एक देश में बार-बार बीमारी फैलती रही- डॉक्टर, पशु चिकित्सक और प्रशासन सब अपने-अपने तरीके से काम करते रहे. नतीजा, समस्या बढ़ती गई. विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 यही संदेश देता है कि असली ताकत नई नीति नहीं बल्कि सबको साथ लाकर काम करने की आदत और भरोसे का सिस्टम है.
यह निबंध विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026: साझा ज़ोखिम के युग में विज्ञान के साथ खड़े रहना नामक श्रृंखला का हिस्सा है.
विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 के मौके पर 7 अप्रैल को, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और फ्रांस की जी-7 अध्यक्षता में लियोन में एक स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया. 7 से 9 अप्रैल तक, डब्ल्यूएचओ सहयोगी केंद्रों का पहला वैश्विक मंच 80 से ज़्यादा देशों के लगभग 800 वैज्ञानिक संस्थानों को एक साथ ला रहा है. इस साल विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम है, "स्वास्थ्य के लिए एक साथ, विज्ञान के साथ खड़े रहें". ये एक ऐसा व्यावहारिक सवाल पूछता है कि कौन से देश विज्ञान को नियमित सार्वजनिक कार्रवाई में बदलने के लिए आवश्यक संस्थानों, कार्यबल और समन्वय की आदतों का निर्माण कर सकते हैं?
ये सवाल भारत के लिए बहुत प्रासंगिक है. भारत में 'वन हेल्थ पॉलिसी' बहुत तेज़ी से नीतिगत भाषा में शामिल हो गई है, लेकिन इसके सहारे जिन ज़ोखिमों को नियंत्रित किया जाना है, वे अभी भी खंडित प्रणालियों के माध्यम से ही सामने आते हैं. ये ख़तरे पशुपालन प्रथाओं, वन्यजीवों के संपर्क, खाद्य श्रृंखलाओं, अपशिष्ट जल, शहरी विस्तार, पारिस्थितिक तनाव और रोगाणुरोधी दवाओं के इस्तेमाल से उभरते हैं. ऐसे ज़ोखिमों का सामना करने वाली सार्वजनिक व्यवस्था को सिर्फ सबूत इकट्ठा करने तक सीमित रहने की बजाए कुछ और भी करना होगा. उसे विभिन्न क्षेत्रों से मिल रहे संकेतों को समझना होगा. समय रहते समन्वय स्थापित करना होगा और ऐसे तरीके से प्रतिक्रिया देनी होगी जो जनता के लिए विश्वसनीय बनी रहे.
भारत ने इस बदलाव के लिए ढांचा तैयार करना शुरू कर दिया है. अब अगला कदम ये होना चाहिए कि नए ढांचे घोषित करने की बजाए मौजूदा तंत्र का इस्तेमाल करना सिखाया जाए. मिशन और समितियां दिशा-निर्देश दे सकती हैं, लेकिन इनसे जिला स्तर पर दक्षता, विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय स्थापित करने की आदतें या संस्थागत विश्वास खुद पैदा नहीं होगा. इन क्षमताओं को प्रशिक्षण, बार-बार अभ्यास और संगठनात्मक संरचना के माध्यम से विकसित किया जाना चाहिए. भारत के लिए, वन हेल्थ की तात्कालिक चुनौती नियामक होने के साथ-साथ जागरूकता बढ़ाना भी है. ये इस बात से संबंधित है कि क्या प्रोग्राम मैनेजर, महामारी विशेषज्ञों, पशु चिकित्सकों, सूक्ष्म जीवविज्ञानी, पर्यावरण विशेषज्ञों और जिला प्रशासकों को एक साझा जोखिमों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है.
भारत में 'वन हेल्थ पॉलिसी' बहुत तेज़ी से नीतिगत भाषा में शामिल हो गई है, लेकिन इसके सहारे जिन ज़ोखिमों को नियंत्रित किया जाना है, वे अभी भी खंडित प्रणालियों के माध्यम से ही सामने आते हैं. ये ख़तरे पशुपालन प्रथाओं, वन्यजीवों के संपर्क, खाद्य श्रृंखलाओं, अपशिष्ट जल, शहरी विस्तार, पारिस्थितिक तनाव और रोगाणुरोधी दवाओं के इस्तेमाल से उभरते हैं.
इस दृष्टिकोण से देखें तो, विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार के अगले चरण के केंद्र में स्थित एक नीतिगत प्रश्न को और अधिक स्पष्ट करता है. वैज्ञानिक क्षमता बढ़ रही है, संस्थागत ढांचा आकार ले रहा है, और वन हेल्थ पर अंतर्राष्ट्रीय ध्यान बढ़ रहा है. अब सबसे मुश्किल काम सार्वजनिक प्रणाली को उस ज्ञान पर निरंतर और व्यापक रूप से कार्य करने के लिए तैयार करना है. इसीलिए प्रशिक्षण को वन हेल्थ स्वास्थ्य एजेंडा में ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए.
वन हेल्थ एजेंडा सार्वजनिक प्रशासन में तभी प्रवेश कर सकता है, जब ये अधिकारियों के समस्या को देखने के प्रशिक्षण के तरीके को बदल दे. एक जिला अधिकारी, जो बीमारी के संकेत पढ़ रहा हो. एक पशु चिकित्सक, जो पशुधन के ज़ोखिम का आकलन कर रहा हो. एक सूक्ष्म जीवविज्ञानी, जो लैब के डेटा की व्याख्या कर रहा हो. एक अस्पताल का प्रशासक, जो प्रकोप से निपटने की योजना बना रहा हो. ये सभी एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से देखकर एक साझा कार्ययोजना बना सकते हैं. रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर), पशुओं में फैलने वाली बीमारियां, पर्यावरणीय प्रदूषण और तैयारियों में विफलताएं वास्तविक दुनिया में शायद ही कभी अलग-अलग मुद्दे बनकर सामने आती हैं. ये विभिन्न क्षेत्रों में एकत्रित होती हैं, और फिर यह परखती हैं कि क्या संस्थान आपस में जुड़े हुए तरीके से सोच सकते हैं. इस तरह की क्षमता को विकसित करना होगा.
इसीलिए वन हेल्थ की चर्चा में प्रशिक्षण संस्थानों पर सामान्य से कहीं ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है. उनका महत्व व्यावहारिक काम से पैदा होता है. वे नीतिगत भाषा को प्रशासनिक व्यवहार में बदलते हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान (एनआईएचएफडब्ल्यू) की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है. इसका कार्यक्षेत्र स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान और नीतिगत सहायता प्रदान करना है. इससे वन हेल्थ को ऐसे समय में एक मज़बूत स्थिति प्राप्त होती है, जब सार्वजनिक प्रणालियों से पुराने कार्यक्रम सीमाओं से परे काम करने की अपेक्षा की जा रही है. वन हेल्थ जैसी व्यवस्था के लिए ये भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि चुनौती केवल तकनीकी ज्ञान की नहीं है. चुनौती यह है कि क्या ये प्रणाली, जटिलता को एक व्यवस्थित तरीके से संभालना सीख सकती है.
इसलिए, क्षमता निर्माण का स्वरूप कैसा होना चाहिए, ये अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है. भारत को ऐसे कार्यबल की ज़रूरत है, जो विभिन्न क्षेत्रों में काम कर सके, अपूर्ण साक्ष्यों की व्याख्या कर सके, अनिश्चितता के बीच संवाद स्थापित कर सके और प्रशासनिक सीमाओं के पार समन्वय स्थापित कर सके. इसके लिए एक ऐसे प्रशिक्षण मॉडल की आवश्यकता है, जो शिक्षण, वास्तविक घटनाओं जैसे अभ्यासों, सिमुलेशन, सतत शिक्षा और महामारी विज्ञान, प्रबंधन, संचार और क्षेत्रीय प्रशासन के बीच मज़बूत समन्वय पर आधारित हो. राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन के तहत आयोजित पहली राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सहभागिता कार्यशाला में इसे लेकर चर्चा हुई. इसमें व्यापक शासन सुधारों के साथ-साथ राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश के अधिकारियों के लिए एक एकीकृत ई-लर्निंग मॉड्यूल पर चर्चा करके इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया. ये एक बड़ा कदम है, क्योंकि यह वन हेल्थ को एक सम्मेलन के नारे के बजाय एक सिखाने योग्य प्रशासनिक क्षमता के रूप में दिखाता है.
भारत को ऐसे कार्यबल की ज़रूरत है, जो विभिन्न क्षेत्रों में काम कर सके, अपूर्ण साक्ष्यों की व्याख्या कर सके, अनिश्चितता के बीच संवाद स्थापित कर सके और प्रशासनिक सीमाओं के पार समन्वय स्थापित कर सके. इसके लिए एक ऐसे प्रशिक्षण मॉडल की आवश्यकता है, जो शिक्षण, वास्तविक घटनाओं जैसे अभ्यासों, सिमुलेशन, सतत शिक्षा और महामारी विज्ञान, प्रबंधन, संचार और क्षेत्रीय प्रशासन के बीच मज़बूत समन्वय पर आधारित हो.
आगे बढ़ने के लिए पहले से ही एक संस्थागत आधार मौजूद है. एनआईएचएफडब्ल्यू के इकोसिस्टम में सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रशासन के औपचारिक कार्यक्रम, सेवा के दौरान प्रशिक्षण, संस्थागत प्रशिक्षण और डिजिटल शिक्षण शामिल हैं. इसके प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिला स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के प्रबंधन पर कार्यक्रम भी शामिल हैं. सक्षम प्लेटफॉर्म को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा एक डिजिटल शिक्षण पहल के रूप में विकसित किया गया है. इसमें पाठ्यक्रमों, प्रशिक्षण सामग्री और प्रशिक्षित स्वास्थ्य पेशेवरों के डेटाबेस का एक केंद्रीय भंडार है. इस प्रकार के उपकरण महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अगर वन हेल्थ मिशन को नियमित आकार देना है, तो इसे प्रबंधकों, शिक्षकों, प्रशिक्षकों और जिला-स्तरीय अधिकारियों तक व्यापक रूप से पहुंचना होगा.
इस नज़रिए से देखा जाए तो, एनआईएचएफडब्ल्यू जैसी संस्थाएं व्यवस्था को हाशिये से समर्थन देने से कहीं ज्यादा काम करती है. इससे ये निर्धारित करने में मदद मिल सकती है कि, क्या यह कार्यक्रम वन हेल्थ एक्सपर्ट्स के दायरे तक ही सीमित रहेगा या मुख्यधारा के लोक प्रशासन में प्रवेश करेगा. वे विभिन्न क्षेत्रों में साझा शिक्षण स्थान बना सकती हैं, कार्यकारी और सेवाकालीन प्रशिक्षण का विस्तार कर सकती हैं, और सबूत के इस्तेमाल और सार्वजनिक तर्क की आदतों को मज़बूत कर सकती हैं. भारत में वन हेल्थ के क्षेत्र में अगली उपलब्धियां नए ढांचे तैयार करने पर कम और इस बात पर ज्यादा निर्भर हो सकती हैं कि, क्या इस तरह की संस्थाओं का उपयोग एक ऐसे कार्यबल को प्रशिक्षित करने के लिए किया जाता है, जो इसे प्रभावी ढंग से संचालित करने में सक्षम हो.
प्रशिक्षण से होती है संस्थागत विश्वास की शुरुआत
स्वास्थ्य प्रणालियों पर जनता के भरोसे की चर्चा अक्सर इस तरह की जाती है, जैसे कि ये सिर्फ संदेश देने की समस्या हो. व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखें तो, भरोसा बहुत पहले और बहुत ही शांत तरीकों से बनता है. ये तब बनता है, जब संस्थाएं समय पर प्रतिक्रिया देती हैं, जब जमीनी स्तर के अधिकारी जानते हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं कहना है, जब दिशा-निर्देश बिना स्पष्टीकरण के नहीं बदलते हैं, और जब राज्य के विभिन्न हिस्से सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे का खंडन नहीं करते हैं. नागरिकों का सामना अक्सर "स्वास्थ्य प्रणाली" के अमूर्त रूप से नहीं होता. उनका सामना अक्सर जिला अधिकारी, अस्पताल प्रशासक, निगरानी कर्मी, हेल्पलाइन, ट्रेनिंग मैनुअल या स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र से होता है. विज्ञान पर उनका भरोसा इस बात पर निर्भर करता है कि, ये संपर्क बिंदु सक्षम, निष्पक्ष और तैयार होते हैं या नहीं.
सार्वजनिक स्वास्थ्य का भविष्य ना सिर्फ मज़बूत निगरानी, बेहतर प्रयोगशालाओं या अधिक महत्वाकांक्षी अभियानों पर निर्भर करेगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या सार्वजनिक संस्थान ऐसा कार्यबल तैयार कर सकते हैं, जो विश्वास जगा सके. प्रशिक्षण संस्थानों की इसमें एक विशिष्ट भूमिका है क्योंकि वे संकट से पहले ही प्रशासन की संस्कृति को आकार देते हैं.
इसीलिए प्रशिक्षण को संस्थागत विश्वास निर्माण के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए. सार्वजनिक संस्थाएं सिर्फ तकनीकी मार्गदर्शन जारी करने से विश्वसनीय नहीं बन जातीं. वे तब विश्वसनीय बनती हैं, जब उनके कर्मचारियों को दबाव में विवेक का इस्तेमाल करने, भ्रम पैदा किए बिना अपनी बात रखने और नियमों को निरंतरता के साथ लागू करने का प्रशिक्षण दिया जाता है. एक सुव्यवस्थित प्रशिक्षण प्रणाली पर आमतौर पर भरोसा करना आसान होता है.
भारत के लिए, इससे एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है. सार्वजनिक स्वास्थ्य का भविष्य ना सिर्फ मज़बूत निगरानी, बेहतर प्रयोगशालाओं या अधिक महत्वाकांक्षी अभियानों पर निर्भर करेगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या सार्वजनिक संस्थान ऐसा कार्यबल तैयार कर सकते हैं, जो विश्वास जगा सके. प्रशिक्षण संस्थानों की इसमें एक विशिष्ट भूमिका है क्योंकि वे संकट से पहले ही प्रशासन की संस्कृति को आकार देते हैं. नीतिगत घोषणाओं की तुलना में ये योगदान भले ही मामूली लगे, लेकिन अक्सर यही निर्धारित करता है कि जनता उन नीतियों को विश्वसनीय कार्रवाई के रूप में देखती है या सिर्फ औपचारिक भाषा की एक और हिस्से के रूप में.
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Dr. Sunil Vilasrao Gitte is Director at the National Institute of Public Health Training and Research, Ministry of Health and Family Welfare, Government of India. ...
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