय डिजाइन इंजीनियरिंग क्षेत्र में महसूस करने लगा है, बल्कि उसकी नौसेना भी इसे खूब समझ रही है.
संक्षेप में कहें, तो भारत कुशल जनशक्ति के स्रोत के रूप में ही नहीं, चुनिंदा जर्मन सैन्य उत्पादों के लिए सस्ते निर्माण-केंद्र के रूप में भी मदद कर सकता है. यानी, जर्मनी और नई भारत के सामने अब असली परीक्षा इन अवसरों को भुनाने की है.
(कार्तिक बोम्माकांति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर फ़ेलो हैं)
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Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
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