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2022 के संकट में श्रीलंका का हाथ थामकर भारत ने जो भरोसा बनाया था, वह अब डिजिटल और वित्तीय सहयोग के नए दौर में बदल चुका है. आपातकालीन मदद से शुरू हुई यह शुरुआत आज UPI, डिजिटल पहचान और बैंकिंग इंटीग्रेशन तक पहुंचकर साझेदारी का नया मॉडल बना रही है.
साल 2022 में, जब श्रीलंका अपनी आज़ादी के बाद के सबसे बुरे आर्थिक संकट में फंस गया था, तब भारत ने जो किया, वह सिर्फ़ जल्दबाजी में की गई मदद नहीं थी बल्कि द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों में एक नए युग की शुरुआत भी थी. उस समय आर्थिक मदद के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ, अब वह डिजिटल व वित्तीय सहयोग में बदल चुका है, जिससे संबंधों के एक नए दौर की शुरुआत हो चुकी है.
साल 2022 में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था इतनी गिर गई थी, जितनी पहले कभी नहीं हुई थी. जनवरी 2022 के अंत तक उसका विदेशी मुद्रा भंडार घटकर सिर्फ़ 2.36 अरब डॉलर रह बचा था, जो मुश्किल से एक महीने के आयात को संभाल सकता था. महंगाई 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी थी और अप्रैल 2022 में, श्रीलंका को अपने इतिहास में पहली बार 51 अरब डॉलर कर्ज़ के कारण दिवालिया होना पड़ा था. जब वहां तेल की कमी हो गई, बिजली की कटौती ने देश की रफ्तार रोक दी और खाने-पीने वाली वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं, तब भारत एक बड़ा आर्थिक मददगार के रूप में सामने आया.
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने श्रीलंका में भारत की एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) सेवाओं की शुरुआत की।”
भारत ने सहायता के रूप में जो पैकेज दिया, वह असाधारण था. न सिर्फ़ वह बड़े पैमाने पर दिया गया, बल्कि उसमें तेज़ी से कार्रवाई भी की गई. लगभग 4 अरब डॉलर की आपातकालीन सहायता साल 2022 में दी गई. इसमें भारतीय रिजर्व बैंक की सार्क स्वैप सुविधा (अप्रैल 2022 में इसे बढ़ा दिया गया था) के माध्यम से 40 करोड़ डॉलर की मुद्रा विनिमय सुविधा उपलब्ध कराई गई, एशियाई क्लियरिंग यूनियन (ACU) में 51 करोड़ डॉलर की व्यापार देनदारियों को स्थगित किया गया, पेट्रोलियम उत्पादों के लिए 50 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन दी गई, खाने-पीने की वस्तुओं व दवाओं जैसी ज़रूरी चीजों के लिए (भारतीय स्टेट बैंक के माध्यम से) 1 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन दी गई, और उर्वरक आयात के लिए 5.5 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन (भारत के एक्ज़िम बैंक के माध्यम से) भी दी गई.
इस आर्थिक मदद ने श्रीलंका की तात्कालिक सामाजिक-आर्थिक ज़रूरतों को पूरा किया और वहां की आर्थिक स्थिरता व कर्ज़ चुकाने की नई व्यवस्था बनाने (ऋण पुनर्गठन) में एक ज़रूरी मददगार के रूप में भारत की पहचान बनाई. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जनवरी 2023 में कहा भी कि भारत ने श्रीलंका के लिए जो किया है, वह ‘IMF द्वारा दिए गए प्रोत्साहन से कहीं बड़ा है’ और इसके लिए ‘भारत ने किसी दूसरे द्विपक्षीय सहयोगी का इंतज़ार नहीं किया’. असल में, भारत पहला देश था, जिसने श्रीलंका को जनवरी 2023 में IMF कार्यक्रम के मुताबिक द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग का भरोसा दिया, जिससे उसके ऋण पुनर्गठन की देख-रेख करने वाली आधिकारिक ऋणदाता समिति के सह-अध्यक्ष (जापान और फ़्रांस के साथ) के रूप में उसकी भूमिका मज़बूत हुई.
भारत ने श्रीलंका के साथ अपने आर्थिक शर्तों में भी नरमी दिखाई, जैसे 10 करोड़ डॉलर के कर्ज़ को उसने अनुदान में बदल दिया, जिससे अनुदान मद में कुल मदद बढ़कर 78 करोड़ डॉलर हो गई. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अक्टूबर 2024 के अपने श्रीलंका दौरे के दौरान खुद यह एलान किया कि भारत 2 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन को विकास सहायता के तहत अनुदान में बदलने जा रहा है.
उल्लेखनीय यह भी है कि भारत और श्रीलंका के रिश्ते तेज़ी से उस दौर से आगे बढ़कर एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं. इसमें डिजिटल और वित्तीय सहयोग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है.
इस नए चरण का सबसे बड़ा सुबूत फरवरी 2024 में देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने श्रीलंका में भारत की एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) सेवाओं की शुरुआत की. यह एक ऐतिहासिक पहल थी और सिर्फ़ तकनीकी साझेदारी तक सिमटी हुई नहीं थी. यह दोनों देशों के बीच डिजिटल आर्थिक संपर्क को आसान बनाने और लोगों के बीच आपसी जुड़ाव को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता का संकेत था.
“अक्टूबर 2023 तक, इस डिजिटल सम्मिलन का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया और LANKAQR कोड स्कैन करने में PhonePe जैसे भारतीय पेमेंट ऐप के इस्तेमाल को लेकर साझेदारी हो गई।”
अक्टूबर 2023 तक, इस डिजिटल सम्मिलन का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया और LANKAQR कोड स्कैन करने में PhonePe जैसे भारतीय पेमेंट ऐप के इस्तेमाल को लेकर साझेदारी हो गई. मई 2024 से PhonePe ने सीमा पार UPI की सुविधा शुरू कर दी, और भारतीय उपयोगकर्ताओं को LANKAQR कोड का इस्तेमाल करके श्रीलंका में 4,50,000 से ज़्यादा व्यापारिक स्थानों पर भुगतान करने की सुविधा मिल गई.
उल्लेखनीय है कि हर साल 4,00,000 से ज़्यादा भारतीय पर्यटक श्रीलंका जाते हैं. उनके लिए UPI-आधारित भुगतान एक जाना-पाना और पेमेंट का आसान तरीका है. वहां यह सुविधा शुरू हो जाने से करेंसी एक्सचेंज की परेशानी और लेन-देन संबंधी शुल्क से उनको मुक्ति मिल गई है. यह सुविधा पर्यटन के दौरान ख़र्च बढ़ाने में भी मदद करती है और भारतीय पर्यटकों को श्रीलंका घूमने के लिए प्रोत्साहित करती है.
UPI-LankaPay की यह साझेदारी बता रही है कि दक्षिण एशिया में भारत डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की अपनी दक्षता को किस हद तक बढ़ाने में सक्षम है.
यूपीआई सम्मिलन की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, भारत और श्रीलंका ने राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की दिसंबर 2024 की भारत यात्रा के दौरान एक व्यापक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) साझेदारी पर सहमति जताई. पद ग्रहण करने के बाद दिसानायके की वह पहली विदेश यात्रा थी. दौरे के अंत में एक साझा बयान भी जारी किया गया, जिसमें विशिष्ट डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान और व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था परियोजनाओं में आपसी सहयोग का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया गया. नई दिल्ली में राष्ट्रपति दिसानायके ने भारत-श्रीलंका व्यापार मंच की बैठक में आईटी और स्टार्टअप क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों को भी संबोधित किया.
डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) सहयोग की बुनियाद श्रीलंका विशिष्ट डिजिटल पहचान (SLUDI) परियोजना है, जिसके लिए भारत ने 450 करोड़ रुपये (करीब 5 करोड़ डॉलर) का अनुदान दिया है. इसका मक़सद भारत के ‘आधार’ कार्यक्रम की तरह एक आधारभूत डिजिटल पहचान प्रणाली बनाना है, क्योंकि आधार से एक अरब से अधिक भारतीय जुड़े हैं और इसने सरकारी योजनाओं के वितरण व वित्तीय समावेशन का स्वरूप ही बदल दिया है. SLUDI से श्रीलंका के लोगों तक सरकारी सेवाओं को पहुंचाने में मदद मिलने की उम्मीद है. हालांकि, इसको लेकर आम लोग ही नहीं, कुछ सरकारी विभागों में भी निजता संबंधी चिंता है. श्रीलंका के ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ रजिस्ट्रेशन ऑफ़ पर्सन’ ने डिजिटल मंत्रालय को एक डोजियर भेजा है, जिसमें उसने 22 चिंताओं का ज़िक्र किया है. ये चिंताएं मुख्य रूप से SLUDI तंत्र के विकास, कार्यान्वयन और रख-रखाव में विदेशी संस्था की भूमिका (इसे ‘मास्टर सिस्टम इंटीग्रेटर’ की भूमिका कहा जाता है) से संबंधित हैं.
इस तरह की चिंताएं इसलिए पैदा हुई हैं, क्योंकि भारत अपने तकनीकी ढांचे, विशेष रूप से आधार-आधारित मॉडल को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकास में भी इस्तेमाल कर रहा है. चूंकि भारत में इसको लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं और निजता, डेटा सुरक्षा, कार्यक्षमता में वृद्धि व डिजिटल पहचान जैसे मुद्दों पर यहां लगातार बहस होती रही है, इसलिए जब यह मॉडल कमज़ोर कानूनी व संस्थागत सुरक्षा उपायों के साथ इन देशों में उपयोग किया जाएगा, तो ये कमज़ोरियां और भी साफ़-साफ़ नज़र आ सकती हैं. भारत में जिस तरह की डिजिटल क्षमता और शासकीय तैयारी है, वैसी हमारे सहयोगी देशों में नहीं है. इसीलए भी इस तरह के असंतुलन के कारण शासन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं, जिनको DPI हल करना चाहता है.
हालांकि, लगता यही है कि डिजिटल पहचान परियोजना से आगे भी DPI सहयोग बना रहेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत ने 1,500 श्रीलंकाई नौकरशाहों को ई-गवर्नेंस और डिजिटल बदलाव के बारे में प्रशिक्षित करने के साथ-साथ सरकारी ई-मार्केटप्लेस व ‘पीएम गति शक्ति’ प्लेटफॉर्म सहित तकनीकी तंत्र में दक्ष बनाने की प्रतिबद्धता जताई है. एक संयुक्त कार्य समूह का भी गठन किया गया है, जो श्रीलंका में भारत के DPI स्टैक को लागू करने के तरीकों का पता लगाएगा. संभव है कि वहां के सरकारी तंत्र में डिजिलॉकर डॉक्यूमेंट मैनेजमेंट सिस्टम को भी अपनाया जाए.
“डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) सहयोग की बुनियाद श्रीलंका विशिष्ट डिजिटल पहचान (SLUDI) परियोजना है, जिसके लिए भारत ने 450 करोड़ रुपये का अनुदान दिया है।”
डिजिटल क्षेत्र में बढ़ता आपसी सहयोग दोनों देशों के G2G रिश्तों (सरकार से सरकार की पहल) में हो रहे एक ख़ास तरह के सुखद बदलाव का संकेत देता है, जो अनुदान वाली आम साझेदारियों से अलग है.
श्रीलंका के साथ भारत अपनी मुद्रा (रुपया) के अंतर्राष्ट्रीयकरण का प्रयास भी आगे बढ़ा रहा है. इस साल की शुरुआत में, श्रीलंका और भारत के अधिकारियों ने अपनी-अपनी मुद्राओं (INR और LKR) में व्यापारिक भुगतान बढ़ाने पर चर्चा की थी. उस समय इसको लेकर एक बैठक हुई थी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने श्रीलंकाई बैंकिंग और कॉर्पोरेट क्षेत्र के लोगों के सामने भारतीय रिजर्व बैंक के समग्र सुधारों व रुपया को अंतरराष्ट्रीय बनाने के चल रहे प्रयासों की जानकारी दी थी. 2022 के अंत में, श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने भारतीय मुद्रा को ‘नामित विदेशी मुद्रा’ (भारतीय रिजर्व बैंक की सहमति से) के रूप में स्वीकार कर लिया, जिससे बैंकिंग लेन-देन आसान हो गया और छोटे व्यापारियों की लागत कम हो गई. कम से कम छह श्रीलंकाई बैंकों ने भारतीय रुपये में मुद्रा रखने के लिए नोस्ट्रो अकाउंट बनाए हैं, जिससे भारतीय व्यापारियों के साथ आर्थिक लेन-देन आसान हो गया है. 2024 और 2025 के दौरान, श्रीलंकाई बैंकों ने अपनी अतिरिक्त विदेशी मुद्रा भारतीय बैंकों (जैसे भारतीय स्टेट बैंक) और कंपनियों को ‘सिंडिकेट लोन’ के तहत उपलब्ध कराना शुरू कर दिया. कुछ बैंक तो भारतीय रुपये में मूल्यवर्गित कर्ज़ की सुविधा देकर और GIFT सिटी (गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी) के सहयोग से बॉन्डों को अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंजों में सूचीबद्ध करके भारत से पूंजी जुटाने पर भी विचार कर रहे हैं.
बढ़ता हुआ यह व्यापारिक वित्त संबंध दोनों देशों के आपसी व्यापार को और बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है. संकट और आर्थिक मंदी के बावजूद, भारत और श्रीलंका के बीच द्विपक्षीय कारोबार बढ़ा है. भारत आज भी श्रीलंका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और 2023-24 में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़कर 5.5 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है. इसमें भारत ने 4.1 अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों का निर्यात किया, तो श्रीलंका ने 1.42 अरब डॉलर मूल्य के उत्पाद भारत भेजे.
दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता (ISFTA) भी करीब 25 वर्षों से लागू है, हालांकि सेवाओं और निवेश को बचाने के लिए इस समझौते को व्यापक बनाने के प्रयास अब तक सफल नहीं हो सके हैं. अक्टूबर 2003 में भारत-श्रीलंका व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) पर एक साझा अध्ययन की शुरुआत हुई थी, जब दोनों पक्षों के विशेषज्ञों के प्रतिष्ठित समूह ने एक गहरी व व्यापक साझेदारी की दिशा में रास्ता तैयार किया था. तब से अब तक 22 साल हो गए हैं और बीच में CEPA पर बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन श्रीलंका के निजी क्षेत्र की कुछ कंपनियों ने राष्ट्रहित के बजाय अपने हितों को अधिक महत्व दिया और श्रीलंका की सरकारों में राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति की भी कमी रही. नतीजतन, यह बातचीत अधर में लटक गई. सिरिसेना-विक्रमसिंघे सरकार ने 2015-16 में इन प्रयासों में नई जान फूंकने का प्रयास किया व आर्थिक और प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते (ETCA) पर बातचीत शुरू की. ETCA वास्तव में CEPA का ही नया रूप है, लेकिन इसमें वस्तुओं के व्यापार से आगे बढ़कर सेवाओं, निवेश और आर्थिक सहयोग की चर्चा भी की गई है.
ETCA पर बातचीत पिछले तीन प्रधानमंत्रियों के शासन-काल से चल रही है और अब तक 14 दौर की वार्ताएं (जिनमें से अंतिम जुलाई, 2024 में हुई) हो चुकी हैं. इस बातचीत में सीमा शुल्क के अलावा अन्य तरीकों से व्यापार में आ रही रुकावटों को कम करने की दिशा में सार्थक प्रगति भी हुई है ( जैसे- 2018 में मानकों की पारस्परिक मान्यता व प्रयोगशालाओं की मान्यता के संदर्भ में), लेकिन एक पूर्ण और अंतिम समझौता अब तक नहीं हो सका है.
पहले के समय में ETCA को लेकर हितधारकों का काफ़ी विरोध था, लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं. श्रीलंका के आर्थिक संकट और वैश्विक व्यापार तनावों ने उसके निजी क्षेत्र को नरम रुख़ अपनाने पर मजबूर किया है. वे गैर-पश्चिमी आर्थिक साझेदारियों को मज़बूत करने की ज़रूरत समझने लगे हैं. ऐसे में, एक व्यापक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर होने से सेवा, निवेश, वित्त और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में पहले से ही सुधर रहे संबंधों को और मज़बूती मिल सकेगी, और उनको तेज़ी से आगे बढ़ाया जा सकेगा.
व्यापार समझौता न होने के बावजूद, दोनों देशों के बीच निजी क्षेत्रों के बीच निवेश और कारोबारी संबंध बढ़ रहे हैं. भारत की कुछ बड़ी कंपनियों ने हाल के वर्षों में श्रीलंका में निवेश किया है, जो बंदरगाह टर्मिनलों और ऑटोमोबाइल से लेकर लेजर और आईटी क्षेत्र तक किए गए हैं. महिंद्रा समूह ने यहां के आइडियल मोटर्स के साथ गाड़ी के लिए असेंबली प्लांट (महिंद्रा आइडियल मोटर्स) लगाने के लिए एक साझेदारी की है, और गैर-बैंक वित्त सेवा फर्म (महिंद्रा आइडियल फाइनेंस) में निवेश किया है. भारतीय कॉरपोरेट ITC ने कोलंबो में एक प्रमुख तट पर साझेदारी में अपना पहला विदेशी होटल खोला है. भारतीय आईटी सेवा की दिग्गज कंपनी HCL टेक्नोलॉजीज ने श्रीलंका में एक सेवा केंद्र स्थापित किया है और – विवादास्पद रूप से- इसे 'रणनीतिक विकास परियोजना’ का दर्जा भी मिल गया है. वेंचर कैपिटल फ़ंडिंग में भी आपसी रिश्ता आगे बढ़ा है. लंकन एंजेल नेटवर्क और इंडियन एंजेल नेटवर्क के बीच सहयोग हुआ है, और कुछ भारतीय निवेशकों ने श्रीलंकाई तकनीकी स्टार्टअप में इक्विटी हिस्सेदारी भी ली है.
“श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने भारतीय मुद्रा को ‘नामित विदेशी मुद्रा’ के रूप में स्वीकार कर लिया, जिससे बैंकिंग लेन-देन आसान हो गया और छोटे व्यापारियों की लागत कम हो गई।”
दोनों देशों के बीच व्यापारिक संपर्क लगातार बना हुआ है. भारत के दो सबसे बड़े चैंबर (CII और FICCI) और श्रीलंका के सीलोन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के बीच रिश्ता लगातार मज़बूत हो रहा है, साथ ही कोलंबो स्थित भारत-श्रीलंका बिजनेस कौंसिल और भारतीय सीईओ फोरम जैसे मंचों के साथ भी बिजनेस-टु-बिजनेस जुड़ाव बना हुआ है. हाल ही में CII और CCC ने व्यापारिक रिश्तों को मज़बूत बनाने के लिए कोलंबो में एक ‘सीईओ राउंडटेबल’ का आयोजन भी किया. एक नवगठित व्यापारिक समूह- लंका इंडिया बिजनेस एसोसिएशन (LIBA)- रणनीतिक सलाहें देकर और व्यावहारिक मार्गदर्शन करके भारत में श्रीलंकाई व्यवसायों को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है.
कुछ व्यापारिक संगठन, जो अब तक भारत के प्रति नकारात्मक रुख़ बनाए हुए थे, अब नरम पड़ने लगे हैं और आपसी सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखाने लगे हैं. इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम चैंबर ऑफ़ यंग लंकन एंटरप्रेन्योर्स (COYLE) का है, जिसके नेतृत्व ने पहले भारत के साथ आर्थिक संबंधों का कड़ा विरोध किया था और ETCA (और इसके पहले वाले CEPA) की कड़ी आलोचना की थी. मगर अब ऐसा लगता है कि वह भारत सहित सभी देशों के साथ द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों की अहमियत समझने लगा है. 2024 में, इस समूह ने भारतीय उच्चायुक्त के साथ बंद कमरे में एक बैठक भी की थी.
भारत की ‘पड़ोस प्रथम’ की नीति के कारण 2022 से 2025 तक भारत-श्रीलंका द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में जो तेज़ी आई है, वह दक्षिण एशिया सहयोग का एक दिलचस्प उदाहरण है.
आर्थिक संकट के दौरान आपातकालीन आर्थिक सहायता के रूप में शुरू हुआ यह रिश्ता डिजिटल भुगतान, बैंकिंग संपर्क और डिजिटल बुनियादी ढांचे के रूप में बढ़ते हुए एक अधिक मज़बूत साझेदारी में बदल चुका है. एक व्यापक व्यापार और आर्थिक समझौते पर भले ही अब तक हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच कारोबारी संबंध बढ़ता दिख रहा है. यह शायद इस बात का संकेत है कि 21वी सदी में, द्विपक्षीय आर्थिक संबंध को मज़बूत करने में डिजिटल संपर्क और आर्थिक जुड़ाव ठीक उसी तरह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिस तरह पारंपरिक व्यापार और निवेश.
निश्चय ही, इसमें राजनीतिक हालात भी मायने रखते हैं. श्रीलंका में सितंबर 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में अनुरा कुमारा दिसानायके को सत्ता मिली, जो पिछली सरकारों से अलग वैचारिक झुकाव वाले गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं. हालांकि, उनकी पहली भारत यात्रा (दिसंबर 2024 में) के दौरान जारी किए गए संयुक्त बयान में पूर्व की सरकार से अलग शायद ही कुछ कहा गया. इससे पता चलता है कि दोनों देशों की साझेदारी में निरंतरता बनी रहेगी, और श्रीलंका की आर्थिक संभावनाओं में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका कायम रहेगी. अभी जिस तरह के डिजिटल और वित्तीय सम्मिलन के काम हो रहे हैं, उनसे संस्थागत व व्यावसायिक संबंध बन रहे हैं और एक-दूसरे पर तकनीकी व आर्थिक निर्भरताएं भी बढ़ रही हैं. इनसे अब अलग होना मुश्किल है और राजनीतिक बदलावों के बाद भी इनके बने रहने की संभावना ही अधिक है.
(अनुष्का विजेसिंहा कोलंबो में रहने वाले अर्थशास्त्री हैं और सार्वजनिक नीति की दिशा में काम करने वाले थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर ए स्मार्ट फ्यूचर’ (CSF) के निदेशक हैं)
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Anushka Wijesinha is an Economist based in Colombo and is Director of public policy think tank Centre for a Smart Future (CSF). He is also ...
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