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टीकाकरण सिर्फ बचपन की ज़रूरत नहीं, जीवनभर की सुरक्षा है. हर उम्र के लिए टीका जरूरी है—क्योंकि स्वस्थ रहना ही असली प्रतिरक्षा है.
हर साल 10 नवंबर को विश्व टीकाकरण दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य टीके की मदद से शरीर में प्रतिरक्षण शक्ति पैदा होने के महत्व को बताना और उसे लेकर जागरूकता बढ़ाना है. 24-30 अप्रैल 2025 के बीच मनाए गए विश्व टीकाकरण सप्ताह में इस बार की थीम थी “सभी के लिए टीकाकरण संभव है.” हालांकि, भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाता है लेकिन आम तौर पर इन्हें गर्भवती महिलाओं और बच्चों तक ही सीमित रखा जाता है. महिलाओं और बच्चों को केंद्र में रखने की वजह से अक्सर वयस्कों के टीकाकरण की कोशिशें पीछे रह जाती हैं, उन्हें ज़रूरी नहीं समझा जाता.
इसमें कोई शक नहीं कि भारत के टीकाकरण कार्यक्रमों ने बीमारियों के प्रसार को नियंत्रित करने और बीमारियों के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हर साल लाखों बच्चों और गर्भवती महिलाओं का जीवन बचाने के लिए ये कम लागत में सबसे प्रभावी स्वास्थ्य कार्यक्रम साबित हुए हैं. एक अध्ययन में पाया गया कि बच्चों के लिए भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) साप्ताहिक वेतन में 13.8 प्रतिशत वृद्धि करता है. ज़ाहिर है स्वास्थ्य और आर्थिक परिणामों के लिहाज ये देश को दीर्घकालिक लाभ प्रदान करता है. इस अध्ययन से ये बात भी सामने आती है कि टीकाकरण का लाभ सिर्फ स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि इसे मानव पूंजी में एक निवेश माना जा सकता है, जो जीवन भर कई तरह से फायदे देता है.
हालाकि, वयस्कों के लिए टीकाकरण दर कम है जबकि ये सबसे उत्पादक आयु समूह हैं. भारत समेत ज़्यादातर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में राष्ट्रीय टीकाकरण नीतियां वयस्कों में प्रतिरक्षण क्षमता पैदा करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती. हालांकि, इसे लेकर देशों में नीतियां ज़रूर हैं लेकिन सामान्य जनता और स्वास्थ्य कर्मियों में वयस्क टीकाकरण की ज़रूरत के बारे में जागरूकता सीमित है. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने 2021-2030 के दशक को स्वस्थ उम्र बढ़ाने का दशक घोषित किया है. ये सतत विकास लक्ष्यों (एसजीडी) में भी शामिल है. इसके तहत उम्रदराज लोगों, उनके परिवारों और जिन समुदायों में वे रहते हैं, उनके जीवन को बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया गया है. इस लक्ष्य को हासिल करने में टीकाकरण की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
भारत को 28 वर्ष की औसत आयु वाला एक युवा देश माना जाता है लेकिन साथ ही, इसके जनसांख्यिकीय ढांचे में भी बदलाव हो रहा है. 2030 तक बुजुर्गों की जनसंख्या 193 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो कुल जनसंख्या का 13 प्रतिशत होगी (चित्र 1 देखें). संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) का अनुमान है कि 2022 और 2050 के बीच 80 साल से ज़्यादा उम्र वाले लोगों की संख्या 279 प्रतिशत बढ़ जाएगी. बुजुर्गों की बड़ी संख्या भारत में भी स्वस्थ वृद्धावस्था को प्रोत्साहित करने वाली पहल की शुरूआत की ज़रूरत पर ध्यान देने की मांग करती हैं.
भारत में टीके से रोके जा सकने वाले रोगों (वीपीडी) से जितनी भी मौतें होती हैं, उनमें 95 प्रतिशत हिस्सा वयस्कों में होता है.
ये तो एक स्थापित तथ्य है कि बढ़ती उम्र के साथ रोग से लड़ने की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती जाती है. बुजुर्गों में संक्रमण की आशंका ज़्यादा होता है. बुजुर्गों में मॉर्बिडिटी (मुख्य बीमारी के लिए अलावा दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं) रोगों के कारण ये स्थिति और बिगड़ जाती है. उनके संक्रामक रोगों के चपेट में आने का ख़तरा बढ़ जाता है. दुनिया भर में कुल आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ता जा रहा है, ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फिर इस बात को दोहराया है कि अगर हमें अपने बुजुर्गों को स्वस्थ रखना है, तो जीवन भर टीकाकरण की सुविधा देना महत्वपूर्ण हैं.
चित्र 1: आयु समूह के अनुसार भारतीय जनसंख्या के हिस्से का अनुमान (प्रतिशत में)

Source: Statista
भारत में टीके से रोके जा सकने वाले रोगों (वीपीडी) से जितनी भी मौतें होती हैं, उनमें 95 प्रतिशत हिस्सा वयस्कों में होता है. हालांकि, नवजात शिशुओं और बच्चों में वैक्सीनेशन कवरेज में सराहनीय बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन जीवनचक्र लंबा होने की वजह से अब बीमारियों की मार बचपन या जवानी की बजाए बुढ़ापे में दिख रहा है. वैक्सीन ना लगाने की वजह से वयस्कों में ज़्यादा मौत हो रही हैं. अधिक उम्र के लोगों में मौत के ज़्यादा मामले मॉर्बिडिटी, रूबेला, हेपेटाइटिस ए, चिकन पॉक्स, इन्फ्लूएंजा जैसे रोगों से जुड़े हैं.
नई वैक्सीनों टीकों की उपलब्धता और पुराने ज़माने में टीकाकरण की निम्न दरों ने मिलकर वयस्कों की एक ऐसी जनसंख्या बनाई है, जिसे बचपन में कई टीके नहीं दिए गए थे. हालांकि, वयस्कों में प्रतिरक्षण शक्ति पैदा करने के लिए सिंगल बूस्टर शॉट पर्याप्त हो सकता है जबकि बुजुर्गों को ज़्यादा शक्तिशाली खुराक की ज़रूरत होती है. इसके अलावा वैक्सीनेशन, मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस की चुनौती का मुकाबला करने में भी मदद कर सकता है क्योंकि इससे एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता कम होती है. इतना ही नहीं, टीकाकरण कार्यक्रम से रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों के ड्रग रेजिस्टेंस वैरिएंट का मुकाबला भी किया जा सकता है.
वयस्क टीकाकरण कार्यक्रम प्रारंभिक निवेश की तुलना में 19 गुना तक आर्थिक लाभ उत्पन्न करते हैं.
गैर सरकारी संगठन स्वास्थ्य अर्थशास्त्र कार्यालय (ओएचई) द्वारा विभिन्न देशों में टीकाकरण कार्यक्रम का विश्लेषण किया गया. इसके तहत ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, पोलैंड, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका समेत दस देशों में टीकाकरण कार्यक्रमों का अध्ययन किया गया. इस विश्लेषण से ये सामने आया कि वयस्क टीकाकरण कार्यक्रम प्रारंभिक निवेश की तुलना में 19 गुना तक आर्थिक लाभ उत्पन्न करते हैं. वैक्सीन की सभी खुराक पाने वाले व्यक्ति में ये आर्थिक लाभ 4,637 डॉलर के बराबर है. ओएचई की रिपोर्ट के मुताबिक वयस्कों का वैक्सीनेशन भी संभावित रूप से बाल टीकाकरण कार्यक्रमों के बराबर ही सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान कर सकता है.
कुल मिलाकर देखा जाए, तो वयस्कों में वैक्सीन के फायदे सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार तक सीमित नहीं हैं. अर्थव्यवस्था की दृष्टि से, ये दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को कम करते हैं. लोग स्वस्थ रहते हैं तो श्रम उत्पादकता में कम नुकसान होता है. ये व्यापक सामाजिक और आर्थिक विकास में मददगार होते हैं. भारत जैसे देश में जनसंख्या का बड़ा हिस्सा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहता है. आहार पौष्टिक नहीं है, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है, और स्वच्छता प्रणाली खराब है ऐसे परिस्थितियों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा में टीकाकरण के महत्व को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए.
भारत में वयस्क टीकाकरण को अभी तक पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है. इसका कम इस्तेमाल हो रहा है. इंफ्लुएंज़ा, न्यूमोकोकल, टाइफॉइड और हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों में वयस्क टीकाकरण कवरेज़ बहुत ही कम यानी 1.5 प्रतिशत, 0.6 प्रतिशत, 1.9 प्रतिशत और 1.9 प्रतिशत है. हालांकि, हृदय रोग, मधुमेह, फेफड़े की बीमारी वाले, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले, पुरुष और उच्च शिक्षा स्तर वाले व्यक्तियों में टीके का उपयोग अधिक था.
2022 के एक अध्ययन में पाया गया कि आय समूहों में असमानताएं भी टीकाकरण को प्रभावित करती है. ज़्यादा समपन्न समूहों में वैक्सीनेशन का कवरेज़ अन्य समूहों की तुलना में सबसे ज़्यादा था. इसे टीकों की कीमत संबंधी चिंताओं और जागरूकता की कमी से जोड़ा जा सकता है. हालांकि, कुल मिलाकर, इस अध्ययन में सभी वयस्कों में वैक्सीनेशन की कम कवरेज़ देखी गई. भारत में किए गए सैंपल स्टडीज़ में पाया गया कि 80 प्रतिशत से ज़्यादा वयस्कों को ये पता ही नहीं था कि उन्हें भी टीकाकरण की ज़रूरत है. उनको लगता था कि वैक्सीनेशन सिर्फ बच्चों के लिए होता है. यही धारणा पूरी स्वास्थ्य प्रणाली यानी सरकार से लेकर स्वास्थ्य विभाग में बनी हुई है.
भारत में किए गए सैंपल स्टडीज़ में पाया गया कि 80 प्रतिशत से ज़्यादा वयस्कों को ये पता ही नहीं था कि उन्हें भी टीकाकरण की ज़रूरत है.
वयस्क टीकाकरण के लिए समर्पित अपर्याप्त व्यवस्था और ज़रूरत के हिसाब से ना बदलने वाला स्वास्थ्य ढांचा एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. इस स्वास्थ्य व्यवस्था में कामकाजी वयस्क आबादी को ध्यान में नहीं रखा जाता. कोविड-19 महामारी के दौरान जब सबसे बड़ा वयस्क टीकाकरण अभियान किया गया, तब उसने वयस्क प्रतिरक्षण में इन कमियों को उजागर किया.
इसके अलावा, वयस्कों के वैक्सीनेशन के मुद्दे पर व्यापक और मानकीकृत राष्ट्रीय स्तर के दिशा-निर्देशों की कमी भी थी. इसीलिए 2024 में, फिजिशियंस एसोसिएशन ने वयस्क टीकाकरण पर 25 टीकों के लिए दिशानिर्देश जारी किए. इनमें जिनमें गर्भावस्था, हृदय और फेफड़े की बीमारियां, और प्रतिरक्षा में कमज़ोर शरीर जैसी ज़ोखिम वाली स्थितियों के लिए विशेष सलाह शामिल है. विभिन्न आयु समूहों के लिए उनकी उम्र के हिसाब से सुझाव दिए गए हैं.
हालांकि, संसाधनों की कमी अभी भी एक चुनौती पेश करती हैं. टीकों की खरीद और उससे संबंधित प्रशासनिक लागतें सिर्फ स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर ही नहीं, बल्कि व्यक्तियों पर भी भारी आर्थिक बोझ डाल सकती हैं. फिर भी, आयुष्मान भारत प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) जैसी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबों के लिए अस्पताल में इलाज में मदद करती है. हालांकि, इस बीमा में वैक्सीन की लागत शामिल नहीं हैं, भले ही वे लंबी अवधि में स्वास्थ्य देखभाल की लागत कम कर सकती हैं. इस योजना की ये कमी विभिन्न आय वर्गों के वयस्कों के बीच वैक्सीनेशन कवरेज़ में मौजूदा असमानताओं को बढ़ा सकती है.
वयस्कों के टीकों में निवेश से सार्वजनिक स्वास्थ्य और दीर्घकाल में आर्थिक लाभ होते हैं. ऐसे में वयस्क वैक्सीनेशन को बढ़ाने के लिए सभी सरकारों को समन्वित प्रयास करने चाहिए.
सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि आम लोगों और स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने वालों यानी सरकार के बीच वयस्क टीकाकरण को लेकर जागरूकता बढ़ानी चाहिए. भारत में 2025 में किए गए एक अध्ययन में ये कहा गया कि बाल रोग विशेषज्ञों के बीच वयस्क टीकों के प्रति जागरूकता बढ़ानी चाहिए. अगर ये विशेषज्ञ, बच्चों के साथ आने वाले उनके माता-पिता को शिक्षित करें तो वयस्क टीकाकरण दर में सुधार किया जा सकता है. बच्चों के लिए टीकाकरण की ही तरह वयस्क वैक्सीनेशन के लिए भी सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान चलाए जाने चाहिए. वीपीडी के बारे में जागरूकता बढ़ाने और वयस्क टीकाकरण के महत्व को समझाने के लिए सार्वजनिक शिक्षा अभियान चलाए जाने चाहिए.
वैक्सीन के लिए सरकारी बीमा योजना में कवरेजं प्रदान करके दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को लागत-प्रभावी तरीके से कम किया जा सकता है.
इसके अलावा, वैक्सीनेशन कवरेज़ बढ़ाने के लिए वयस्क टीकाकरण केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए. समानांतर रूप से, वयस्क वैक्सीनेशन के लिए एक इकोसिस्टम विकसित करने की ज़रूरत है, जिससे इस आयुवर्ग में भी कम टीकाकरण दर की समस्या पर ध्यान दिया जा सके. बच्चों और गर्भवती महिलाओं में टीकाकरण दर बढ़ाने में भारत को मिली कामयाबी ये दिखाती है कि स्वास्थ्य प्रणाली राष्ट्रीय स्तर पर वयस्क वैक्सीनेशन कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्षम है. वैक्सीन के लिए सरकारी बीमा योजना में कवरेजं प्रदान करके दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को लागत-प्रभावी तरीके से कम किया जा सकता है.
हालांकि जीवन के प्रारंभिक चरण में टीकाकरण ज़्यादा लागत-कुशल होता है. फिर भी, उन लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिन्होंने बचपन में टीका नहीं लगवाया. इसके साथ ही, उन व्यक्तियों को भी केंद्र में रखना चाहिए, जिनमें मॉर्बिडिटी, कमजोर प्रतिरक्षा शक्ति है, और जिनकी उम्र ज़्यादा है. इसी तरह, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को प्राथमिकता देकर आय की असमानता से जुड़ी चिंताओं को दूर किया जाना चाहिए. एक खास वर्ग को लक्षित करके अभियान चलाने से वयस्क टीकाकरण कार्यक्रमों की दक्षता और संसाधनों के अधिकतम उपयोग को बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
कुल मिलाकर, टीकाकरण को लेकर ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, कि किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य उसके आनुवांशिक, जैविक और सामाजिक स्तर से तय होता है, इसलिए नीतियां भी उसी हिसाब से बनाई जानी चाहिए. अगर लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा तो बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उच्च श्रम उत्पादकता के आर्थिक लाभ भी हासिल किए जा सकते हैं. मौजूदा दौर में भारत की जनसंख्या संरचना बदल रही है, ऐसे में सभी के लिए टीकाकरण एक लंबे और स्वस्थ जीवन की मौलिक आवश्यकता है.
निमिषा चड्ढा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Nimisha Chadha is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. She was previously an Associate at PATH (2023) and has a MSc ...
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