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भारत को IMO परिषद की श्रेणी-बी में दोबारा चुना गया. जहाज़ सुरक्षा और हरित शिपिंग पर असर डालने का मौका मिला. साथ ही विकासशील देशों के लिए न्यायपूर्ण नियम बनाने का अवसर भी.
अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की परिषद की श्रेणी–बी में 2026–27 के लिए भारत का दोबारा चुना जाना और उसमें भी अपने वर्ग में सबसे अधिक वोट हासिल करना, यह दिखाता है कि समुद्री क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार पहचान मिल रही है. यह लगातार दूसरी बार है जब भारत ने अपने वर्ग में शीर्ष स्थान हासिल किया है. इससे भारत की गिनती जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, स्वीडन, नीदरलैंड और ब्राज़ील जैसे प्रमुख समुद्री देशों के साथ होने लगी है. भारत को मिला समर्थन इस बात का संकेत है कि वैश्विक समुद्री शासन में भारत को एक जिम्मेदार, दूरदर्शी और भरोसेमंद आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है.
भारत को मिला समर्थन इस बात का संकेत है कि वैश्विक समुद्री शासन में भारत को एक जिम्मेदार, दूरदर्शी और भरोसेमंद आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है.
IMO संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है जिसका उद्देश्य समुद्री यातायात को सुरक्षित और स्वच्छ बनाना तथा जहाजों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है. यह संगठन सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप काम करता है. IMO की महासभा, जिसमें सभी सदस्य देश शामिल होते हैं, इसकी सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है. यह हर दो वर्ष में बैठक कर कार्ययोजना, बजट को मंजूरी देती है और परिषद का चुनाव करती है. परिषद, महासभा की बैठकों के बीच संगठन के कामकाज को दिशा देती है.
IMO परिषद के सदस्य तीन श्रेणियों में चुने जाते हैं. श्रेणी–ए में वे देश आते हैं जो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग सेवाओं में सबसे अधिक सक्रिय हैं. श्रेणी–बी में वे देश शामिल होते हैं जिनकी वैश्विक समुद्री व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी है. श्रेणी–सी में ऐसे देश आते हैं जिनके विशेष समुद्री हित हैं ताकि भौगोलिक संतुलन बना रहे.
श्रेणी–बी की सीट मिलने से भारत को जहाजों की सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी), डिजिटल तकनीक और नाविकों के कल्याण जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा को दिशा देने का अवसर मिलता है.
भारत के कुल व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत (मात्रा के हिसाब से) और करीब 70 प्रतिशत (मूल्य के हिसाब से) समुद्री मार्गों से होता है. साथ ही, भारत सागरमाला कार्यक्रम, मैरीटाइम विज़न 2030 और मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 जैसी पहलों के ज़रिये अपनी समुद्री क्षमताओं को लगातार मज़बूत कर रहा है. IMO परिषद की सदस्यता इन प्रयासों को और मजबूती देती है और भारत को ऐसे समय में व्यावहारिक, संतुलित और समावेशी नियमों का समर्थन करने का मंच देती है, जब वैश्विक समुद्री क्षेत्र तेज़ी से बदल रहा है.
इस मंच के ज़रिये भारत अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम अनुभवों से सीख सकता है, अपने अनुभव साझा कर सकता है और अपनी घरेलू नीतियों को और बेहतर बना सकता है. चुनाव में भारत को मिला समर्थन उसकी स्थिर और भरोसेमंद नीति पर वैश्विक विश्वास को दर्शाता है.
IMO परिषद में भारत की मौजूदगी यह दिखाती है कि वह एक जिम्मेदार वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में उभर रहा है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए क्षमता निर्माण और ज्ञान साझा करने में. जैसे-जैसे भारत अपने बंदरगाहों का विस्तार कर रहा है, जहाज निर्माण क्षमता बढ़ा रहा है और हरित लॉजिस्टिक्स को मज़बूत कर रहा है, वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था से मेल खाएँ और ग्लोबल साउथ की आवाज़ सुनी जाए.
जलवायु परिवर्तन से निपटना IMO के एजेंडे का एक प्रमुख हिस्सा है क्योंकि वैश्विक शिपिंग क्षेत्र 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन की दिशा में बढ़ रहा है. भारत का पुनः निर्वाचन उसे इस प्रक्रिया को आकार देने का अवसर देता है, साथ ही यह ज़ोर देने का भी कि डीकार्बोनाइजेशन प्रभावी, किफ़ायती और न्यायसंगत होना चाहिए-खासकर उन विकासशील देशों के लिए जिन पर नियमों का पालन करने का भारी खर्च पड़ता है.
भारत का अपना अनुभव इस तर्क को मजबूती देता है. वह यह दिखा सकता है कि कैसे नवाचार और लक्षित निवेश के ज़रिये जलवायु लक्ष्यों और विकास की ज़रूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है.
दुनिया का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है, जिससे समुद्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाते हैं. कच्चे तेल से लेकर खाद्यान्न, औद्योगिक कच्चे माल और तैयार उत्पादों तक—लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की भूमिका वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है.
भारत के बंदरगाहों और समुद्री क्षेत्र में हरित शिपिंग के प्रयास पहले से दिखने लगे हैं. हरित सागर दिशानिर्देश और हरित श्रेय प्रोत्साहन योजना जैसे कदम स्वच्छ जहाजों और कम उत्सर्जन को बढ़ावा दे रहे हैं. नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ ईंधन के प्रयोग, इलेक्ट्रिक हार्बर क्राफ्ट और जहाज पुनर्चक्रण में प्रगति इस दिशा में अहम कदम हैं. हरित और डिजिटल शिपिंग कॉरिडोर तथा ग्रीन पोर्ट परफॉर्मेंस इंडेक्स से बंदरगाह संचालन को जलवायु अनुकूल और अधिक कुशल बनाया जा रहा है.
लंबी तटरेखा और बढ़ते बंदरगाह नेटवर्क के कारण भारत के लिए भविष्य-तैयार और सुरक्षित बंदरगाह शहर रणनीतिक प्राथमिकता हैं. IMO परिषद में भूमिका निभाकर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में प्रदूषण, बैलास्ट जल और बढ़ते जहाज़ी यातायात जैसे पर्यावरणीय जोखिमों से निपटने में भी योगदान दे सकता है.
अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती विरोधी अभियान और पश्चिमी हिंद महासागर में सक्रिय मौजूदगी से भारत को व्यावहारिक अनुभव मिला है. IFC-IOR, क्वाड, IORA और अफ्रीकी तटीय देशों के साथ साझेदारी से क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और जागरूकता को बल मिला है.
दुनिया का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है, जिससे समुद्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाते हैं. कच्चे तेल से लेकर खाद्यान्न, औद्योगिक कच्चे माल और तैयार उत्पादों तक—लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की भूमिका वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है. IMO न केवल जहाजों की सुरक्षा और समुद्री पर्यावरण की रक्षा के लिए नियम तय करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि वैश्विक व्यापार निर्बाध और सुरक्षित रूप से चलता रहे.
भारत के लिए यह भूमिका और भी अहम है, क्योंकि उसका अधिकांश व्यापार समुद्र के रास्ते होता है. भारत जैसे-जैसे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है, वैसे-वैसे समुद्री लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह विकास और जहाज निर्माण में उसकी भागीदारी तेज़ी से बढ़ रही है. सागरमाला जैसी योजनाएँ, नए बंदरगाहों का विकास और जहाज निर्माण क्षमता में विस्तार भारत को एक उभरती समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित कर रहे हैं.
इस बदलती स्थिति में, केवल नियमों का पालन करना पर्याप्त नहीं है. भारत के लिए ज़रूरी है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाए. IMO जैसे मंचों पर भारत की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि वैश्विक समुद्री नियम व्यावहारिक, संतुलित और विकासशील देशों की ज़रूरतों के अनुकूल हों. इससे न केवल भारत के हित सुरक्षित रहते हैं, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यवस्था भी अधिक स्थिर, सुरक्षित और समावेशी बनती है.
चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और हिंद-प्रशांत, दक्षिण चीन सागर व लाल सागर में बढ़ते जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, भारत की IMO में भूमिका उसे विकसित और विकासशील देशों के बीच सेतु बनाने, सहमति बनाने और समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने का अवसर देती है.
IMO परिषद में रहते हुए भारत ISPS कोड और समुद्री दुर्घटना जांच जैसे ढाँचों पर चर्चा में योगदान दे सकता है, जिससे समुद्र में डकैती से लेकर मानवीय संकटों तक, खतरों से निपटने की दिशा तय होती है.
भारत SAGAR पहल, सिंगापुर और रॉटरडैम के साथ हरित और डिजिटल शिपिंग कॉरिडोर, जापान के साथ गुणवत्ता आधारित अवसंरचना सहयोग, IMEC जैसे नए व्यापार मार्गों और ASEAN व BIMSTEC के साथ समुद्री संपर्क को आगे बढ़ा सकता है. ये प्रयास व्यापार बढ़ाने, उत्सर्जन घटाने और आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत बनाने में मदद करते हैं.
चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और हिंद-प्रशांत, दक्षिण चीन सागर व लाल सागर में बढ़ते जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, भारत की IMO में भूमिका उसे विकसित और विकासशील देशों के बीच सेतु बनाने, सहमति बनाने और समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने का अवसर देती है.
दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहती है. ऐसे में टिकाऊ समुद्री विकास में लोगों की भूमिका सबसे अहम है. जैसे-जैसे बंदरगाह शहरों के पास फैलते हैं, स्थानीय समुदायों पर पर्यावरणीय और सामाजिक दबाव बढ़ता है. मछुआरे, असंगठित कामगार, महिलाएँ और प्रवासी श्रमिक अक्सर सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.
ग्लोबल साउथ के उभरते बंदरगाह शहर हर साल लाखों कार्गो संभालते हैं, लेकिन शासन से जुड़ी चुनौतियाँ बनी रहती हैं. बंदरगाह आधारित विकास शहरों की संरचना, आजीविका और सार्वजनिक स्थानों को बदल देता है. इसलिए आर्थिक लक्ष्यों, पर्यावरण सुरक्षा और स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं के बीच संतुलन ज़रूरी है.
भारत IMO में समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण को आगे बढ़ा सकता है. स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक समझ, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और समन्वित शासन को बढ़ावा देकर टिकाऊ तटीय क्षेत्रों का निर्माण किया जा सकता है. दुनिया के सबसे बड़े नाविक आपूर्तिकर्ता देशों में से एक होने के नाते, भारत नाविकों के कल्याण में भी गहरी रुचि रखता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास एक बार फिर वैश्विक समुद्री विमर्श को व्यावहारिक, संतुलित और न्यायपूर्ण दृष्टि से आकार देने का अवसर है.
‘सागर में सम्मान’ जैसी पहलें प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और सुरक्षित कार्य स्थितियों को बढ़ावा देती हैं. अंतरराष्ट्रीय नाविक कल्याण नेटवर्क के साथ साझेदारी से वैश्विक मानकों के अनुरूप सहयोग मज़बूत हुआ है.
IMO परिषद में भारत का पुनः निर्वाचन उसकी बढ़ती क्षमता और समुद्री क्षेत्र में उसकी अहम भूमिका को दर्शाता है, खासकर ऐसे समय में जब विकासशील देश वैश्विक नियम निर्माण में अधिक आवाज़ चाहते हैं. यह अवसर भारत को समुद्री और महासागर शासन के भविष्य को दिशा देने का मौका देता है.
आने वाले दो वर्षों में भारत सहयोग बढ़ाने, क्षेत्रीय साझेदारियाँ गहरी करने, ज्ञान साझा करने और एक सुरक्षित, टिकाऊ व समावेशी समुद्री व्यवस्था को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास एक बार फिर वैश्विक समुद्री विमर्श को व्यावहारिक, संतुलित और न्यायपूर्ण दृष्टि से आकार देने का अवसर है.
अनुषा केसकर गावंकर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.
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Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...
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