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Published on Jul 23, 2025 Updated 0 Hours ago

भारत को पाकिस्तान को लेकर अमेरिका और चीन में बढ़ रहे तनाव का लाभ उठाना चाहिए, ताकि दोनों में से कोई भी देश इस्लामाबाद को उन्नत सैन्य तकनीक न दे सके.

पाकिस्तानी मोर्चे पर अमेरिका-चीन की तकरार: भारत के लिए सुनहरा अवसर

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उप-सेना प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह के 4 जुलाई के बयान ने चीन और पाकिस्तान की ‘युद्ध के मैदान में सांठगांठ’ के मुद्दे को फिर से सुर्ख़ियों में ला दिया है. उन्होंने अपनी बात 7 से 10 मई, 2025 तक चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन द्वारा पाकिस्तान को उपलब्ध कराई गई खुफ़िया जानकारी और हथियारों के संदर्भ में कही थी. विश्लेषक इस बात पर बहस करते रहे हैं कि चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ती रणनीतिक दोस्ती के ख़िलाफ़, जो अब जंग के मैदान में कहीं ज़्यादा खुलकर सामने आ रही है, भारत किस तरह अपनी तैयारी कर सकता है. इस संदर्भ में भारत के रणनीतिकारों की ओर से जो कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए जाते रहे हैं, वे हैं- घरेलू क्षमता निर्माण को आगे बढ़ाना, सैन्य प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि करना, दबाव निर्माण के क्षेत्र विकसित करना और बाहरी संतुलन को मज़बूत बनाना आदि. इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए मैंने यह लेख चीनी भाषा साहित्य के एक अध्ययन के आधार पर तैयार किया है, जिसमें इस संभावना की पड़ताल की गई है कि भारत अपने पश्चिमी मोर्चे को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका और चीन के बीच पाकिस्तान को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा को एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल कर सकता है और इसका अपने हित में किस तरह फ़ायदा उठा सकता है.

वास्तव में, भारत की तरह, चीन भी 18 जून, 2025 को पाकिस्तानी फील्ड मार्शल असीम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात को लेकर चिंतित है. पाकिस्तान ने तो एक कदम आगे बढ़कर राष्ट्रपति ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित तक कर दिया, जिससे चीन में बड़े पैमाने पर नाराज़गी देखी गई है. ऐसे समय में, जब चीन ‘ट्रंप की टैरिफ तानाशाही’ के ख़िलाफ़ वैश्विक जनमत बनाने में जुटा है और अमेरिकी राष्ट्रपति को ‘वैश्विक व्यवस्था का विध्वंसक’ बता रहा है, तब उसी का सबसे क़रीबी दोस्त पाकिस्तान राष्ट्रपति ट्रंप को ‘सच्चा शांतिदूत’ बताकर उनका समर्थन कर रहा है, जिससे चीन को दुनिया भर में शर्मिंदगी राजनयिक असहजता हुई है. कई चीनी टिप्पणीकारों ने कहा है कि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों ने अपने हवाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चीन के लड़ाकू विमान उड़ाए, लेकिन उनके राजनयिकों ने अंततः इसका श्रेय अमेरिका को दे दिया. यह सब ऐसे समय में हुआ है, जब चीन शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के माध्यम से भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष-विराम वार्ता का नेतृत्व करने, सिंधु जल संधि को बहाल करने और सैन्य संचार माध्यमों को मज़बूत करने जैसी योजनाएं बना रहा था.

इस संभावना की पड़ताल की गई है कि भारत अपने पश्चिमी मोर्चे को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका और चीन के बीच पाकिस्तान को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा को एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल कर सकता है और इसका अपने हित में किस तरह फ़ायदा उठा सकता है.

इसी तरह, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल माइकल कुरिल्ला द्वारा पाकिस्तान को अमेरिका का उल्लेखनीय साझेदार’ बताए जाने से न केवल नई दिल्ली में, बल्कि चीन में भी ख़तरे की घंटी बज गई है. बीजिंग ने पाकिस्तान के एयर चीफ मार्शल ज़हीर अहमद बाबर सिद्धू की ऐतिहासिक अमेरिका यात्रा पर भी क़रीबी नज़र रखी और इस दौरे के ख़त्म होने के तुरंत बाद एक उच्च-स्तरीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद भेजा.

कुछ चिंताएं-

कई चीनी टिप्पणीकारों के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में आई अचानक गर्मजोशी को लेकर चीन की कुछ महत्वपूर्ण चिंताएं हैं, जो इस प्रकार हैं- 

  • क्या अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में आई गर्मी के कारण 62 अरब डॉलर मूल्य के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में छेड़छाड़ की जाएगी या इसमें कुछ फेरबदल किया जाएगा? विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने ग्वादर बंदरगाह को बनाने में सैकड़ों अरब डॉलर ख़र्च किए हैं, जिसे इसी साल मई में अफ़ग़ानिस्तान के खैबर दर्रे से जोड़ा गया है. इस बंदरगाह के कारण मलक्क़ा जलडमरूमध्य में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती और सीधे हिंद महासागर में पहुंचा जा सकता है, जिससे समुद्री रास्ता 2,600 किलोमीटर कम हो गया है. अब जबकि ट्रंप और मुनीर हाथ मिला रहे हैं, तब सवाल यह है कि क्या चीन के गलियारे की इस ‘जीवनरेखा’ से छेड़छाड़ की जाएगी और उसे नुक़सान पहुंचाया जाएगा?

  • क्या ट्रंप और मुनीर के बीच हुई गुप्त बैठक सिर्फ़ पाकिस्तान को ईरान की मदद करने से रोकने के बारे में थी या चीन की सैन्य खुफ़िया सूचनाएं हासिल करने के बारे में? क्या भारत और पाकिस्तान के हवाई संघर्ष के दौरान इस्तेमाल किए गए चीन के हथियारों और युद्ध प्रणालियों के बारे में ट्रंप खुफ़िया सूचना हासिल करना चाहते थे, ताकि चीन की सैन्य ताकत वह पता कर सकें और अमेरिकी सेना की रणनीतिक तैनाती का रास्ता तैयार कर सकें? 

  • क्या चीन की मध्य-पूर्व की नीतिगत योजनाओं में रुकावट डालने के लिए अमेरिका पाकिस्तान का समर्थन पाना चाहता था? अगर इस्लामी दुनिया का एकमात्र परमाणु-संपन्न देश (पाकिस्तान) ईरान के ख़िलाफ़ हो जाता है, तो चीन द्वारा इज़रायली हमलों की आलोचना करना नैतिक रूप से बेमानी बन जाएगा और यह काम खुद उसके दोस्त (पाकिस्तान) के हाथों होगा.

  • कुछ चीनी पर्यवेक्षकों ने अमेरिका और पाकिस्तान के बीच क्रिप्टोकरेंसी को लेकर बनी नज़दीकी पर भी आपत्ति जताई है. उनका तर्क है कि इस्लामाबाद को दक्षिण एशिया का एन्क्रिप्शन केंद्र बनाने की अमेरिकी योजना, पाकिस्तान में RMB (चीन की मुद्रा) की सीमा-पार निपटान की हैसियत कमज़ोर कर सकती है. इससे दक्षिण एशिया में चीन की डिजिटल मुद्रा के प्रसार में रुकावट आ सकती है, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) में ऊर्जा संसाधनों को नुक़सान पहुंच सकता है और पाकिस्तान में चीन की समग्र रणनीतिक मौजूदगी ख़तरे में पड़ सकती है. तर्क यह भी दिया गया है कि चीन ने CPEC को बनाने में अरबों डॉलर का निवेश किया है, ताकि पाकिस्तान चरणबद्ध तरीके से तरक्क़ी कर सके, जिसकी शुरुआत औद्योगिक विनिर्माण से होगी. मगर पाकिस्तान अब अमेरिका के नक्शेकदम पर चलना चाहता है और अपनी अर्थव्यवस्था की मज़बूती के लिए शार्टकट रास्ता अपनाना चाहता है. इससे पाकिस्तान की ‘वास्तविक अर्थव्यवस्था’ में चीन द्वारा पूर्व में किया गया निवेश महत्वहीन बन जाएगा.

ड्रैगन की बेचैनी और इस्लामाबाद की चालबाज़ी

कई चीनी रणनीतिक विश्लेषकों ने पाकिस्तान के इस अचानक ‘अवसरवादी रुख़’ को चीन की पीठ में छुरा घोंपने जैसा बताया है, जिसने बीजिंग और इस्लामाबाद के आपसी संबंधों की बुनियाद (यानी, रणनीतिक आपसी विश्वास) को चोट पहुंचाई है. उन्होंने इसे चीन के लिए एक चेतावनी बताया है और यह सबक लेने को कहा है कि ‘राजनीति में हित पहले आते हैं, मित्रता बाद में. यहां तक कि सबसे भरोसेमंद दोस्त के भी कदम उस वक्त डगमगा सकते हैं, जब बात राष्ट्रीय हितों पर आती है... और यह भी कि CPEC आपसी राजनीतिक विश्वास के बिना आगे नहीं बढ़ सकता.’

 जैसे-जैसे चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों में आपसी मुकाबला बढ़ता जा रहा है, इस्लामाबाद के लिए संतुलन बनाना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है. तेज़ प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, अविश्वास और भ्रम इस त्रिपक्षीय संबंध के प्रमुख पहलू बनते जा रहे हैं. 

हालांकि, कुछ अन्य विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप द्वारा टैरिफ छूट दिए जाने की संभावना (पाकिस्तान पर 29 प्रतिशत प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है) या हथियारों की संभावित बिक्री (जैसे कि F35 की बिक्री) से चीन को नहीं घबराना चाहिए, क्योंकि ये बीजिंग और इस्लामाबाद की ‘मजबूती दोस्ती’ में दरार डालने के लिए चारा फेंकने वाले कदम हो सकते हैं. उनका मानना है कि चीन और पाकिस्तान की ‘सदाबहार रणनीतिक साझेदारी’ की बुनियाद काफ़ी मज़बूत है और अमेरिका द्वारा नरमी के कुछ संकेत दिए जाने के बावजूद इस आधार को आसानी से हिलाया नहीं जा सकता. चीन और पाकिस्तान की दोस्ती न केवल कूटनीतिक क्षेत्र में दिखती है, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंधों में भी दोनों की मित्रता काफ़ी गहरी है.

दूसरी ओर, वे इस ओर भी इशारा करते हैं कि पाकिस्तान को लेकर अमेरिका के पास विकल्प कितने कठिन हैं, इसलिए पाकिस्तान और अमेरिका में चाहे जैसी खिचड़ी पके, चीन के लिए जीत जैसे हालात ही बने रहेंगे. उदाहरण के लिए, चीन मानता है कि पाकिस्तान अब अमेरिका से सबसे उन्नत AIM-120D मिसाइलें, जो मध्यम दूरी की हवा में हवा में मार करने वाली मिसाइलें हैं, पाने के लिए चीन के J-35 विमान का इस्तेमाल सौदेबाजी के रूप में कर रहा है. अगर पाकिस्तान को अस्थायी रूप से अपने पक्ष में करने के लिए अमेरिका अपने इस ‘पूर्व सहयोगी’ की मांग मान लेता है, तो उसे इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. सबसे पहले, इस कदम से नई दिल्ली में नाराज़गी पैदा होगी और अमेरिका की ‘हिंद-प्रशांत रणनीति’ पर इसका व्यापक असर पड़ेगा, जो चीन के लिए एक स्वागतयोग्य कदम होगा. इतना ही नहीं, ऐसा करने से अमेरिका को चीन और पाकिस्तान के बीच गहरे रक्षा सहयोग से नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. मुमकिन है कि उसकी शीर्ष तकनीक चीन के पास पहुंच जाए, जिससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना के हवाई वर्चस्व को सीधे तौर पर ख़तरा पैदा हो सकता है. इसके विपरीत, अगर अमेरिका सौदेबाजी से इनकार कर देता है, तो यह कदम पाकिस्तान को चीन की तरफ़ और धकेल देगा. इस बीच, जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ेगी, अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के माध्यम से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को राहत देना भी चीन के लिए अच्छा होगा, क्योंकि इससे इस्लामाबाद को बीजिंग का कर्ज़ चुकाने में सहूलियत मिलेगी.

भारत के नज़रिये से देखें, तो अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के इस त्रिकोण पर ध्यान देना काफ़ी ज़रूरी है. भले ही लंबे समय से, पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को कुशल तरीके से आगे बढ़ाया है, जिसमें हितों का टकराव काफ़ी कम हुआ है. मगर, जैसे-जैसे चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों में आपसी मुकाबला बढ़ता जा रहा है, इस्लामाबाद के लिए संतुलन बनाना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है. तेज़ प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, अविश्वास और भ्रम इस त्रिपक्षीय संबंध के प्रमुख पहलू बनते जा रहे हैं. यह कुछ ऐसा है, जिसका लाभ भारत के रणनीतिकारों को उठाना चाहिए, ताकि पाकिस्तान में निवेश करने या उसे प्रमुख तकनीकी मदद करने को लेकर न तो चीन और न ही अमेरिका विश्वास के साथ आगे बढ़ सके.


(अंतरा घोषाल सिंह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में फेलो हैं)

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Author

Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh is a Fellow at the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation, New Delhi. Her area of research includes China-India relations, China-India-US ...

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