Author : Manoj Joshi

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Published on Feb 18, 2026 Updated 1 Days ago
अंतरिक्ष अब सिर्फ खोज और विज्ञान का क्षेत्र नहीं बल्कि आधुनिक युद्ध की नई रणभूमि बन गया है. जानिए कैसे रूस, चीन और अमेरिका उपग्रहों के माध्यम से रणनीतिक बढ़त हासिल कर रहे हैं और भारत इस प्रतिस्पर्धा में कहां खड़ा है.
गगन में जासूस: महाशक्तियों की अंतरिक्ष जंग

22 फरवरी 2022 को जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब रूस ने सबसे पहले यूक्रेन की उपग्रह संचार प्रणाली, वायासैट के केए-सैट सिस्टम को हैक कर लिया. इससे ना सिर्फ यूक्रेन की सेना की आपस में संपर्क करने की क्षमता बाधित हुई बल्कि पूरे यूरोप में हज़ारों कनेक्शन भी प्रभावित हुए. फरवरी 2026 की शुरुआत में, रूस के एक जासूसी अंतरिक्ष यान ने यूरोप के उपग्रह संकेतों को इंटरसेप्ट किया. फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, यूरोप के सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि दो रूसी अंतरिक्ष यानों ने यूरोपीय महाद्वीप के ऊपर स्थित एक दर्जन महत्वपूर्ण सेटेलाइट्स के संचार को इंटरसेप्ट किया है. पिछले तीन साल यानी यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से, पश्चिमी देशों और रूस के बीच तनाव बढ़ा है. इस बढ़ते तनाव के बीच, रूसी अंतरिक्ष यानों ने अक्सर यूरोपीय उपग्रहों का पीछा किया है. ये जासूसी अंतरिक्ष यान पृथ्वी से 35,000 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित जियोस्टेशनरी सैटेलाइट के पास पहुंचे हैं जिससे उन्हें इंटरसेप्ट किया जा सके. ऐसा माना जा रहा है कि फिलहाल इन्होंने सिर्फ एन्क्रिप्टेड लेकिन संचार को ही बाधित किया है. हालांकि, इसके साथ ही रूस ने ये भी दिखा दिया है कि भविष्य में किसी युद्ध की स्थिति में उसके पास इन संचार प्रणालियों को निष्क्रिय करने और नुकसान पहुंचाने की क्षमता मौजूद है.

वैश्विक शक्तियां अंतरिक्ष को भविष्य के युद्धक्षेत्र के रूप में देख रही हैं. आधुनिक युद्ध के लिए अंतरिक्ष पर प्रभुत्व होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि लाइव अपडेट देने और संचार के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है. इतना ही नहीं, रक्षात्मक और आक्रामक रणनीतियों के लिए भी अंतरिक्ष में मज़बूत होना आवश्यक है जिनमें दुश्मन के विमानों पर हमला करने के लिए मिसाइलों का मार्गदर्शन करना और उनसे बचाव करना शामिल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गोल्डन डोम प्रणाली अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को और बढ़ावा दे सकती है.

चीन अंतरिक्ष में 'छलांग' मार रहा है

अप्रैल 2023 में अमेरिकी ख़ुफिया जानकारी के एक गोपनीय खुलासे से पता चला कि युद्ध की स्थिति में चीन अपने दुश्मन के उपग्रहों को निष्क्रिय करने, उनका फायदा उठाने या उन्हें हाईजैक करने के लिए उन्नत साइबर हथियारों का विकास कर रहा है और उसे इस क्षेत्र में काफ़ी कामयाबी मिल चुकी है.

फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, यूरोप के सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि दो रूसी अंतरिक्ष यानों ने यूरोपीय महाद्वीप के ऊपर स्थित एक दर्जन महत्वपूर्ण सेटेलाइट्स के संचार को इंटरसेप्ट किया है. पिछले तीन साल यानी यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से, पश्चिमी देशों और रूस के बीच तनाव बढ़ा है. इस बढ़ते तनाव के बीच, रूसी अंतरिक्ष यानों ने अक्सर यूरोपीय उपग्रहों का पीछा किया है.

इन तकनीकों में वो साइबर हथियार शामिल हैं, जो संकेतों की नकल करके उपग्रहों को निष्क्रिय करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं. सफल हमलों से उपग्रहों का एक समूह काम करना बंद कर सकता है. ऐसा होने पर वे हथियार प्रणालियों को आदेश भेजने, आपस में संवाद करने या महत्वपूर्ण ख़ुफिया और संचार डेटा वापस भेजने में असमर्थ हो जाएंगे. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन की ये प्रणालियां यूक्रेन युद्ध में दिखाई गई रूसी जैमिंग तकनीक से कहीं ज़्यादा एडवांस हैं, और इनमें उन्नत हैकिंग शामिल है.

चीन ने दुश्मन के उपग्रहों या उन्हें लॉन्च करने वाले उनके ज़मीनी स्टेशनों को नष्ट करने के लिए हथियार बना रहा है. उसने ज़मीन और अंतरिक्ष से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों के साथ-साथ सेटेलाइट्स के उपकरणों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम अंतरिक्ष-आधारित उच्च-शक्ति वाले लेज़र तकनीक का विकास कर लिया है.

चीन कुछ समय से ऐसे उपग्रहों का परीक्षण कर रहा है, जिनमें रोबोटिक हाथ लगे हैं. ये दुश्मन के उपग्रह को अंतरिक्ष की कक्षा से बाहर खींच या धकेल सकते हैं. ज़रूरत पड़ने पर इनमें उपग्रह को स्थानांतरित करने की क्षमता भी होती है. इससे बचाव के लिए अमेरिका ने अब ऐसे उपग्रह डिज़ाइन किए हैं, जो चीनी सैटेलाइट की पकड़ में नहीं आएंगे. जून 2025 में, चीन ने अंतरिक्ष में मौजूद अपने उपग्रहों में ईंधन भरने की अपनी क्षमता का भी प्रदर्शन किया. सेटेलाइट्स की उम्र बढ़ाने में चीन की ये क्षमता बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.

2023 में, चीन ने कृषि और मौसम विज्ञान से संबंधित गतिविधियों की निगरानी के बहाने अपने याओगान 41 उपग्रह को 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर जियोस्टेशनरी ऑर्बिन में स्थापित किया. लेकिन पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने पाया कि इसकी स्थिति ऐसी थी कि ये सेटेलाइट ताइवान और दक्षिण चीन सागर सहित एक बड़े क्षेत्र पर करीबी नज़र रख सकता था. आशंका जताई जा रही है कि, ये उपग्रह शायद इस क्षेत्र में समुद्री यातायात की निगरानी कर रहा था. चीन ने पिछले दशक में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को काफी बढ़ावा दिया है, और आज उसके लगभग 600 उपग्रह सक्रिय है. माना जा रहा है कि इसमें से करीब 360 या उससे ज़्यादा जासूसी सैटेलाइट हैं.

अंतरिक्ष के सैन्यीकरण में सबसे आगे कौन?

हालांकि, सेटेलाइट और एंटी-सैटेलाइट, दोनों ही प्रौद्योगिकियों के मामले में अब भी अमेरिका ही अग्रणी है. लेकिन, पिछले कुछ साल से रूस और चीन दोनों ही अमेरिका से आगे निकलने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. 2019 में, अपने पहले कार्यकाल में, डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी अंतरिक्ष कमान की स्थापना की, जिसे अमेरिकी सैटेलाइट के लिए ख़तरों से निपटने और युद्ध के लिए अपनी प्रणालियों को विकसित करने का दायित्व सौंपा गया था. 

ज़रूरत पड़ने पर इनमें उपग्रह को स्थानांतरित करने की क्षमता भी होती है. इससे बचाव के लिए अमेरिका ने अब ऐसे उपग्रह डिज़ाइन किए हैं, जो चीनी सैटेलाइट की पकड़ में नहीं आएंगे. जून 2025 में, चीन ने अंतरिक्ष में मौजूद अपने उपग्रहों में ईंधन भरने की अपनी क्षमता का भी प्रदर्शन किया.

हालांकि, अब तीनों देशों के बीच अंतरिक्ष के सैन्यीकरण की होड़ का एक परिणाम यह हुआ है कि अब बड़े और महंगे या बहुउद्देशीय उपग्रहों से हटकर कम लागत वाले और आसानी से नष्ट किए जा सकने वाले सेटेलाइट्स की ओर रुझान बढ़ा है. अमेरिकी जासूसी उपग्रह कार्यक्रम चलाने वाले अमेरिकी राष्ट्रीय ख़ुफिया कार्यालय ने 2023 से अब तक 200 से ज़्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए हैं. अंतरिक्ष यान को लॉन्च करने की लागत पहले से काफ़ी कम हो गई है. 8,000 उपग्रहों के समूह का संचालन करने वाली एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने पिछले साल 165 से ज़्यादा रॉकेट अंतरिक्ष में भेजे, जबकि चीन ने 92 अंतरिक्ष यान लॉन्च किए. 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी अब इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उदाहरण के लिए, चीन ने इसका इस्तेमाल याओगान-41 उपग्रह द्वारा अपनी पहचान क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया. अंतरिक्ष में दुश्मनों के उपग्रहों का सामना होने पर रक्षा तंत्र को सक्रिय करने में भी एआई का उपयोग किया जा सकता है.

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम

हालांकि, भारत के पास जीएसएलवी जैसे सैटेलाइट लॉन्चर, नवंबर 2024 में लॉन्च किया गया जीएसएटी-20 जैसे उपग्रह और गगनयान अंतरिक्ष मिशन सहित एक स्पष्ट अंतरिक्ष कार्यक्रम है, फिर भी ये वैश्विक महाशक्तियों के स्तर का नहीं है. इसका एक सबूत ये भी है कि हालिया कुल वर्षों में भारत 7 से 10 उपग्रह की लॉन्च कर रहा है, जो अंतरिक्ष शक्ति बनने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

आज, देश अपने विरोधियों की प्रणालियों को बाधित करने के लिए अंतरिक्ष-विरोधी प्रणालियों को विकसित और तैनात करने की कोशिश कर रहे हैं. उपग्रह प्रणालियों में व्यवधान का व्यापक प्रभाव उन नागरिक सेवाओं पर पड़ सकता है, जो विश्व के वित्तीय और सामाजिक कल्याण को प्रभावित करती हैं.

अपने अंतरिक्ष सैन्यीकरण के लिए भी भारत की रफ्तार काफ़ी कम है. चीन के सैन्यीकृत अंतरिक्ष कार्यक्रम के विपरीत, भारत का सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम बहुत धीमी गति से विकसित हो रहा है. भारत ने 2018 में एकीकृत रक्षा कमान के तहत अपनी डिफेंस स्पेस एजेंसी की स्थापना की. इसके तुरंत बाद, मार्च 2019 में इसने अपना पहला एंटी-सेटेलाइट परीक्षण किया, जिसमें इसने ऑर्बिन में मौजूद अपने ही निष्क्रिय उपग्रह को मिसाइल से नष्ट कर दिया.

अक्टूबर 2022 में, प्रधानमंत्री ने मिशन डेफस्पेस की शुरुआत की, जिसमें लॉन्च सिस्टम, उपग्रहों, संचार प्रणालियों, ज़मीनी प्रणालियों और सॉफ्टवेयर सिस्टम के क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए अलग-अलग चुनौतियां शामिल हैं. ये रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करने की एक व्यापक योजना का हिस्सा था.

इसी परियोजना की गति को आगे बढ़ाते हुए, अक्टूबर 2024 में, सुरक्षा मामलों पर मंत्रिमंडल कमेटी ने 27,000 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद का एलान किया. इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा संचालित एक मिशन के माध्यम से अगले दशक में लगभग 52 सर्विलांस सेटेलाइट्स को लॉन्च किया जाएगा. यह भारत के अंतरिक्ष-आधारित निगरानी कार्यक्रम का तीसरा चरण है, जिसे 2001 में वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में शुरू किया गया था.

इस सबके बावजूद, भारत और चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम में बहुत अंतर है. चीन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारी निवेश कर रहा है. स्पेस तकनीकी के मामले में चीन इस समय दुनिया में दूसरे नंबर पर है. युद्ध में अंतरिक्ष के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता. दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए ख़ुफिया जानकारी, निगरानी और टोही उपग्रहों की ज़रूरत होती है. अंतरिक्ष-आधारित संचार, कमान और नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण माध्यम हैं. इंफ्रारेड सेटेलाइट, दुश्मन के मिसाइल हमलों के ख़िलाफ पहले ही चेतावनी दे सकते हैं.

अंतरिक्ष का इस्तेमाल लंबे समय से हथियारों के रूप में होता रहा है, क्योंकि सेनाएं संचार, ख़ुफिया जानकारी और नेविगेशन सैटेलाइट का इस्तेमाल अपने अभियानों को अंजाम देने के लिए करती रही हैं. आज, देश अपने विरोधियों की प्रणालियों को बाधित करने के लिए अंतरिक्ष-विरोधी प्रणालियों को विकसित और तैनात करने की कोशिश कर रहे हैं. उपग्रह प्रणालियों में व्यवधान का व्यापक प्रभाव उन नागरिक सेवाओं पर पड़ सकता है, जो विश्व के वित्तीय और सामाजिक कल्याण को प्रभावित करती हैं. हालांकि, बाहरी अंतरिक्ष संधि का विस्तार करके इन हथियारों पर प्रतिबंध लगाने पर चर्चा की जा रही है, लेकिन ये कोशिशें अभी तक सफल नहीं हो सकी हैं.


मनोज जोशी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं.

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