तेज़ होती भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने अमेरिका और चीन को आमने-सामने ला दिया है. वैश्विक मामलों में दोनों की भूमिका के मद्देनज़र दोनों पक्षों द्वारा अपने संबंधों में स्थायित्व लाए जाने की दरकार है.
पिछले हफ़्ते अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य और विदेशी मामलों के आयोग के कार्यालय के निदेशक वांग यी के साथ मुलाक़ात की. दो दिनों में तक़रीबन आठ घंटे तक चली इस बैठक को दोनों में से किसी भी पक्ष ने बातचीत से पहले प्रचारित नहीं किया था. बहरहाल, इस मुलाक़ात को दोनों देशों द्वारा अपने संबंधों में स्थायित्व लाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है. ग़ौरतलब है कि अमेरिका और चीन के रिश्ते इस वक़्त हालिया दशकों में सबसे निचले स्तर पर हैं.
वैसे तो दोनों देशों के बीच क़रीबी और सघन आर्थिक जुड़ाव रहे हैं, साथ ही वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर अनेक मामलों के निपटारे से दोनों के साझा हित भी जुड़े हुए हैं. इसके बावजूद अमेरिका और चीन निरंतर तीखी होती भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझते जा रहे हैं. यूक्रेन और ताइवान जैसे मसलों पर ये परस्पर विरोधी खेमों में बंटे हैं. अमेरिकी कंपनियां धीरे-धीरे अपने कारोबार को चीन से दूर समेट रही हैं और अपनी गतिविधियों में विविधता ला रही हैं. इतना ही नहीं, चीन में अमेरिकी कंपनियों की कमाई में भी गिरावट आती जा रही है. इस तरह अमेरिका कारोबारी तौर पर धीरे-धीरे चीन से अलग होने (decouple) की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है.
बैठक के परिणामों का ब्योरा देने के लिए दोनों पक्षों ने एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया. व्हाइट हाउस की विज्ञप्ति में बताया गया कि इन वार्ताओं में “अमेरिका-चीन द्विपक्षीय रिश्तों, वैश्विक सुरक्षा मामलों, यूक्रेन और ताइवान जैसे अहम मुद्दों पर बेबाक, मौलिक और सकारात्मक चर्चा हुई”. चीन की ओर से जारी बयान में भी ऐसी ही शब्दावलियों का इस्तेमाल करते हुए इन वार्ताओं को “अमेरिका-चीन रिश्तों की बाधाओं को दूर करने और संबंधों में और गिरावट की बजाए स्थिरता लाने” की दिशा में “साफ़गोई भरा, गहरा, मौलिक और सकारात्मक” क़रार दिया गया. वांग ने ताइवान, यूक्रेन समेत तमाम क्षेत्रीय मसलों पर चीनी रुख़ को स्पष्ट किया. इन वार्ताओं की पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करते हुए एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि दोनों ही पक्षों ने अमेरिकी वायु सीमा में गुब्बारों से जुड़ी हालिया घटना को “दुर्भाग्यपूर्ण” क़रार देते हुए साफ़ किया कि दोनों ही देश अब “संचार के स्थिर और सामान्य रास्तों की बहाली” पर ध्यान दे रहे हैं.
अमेरिकी कंपनियां धीरे-धीरे अपने कारोबार को चीन से दूर समेट रही हैं और अपनी गतिविधियों में विविधता ला रही हैं. इतना ही नहीं, चीन में अमेरिकी कंपनियों की कमाई में भी गिरावट आती जा रही है. इस तरह अमेरिका कारोबारी तौर पर धीरे-धीरे चीन से अलग होने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है.
सुलिवन-वांग की मीटिंग से दो दिन पहले अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री चिन गैंग से मुलाक़ात की. चिन के मुताबिक अमेरिका की ओर से “ग़लत शब्दों और हरकतों” की एक श्रृंखला के चलते दोनों महाशक्तियों के बीच के रिश्तों में “बर्फ़” जम गई, लेकिन रिश्तों में स्थायित्व लाना दोनों देशों की शीर्ष प्राथमिकता था. बर्न्स ने बताया कि उन्होंने और चिन ने “अमेरिका-चीन रिश्तों के सामने मौजूद चुनौतियों” और “संबंधों में स्थिरता” लाने की अनिवार्यता पर चर्चा की.
दरअसल अपनी चीन नीति को लेकर अमेरिका एक नाज़ुक संतुलनकारी क़वायद कर रहा है. हाल के वर्षों में अमेरिकी नीति का रुख़ जुड़ावों से हटकर प्रतिस्पर्धा या यहां तक कि रोकथाम की ओर चला गया है. अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध और हुआवै जैसी चीनी कंपनियों पर अमेरिका में टेक्नोलॉजी से जुड़ी रोक की पहली लहर के मद्देनज़र दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच “संपर्क टूटने” की बातें चलने लगी थी. हॉन्ग कॉन्ग में चीन की दमनकारी गतिविधियों और नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद छिड़े तनाव के दौर ने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच की दरार को और गहरा कर दिया.
2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने चीनी राष्ट्रपति शी के साथ बातचीत में “कुछ आम सूझबूझ वाले बचावकारी उपायों” की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोनों देश अनचाहे टकराव से बच सकें. नवंबर 2022 में बाली में शिखर सम्मेलन के बाद बाइडेन ने कहा था कि “मैं संघर्ष के बारे में सोच ही नहीं रहा, मैं तो इस प्रतिस्पर्धा को ज़िम्मेदार तरीक़े से निपटाने पर ध्यान लगा रहा हूं.” उस बैठक में शी ने ताइवान को “पहली लक्ष्मण रेखा” बताते हुए दो टूक कहा था कि चीन-अमेरिका रिश्तों में इसे कतई नहीं लांघा जाना चाहिए. इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को बीजिंग का दौरा करना था, लेकिन बैलून प्रकरण के चलते वो दौरा रद्द कर दिया गया. आगे फ़रवरी 2023 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में ब्लिंकन ने वांग से मुलाक़ात की. हालांकि दोनों देशों के बीच के रिश्तों में बेहतरी लाने के लिहाज़ से कुछ ख़ास प्रगति नहीं हुई.
चिन के मुताबिक अमेरिका की ओर से “ग़लत शब्दों और हरकतों” की एक श्रृंखला के चलते दोनों महाशक्तियों के बीच के रिश्तों में “बर्फ़” जम गई, लेकिन रिश्तों में स्थायित्व लाना दोनों देशों की शीर्ष प्राथमिकता था. बर्न्स ने बताया कि उन्होंने और चिन ने “अमेरिका-चीन रिश्तों के सामने मौजूद चुनौतियों” और “संबंधों में स्थिरता” लाने की अनिवार्यता पर चर्चा की.
यहां ग़ौरतलब है कि पिछले साल अक्टूबर में अमेरिकी सरकार ने उन्नत सेमीकंडक्टर और उनको बनाने वाले उपकरण तक चीनी पहुंच पर नए सिरे से सघन पाबंदियां लगा दी थी. इससे पहले हुआवै और ZTE जैसी चीनी इकाइयों के लिए सेमीकंडक्टर की आपूर्ति पर लगाम लगाई गई थी. अक्टूबर का फ़ैसला उन पाबंदियों की अगली कड़ी थी.
इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने चीन को सेमीकंडक्टर विनिर्माण उपकरण के निर्यात पर आयद प्रतिबंधों को और सख़्त बना दिया. इन दिशानिर्देशों की लगाम कसने के लिए अमेरिका ने नीदरलैंड और जापान की सरकारों के साथ तालमेल बनाकर क़दम आगे बढ़ाए. अभी हाल ही में अमेरिका ने साफ़ कर दिया है कि वो चिप्स एंड साइंस एक्ट के तहत कोष पाने वाले चिप निर्माताओं की गतिविधियों पर पाबंदियां लगाएगा. दरअसल ये प्रतिबंध उन घटकों की आपूर्ति सुरक्षित करने की अमेरिकी क़वायदों का हिस्सा हैं जिनकी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर के साथ-साथ रोज़मर्रा के इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए दरकार होती है.
मार्च के महीने में चीन की ओर से कठोर संकेत दिखाई दिए. उस महीने अपने संबोधन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहली बार अमेरिका का नाम लेते हुए कहा कि वो “हमारे ख़िलाफ़ रोकथाम, घेराबंदी और दमनकारी कार्रवाइयों” की नीति अपना रहा है. अगले ही दिन चीन के नए-नवेले विदेश मंत्री चिन गैंग ने और मुखर होकर बयान दिया. उन्होंने यूक्रेन मसले को ताइवान से जोड़ने के लिए अमेरिका की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका की ओर से “तथाकथित ‘प्रतिस्पर्धा’ पूरी तरह से नकेल कसने और दमन करने वाली नीति है, जो ज़िंदगी और मौत से जुड़ा ऐसा खेल है जिसमें किसी एक के नुक़सान की बुनियाद पर दूसरे को फ़ायदा पहुंचता है.” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका ने “अपनी हरकतों पर लगाम नहीं लगाई और ग़लत रास्ते पर चलना जारी रखा तो बचावकारी उपायों की कोई भी क़वायद हालात को बेपटरी होने से नहीं रोक पाएगी. ऐसे में निश्चित रूप से संघर्ष और टकराव के हालात बनेंगे.”
अप्रैल में अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी हालात संभालने में जुटे रहे. पिछले महीने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में बोलते हुए अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेनने कहा कि आर्थिक मोर्चे पर अलगाव की कार्रवाई “विनाशकारी” होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अमेरिकी लक्ष्यों का मक़सद चीन के रास्तों में रोड़ा अटकाना नहीं है. उन्होंने तीन तत्वों के साथ “सकारात्मक जुड़ाव” की योजना का आह्वान किया. वो कारक हैं- अमेरिका और उसके साथियों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा; “निष्पक्ष” प्रतिस्पर्धा की बुनियाद पर आर्थिक रिश्ता; और तात्कालिक वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग.
यूक्रेन मसले को ताइवान से जोड़ने के लिए अमेरिका की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका की ओर से “तथाकथित ‘प्रतिस्पर्धा’ पूरी तरह से नकेल कसने और दमन करने वाली नीति है, जो ज़िंदगी और मौत से जुड़ा ऐसा खेल है जिसमें किसी एक के नुक़सान की बुनियाद पर दूसरे को फ़ायदा पहुंचता है.
येलेन का भाषण चीन के प्रति अमेरिकी रुख़ों की एक समग्र व्याख्या थी. इसका असर हुआ. द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे दोनों देशों के बीच महीनों से चले आ रहे तनावों के बीच “उल्लेखनीय रूप से सकारात्मक सुर” क़रार दिया.
हफ़्ते भर बाद येलेन की टिप्पणियों के सार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने अपने संबोधन में रेखांकित किया. ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में बोलते हुए सुलिवन ने “डि-रिस्किंग” शब्द का प्रयोग किया. इससे पहले यूरोपीय संघ आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन इसका प्रयोग करती रही थीं. सुलिवन ने ज़ोर देकर कहा कि “हम संबंध तोड़ने की बजाए जोख़िम कम करने और विविधता लाने के समर्थक हैं.” इससे पहले सुलिवन ने चीन पर प्रौद्योगिकीय प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी नीति को “ऊंची घेराबंदी वाला छोटा आहाता” तैयार करने की क़वायद क़रार दिया था.
अब ब्लिंकन, येलन, वाणिज्य मंत्री जीना रायमुंडो और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन जैसे अधिकारी अपने चीनी समकक्ष के साथ बैठक तय करने की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन ये क़वायद बेहद कठिन साबित हो रही है. फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक चीनी पक्ष ब्लिंकन की यात्रा को लेकर हिचक रहा है क्योंकि उन्हें डर है कि FBI गुब्बारे के मलबे के आधार पर रिपोर्ट जारी कर सकती है.
जहां तक अमेरिकी रक्षा मंत्री ऑस्टिन का सवाल है तो असलियत ये है कि उनके नए-नवेले चीनी समकक्ष जनरल ली शांगफ़ु 2018 से ही अमेरिकी प्रतिबंधों की ज़द में हैं. दरअसल उनके जनरल रहते चीन द्वारा रूसी हथियारों की ख़रीद के मामले में उन पर अमेरिकी पाबंदी आयद की गई थी. अमेरिका का कहना है कि अमेरिकी और चीन को छोड़कर किसी तीसरे देश में होने वाली बैठक पर इन प्रतिबंधों का असर नहीं होगा, हालांकि चीनी पक्ष के इस बात के लिए रज़ामंद होने की संभावना ना के बराबर है. जनरल ली को इस साल मार्च में चीन का रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया था.
यूक्रेन युद्ध के मद्देनज़र पश्चिमी गठजोड़ में कसावट आने के चलते अमेरिका ने अपनी चीन नीति में यूरोपीय संघ को भी शामिल करने की कोशिश की है. चीन की तीन दिवसीय यात्रा के कुछ ही अर्से बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने ताइवान के संदर्भ में कहा कि यूरोप को उन संकटों में नहीं फंसना चाहिए “जो हमारे ख़ुद के नहीं हैं”. यूरोप को विश्व व्यवस्था का “तीसरा ध्रुव” बनने की कोशिश करनी चाहिए और यूरोप की “सामरिक स्वायत्तता” की ज़रूरत अब स्वीकार हो गई है.
हालांकि अमेरिका इस संदर्भ में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन द्वारा 30 मार्च को दिए गए भाषण का हवाला देता है. अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि चीन से अलग होना ना तो व्यावहारिक है और ना ही यूरोप के हित में है. लेयेन ने कहा था कि “हमें अलगाव की जगह डि-रिस्किंग यानी जोख़िम कम करने पर ज़ोर देना चाहिए.” उन्होंने बेबाक अंदाज़ में कहा था कि “साफ़तौर से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसे व्यवस्थागत बदलाव के लक्ष्य से काम कर रही है जिसके केंद्र में चीन रहे.” उन्होंने आगे कहा था कि यूरोपीय कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी “पूंजी, विशेषज्ञता और ज्ञान को उनके व्यवस्थागत प्रतिस्पर्धी अपनी सैन्य और ख़ुफ़िया क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल में ना ला सकें.”
चीन को लेकर अमेरिका जो संदेश दे रहा है, उसका कितना हिस्सा सचमुच संजीदगी भरा है और कितना अपने घबराए साथियों को भरोसे में रखने के लक्ष्य से है, ये अभी साफ़ नहीं है. अमेरिका के कई साथियों को लगता है कि वाशिंगटन की नीतियों का उन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. हालांकि इस सिलसिले में अमेरिका का एजेंडा साफ़ है.
चीन को लेकर अमेरिका जो संदेश दे रहा है, उसका कितना हिस्सा सचमुच संजीदगी भरा है और कितना अपने घबराए साथियों को भरोसे में रखने के लक्ष्य से है, ये अभी साफ़ नहीं है. अमेरिका के कई साथियों को लगता है कि वाशिंगटन की नीतियों का उन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
हाल ही में जापान में G7 के वित्त मंत्रियों की बैठक में शिरकत करते हुए येलेन ने अन्य देशों के ख़िलाफ़ चीन की “आर्थिक ज़ोर-ज़बरदस्ती” को लेकर G7 के देशों द्वारा “समन्वित कार्रवाई” किए जाने का आह्वान किया. उन्होंने ये भी कहा कि अमेरिका “चीन की ओर जा रहे निवेश पर तंग रूप से लक्षित पाबंदियां” अतिरिक्त रूप से आयद करने पर विचार कर रहा है और इसके बारे में G7 के बाक़ी हिस्सेदारों से चर्चा की जा चुकी है. उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों से जुड़ी इन क़वायदों को उन प्रौद्योगिकियों में लक्षित किया जाएगा “जहां साफ़ तौर से स्पष्ट राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं जुड़ी हैं.”
हालांकि फ़िलहाल ऐसा ही लग रहा है कि दोनों पक्ष एक ऐसा वातावरण तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं जिसे डेविड इग्नेशियस ने “सकारात्मक जुड़ाव का ढांचा” क़रार दिया है. विएना में सुलिवन और वांग के बीच हुई विस्तृत परिचर्चाओं से आशा की कुछ किरण नज़र आती है, जिसे (जैसा कि हमने बताया है) दोनों ही पक्षों ने “बेबाकी भरा” और “सकारात्मक’’ क़रार दिया है. दुनिया के मसलों में दोनों देश जिस तरह की भूमिका निभाते हैं, उसे देखते हुए दोनों पक्ष अपने रिश्तों में स्थायित्व लाने की ज़रूरत देख रहे हैं.
बहरहाल, अमेरिका में चुनावी सरगर्मियां तेज़ होने के मद्देनज़र ये साफ़ नहीं है कि दोनों देशों द्वारा नए तौर-तरीक़ों की खोज से जुड़े इस प्रयास की मियाद कब तक रहेगी. अगर अमेरिका में इस एक मसले (चीन के प्रति कठोर रुख़ अपनाए जाने) पर सर्वसम्मति बन जाए तो चीन के साथ जुड़ाव बढ़ाने की क़वायद अमेरिका में राजनीतिक रूप से नुक़सानदेह सबब बन सकती है.
मनोज जोशी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में एक प्रतिष्ठित फ़ेलो हैं.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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