इस बात में कोई शक नहीं है कि जेनेरिक दवाओं के वैश्विक निर्यात में भारत को काफ़ी सफलता मिली है लेकिन इस सफलता के पीछे एक स्याह सच है. बल्क ड्रग्स और इसके लिए ज़रूरी केमिकल कम्पाउंड्स में भारत अब भी चीन पर बहुत ज़्यादा निर्भर है.
यह 'चाइना क्रॉनिकल्स' श्रृंखला का 187वां लेख है.
विकासशील देशों के दवा उद्योग के बादशाह के रूप में भारत की पहचान बिल्कुल सही है. नवीनतम जानकारी के मुताबिक, भारत मात्रा के हिसाब से दवाओं का तीसरा सबसे बड़ा और मूल्य के हिसाब से 14वां सबसे बड़ा उत्पादक है. प्रक्रिया पेटेंट, सस्ते कुशल श्रम और सार्वजनिक नीतियों के संयोजन से भारत दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं का उत्पादन करता है. भारत आज ज़्यादातर कम और निम्न मध्यम आय वाले देशों की दवा ज़रूरतों को पूरा करता है.
भारत जेनेरिक दवा-निर्यात में सफल, पर बल्क ड्रग्स के लिए चीन पर भारी निर्भरता।
भारत विश्व की 20% जेनेरिक दवाएँ बनाता है—वैश्विक ‘फार्मेसी’ के रूप में पहचान।
निर्यात बढ़ा, पर एपीआई के लिए चीन पर समानांतर निर्भरता भी बढ़ी।
निम्नलिखित विश्लेषण, ट्रेड मैप प्लेटफॉर्म से संकलित आंकड़ों पर आधारित है, जो 21वीं सदी की शुरुआत से भारत के व्यापार प्रवाह को ट्रैक करता है. यह दो प्रमुख हार्मोनाइज़्ड सिस्टम (एचएस) अध्यायों का अनुसरण करता है. एचएस-29, जो कार्बनिक रसायनों को कवर करता है, जो भारत के मामले में एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रिडिएंट्स (एपीआई) और मध्यवर्ती दवाओं का हिसाब रखता है, और एचएस-30, जो तैयार फार्मास्युटिकल उत्पादों को कवर करता है.
“भारत में एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं का आयात लगभग 1.8 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 26 अरब डॉलर हो गया… एचएस-29 आयात और एचएस-30 निर्यात दोनों बहुत करीब से एक साथ बढ़ते हैं।”
इन दोनों श्रृंखलाओं में रुझानों का एक साथ विश्लेषण करके, यह लेख बताता है कि तैयार दवाओं में भारत की बढ़ती निर्यात उपस्थिति किस प्रकार एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं के लिए चीन पर इसकी आयात निर्भरता के साथ-साथ विकसित हुई है. भारत की एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं के उत्पादन की क्षमता में जबरदस्त वृद्धि हुई है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस बढ़े हुए उत्पादन का अधिकांश हिस्सा निर्यात में ही इस्तेमाल हुआ है, ना कि भारतीय दवा उद्योग को एपीआई (जिन्हें अक्सर बल्क ड्रग्स कहा जाता है) और मध्यवर्ती दवाओं के लिए चीन पर निर्भरता से मुक्त करने में.

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
2001 से 2024 तक जो पैटर्न उभरता है, वह दोहरी उछाल का है. भारत में तैयार फार्मास्युटिकल उत्पादों का विश्व को निर्यात (ग्राफ 1) 2001 में एक अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 23.3 अरब डॉलर हो गया, जो मौजूदा कीमतों पर एक महत्वपूर्ण वृद्धि है. इसी अवधि में, भारत में एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं का आयात लगभग 1.8 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 26 अरब डॉलर हो गया, जो लगभग पंद्रह गुना वृद्धि है. (ग्राफ 2) एचएस-29 आयात और एचएस-30 निर्यात दोनों बहुत करीब से एक साथ बढ़ते हैं, और इन्हें नज़रअंदाज करना मुश्किल है.

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
थोक दवा प्रयोगों से लेकर चीन पर निर्भरता तक
दवा के मामलों में चीन पर निर्भरता का लंबा इतिहास रहा है. सुदीप चौधरी बताते हैं कि, स्वतंत्रता के बाद के पहले दशकों में, भारत ने हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स और इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के माध्यम से एपीआई क्षमता विकसित करने की कोशिश की. 1975 में हाथी समिति और 1978 की औषधि नीति में भी एपीआई दवाओं पर ज़ोर देने की बात कही गई, लेकिन वह दृष्टिकोण कभी पूरी तरह से साकार नहीं हुआ, जिससे आयात पर निर्भरता का रास्ता खुल गया.
“भारत के दवा निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 2001 में लगभग 12 प्रतिशत… 2024 तक बढ़कर लगभग 38 प्रतिशत हो गई।”
1990-91 तक, चीन से भारत 10 लाख डॉलर से कम मूल्य की थोक दवाएं आयात करता था, और थोक दवा आयात में चीन की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से भी कम थी. 1990 के दशक के मध्य तक, इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 20 प्रतिशत और 2020 तक भारत के एपीआई और मध्यवर्ती दवा आयात में चीन की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई हो गई थी. औषधि विभाग की रिपोर्ट्स में भी चीन पर भारत की भारी निर्भरता को स्वीकार किया गया है, 70 प्रतिशत आयात चीन से होने की बात कही गई है.
ग्राफ 3 दिखाता है कि कार्बनिक रसायनों की व्यापक श्रेणी में भारत को एपीआई आपूर्ति के प्राथमिक प्रदाता के रूप में चीन का महत्व कैसे बढ़ा. 2010 तक, भारत के कार्बनिक रसायनों के आयात में चीन का योगदान दोगुना होकर एक तिहाई हो गया और 2020 तक यह लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गया. चीन से आयात 2001 में लगभग 0.29 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 11.1 अरब डॉलर से ज़्यादा हो गया.

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
दवा उत्पादों के निर्यात के मामले में, भारत की प्रभावशाली बढ़ोत्तरी (ग्राफ 1) काफ़ी हद तक अमेरिका को निर्यात में हुई वृद्धि के कारण थी. 2001 में, भारत के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत थी और 2024 तक, यह हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 38 प्रतिशत हो गई (ग्राफ 4).

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
भारत के दवा निर्यात में अफ्रीकी महाद्वीप भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अगर हम भारतीय दवा उत्पादों के पांच प्रमुख अफ्रीकी आयातकों- दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, केन्या, घाना और तंजानिया - को देखें, तो इन पांच देशों को भारत का निर्यात 2001 में लगभग 120 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2024 में करीब 1.93 अरब डॉलर हो गया. हालांकि, भारत के निर्यात में उनकी संयुक्त हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से घटकर करीब 8 प्रतिशत ही रह गई है.
“थोक दवाओं और मध्यवर्ती पदार्थों का आयात 2019-20 से 2023-24 तक… चीन से आयात 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया।”
चीन से जैविक रसायनों के आयात (ग्राफ 3) से पता चलता है कि राजनयिक या सैन्य तनावों का व्यापार मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. 2020 में इसमें गिरावट आई, जब भारत में आयात 2019 के लगभग 20.5 अरब डॉलर से घटकर लगभग 18.2 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, और चीन से आयात में भी थोड़ी कमी आई. फिर भी, 2021 में आयात में उछाल आया और यह नए उच्च स्तर पर पहुंच गया. सीमा पर संघर्षों के बाद भी चीन से आयात में कमी का कोई सबूत नहीं है.
नीति और रणनीति को शामिल करने पर मामला और भी जटिल हो जाता है. एपीआई आयात पर निर्भर निर्यात में मिल रही सफलता से दवा सुरक्षा संबंधी स्पष्ट ज़ोखिम जुड़े हुए हैं. सरकार भी इस बात को कुबूल कर चुकी है. इसीलिए सरकार ने एपीआई के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं और 3 बल्क-ड्रग पार्कों की स्थापना का समर्थन किया. हालांकि, इसमें कोई खास सफलता नहीं मिली. आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2019-20 से 2023-24 तक, थोक दवाओं और मध्यवर्ती पदार्थों का आयात लगभग 24,172 करोड़ रुपये से बढ़कर 37,722 करोड़ रुपये हो गया, जबकि चीन से आयात 16,443 करोड़ रुपये से बढ़कर 27,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया, जिससे चीन की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई.

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
हालांकि, चीन से एपीआई और मध्यवर्ती पदार्थों का आयात करने को सिर्फ एक कमज़ोरी के तौर पर नहीं देखना चाहिए. इसने भारतीय कंपनियों को फॉर्मूलेशन में नवाचार, नियामक अनुपालन और बाजार पहुंच पर ध्यान केंद्रित करने की भी अनुमति दी है. फाइनेंशियल टाइम्स के एक विश्लेषण में बताया गया है, समृद्ध देशों में इस्तेमाल होने वाली कई कम लागत वाली तैयार दवाएं भारत में निर्मित होती हैं. इन्हें बनाने में मुख्य रूप से चीन से हासिल एपीआई का इस्तेमाल किया जाता है. इसके समानांतर, जैसा कि ग्राफ 5 दर्शाता है, एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं सहित कार्बनिक रसायनों का भारत का निर्यात 2001 और 2024 के बीच लगभग 1.6 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 21 अरब डॉलर हो गया.

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
“एंटीबायोटिक्स जैसी विशिष्ट श्रेणियों में भारत के चीन पर अत्यधिक निर्भर होने का ख़तरा… कुल आयात का 87 प्रतिशत चीन से।”
यह जटिल परस्पर निर्भरता का मामला है. इसे एक त्रिकोणीय श्रृंखला के रूप में देखा जाना चाहिए. ये चीन से सस्ते कच्चे माल के आयात, भारत में तैयार दवाओं और एपीआई दोनों के फार्मास्युटिकल विनिर्माण, साथ ही समृद्ध देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को आपस में जोड़ती है. हालांकि, एंटीबायोटिक्स जैसी विशिष्ट श्रेणियों में भारत के चीन पर अत्यधिक निर्भर होने का ख़तरा मंडरा रहा है (ग्राफ 6), जहां भारत में होने वाले कुल आयात का 87 प्रतिशत चीन से होता है. दिलचस्प बात यह है कि, पिछले दो दशकों में ज़्यादातर समय चीन, भारतीय जैविक रसायनों के शीर्ष 5 निर्यात गंतव्यों में से एक रहा है (ग्राफ 7).

स्रोत: ट्रेड मैप से डेटा, लेखक द्वारा संग्रहीत और विश्लेषण किया गया
हालांकि, फिलहाल जेनेरिक दवाओं को अमेरिकी टैरिफ के दायरे में शामिल किए जाने का तत्काल कोई ख़तरा नहीं दिख रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन द्वारा भविष्य में प्रतिबंध लगाए जाने का ज़ोखिम बना हुआ है. ऐसे में भारत को चाहिए कि वो आयात पर चीन और निर्यात पर अमेरिका में बहुत ज़्यादा निर्भर रहने की बजाए बाज़ार में विविधता लाने के तरीकों के बारे में सोचे.
ओमेन सी. कुरियन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की स्वास्थ्य पहल के मुखिया और सीनियर फेलो हैं.
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Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
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