बीमारी की पहचान से लेकर इलाज के फैसलों तक, एआई चुपचाप भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में अपनी जगह बना रहा है. कहाँ यह तकनीक कामयाब हुई, कहाँ चूकी और आगे क्या सीख है- इस सारे सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़े पूरा लेख...
पिछले कुछ साल में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का तेज़ी से विस्तार हुआ है. तकनीकी या आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं, अब एआई ने स्वास्थ्य सेवा में भी महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. चाहे बीमारी का पता लगाना हो या फिर उसके प्रकोप पर नियंत्रण की सलाह देनी हो, एआई का दख़ल बढ़ रहा है. भारत में रोग और रोगियों की संख्या ज़्यादा है जबकि उसकी तुलना में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच सीमित और असमान है. डॉक्टरों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने समस्या को और बढ़ा दिया है. एआई को अक्सर एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' के रूप में देखा जाता है. इसीलिए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में स्वास्थ्य सेवा में 'किफायती' एआई के इस्तेमाल बढ़ाने की बात कही गई है.
हालांकि, स्वास्थ्य सेवा में एआई के इस्तेमाल के मिश्रित परिणाम रहे हैं. कुछ एआई एप्लिकेशंस ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर बदलाव किए जबकि अन्य विफल रहे हैं. जिन लोगों यानी कम संसाधन वाले क्षेत्रों में हाशिए पर पड़े समूहों को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, वहां यह नाकाम रहे. ऐसे में चुनौती अब एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की है जो नवाचार और नई तकनीकी को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए अनुकूल हो. इसके साथ ही समानता, सुरक्षा और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो.
कोविड चेतावनी से कैंसर स्क्रीनिंग तक
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई की उपयोगिता का सबसे अच्छा उदाहरण शुरुआती चेतावनी देने और विशेष निदान प्रणालियों में देखा जा सकता है. टोरंटो स्थित ब्लू डॉट नामक प्लेटफॉर्म ने 65 से अधिक भाषाओं में समाचार लेखों, स्वास्थ्य रिपोर्टों और एयरलाइन डेटा को स्कैन किया. इसी का नतीजा था कि ब्लू डॉट ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा चेतावनी जारी करने से नौ दिन पहले ही कोविड-19 महामारी के प्रकोप की पहचान कर ली थी.
भारत में रोग और रोगियों की संख्या ज़्यादा है जबकि उसकी तुलना में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच सीमित और असमान है. डॉक्टरों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने समस्या को और बढ़ा दिया है. एआई को अक्सर एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' के रूप में देखा जाता है.
अगर भारत के संदर्भ में भी देखें तो, डायबिटिक रेटिनोपैथी का पता लगाने में ‘मधुनेत्र’ एआई को काफ़ी सफलता मिली. 3,000 से ज़्यादा रेटिना इमेज पर की गई जांच से लगभग 7,100 मरीजों को लाभ हुआ है. इसी तरह, तपेदिक (टीबी) की जांच के लिए Qure.ai ने लागत कम करते हुए इस रोग की पहचान करना आसान किया है. इसकी सफलता को देखते हुए अब इसे राष्ट्रीय स्तर पर सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में तैनात किया गया है. स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई स्टार्टअप की दो सफलताओं के बारे में आपको बताते हैं. पहला स्टार्टअप है 30 से ज़्यादा शहरों में इस्तेमाल की जाने वाली एआई-आधारित ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग NIRAMAI और दूसरी है Wadhwani AI, जो हरियाणा में 157 सरकारी सुविधाओं में टीबी उपचार और केस प्रबंधन के लिए इस्तेमाल हो रही है. इनकी सफलता दिखाती है कि कैसे स्वदेशी स्वास्थ्य-एआई नवाचारों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में एकीकृत किया जा रहा है.
हालांकि, वैश्विक स्तर पर नाकामियों के उदाहरण भी सामने आए हैं, जिनके ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं. इनमें एआई चैटबॉट द्वारा भ्रामक, गलत और ख़तरनाक चिकित्सा सलाह देना शामिल है. भारत समेत सात एशियाई और अफ्रीकी देशों में 2024 में टीबी की जांच को लेकर एक अध्ययन किया गया. इससे पता चला कि टीबी की जांच के लिए छाती के एक्स-रे का परीक्षण करने वाले एआई उपकरण विभिन्न परिस्थितियों और रोगी समूहों में असमान रूप से काम करते हैं. हालांकि कई व्यावसायिक उपकरण विश्व स्वास्थ्य संगठन के न्यूनतम सटीकता लक्ष्य को पूरा करते हैं, लेकिन महिलाओं, एचआईवी से पीड़ित लोगों और टीबी के इतिहास वाले व्यक्तियों में उनका प्रदर्शन कम हो गया.
ये उदाहरण बताते हैं कि एआई की प्रभावशीलता उसके ट्रेनिंग डेटा और स्थानीय तैनाती संदर्भों के साथ उसके तालमेल पर निर्भर करती है. एआई के इस्तेमाल से मिले अनुभव और हालिया सार्वजनिक बहसें भारत के लिए भी इसी तरह की चिंताएं उठाती हैं. ये चेतावनी देती हैं कि सही प्रशिक्षण डेटा के बिना विकसित एआई प्रणालियां जाति, धर्म, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के हिसाब से कई बार गलत निष्कर्ष देती है. ये भी एक वजह है, जिसके आधार पर भारत में अपने एआई इकोसिस्टम मज़बूत करने की वकालत की जाती है. हालांकि, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने और लागत को कम करने में एआई मदद कर सकता है.
भारत सरकार का इंडियाएआई मिशन एआई क्षमताओं के विकास की नींव रखता है. इसमें बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना, नवाचार, गुणवत्तापूर्ण डेटा तक पहुंच, कौशल विकास और स्टार्टअप वित्तपोषण सहित सात प्रमुख स्तंभ शामिल हैं. पांच साल में 10,371.92 करोड़ रुपये के बजट के साथ, यह स्वास्थ्य सेवा सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर केंद्रित है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कम संसाधन वाले वातावरण के लिए तैयार किए गए एआई उपकरणों पर ज़ोर दिया गया है.
भारत समेत सात एशियाई और अफ्रीकी देशों में 2024 में टीबी की जांच को लेकर एक अध्ययन किया गया. इससे पता चला कि टीबी की जांच के लिए छाती के एक्स-रे का परीक्षण करने वाले एआई उपकरण विभिन्न परिस्थितियों और रोगी समूहों में असमान रूप से काम करते हैं.
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) में भी इसे समर्थन हासिल है. इसका उद्देश्य परस्पर संचालन योग्य स्वास्थ्य डेटा विनिमय, दीर्घकालिक इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और विशिष्ट डिजिटल स्वास्थ्य पहचानकर्ताओं को सक्षम बनाना है. भारत के एकीकृत डिजिटल स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की रीढ़ को मज़बूत करने के लिए आम बजट 2026-27 के तहत 350 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो निरंतर निवेश का संकेत देता है. इसके साथ-साथ, राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा, ई-संजीवनी, निर्णय लेने और उपयोगकर्ता के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए एआई-आधारित क्षमताओं को एकीकृत करने के लिए मंच विकसित किए जा रहे हैं. ये दिखाता है कि डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के भीतर एआई को कैसे समाहित कर सकते हैं.
कंपनी स्तर पर, इनक्यूबेटर्स और एक्सेलेरेटर्स का बढ़ता हुआ नेटवर्क हेल्थ-टेक और हेल्थ-एआई स्टार्टअप्स की मदद कर रहा है. स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम जैसे नवाचार कार्यक्रम इनक्यूबेटरों के माध्यम से फंडिंग प्रदान करते हैं. इतना ही नहीं, इन कार्यक्रमों के ज़रिए हेल्थ-टेक इनोवेटर्स को फंडिंग, मेंटरशिप और बाज़ार में प्रवेश के लिए सहायता दी जाती है. इसके लिए लखनऊ में एसटीपीआई मेडटेक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और आईआईएम बैंगलोर के एनएसआरसीईएल के हेल्थकेयर इनक्यूबेशन प्रोग्राम से समझौते भी किए गए हैं. हालांकि, इनमें से ज़्यादातर चीजें अभी शुरुआती दौर में हैं.
स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई निर्बाध तरीके से काम करे, इसके लिए नियामक मोर्चे पर भी कई कदम उठाए गए हैं. एआई शासन दिशानिर्देश, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम 2023 और स्वास्थ्य सेवा के लिए सूचना सुरक्षा नीति जैसे नियामक ढांचे बनाए गए हैं. केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने भी अक्टूबर 2025 में कुछ गाइडलाइंस बनाई थी. इनके ज़रिए एआई-संचालित सॉफ्टवेयर से संबंधित अस्पष्टता को दूर कर किया गया है. चिकित्सा उपकरण में सॉफ्टवेयर ( सॉफ्टवेयर इन अ मेडिकल डिवाइस) और चिकित्सा उपकरण के रूप में सॉफ्टवेयर (सॉफ्टवेयर एज़ अ मेडिकल डिवाइस) के बीच का अंतर स्पष्ट किया गया है. यह मौजूदा चिकित्सा उपकरण नियमों के ख़तरों की मैपिंग करता है, और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है. यह एआई और मशीन लर्निंग (एमएल) आधारित सॉफ़्टवेयर के लिए एक एल्गोरिदम चेंज प्रोटोकॉल भी पेश करता है. इसके तहत डेवलपर्स को पहले ही ये बताना ज़रूरी है कि ब्लैक-बॉक्स ज़ोखिमों को प्रबंधित करने के लिए एआई मॉडल को कैसे अपडेट किया जाएगा.
इसके अलावा, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जैव चिकित्सा अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा में एआई के इस्तेमाल को लेकर कुछ नैतिक दिशानिर्देश जारी किए गए हैं. ये गाइडलाइंस जवाबदेही, मानवीय निगरानी, समानता, डेटा गोपनीयता और समावेशिता जैसे सिद्धांतों को स्पष्ट करती हैं. हालांकि, ये बाध्यकारी नहीं हैं, संस्थागत समीक्षा के दायरे तक ही सीमित हैं.
इसके समानांतर, भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं स्वास्थ्य एआई प्रणालियों के संचालन में वैश्विक सहयोग की आवश्यकता की बढ़ती मान्यता को दर्शाती हैं. 2023 में दिल्ली में हुए जी-20 सम्मेलन के घोषणापत्र में मानवाधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करते हुए एआई के लिए नवाचार-समर्थक दृष्टिकोण के प्रति समर्थन जताया गया. 2025 में, भारत स्वास्थ्य एआई वैश्विक नियामक इकाई में शामिल हुआ. इसका उद्देश्य साझा शिक्षण, संयुक्त मानकों और उभरते ज़ोखिमों की प्रारंभिक चेतावनियों के माध्यम से सुरक्षा में सुधार करना और जिम्मेदार नवाचार को गति देना है.
फिर भी, 2024 की नैसकॉम रिपोर्ट में पाया गया है कि स्वास्थ्य सेवा सहित अधिकांश क्षेत्र अभी तक एआई की परिपक्वता के शुरुआती चरण में हैं. हालांकि, कई स्वास्थ्य सेवा फर्मों ने प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (पीओसी) परियोजनाएं चलाई हैं, लेकिन उनमें से कुछ चुनिंदा योजनाएं ही उत्पादन में आगे बढ़ी हैं. ये दिखाता है कि एआई नवाचार में अभी कई चुनौतियां हैं. इसी तरह, स्वास्थ्य सेवा में एआई का विनियमन भी अभी प्रारंभिक अवस्था में है. एक बार चिकित्सा उपकरणों की बिक्री के बाद उनकी कमज़ोर निगरानी और जवाबदेही में अस्पष्टता जैसी चुनौतियां बनी हुई है. एआई-आधारित डायग्नोस्टिक पर 2025 के एक अध्ययन में पाया गया है कि मौजूदा कानून यह स्पष्ट नहीं करते हैं कि एआई-टूल्स से इलाज के दौरान गलतियां होने पर क्या किया जाएगा? चिकित्सकों, अस्पतालों, एआई डेवलपर्स और डेटा फिड्यूशरी के बीच जिम्मेदारी कैसे आवंटित की जाएगी? इससे जवाबदेही का अंतर पैदा होता है.
सबको एक समान स्वास्थ्य सेवा का वादा तभी पूरा हो सकता है जब अंतर्निहित डेटा भारत की व्यापक आनुवंशिक और सामाजिक-आर्थिक विविधता को दिखाए. सरकार को भी एबीडीएम के डिजिटल आधार का लाभ उठाते हुए स्थानीय नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए. इसके लिए इंडियाएआई मिशन के अनुरूप उच्च-गुणवत्ता वाले, निष्पक्ष और सुलभ डेटासेट के निर्माण को प्रोत्साहित करना चाहिए. यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एआई उपकरण ना केवल तकनीकी रूप से मान्य हों बल्कि आंकड़ों का सही प्रतिनिधित्व हो.
इसके अलावा, डीपीडीपी अधिनियम 2023 जैसे कानून डेटा गोपनीयता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि एल्गोरिदम संबंधी गलतियों पर. एल्गोरिदम की त्रुटियों और पूर्वाग्रह की वजह से होने वाले नुकसानों को लेकर इस कानून में कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है. भारतीय स्वास्थ्य सेवा में एआई पर शोध संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करता है. इसमें निष्पक्ष आंकड़ों की सीमित उपलब्धता, डेटा गोपनीयता और सहमति के बारे में कम जागरूकता, व्यापक कानूनी और नैतिक मानकों का अभाव शामिल है. अब चुनौती इस ढांचे को परिपक्व बनाने में है, जिससे नवाचार में तेज़ी आए.
जवाबदेही को लेकर मौजूदा अस्पष्टता को दूर करने के लिए कुछ मानदंड स्थापित किए जाने चाहिए. हालांकि, भारत एआई मिशन और आईसीएमआर के नैतिक दिशा निर्देश जैसे ढांचे मूलभूत सिद्धांत प्रदान करते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर नैदानिक उत्पादन की ओर बढ़ने के लिए डेवलपर्स और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं दोनों के लिए स्पष्ट नियम ज़रूरी हैं. तकनीकी एल्गोरिदम त्रुटियों और क्लीनिकल मिसजजमेंट (गलत निर्णयों) के बीच अंतर करके भारत एक सुरक्षित वातावरण बना सकता है. इससे स्टार्टअप्स में नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा, साथ ही ये भी तय होगा कि अगर कोई गलती होती है तो अस्पतालों की क्या जिम्मेदारियां होंगी. रोगियों की सुरक्षा से समझौता किए बिना नवाचार को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक ढांचा प्रदान करना होगा.
एआई की विफलताओं के ज़ोखिम को कम करने के लिए केंद्रीय औषधि संगठन जैसे नियामक प्राधिकरणों को नए मॉडल अपनाने चाहिए. इसमें उच्च जोखिम वाले एआई उपकरणों के लिए बाज़ार में आने के बाद निगरानी को अनिवार्य बनाना शामिल है. इसमें सिस्टम की नाकामियों और अप्रत्याशित परिणामों को रिकॉर्ड करने के लिए एक केंद्रीकृत रजिस्ट्री शामिल हो सकती है. इसका फायदा ये होगा कि विभिन्न जनसांख्यिकीय संकेतकों में एआई प्रदर्शन की वास्तविक दुनिया की निगरानी की जा सकेगी. इस बात को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एल्गोरिथम संबंधी विचलन की वक्त रहते पहचान हो जाए. शहरी केंद्रों से लेकर ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक विस्तार करते समय एआई के प्रणालीगत नुकसान होने से पहले ही उन्हें ठीक किया जाए.
आखिर में यही कहा जा सकता है कि, सबको एक समान स्वास्थ्य सेवा का वादा तभी पूरा हो सकता है जब अंतर्निहित डेटा भारत की व्यापक आनुवंशिक और सामाजिक-आर्थिक विविधता को दिखाए. सरकार को भी एबीडीएम के डिजिटल आधार का लाभ उठाते हुए स्थानीय नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए. इसके लिए इंडियाएआई मिशन के अनुरूप उच्च-गुणवत्ता वाले, निष्पक्ष और सुलभ डेटासेट के निर्माण को प्रोत्साहित करना चाहिए. यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एआई उपकरण ना केवल तकनीकी रूप से मान्य हों बल्कि आंकड़ों का सही प्रतिनिधित्व हो. ऐसा होने पर ही भारत अपने स्वास्थ्य ढांचे को एक भरोसेमंद और समावेशी डिजिटल स्वास्थ्य के वैश्विक मॉडल में बदल सकता है.
निमिषा चड्ढा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Nimisha Chadha was a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. She was previously an Associate at PATH (2023) and has a MSc ...
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