Author : Tehmeena Rizvi

Expert Speak Raisina Debates
Published on Apr 28, 2026 Updated 2 Days ago

जम्मू-कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के जरिए उग्रवाद अब डिजिटल और सामाजिक नेटवर्क के साथ “इकोसिस्टम वॉरफेयर” में बदल रहा है जिससे यह मुद्दा अभी बेहद प्रासंगिक हो गया है. पढ़ें कैसे राज्य में अब संघर्ष केवल जमीन पर नहीं बल्कि नैरेटिव और सूचना के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है.

कश्मीर में नया रण: पोस्ट बने हथियार, नैरेटिव बने वार

Image Source: Getty

पिछले दस वर्षों में जम्मू-कश्मीर के संघर्ष के स्वरूप में बड़ा संरचनात्मक बदलाव आया है. पहले यह संघर्ष मुख्य रूप से सशस्त्र उग्रवादियों, क्षेत्रीय नियंत्रण और बीच-बीच में होने वाली हिंसा तक सीमित था, लेकिन अब यह एक अधिक फैलाव वाला और अनुकूलनशील संघर्ष तंत्र बन गया है. यह नया रूप केवल उग्रवाद का विस्तार नहीं है, बल्कि एक तरह का परिवर्तन है जिसे ‘इकोसिस्टम वॉरफेयर’ कहा जा सकता है. इसमें कई तरह के लोग-दिखाई देने वाले और छिपे हुए डिजिटल, वैचारिक और भौतिक स्तरों पर काम करते हैं.
दिखाई देने वाले लोग वे होते हैं जिनकी पहचान और गतिविधियाँ स्पष्ट होती हैं, जैसे खुलेआम हथियार लेकर चलने वाले उग्रवादी. वहीं छिपे हुए लोग डिजिटल और वैचारिक क्षेत्रों में गुप्त रूप से काम करते हैं, अपनी पहचान छिपाकर बिना सामने आए दूसरों को प्रभावित करते हैं.

यह नया स्वरूप केवल उग्रवाद का विस्तार नहीं है, बल्कि एक ऐसा बदलाव है जिसे इकोसिस्टम वॉरफेयर के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग तरह के लोग कई स्तरों पर मिलकर काम करते हैं.

इस बदलाव के केंद्र में हितधारकों की बढ़ती विविधता है. पारंपरिक उग्रवादी संगठन जैसे जैश-ए-मोहम्मद (JeM) अब सिर्फ जंगलों में लड़ने वाले उग्रवादियों या सामान्य लड़ाकों की भर्ती तक सीमित नहीं हैं. वे अब एक बहु-स्तरीय समर्थन तंत्र बना रहे हैं, जिसमें समाज में घुले-मिले सहयोगी, डिजिटल प्रचार करने वाले और शिक्षित पेशेवर शामिल हैं. इस बदलाव से उग्रवादी नेटवर्क की अनुकूलन क्षमता, मजबूती और काम करने की पहुंच काफी बढ़ गई है.

ब डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी विशेषज्ञ और शिक्षाविद जैसे पेशेवर लोग भी जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों द्वारा ऑपरेशन्स में सहयोग के लिए शामिल किए जा रहे हैं. ये लोग पारंपरिक उग्रवादियों से अलग होते हैं, क्योंकि इनकी सार्वजनिक छवि साफ-सुथरी होती है, जिससे इनकी पहचान करना और भी मुश्किल हो जाता है. यह एक सोची-समझी रणनीति का संकेत है.

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर होने वाली मुठभेड़ों में कमी आई है, लेकिन इसके साथ ही ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के नेटवर्क, डिजिटल कट्टरता के मामले और वित्तीय सहायता के चैनल बढ़े हैं. इसका मतलब है कि भले ही दिखने वाली हिंसा कम या ज्यादा होती रहे, लेकिन उग्रवाद को सहारा देने वाला पूरा तंत्र अब ज्यादा जटिल, मजबूत और व्यवस्थित हो गया है.

उग्रवाद का बदलता चेहरा 

जम्मू-कश्मीर में बदलते संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू ‘व्हाइट-कॉलर उग्रवाद’ का उभरना है. अब डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी विशेषज्ञ और शिक्षाविद जैसे पेशेवर लोग भी जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे संगठनों द्वारा ऑपरेशन्स में सहयोग के लिए शामिल किए जा रहे हैं. ये लोग पारंपरिक उग्रवादियों से अलग होते हैं, क्योंकि इनकी सार्वजनिक छवि साफ-सुथरी होती है, जिससे इनकी पहचान करना और भी मुश्किल हो जाता है. यह एक सोची-समझी रणनीति का संकेत है. उग्रवादी संगठन अपने लोगों को सामान्य सामाजिक और आर्थिक ढांचे में शामिल करके अपनी तकनीकी और लॉजिस्टिक क्षमता बढ़ाते हैं, साथ ही अपनी गतिविधियों को छिपाकर रखते हैं.

उदाहरण के तौर पर, जटिल वित्तीय लेन-देन, ड्रोन के जरिए निगरानी और एन्क्रिप्टेड संचार जैसे काम तकनीकी ज्ञान मांगते हैं, जो पारंपरिक उग्रवादियों में अक्सर नहीं होता. शिक्षित पेशेवरों के जुड़ने से यह कमी पूरी होती है और उग्रवादी संगठन ‘हाइब्रिड’ (मिश्रित) रूप ले लेते हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर सकते हैं. हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में कंटेंट हटाने के अनुरोधों और साइबर निगरानी में तेज़ी से वृद्धि हुई है, जो यह दिखाता है कि सूचना युद्ध का महत्व बढ़ रहा है.

अब डिजिटल क्षेत्र भी संघर्ष का एक प्रमुख मैदान बन गया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग ऐसे लोग करते हैं जो अक्सर गुमनाम रहकर खास तरह के नैरेटिव (कथानक) बनाते और फैलाते हैं. ये नैरेटिव, खासकर पहचान और धर्म से जुड़े मुद्दों पर आधारित होते हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय समस्याओं को वैश्विक मुद्दों से जोड़ना होता है. कभी ये नैरेटिव उग्रवाद को ‘वैध प्रतिरोध’ के रूप में दिखाते हैं, तो कभी स्थानीय लोगों को हिंसक तत्वों के बजाय अपनी पहचान और आस्था के रक्षक के रूप में पेश करते हैं. कई बार ये ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) द्वारा दी जा रही वैचारिक, लॉजिस्टिक और डिजिटल मदद को एक सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे उनकी भूमिका सामान्य और स्वीकार्य लगने लगती है.

अब संघर्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ और विकेंद्रीकृत हो गया है, जिसमें उग्रवादी, OGWs, डिजिटल एक्टर्स और अन्य सहयोगी शामिल हैं. इससे आम नागरिक और उग्रवादी के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है. खासकर OGWs आम जीवन के बीच रहकर समन्वय और सहायता करते हैं, बिना अपनी पहचान जाहिर किए.

सरकार के हर कदम-चाहे वह विकास, सुरक्षा या प्रशासन से जुड़ा हो-को कई बार ‘दमन’ के रूप में दिखाया जाता है. इससे लोगों में गुस्सा और विरोध बढ़ता है. सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश बहुत तेजी से फैलते हैं और विदेशों में रहने वाले लोग भी इन्हें आगे बढ़ाते हैं, जिससे छोटे स्थानीय मुद्दे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच जाते हैं और सरकार पर दबाव बढ़ता है. यह पूरा नेटवर्क इसलिए मजबूत होता है क्योंकि इसमें अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं. अगर किसी एक व्यक्ति को हटा भी दिया जाए, तो पूरा सिस्टम बंद नहीं होता, बल्कि खुद को बदलकर काम करता रहता है.

डिजिटल युद्धभूमि और नैरेटिव नियंत्रण

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में डिजिटल क्षेत्र अब इकोसिस्टम वॉरफेयर का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है, जहाँ नैरेटिव (कथानक) बनाए जाते हैं, चुनौती दिए जाते हैं और रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं. 2026 तक यह डिजिटल क्षेत्र ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के नेटवर्क से गहराई से जुड़ चुका होगा. अब ये नेटवर्क सिर्फ उग्रवाद का एक छोटा हिस्सा नहीं रह गए हैं, बल्कि जमीनी हकीकत और उसकी डिजिटल छवि के बीच पुल का काम करते हैं.

स्थानीय घटनाओं-जैसे सुरक्षा अभियानों या प्रशासनिक फैसलों-को भावनात्मक रूप से भरे हुए विरोध और असंतोष के नैरेटिव में बदलने में OGWs और उनके समर्थक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये नैरेटिव अचानक नहीं बनते, बल्कि इन्हें सोच-समझकर तैयार किया जाता है-समय के हिसाब से पोस्ट किया जाता है, एडिट किया जाता है और बड़े पैमाने पर फैलाया जाता है. इसी कारण ये सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाते हैं.

यह डिजिटल गतिविधि बिना किसी एक नेता के भी चलती रहती है, इसलिए इसे रोकना और यह पता लगाना मुश्किल होता है कि इसे कौन चला रहा है. अब OGW नेटवर्क डिजिटल टूल्स की मदद से तुरंत आपस में बात कर सकते हैं, योजना बना सकते हैं और लोगों को जोड़ सकते हैं-जो पहले इतना आसान नहीं था. इससे एक ‘फीडबैक लूप’ बन जाता है, जहाँ जमीनी घटनाएं इस सोच के साथ होती हैं कि उनका ऑनलाइन असर क्या होगा, और ऑनलाइन बातें लोगों की सोच को और प्रभावित करती हैं. इस तरह अब संघर्ष सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि लोगों की सोच और भरोसे की लड़ाई बन गया है.

इस बदलाव ने भारत के सामने नई रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, जो पहले के उग्रवाद से अलग हैं. अब संघर्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ और विकेंद्रीकृत हो गया है, जिसमें उग्रवादी, OGWs, डिजिटल एक्टर्स और अन्य सहयोगी शामिल हैं. इससे आम नागरिक और उग्रवादी के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है. खासकर OGWs आम जीवन के बीच रहकर समन्वय और सहायता करते हैं, बिना अपनी पहचान जाहिर किए. इस वजह से पारंपरिक खुफिया और निगरानी तंत्र की सीमाएँ सामने आती हैं, क्योंकि वे सामान्य गतिविधियों और गुप्त सहयोग के बीच अंतर करने में अक्सर असफल रहते हैं. यदि गलती से गलत पहचान या अधिक बल का प्रयोग होता है, तो इससे स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ सकता है और वही इकोसिस्टम मजबूत हो सकता है जिसे खत्म करना लक्ष्य है.

भारत को अब एक ऐसे समग्र इकोसिस्टम-आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो डिजिटल, सामाजिक और वैचारिक सभी पहलुओं को साथ लेकर चले, न कि केवल सैन्य या सुरक्षा उपायों पर निर्भर रहे. ध्यान केवल उग्रवादियों पर नहीं, बल्कि छिपे हुए सहयोगियों, OGWs और नैरेटिव बनाने वालों पर भी होना चाहिए.

यह स्थिति सुरक्षा बलों के लिए काम को और जटिल बनाती है. अब चुनौती केवल खतरों को खत्म करना नहीं है, बल्कि ऐसा करते समय सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलता बनाए रखना भी जरूरी है. हितधारकों की विविधता ने उग्रवादी नेटवर्क को अधिक लचीला और मजबूत बना दिया है, जिससे पारंपरिक रणनीतियाँ-जैसे नेतृत्व को निशाना बनाना-कम प्रभावी हो गई हैं. OGWs और अन्य सहयोगियों की मदद से यह नेटवर्क तब भी चलता रहता है, जब कुछ उग्रवादी खत्म कर दिए जाते हैं.

इसका मतलब है कि केवल सामरिक जीत से हमेशा रणनीतिक सफलता नहीं मिलती. इसलिए भारत को अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है-सिर्फ सुरक्षा-आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें-कई एजेंसियों द्वारा मिलकर रियल-टाइम में गलत सूचना का खंडन और पारदर्शी सूचना प्रसार,  समाज-आधारित शासन को बढ़ावा देना और नागरिक समाज को शामिल करना,  उग्रवादी नेटवर्क को तोड़ने के लिए वैध आर्थिक विकल्प और मजबूत स्थानीय शासन विकसित करना.

भारत को अब एक ऐसे समग्र इकोसिस्टम-आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो डिजिटल, सामाजिक और वैचारिक सभी पहलुओं को साथ लेकर चले, न कि केवल सैन्य या सुरक्षा उपायों पर निर्भर रहे. ध्यान केवल उग्रवादियों पर नहीं, बल्कि छिपे हुए सहयोगियों, OGWs और नैरेटिव बनाने वालों पर भी होना चाहिए. अंततः, चुनौती केवल अलग-अलग उग्रवादियों को खत्म करने की नहीं है, बल्कि पूरे इकोसिस्टम को कमजोर करने की है-वह भी बिना समाज में और विभाजन पैदा किए. भविष्य में क्षेत्र की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपनी रणनीति को इस नए, तेजी से बदलते इकोसिस्टम के अनुसार कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से ढाल पाता है.


तेहमीना रिजवी बेनेट विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शोध विश्लेषक और पीएचडी छात्रा हैं. वे महिला, शांति और सुरक्षा (दक्षिण एशिया) में विशेषज्ञता रखती हैं, और कश्मीर क्षेत्र, पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर केंद्रित शोध के साथ संघर्ष, लिंग और सुरक्षा नीतियों के अंतर्संबंधों पर ध्यान केंद्रित करती हैं.
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