Expert Speak Raisina Debates
Published on Nov 28, 2025 Updated 0 Hours ago

श्रीलंका में तमिलों की ज़मीन और अधिकारों को लेकर नई पहल भारत की नीति के लिए अहम मोड़ ला रही है. अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार की सुधारों की राह भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों पेश करती है.

अनुरा दिसानायके का खेल: क्या भारत को मिला तमिलों के लिए सुनहरा मौका?

11 नवंबर 2025 को श्रीलंका सरकार ने तमिलों के दबदबे वाले प्रांतों में निजी स्वामित्व वाली ज़मीनों को मुक्त करने के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक की. गृह युद्ध की समाप्ति के समय से ये ज़मीनें सेना के इस्तेमाल मे हैं. ये मुद्दा विवादित है और अतीत की सरकारों ने आंशिक रूप से ही अपने इस वादे को लागू किया था. लेकिन ज़मीनों से कब्ज़ा छोड़ना राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके (AKD) का एक बड़ा चुनावी वादा था. जनता विमुक्ति पेरामुना (सिंहली-मार्क्सवादी पार्टी जो एक समय में किसी भी तरह की संघीय मांग के ख़िलाफ़ थी) के नेतृत्व वाली मौजूदा गठबंधन सरकार मेलजोल और गैर-भेदभावपूर्ण राजनीति पर ज़ोर दे रही है. व्यावहारिकता की इस चुटकी ने भारत को सार्वजनिक रूप से तमिल मुद्दे पर मौजूदा सरकार को फटकार लगाने या दबाव डालने से रोका है. AKD में भारत को तमिल हितों को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविक प्रतिबद्धता दिखती है. लेकिन घरेलू राजनीति और बुनियादी चुनौतियां AKD के सुधार के एजेंडे और भारत की व्यावहारिक नीति के सामने कठिनाई पेश करती रहेंगी. 

  • श्रीलंका की नई ज़मीन पहल भारत के लिए अहम मोड़ है.
  • 11 नवंबर 2025 को ज़मीनों की मुक्ति पर उच्च स्तरीय बैठक हुई.
  • यह विवादित मुद्दा रहा है; पहले वादे आंशिक रूप से ही पूरे हुए.

 तमिल मुद्दे पर भारत का व्यावहारिक रवैया 

1948 में अपनी स्वतंत्रता के समय से ही श्रीलंका में तमिलों से किया जाने वाला व्यवहार भारत के हितों के लिए एक बड़ा मुद्दा रहा है. भारत की दो मांगें रही हैं: पहली, ये सुनिश्चित किया जाए कि एक निश्चित स्वायत्तता और अधिकारों के साथ तमिल श्रीलंका की व्यापक राजनीति में जुड़े रहें और दूसरी, श्रीलंका की सरकार तमिलों के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा हिंसा या भेदभाव का सहारा नहीं ले. 80 के दशक में गृह युद्ध शुरू होने के साथ भारत ने एक कठोर रवैया अपनाते हुए सरकार को 13वां संशोधन लागू करने के लिए कहा जिससे प्रांतों को अधिक संघीय ताकत और स्वायत्तता मिल जाती. लेकिन 90 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद भारत ने हस्तक्षेप नहीं करने का रुख अपनाया. अंतिम ईलम युद्ध (2006-2009) के दौरान भारत ने बहुत ज़्यादा ताकत का इस्तेमाल करने के लिए श्रीलंका की सरकार की आलोचना की लेकिन इसके साथ-साथ गृह युद्ध समाप्त करने के लिए खुफिया जानकारी और मदद भी मुहैया कराई. 

“AKD में भारत को तमिल हितों को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविक प्रतिबद्धता दिखती है.”

श्रीलंका की सरकार के द्वारा ताकत के उपयोग, इस मुद्दे पर भारत के दोहरे रवैये और पश्चिमी देशों के दबाव ने चीन को यहां अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया. युद्ध ख़त्म होने तक चीन ने श्रीलंका को बहुत अधिक वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं की पेशकश की. इससे भारत को ये समझ में आया कि जितना अधिक वो विजेता सरकार पर दबाव डालेगा, उतना ही वो श्रीलंका के अभिजात वर्ग और बहुसंख्यक समुदाय से ख़ुद को दूर करेगा और इस तरह चीन के लिए जगह बनेगी. युद्ध की समाप्ति का ये अर्थ भी था कि श्रीलंका की सरकार इस मुद्दे पर एकमात्र हितधारक है जिससे भारत की भागीदारी आवश्यक हो गई. 2014 में संसद में मोदी सरकार के बहुमत ने भी श्रीलंका से संबंधों को घरेलू राजनीति और तमिल पार्टियों की लॉबिंग से अलग किया. भारत सरकार ने जहां तमिलों के साथ सुलह पर ज़ोर देना जारी रखा, वहीं अभी तक तमिलनाडु की राजनीति से ये कम प्रभावित है. 

“भारत की दो मांगें रही हैं: पहली, ये सुनिश्चित किया जाए कि एक निश्चित स्वायत्तता और अधिकारों के साथ तमिल श्रीलंका की व्यापक राजनीति में जुड़े रहें और दूसरी, श्रीलंका की सरकार तमिलों के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा हिंसा या भेदभाव का सहारा नहीं ले.”

 

कुछ हद तक तमिल समुदाय को फिर से जोड़ने और कुछ हद तक अंतर्राष्ट्रीय (भारत समेत) जांच-पड़ताल से बचने के लिए बाद में श्रीलंका की सरकारों ने कई कदम उठाए जैसे कि सबक और सुलह आयोग, लापता लोगों पर कार्यालय, मुआवज़ा कार्यालय और राष्ट्रीय एकता एवं सुलह कार्यालय. इसके बावजूद बड़ी राजनीतिक कीमत चुकाने की आशंका के कारण फिर से एकीकरण या जवाबदेही को लेकर वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए. युद्ध में विजेता बनकर उभरे बौद्ध भिक्षुओं, सेना, राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से और यहां तक कि आम लोगों को भी इस बात की ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि तमिलों के साथ समझौता किया जाए या उन्हें मुआवज़ा दिया जाए. इसके परिणामस्वरूप भारत की आपत्तियों और चिंताओं के बावजूद श्रीलंका के नेताओं ने सेना और राजनीतिक अभिजात वर्ग को जांच से बचाया, प्रांतीय चुनावों में देरी की और 13वें संशोधन के पूरी तरह कार्यान्वयन को टाला. 

बदलाव की हवा 

लेकिन JVP-NPP की नई सरकार ने तमिल मुद्दे पर भारत के लिए बेहद ज़रूर उम्मीद जगाई है. इसका पहला कारण ये है कि भारत ने पूर्व की सरकारों से भी बातचीत की थी लेकिन सार्थक पुन: एकीकरण में बहुत कम प्रगति देखी गई. श्रीलंका के पारंपरिक रूप से अभिजात वर्ग और उनके खोखले वादों से भारत के मोहभंग के साथ-साथ घरेलू स्तर पर उनकी अलोकप्रियता और बुनियादी सुधारों की मांग में भी बढ़ोतरी हुई. इसलिए AKD की जीत ने भेदभाव से मुक्त राजनीति के संकल्प के साथ बुनियादी सुधारों की शुरुआत करने का एक नया अवसर प्रदान किया. इस तरह भारत को इंतज़ार करने और नज़र रखने के लिए प्रेरित किया गया. संसदीय चुनावों के दौरान तमिल प्रांतों में JVP के प्रदर्शन से इसकी और अधिक पुष्टि हुई जो पूरे देश में पार्टी की अपील के बारे में बताता है. 

भारत की उम्मीद का दूसरा कारण ये है कि JVP के नेतृत्व वाली सरकार अतीत की सरकारों की तरह सरकार के नियंत्रण वाली सोच और विचारधारा नहीं दिखाती है. वो बिना किसी खेद के अपनी विचारधारा और उग्रवाद के इतिहास के करीब बनी हुई है. वास्तव में राष्ट्रपति और उनकी पार्टी ने पिछले दिनों नवंबर हीरोज़ की 36वीं सालगिरह मनाई और अपने दो विद्रोहों (1971 और 1987-89) के दौरान श्रीलंका की सेना और सरकार के द्वारा मारे गए सदस्यों को याद किया. इसलिए सरकार तमिल मुद्दे को सहानुभूति की भावना से देखती है, विशेष रूप से ये देखते हुए कि सरकार प्रायोजित हिंसा का असर तमिलों और JVP पर एक समान पड़ा था. उदाहरण के लिए, JVP के दूसरे विद्रोह के दौरान ही अनाधिकारिक अनुमानों के अनुसार 60,000-80,000 लोगों की हत्या की गई और 20,000 लोग लापता हो गए. सरकार ने पहली बार 1998 के बटालांडा आयोग की रिपोर्ट भी पेश की जिसमें JVP के कैडर के मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया गया है और जवाबदेही की मांग की गई है. 


“बदलाव की हवा … AKD की जीत ने भेदभाव से मुक्त राजनीति के संकल्प के साथ बुनियादी सुधारों की शुरुआत करने का एक नया अवसर प्रदान किया.”


भारत की उम्मीद का तीसरा कारण है श्रीलंका की मौजूदा सरकार के द्वारा राजनीति के केंद्र में सुधारों को रखना. वो सावधानी से ऐसी छवि बना रही है जो उसे पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करती है. सरकार दावा करती है कि अतीत के युद्ध की साज़िश उन नेताओं के द्वारा रची गई थी जिन्होंने सत्ता बनाए रखने और अपने मतदाताओं के आधार को मज़बूत करने के लिए चरमपंथ, संघर्ष और नस्लवाद का फायदा उठाया. इसे देखते हुए सरकार का लक्ष्य अतीत से ख़ुद को अलग करना और एक शांतिपूर्ण एवं सह-अस्तित्व वाले श्रीलंका का पुनर्निर्माण करने और उसका विकास करने के लिए एक व्यापक रोडमैप पेश करना है. AKD ने सत्ता के विकेंद्रीकरण, जवाबदेही, न्याय, मौजूदा प्रणाली को ख़त्म करने, प्रांतीय चुनावों, विसैन्यीकरण, ज़मीन की वापसी और नए संविधान का मसौदा तैयार करने का वादा किया है. इस तरह तमिल मुद्दे को लेकर भारत की चिंताओं को काफी हद तक ध्यान में रखा है. उन्होंने कठोर आतंकवाद विरोधी अधिनियम को बदलने और लापता लोगों, मुआवज़ा एवं सुलह से संबंधित मौजूदा संस्थानों/कार्यालयों को मज़बूत करने का भी वादा किया है.

जो कहा वो करके दिखाया? 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क (जिन्होंने जून 2025 में श्रीलंका का दौरा किया था) ने समावेशिता को लेकर चर्चा में उल्लेखनीय बदलाव के बारे में बताया. दूसरी सड़कों समेत जाफना-पलाली सड़क भी खुल गई है और तमिलों को ज़मीन लौटाने एवं युद्ध प्रभावित क्षेत्र में बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के मुद्दे पर नियमित बैठकें हो रही हैं. सरकार ने बिना किसी दखल के चेम्मनी सामूहिक कब्र की खुदाई का समर्थन जारी रखा है और सत्य एवं सुलह आयोग (ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन) की स्थापना को लेकर प्रतिबद्ध है. इसी प्रगति की वजह से भारत ने काफी हद तक वर्तमान सरकार के साथ अपने किसी भी साझा बयान में 13वें संशोधन का ज़िक्र करने से परहेज किया है. इसका एकमात्र अपवाद विदेश मंत्री का पहला दौरा और नई सरकार के साथ बातचीत है. इसके बावजूद भारतीय नेतृत्व ने तमिल नेताओं के साथ संबंध बरकरार रखे हैं और उनके साथ नियमित बैठकें की हैं. साथ ही भारतीय नेतृत्व ने सरकार से तमिल आकांक्षाओं को पूरा करने (बिना तरीका बताए) पर भी ज़ोर दिया है. 

“AKD ने सत्ता के विकेंद्रीकरण, जवाबदेही, न्याय, मौजूदा प्रणाली को ख़त्म करने, प्रांतीय चुनावों, विसैन्यीकरण, ज़मीन की वापसी और नए संविधान का मसौदा तैयार करने का वादा किया है.”

 

भारत के व्यावहारिक लेकिन सतर्क रवैये पर श्रीलंका की व्यापक बुनियादी और राजनीतिक चुनौतियों का भी असर है. प्राथमिक रूप से श्रीलंका का समाज और राजनीति अभी भी काफी हद तक बंटी हुई है. हालांकि अरगालया (2022 में सरकार के ख़िलाफ़ जन आंदोलन) के बाद से जवाबदेही और समानता की मांग बढ़ी है लेकिन ये देखना बाक़ी है कि समाज और राजनीति इन बदलावों को कैसे स्थान देती है. सामान्य रूप से सिंहली राजनीतिज्ञ, बौद्ध भिक्षु और कट्टरपंथी अभी भी ख़ुद को गृह युद्ध के विजेता के रूप में देखते हैं. तमिल दबदबे वाले क्षेत्रों में मंदिर बनाने का इरादा रखने वाले बौद्ध भिक्षुओं के बीच बार-बार विवाद होता रहता है. एक सामूहिक कब्र की जगह पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के दौरे और UNHRC के द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त के कार्यालय के क्षेत्राधिकार का विस्तार करने के हाल के प्रस्ताव ने भी जवाब देने में सरकार की बहुत कम इच्छा के ख़िलाफ़ घरेलू आलोचनाओं को जन्म दिया है.

इसके अलावा सेना को भी ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल है. इस तरह जवाबदेही को लेकर कोई भी प्रयास मुश्किल हो जाता है. संस्थाएं व्यापक पैमाने पर विसैन्यीकरण को लेकर भी चिंतित हैं जिससे सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है. 2019 के ईस्टर धमाके के दौरान ये देखा भी गया था. वास्तव में लापता लोगों के परिवार के सदस्यों की निगरानी, धमकी एवं उत्पीड़न और सेना के द्वारा तमिल युवकों की पिटाई तथा उनके अपहरण के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं. राजनीतिक रूप से भी देखें तो सरकार को जहां लोकप्रियता हासिल है, वहीं साझा विपक्ष से उसे अधिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है. पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की गिरफ्तारी ने राजनीतिक दलों को और एकजुट कर दिया है और लोकतांत्रिक पतन एवं बदले की राजनीति को लेकर चर्चा फिर से शुरू हो गई हैं. दूसरी तरफ तमिल पार्टियां अभी भी JVP को संदेह की नज़र से देख रही हैं और उसे बहुसंख्यक सिंहली राजनीति का विस्तार मानती हैं. 

ये राजनीतिक, बुनियादी और सामाजिक फैक्टर श्रीलंका की सरकार में गहराई से समाए हुए हैं. ज़बरदस्त दमन और सुधारों एवं जवाबदेही की मांग की बड़ी कीमत सरकार को चुकानी पड़ सकती है, विशेष रूप से धार्मिक एवं राजनीतिक अभिजात वर्गों और कुछ ख़ास सरकारी संस्थानों को एकजुट करके. AKD के द्वारा इन ताकतों को संतुलित करने की ज़रूरत काफी हद तक सुधारों की क्षमता और प्रकृति को तय करेगी. वैसे तो AKD तमिल मुद्दे पर भारत और श्रीलंका की सर्वश्रेष्ठ उम्मीद बने हुए हैं लेकिन बुनियादी मुद्दे और घरेलू राजनीति, सुधारों को लेकर उनकी क्षमता और इस तरह तमिल मुद्दे पर श्रीलंका को लेकर भारत की नीति भी काफी हद तक निर्धारित करेंगी.

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