Author : Ashraf Nehal

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jul 19, 2025 Updated 0 Hours ago

कैरेबियाई देशों में कौशल, मंच और साझा नवाचार प्रदान करके भारत खुद को सह-विकासकर्ता के रूप में स्थापित कर रहा है. कैरेबियन द्वीप के देशों के साथ भारत के पुराने भावनात्मक संबंध रहे हैं. अब वो इसमें रणनीतिक गहराई भी ला रहा है.

प्रवासी जुड़ाव से रणनीतिक साझेदारी तक: कैरेबियन में भारत की वापसी!

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई 2025 में त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर गए. 26 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ये पहली त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा थी. इतना ही नहीं उनका ये दौरा कैरेबियन द्वीपसमूह में भारत की उच्च-स्तरीय कूटनीति की उल्लेखनीय वापसी का प्रतीक था. इस दौरान त्रिनिदाद ने पीएम मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया. समारोह की औपचारिक भव्यता के अलावा, इस यात्रा ने एक और सूक्ष्म लेकिन गंभीर पहलू को भी उजागर किया. ये पहलू है ग्लोबल साउथ के प्रति एक नया भारतीय दृष्टिकोण. एक ऐसा दृष्टिकोण जहा इतिहास और रणनीति अब समानांतर नैरेटिव नहीं, बल्कि एक-दूसरे से मिला है.

बंधुआ मजदूरी, प्रवासी भारतीयों और हार ना मानने के जज़्बे से परिभाषित यादों के इस साझा क्षेत्र में यानी कैरेबियन में भारत को ना सिर्फ एक भावनात्मक सहारा मिला, बल्कि एक भू-राजनीतिक सेतु भी मिला. सोहारी के पत्तों पर परोसा जाने वाला पारंपरिक रात्रिभोज सांस्कृतिक मेहमाननवाज़ी से कहीं अधिक का प्रतीक था. ये उस देश की ओर से मान्यता का एक संकेत था जिसके भारतीय मूल के नागरिक अब शासन, पहचान और कूटनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं.

 मई 2025 में, सांसद शशि थरूर के नेतृत्व में एक सर्वदलीय भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भी गुयाना यात्रा पर आया था. इसी दौरान गुयाना अपना 59वां स्वतंत्रता दिवस भी मना रहा था. हालांकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल की उस यात्रा को ऑपरेशन सिंदूर के व्यापक संदर्भ में देखा गया.

सांस्कृतिक परिचय की वजह से कैरेबियन द्वीपों में अब तक भारत की सॉफ्ट पावर ही दिखती थी, लेकिन अब ये क्षेत्र धीरे-धीरे एक रणनीतिक मोर्चा भी बनता जा रहा है. इस बात को देखते हुए भी ये महत्वपूर्ण है कि भारत के प्रतिद्वंद्वी देश भी अब कैरेबियन में अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं. नवंबर 2024 में गुयाना में दूसरा भारत-कैरिकॉम शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया. किसी भी कैरिकॉम देश में आयोजित ये अपनी तरह का पहला शिखर सम्मेलन था. ये भारत की विकसित होती ग्लोबल साउथ रणनीति का प्रतीक था. ग्रेनाडा के प्रधानमंत्री डिकॉन मिशेल और गुयाना के राष्ट्रपति इरफ़ान अली समेत कई क्षेत्रीय नेताओं ने इस सम्मेलन में भागीदारी की. इस शिखर सम्मेलन ने ऐतिहासिक समानताओं को विकासात्मक साझेदारियों में बदलने में आपसी रुचि को दर्शाया.

दूसरे भारत-कैरिकॉम शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सात स्तंभों (पिलर) वाला कैरिकॉम एजेंडा पेश किया गया. ये एजेंडा डिजिटल बुनियादी ढांचे, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, स्वास्थ्य सेवा, समुद्री अर्थव्यवस्था और युवा जुड़ाव जैसी क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. पारंपरिक वित्तीय दाताओं के विपरीत, भारत ने कैरेबियन में खुद को एक सह-विकासकर्ता के रूप में स्थापित किया है. भारत ने इन देशों को  यूपीआई और डिजिलॉकर जैसे प्लेटफॉर्म, 1,000 से ज़्यादा नई आईटीईसी छात्रवृत्तियां और सहयोगी तकनीकी समाधान प्रदान किए. इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण बेलीज़ में एक डिजिटल प्रशिक्षण केंद्र के लिए भारत का समर्थन था. इस प्रशिक्षण केंद्र का उद्देश्य कैरिकॉम देशों में डिजिटल शासन और वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षमता को मज़बूत करना था. जलवायु पहलों में आईएसए के माध्यम से सौर ऊर्जा पर साझेदारी और सार्गासम (एक तरह का समुद्री शैवाल) को उर्वरक में परिवर्तित करना शामिल था. ये इस क्षेत्र में एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय है. भारत का रुख़ सहयोगी, कौशल-आधारित और जिम्मेदारी से भरा है. ये एक रणनीतिक विकास का संकेत है, जिसमें सांस्कृतिक अतीत से लेकर क्षमता-केंद्रित, दक्षिण-दक्षिण सहयोग तक सब शामिल है.

प्रवासियों के लगाव से क्षेत्रीय रणनीति तक

भारत की रणनीतिक कल्पना में कैरेबियन को शामिल करना भारत और कैरिबियाई नेताओं की बढ़ती वैश्विक मौजूदगी और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के स्थल के रूप में इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को दिखाती है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, विकास और डिजिटल शासन पर बहुपक्षीय मानदंडों को आकार देने में छोटे देशों की बढ़ती प्रासंगिकता भी इससे ज़ाहिर होती है.

प्रधानमंत्री मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा के बाद कई कूटनीतिक पहल हुईं, जिनसे भारत की क्षेत्रीय उपस्थिति और गहरी हो गई. मई 2025 में, सांसद शशि थरूर के नेतृत्व में एक सर्वदलीय भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भी गुयाना यात्रा पर आया था. इसी दौरान गुयाना अपना 59वां स्वतंत्रता दिवस भी मना रहा था. हालांकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल की उस यात्रा को ऑपरेशन सिंदूर के व्यापक संदर्भ में देखा गया. आतंकवाद के प्रति भारत की ज़ीरो-टॉलरेंस की नीति की पुष्टि करते हुए इस प्रतिनिधिमंडल ने दूसरे कई मुद्दों पर भी बात की. इसमें आर्थिक साझेदारी, विशेष रूप से गुयाना के उभरते तेल और गैस क्षेत्र में, सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया गया. राजनीतिक संकेत, प्रवासी एकजुटता और आर्थिक कूटनीति को मिलाकर भारत अब कैरेबियन को अपनी सुरक्षा और विकास साझेदारी, दोनों में शामिल कर रहा है.

भारत और कैरेबियन के बीच ये जो नई कूटनीति उभर रही है, इसका एक बड़ा कारण चीन है. कैरेबियन द्वीपसमूहों में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है. चीन का प्रभाव जमैका, सूरीनाम और ग्रेनाडा जैसे देशों में बंदरगाहों, अस्पतालों, सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे और मीडिया साझेदारियों तक फैला हुआ है. 

महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत की भागीदारी क्षेत्रीय रूप से अधिक जागरूक हुई है. भारत की पहले की सरकारें कैरेबियन द्वीपसमूह को प्रवासी भारतीयों से समृद्ध देशों के नज़रिए से देखती थी. मोदी सरकार ने इस दृष्टिकोण को बदला है. मौजूदा भारत सरकार की रणनीति कैरिकॉम और बारबाडोस, ग्रेनाडा और सेंट लूसिया जैसे देशों की व्यक्तिगत एजेंसियों के सामूहिक महत्व को मान्यता देने की है. इनमें से कई देश जलवायु संवेदनशीलता और शासन नवाचार के मामले में अग्रणी हैं. सौर ऊर्जा, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और आपदा-रोधी विकास के लिए भारत का समर्थन इन संदर्भों में मज़बूती से दिखता है.

भारत और कैरेबियन देशों के बीच मज़बूत होते संबंधों में भारतीय मूल के कई कैरेबियाई नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इनमें सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी, गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली और उपराष्ट्रपति भरत जगदेव, और त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री कमला प्रसाद-बिसेसर जैसे नेता शामिल हैं. ये नेता क्षेत्रीय शक्ति माने जाने वाले इन देशों के मध्यस्थ और सांस्कृतिक सेतु-निर्माता के रूप में दोहरी भूमिका निभाते हैं. इनकी कोशिशों ने भारत और कैरेबियाई समूह के बीच ज़्यादा सौहार्दपूर्ण और विश्वास-आधारित संवाद को संभव बनाया है.

इस क्षेत्र में भारत की नई कूटनीतिक स्थिति बातचीत के ज़रिए तालमेल बिठाने पर ज़्यादा केंद्रित है. कौशल विकास, संयुक्त मंच और साझा नवाचार प्रदान करके भारत खुद को एक सह-विकासकर्ता के रूप में स्थापित कर रहा है. इसकी वजह से भारत अपनी भावनात्मक पूंजी को तेज़ी से रणनीतिक गहराई में बदल रहा है.

बदलते वैश्विक दक्षिण में रणनीतिक उपस्थिति

भारत और कैरेबियन के बीच ये जो नई कूटनीति उभर रही है, इसका एक बड़ा कारण चीन है. कैरेबियन द्वीपसमूहों में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है. चीन का प्रभाव जमैका, सूरीनाम और ग्रेनाडा जैसे देशों में बंदरगाहों, अस्पतालों, सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे और मीडिया साझेदारियों तक फैला हुआ है. रियायती ऋणों और भव्य बुनियादी ढांचा योजनाओं द्वारा समर्थित चीन का मॉडल आकर्षक साबित हुआ है, लेकिन ऋण के बोझ और राजनीतिक विषमताओं के कारण ये मॉडल अनिश्चित भी होता जा रहा है.

भारत की रणनीति मदद करने, सलाह देने और स्थानीय सशक्तिकरण पर आधारित है. चीन के मॉडल की तुलना में ये ज़्यादा विश्वसनीय दिखती है. ये दीर्घकालिक रणनीति है: कम दिखावा, अधिक स्थायित्व. भारत खुद को एक दाता के रूप में नहीं, बल्कि एक विकास भागीदार के रूप में प्रस्तुत करता है. भारत कैरेबियाई देशों की स्वायत्तता का सम्मान करता है और इसलिए ये देश भारत के साथ जुड़ाव की इच्छा रखते हैं.

भारत की इस रणनीति को पूरा करने के लिए प्रवासी समुदाय बहुत काम आता है. गुयाना की 40 प्रतिशत आबादी की जड़ें भारत से जुड़ी हैं. प्रवासी समुदाय भारत के हितों को आगे बढ़ाने में एक सक्रिय, संस्थागत शक्ति है. राजनीतिक पदों से लेकर आर्थिक क्षेत्रों तक, भारतीय-गुयानावासी राष्ट्र की प्रगति के अभिन्न अंग हैं. त्रिनिदाद में भी, भारतीय पहचान राष्ट्रीय ताने-बाने में समाहित है. ये पहचान त्रिनिदाद में भाषा, त्योहारों, भोजन और सार्वजनिक जीवन को आकार देती है.

अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने जब भारतीय विरासत का ज़िक्र किया, और प्रवासी समुदायों द्वारा पारस्परिक मान्यता की बात की तो ये कोई संयोग नहीं था. ये कूटनीतिक संकेत थे. आज के दौर में कई वैश्विक दक्षिण देश अपनी बाहरी साझेदारियों की फिर से समीक्षा करते हैं. ऐसे में भारत की साझा पहचान और रणनीतिक हितों का मिश्रण उसे उन देशों में विश्वास हासिल करने में मदद करते हैं, जहां दूसरे देश सिर्फ लेन-देन करते हैं. ये विश्वास बहुपक्षीय समन्वय तक फैला हुआ है. भारत और कैरिकॉम देश संस्थागत सुधार और समतापूर्ण जलवायु वित्त से लेकर विकासात्मक न्याय जैसे वैश्विक मुद्दों पर तेज़ी से एकमत हो रहे हैं. ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि छोटे द्वीपीय देशों और उभरती मध्यम शक्तियों के लिए ये अस्तित्व का सवाल है.

ऐसे में ये कहा जा सकता है कि कैरेबियाई देशों के साथ भारत का फिर से जुड़ाव साझी विरासत को एक रणनीतिक अभियान में बदलने के बारे में है. एक बहुध्रुवीय विश्व में कैरेबियाई देश अब एक परिधि यानी मुख्य धारा से बाहर के राष्ट्र नहीं रह गए हैं. ये इस बात का सबूत है कि भारत किस तरह आपसी विश्वास और जुड़ाव के साथ नेतृत्व कर सकता है.


अशरफ नेहाल ग्रेनाडा के विदेश मंत्रालय से संबद्ध हैं और वो लंदन में ग्रेनाडा के उच्चायोग में काम करते हैं.

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