समुद्र किनारे खड़ा भारत अब सिर्फ जहाज़ों को गुजरते नहीं देख रहा बल्कि Maritime Amrit Kaal Vision 2047 के जरिए खुद शिपबिल्डिंग ताकत बनने की राह पर है- जानिए कैसे निवेश, ग्रीन टेक्नोलॉजी और विदेशी दिलचस्पी इसे नई समुद्री पहचान दे रहे हैं.
भारत ने हाल ही में ऐलान किया है कि वो समुद्री अमृत काल विजन 2047 के तहत पूरे मुल्क में जहाज बनाने के बड़े-बड़े क्लस्टर खड़े करने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये लगाएगा. इसके लिए पहला ढांचा (SPV) भी तय किया है, जिसका नाम है नैशनल शिपबिल्डिंग एंड हेवी इंडस्ट्रीज पार्क, तमिलनाडु. तूतिकोरिन में इसे एक बिल्कुल नई जगह पर बड़े जहाज और भारी उद्योगों के केंद्र के तौर पर बनाया जा रहा है. मुंबई पोर्ट अथॉरिटी और महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसा ही SPV बनाने का प्लान बनाया है.
हाल ही में एचडी ह्युंडई ग्रुप के चेयरमैन चुंग किसुन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मुलाकात हुई, जिसमें जहाज बनाने से जुड़े नए प्रोजेक्ट पर बात हुई. साफ है कि भारत अब दुनिया की बड़ी जहाज बनाने वाली कंपनियों के लिए एक अहम और आकर्षक जगह बनता जा रहा है. ये कदम भारत के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे विजन के साथ भी मेल खाते हैं. साथ ही, भारत का मकसद है कि वो दुनिया के बड़े जहाज बनाने और भारी उद्योग वाले देशों में शामिल हो.
एचडी ह्युंडई ग्रुप के चेयरमैन चुंग किसुन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मुलाकात हुई, जिसमें जहाज बनाने से जुड़े नए प्रोजेक्ट पर बात हुई. साफ है कि भारत अब दुनिया की बड़ी जहाज बनाने वाली कंपनियों के लिए एक अहम और आकर्षक जगह बनता जा रहा है. ये कदम भारत के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे विजन के साथ भी मेल खाते हैं.
दुनिया का 90 फीसद से ज्यादा व्यापार समुद्र के रास्ते होता है, लेकिन जहाज कुछ देशों में ही बनते हैं. 2024 में नए जहाजों के 95 फीसदी ऑर्डर चीन, दक्षिण कोरिया और जापान के पास थे. इनका हर साल करीब 150 अरब डॉलर के बाजार पर कब्जा रहता है तो बाकी देश जहाजों के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं. इसका असर सियासत और रणनीति पर भी पड़ता है. जैसे-जैसे समुद्री रास्तों में अनिश्चितता बढ़ रही है, देश अब यह समझने लगे हैं कि अपने यहां जहाज बनाना एक जरूरी रणनीतिक जरूरत है.
जहां एक तरफ वैश्विक व्यापार समुद्र पर टिका हुआ है, वहीं जहाज निर्माण की ताकत कुछ ही देशों में सिमटी हुई है. 2024 में 95 फीसदी नए ऑर्डर तीन देशों के पास होना इस असंतुलन को साफ दिखाता है. भारत जैसे बड़े कारोबारी देश के लिए यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है, क्योंकि इससे उसकी निर्भरता और जोखिम दोनों बढ़ते हैं.
वॉल्यूम के हिसाब से भारत का करीब 95 फीसद और मूल्य के हिसाब से लगभग 70 फीसद कारोबार समुद्री रास्ते से होता है. फिर भी यहां दुनिया के बरक्स एक फीसद से भी कम जहाज बनते हैं, और इस वक्त भारत करीब 18वें नंबर पर है. अभी भारत की जहाज बनाने की कुल ताकत करीब 0.072 मिलियन GT है, जो चीन के 39 मिलियन GT, दक्षिण कोरिया के 20 मिलियन GT और जापान के 9 मिलियन GT के मुकाबले बहुत कम है.
किसी शिपयार्ड की जहाज बनाने की ताकत का मतलब होता है, 'वह ज्यादा से ज्यादा वजन जो कोई जहाज उठा सकता है, जिसे डेड वेट टननेज (DWT) में नापा जाता है.' भारत की जहाज बनाने की इंडस्ट्री को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है:
- विदेशी और तटीय कारोबार के लिए बड़े समुद्री जहाज.
- मध्यम साइज के खास काम वाले जहाज, जैसे बंदरगाह पर काम आने वाले जहाज, मछली पकड़ने वाली नावें, और छोटे जहाज.
- फौज, नौसेना और तटरक्षक के जहाज.
भारत के शिपयार्ड में करीब 19,000 लोग काम करते हैं और हर साल सैकड़ों जहाजों की मरम्मत होती है. यह दिखाता है कि देश के पास आधार मौजूद है, लेकिन इसे विस्तार देने और आधुनिक बनाने की जरूरत है ताकि यह दुनिया के कॉम्पिटिशन में टिक सके.
2024 में 95 फीसदी नए ऑर्डर तीन देशों के पास होना इस असंतुलन को साफ दिखाता है. भारत जैसे बड़े कारोबारी देश के लिए यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है, क्योंकि इससे उसकी निर्भरता और जोखिम दोनों बढ़ते हैं.'
2023-24 तक भारत में जहाजों की मरम्मत के लिए 42 ड्राई डॉक थे, आठ सरकारी जहाज बनाने और मरम्मत करने वाली कंपनियां थीं, और पांच बड़े बंदरगाहों के तहत नौ ड्राई डॉक चल रहे थे. यहां लगभग 19,000 कामगार थे, जिनमें करीब पांचवां हिस्सा अफसरों का था. उस साल करीब 418 जहाजों की मरम्मत की गई. यानी भारत के पास जहाज बनाने और उनकी मरम्मत की बुनियादी ताकत तो है, बड़े स्तर का ढांचा और ट्रेनिंग पर ध्यान देना पड़ेगा.
भारत का जहाज निर्माण और मरम्मत उद्योग: एक नज़र में
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जहाज निर्माण क्षमता |
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क्रम संख्या |
कंपनी का नाम* |
क्षमता (हजार DWT में) |
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1 |
कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड |
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2 |
हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड |
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3 |
शोफ्ट शिपयार्ड लिमिटेड |
10.0 |
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4 |
पत्रा शिपिंग प्राइवेट लिमिटेड |
10.0 |
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5 |
सैन मरीन |
8.0 |
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जहाज मरम्मत क्षमता |
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क्रम संख्या |
कंपनी का नाम* |
क्षमता (हजार DWT में) |
|
1 |
कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड |
|
|
2 |
हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड |
80.0 |
|
3 |
पत्रा शिपिंग प्राइवेट लिमिटेड |
10.0 |
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4 |
वाटरवेज़ शिपयार्ड प्राइवेट लिमिटेड |
8.0 |
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5 |
मोडेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड |
6.0 |
* टॉप 5 रिपोर्ट करने वाली कंपनियां
स्रोत: भारत के जहाज निर्माण और मरम्मत उद्योग के आंकड़े 2023-24, पोर्ट, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय
भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबा समुद्री किनारा है, फिर भी 2023-24 में अपने जहाजों का हिस्सा सिर्फ 4.11 फीसद ही था. इससे साफ होता है कि न सिर्फ मांग बढ़ाने की जरूरत है, बल्कि अपनी ताकत भी बढ़ानी पड़ेगी. इसलिए भारत के जहाज बनाने वाले सेक्टर को कई असली मुश्किलों से पार पाना होगा. उदाहरण के लिए, अपने देश के अंदर और जरूरी कामों के लिए लगातार ऑर्डर मिलते रहें.
पैसों के इंतजाम में आने वाली रुकावटें और ढांचे की कमियां दूर करना, जरूरी सामान और पुर्जों की सप्लाई को मजबूत करना आदि. इन मसलों को ठीक करना बहुत जरूरी होगा, तभी भारत में बड़े जहाज बन पाएंगे. भारत को खास तौर पर ग्रीन शिपिंग टेक्नोलॉजी और कुछ खास तरह के जहाज बनाने वाले हिस्सों में बढ़त मिल सकती है.
भारत की जहाज बनाने की योजना मेरिटाइम इंडिया विजन 2030 (MIV) और मेरिटाइम अमृत काल विजन 2047 (MKV) पर टिकी हुई है. इसके कुछ बड़े मकसद इस तरह हैं:
- 2030 तक दुनिया के जहाज बनाने के बाजार में 5 फीसद हिस्सा हासिल करना, और 2047 तक टॉप 5 में पहुंचना.
- सरकारी और निजी साझेदारी के साथ शिपयार्ड को वर्ल्ड लेवल का बनाना.
- 2047 तक जहाज बनाने की ताकत को बढ़ाकर हर साल 3 मिलियन GT तक पहुंचाना.
- भारत के व्यापारिक जहाजों के बेड़े को करीब 100 मिलियन GT तक ले जाना.
- करीब 22 लाख सीधे और परोक्ष रोजगार पैदा करना.
- ग्रीन शिपिंग टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना.
- अपने देश के उद्योग को सहारा देना, और ‘राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल (ROFR)’ जैसी नीतियां लागू करना.
भारत का जहाज निर्माण सेक्टर कई असली चुनौतियों से जूझ रहा है- लगातार ऑर्डर की कमी, फाइनेंस की दिक्कतें और जरूरी पुर्जों की सप्लाई में कमजोरी. जब तक इन बुनियादी मसलों को हल नहीं किया जाएगा, तब तक बड़े स्तर पर जहाज निर्माण की रफ्तार पकड़ना मुश्किल रहेगा.'
इसके बाद भारत की जहाज बनाने की पूरी योजना इन बातों पर टिकी है:
2025 में चार हिस्सों वाले तरीके को अपनाते हुए यूनियन कैबिनेट ने करीब 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का पैकेज मंजूर किया:
- करीब 2.70 बिलियन डॉलर शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम के लिए रखे गए.
- करीब 2.18 बिलियन डॉलर एक खास शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम के लिए रखे गए, जिसमें 100 फीसद पूंजी मदद दी जाएगी, ताकि नई और पुरानी शिपयार्ड साइट्स (ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड) को सहारा मिल सके, ढांचा बढ़ाया जा सके, जोखिम से बचाव हो सके, और इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर बनाया जा सके.
- करीब 2.73 बिलियन डॉलर मेरिटाइम डेवलपमेंट फंड के लिए रखे गए.
- कानून, टैक्स और पॉलिसी में बदलाव किए जा रहे हैं, ताकि अपने देश में जहाज बनाने को बढ़ावा मिले.
- शिपयार्ड को 'इंफ्रास्ट्रक्चर स्टेटस' दिया गया है, जिससे कर्ज लेने की लागत कम होगी और लंबे समय का निवेश आसान होगा.
- तय नियम कहते हैं कि पोर्ट पर काम करने वाली टग बोट और पायलट बोट को लंबे समय के लिए किराए पर लिया जाए, ताकि छोटे और मझोले शिपयार्ड को काम मिले.
- ROFR के नियम, जो भारत में बने, भारत के झंडे वाले और भारत के मालिकाना हक वाले जहाजों पर लागू होते हैं. मकसद अपने देश में मांग को बढ़ाना है.
तकनीक और हुनर पर फोकस करते हुए भारत 2030 तक हजारों कामगारों को ट्रेनिंग देने और नई टेक्नोलॉजी अपनाने की तैयारी में है. अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के जरिए देश न सिर्फ तकनीक सीखना चाहता है, बल्कि अपनी खुद की क्षमता भी विकसित करना चाहता है.
- NSHIP, तमिलनाडु पहला बड़ा जहाज बनाने का क्लस्टर है, जो केंद्र और राज्य की साझेदारी से बना है.
- ऐसा ही एक और क्लस्टर महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बना रही है. केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और महाराष्ट्र में भी ऐसे प्रस्ताव हैं.
- समुद्र किनारे जुड़े हुए क्लस्टर बनाए जा रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे दक्षिण कोरिया, वियतनाम और चीन में होता है.
- 2030 तक 50,000 समुद्री कामगारों को बेहतर ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया है.
- ऑटोमेशन, डिजिटल ट्विन जैसी तकनीक, और एलएनजी, मेथनॉल और हाइड्रोजन जैसे ईंधनों से चलने वाले ग्रीन जहाज बनाने को बढ़ावा.
- दुनिया के दूसरे देशों के साथ साझेदारी की जा रही है, ताकि तकनीक सीखी जा सके.
भारत अब धीरे-धीरे कम कार्बन और ग्रीन शिपिंग को अपने फायदे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के नेट-जीरो के टारगेट, यूरोपियन यूनियन के एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम, और पुराने जहाजों को बदलने की जरूरत की वजह से ऐसे वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले जहाजों की मांग बढ़ रही है. आज दुनिया भर में आधे से ज्यादा जहाजों के ऑर्डर ग्रीन टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं. भारत के शिपयार्ड, जैसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड पहले ही हाइड्रोजन फ्यूल-सेल और कम कार्बन वाले जहाजों के ऑर्डर हासिल कर चुके हैं.
इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के नेट-जीरो के टारगेट, यूरोपियन यूनियन के एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम, और पुराने जहाजों को बदलने की जरूरत की वजह से ऐसे वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले जहाजों की मांग बढ़ रही है.
सरकार की ग्रीन गाइडलाइंस, ट्रांजिशन प्रोग्राम और विजन प्लान यह दिखाते हैं कि भारत अब टिकाऊ समुद्री ढांचे की तरफ गंभीरता से बढ़ रहा है. यह बदलाव न सिर्फ पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य के कारोबार के लिए भी अहम साबित हो सकता है.
सरकार की तरफ से भी कई कदम उठाए जा रहे हैं, जैसे देश के अंदर चलने वाले पानी के जहाजों के लिए ग्रीन गाइडलाइंस, ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम, और मेरिटाइम इंडिया विजन के तहत मिलने वाली मदद दिखाते हैं कि भारत साफ और टिकाऊ समुद्री बदलाव की तरफ बढ़ने के लिए गंभीर है. उन्नत शिपयार्डों के साथ काम करने से भारत जल्दी नई तकनीक सीख सकता है.
इनसे उम्मीद है कि करीब 30 लाख नई नौकरियां पैदा होंगी और लगभग 49 बिलियन डॉलर का निवेश आएगा. बड़ी चुनौती यह रहेगी कि ये साझेदारियां लंबे समय तक अपने देश की ताकत बढ़ाएं. मुंद्रा पोर्ट जैसी निजी सेक्टर की पहल सरकार के साथ मिलकर काम कर रही हैं. साफ है कि भारत का सिस्टम अब एक नई बढ़त पर है.
अगर पैसे की मदद, क्लस्टर, ट्रेनिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी साथ चलते हैं, तो भारत एक मजबूत और टिकाऊ जहाज़ बनाने वाला देश बन सकता है. 2047 तक भारत न सिर्फ अपने समुद्री हितों को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि साफ और आधुनिक जहाज बनाने में दुनिया के आगे रहने वाले देशों में भी शामिल हो सकता है.
बाजार के आंकड़े भी बताते हैं कि भारत के जहाज बनाने के सेक्टर की मौजूदा कीमत करीब 1.12 बिलियन डॉलर है. यह हर साल करीब 60 फीसद की दर से बढ़कर 2047 तक करीब 237 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. करीब 30 लाख रोजगार और 49 बिलियन डॉलर निवेश की संभावना यह दिखाती है कि जहाज निर्माण अब सिर्फ एक उद्योग नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक बदलाव का जरिया बन सकता है. हालांकि असली चुनौती यह होगी कि यह बढ़त लंबे समय तक टिके और देश की अपनी ताकत को मजबूत करे.
भारत की जहाज बनाने की पॉलिसी एक बड़ा बदलाव है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए लगातार सही काम, मांग और सही साझेदारी जरूरी होगी. अगर पैसे की मदद, क्लस्टर, ट्रेनिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी साथ चलते हैं, तो भारत एक मजबूत और टिकाऊ जहाज़ बनाने वाला देश बन सकता है. 2047 तक भारत न सिर्फ अपने समुद्री हितों को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि साफ और आधुनिक जहाज बनाने में दुनिया के आगे रहने वाले देशों में भी शामिल हो सकता है.
अनुषा केसकर गावंकर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.
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Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...
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