मोदी-इशिबा बैठक भारत-जापान सहयोग को एक नई सिरे से सोचने का संकेत देती है जो एक स्थिर संबंधों के दौर से परिवर्तनकारी दौर की ओर बदलाव का संकेत देते हैं.
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के बीच 29-30 अगस्त, 2025 को जापान में हुई बैठक ने नई दिल्ली और टोक्यो के बीच रणनीतिक सहयोग की दिशा में एक दूरदर्शी मार्ग प्रशस्त किया है. हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की यह आठवीं जापान यात्रा थी, लेकिन यह मुलाकात ऐतिहासिक है क्योंकि इशिबा के साथ भारत का यह पहला स्टैंडअलोन शिखर सम्मेलन है. इस बैठक ने आर्थिक, सुरक्षा, तकनीकी और लोगों से लोगों के बीच के संबंधों में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने का काम किया है. यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा हाल ही में भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के सवाल पर वाशिंगटन की ओर से भिन्न-भिन्न संकेत आ रहे हैं.
भारत और जापान के बीच अगले दशक के लिए एक व्यापक "जोइंट विज़न" की नींव रखना इस सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक था. यह ढांचा सुरक्षा, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और मानव संसाधन सहित प्रमुख क्षेत्रों में आपसी सहयोग में विस्तार की बात करता है. उल्लेखनीय बात यह है कि जापान ने अगले दस वर्षों में भारत में अपने निवेश को 2024 के स्तर (लगभग 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) से बढ़ाकर (68 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 10 ट्रिलियन येन) करने की प्रतिबद्धता जाहिर की है. पूंजी के प्रवाह के अलावा, दोनों नेताओं ने एक जेनेरशनल पीपल टू पीपल आदान-प्रदान कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की बात कही है. इस कार्यक्रम का लक्ष्य जापान की बूढ़ा होती आबादी की संरचनात्मक श्रम बल के क्षेत्र में कमी को कम करने और भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिए आने वाले पांच वर्षों में जापान में 500,000 भारतीय छात्रों और श्रमिकों को भेजने के लक्ष्य को लेकर दोनों देश काम करेंगे.
तकनीकी और बुनियादी ढांचागत सहयोग इस सम्मेलन का प्रमुख मुद्दा रहा. मोदी और इशिबा ने साथ में हाई-स्पीड रेल सहयोग के प्रतीक रूप में शिंकानसेन बुलेट ट्रेन में सेंदाई तक यात्रा की और यह घटना भारत को अत्याधुनिक जापानी रेल प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण का संकेत भी है. भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना जो मुंबई और अहमदाबाद के बीच का कॉरिडोर है, उसको इस हस्तांतरण से लाभ होना तय है. यह एक महत्वपूर्ण कदम है. भारत की योजना 7,000 किलोमीटर लंबा घरेलू हाई-स्पीड रेल नेटवर्क विकसित करने की है. मोदी और इशिबा ने टोक्यो इलेक्ट्रॉन सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट फैसिलिटी का भी निरीक्षण किया. सेमीकंडक्टर क्षेत्र में संयुक्त निवेश, निर्माण, परीक्षण और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण के अवसरों को इससे बल मिला है. रणनीतिक रूप से, शिखर सम्मेलन ने क्वाड समूह (जिसमें भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं) और एक शांतिपूर्ण, रूल-बेस्ड हिंद-प्रशांत को बनाए रखने के लिए दोनों राष्ट्रों की प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई. किसी भी देश का नाम लिए बिना, मोदी और इशिबा ने पूर्वी और दक्षिण चीन सागर में यथास्थिति में एकतरफा बदलावों पर चिंता व्यक्त की. यह चिंता व्यापक क्षेत्रीय तनावों, विशेष रूप से चीन के साथ, के बढ़ने का एक स्पष्ट संकेत भी है.
उल्लेखनीय बात यह है कि जापान ने अगले दस वर्षों में भारत में अपने निवेश को 2024 के स्तर (लगभग 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) से बढ़ाकर (68 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 10 ट्रिलियन येन) करने की प्रतिबद्धता जाहिर की है.
जिओपॉलिटिकल दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह शिखर सम्मेलन कई बातों को आगे बढ़ाने वाला है. पहली बात, जापान की ओर से बड़े निवेश के करार और बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रति ठोस समर्थन भारत को एक रणनीतिक विकास के भागीदार के रूप में स्थापित करता है और यह बात क्षेत्रीय आर्थिक समीकरणों को संतुलित करता है, विशेष रूप से चीन के नेतृत्व के विषय को लेकर. दूसरी बात, ‘पीपल टू पीपल’ आदान-प्रदान की पहल सॉफ्ट पावर संबंधों को आगे बढ़ाने का काम करती है और श्रम गतिशीलता के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य पहलू को बखूबी संतुलित करने का काम करती है जो कि जापान की जनसांख्यिकीय चुनौती और भारत के युवा कार्यबल के बीच समन्वय बिठाने का काम करती है. तीसरी बात, हाई-स्पीड रेल और सेमीकंडक्टर सहयोग भारत को, विविधताओं से भरे और लचीले वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बीच, मजबूत दावेदार रूप में पेश करता है. यह बात अमेरिकी और चीन के बीच व्यापार में आए तनाव और तकनीकी संप्रभुता के लिए विश्व भर में मची होड़ को देखते हुए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. अंततः क्वाड के समीकरण एक साझा हिंद-प्रशांत की सोच की पुष्टि करता है और बहुपक्षीय रणनीतिक पहलू को मजबूती प्रदान करता है और यह विशेष रूप से मानदंडों पर आधारित एक क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में मददगार होगी.
इस पूरे मामले में भारत का रुख़ कूटनीति में एक व्यावहारिक सोच को दर्शाता है. जहां एक तरफ जापान के साथ घनिष्ठता का मार्ग प्रशस्त किया गया वहीं दूसरी ओर चीन के साथ एक आउटरीच द्वारा इस पूरी पहल का पूरक भी तैयार था. यह तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की चर्चाओं द्वारा रेखांकित किया गया. यह “दोहरी कूटनीति” भारत की इस स्वीकार्यता को रेखांकित करती है कि हिंद-प्रशांत में इसके दीर्घकालिक हितों को किसी एक शक्ति की ओर विशेष झुकाव से प्रभावी ढंग से पूरा नहीं किया जा सकता. नई दिल्ली का झुकाव इस तरफ है कि किसी विशेष शक्ति की ओर झुकाव के बजाय "रणनीतिक स्वायत्तता" को सतत रूप से आगे बढ़ाया जाए. यह एक सोची समझी रणनीतिक दृष्टि से लिया गया महत्वपूर्ण कदम है जो एक अत्यधिक ध्रुवीकृत क्षेत्रीय समीकरणों के बीच भारत के लाभ को अधिकतम रखने के लिए डिज़ाइन किया गया एक साथ कई भागीदारों के साथ जुड़ाव का मार्ग बनाता है.
भारत की योजना 7,000 किलोमीटर लंबा घरेलू हाई-स्पीड रेल नेटवर्क विकसित करने की है.
प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के साथ हुआ टोक्यो शिखर सम्मेलन भारत-जापान संबंधों को मजबूत करने की ओर एक ठोस कदम है. भारत के लिए यह द्विपक्षीय संबंध न केवल उन्नत प्रौद्योगिकी और पूंजी तक पहुंच प्रदान करता है बल्कि यह एक नियम-आधारित हिंद-प्रशांत को आकार देने में एक समान विचारधारा वाला भागीदार भी प्रदान करता है. मोदी और इशिबा का एक साथ शिंकानसेन की सवारी करने का कदम जापानी निवेश और भारत के आधुनिकीकरण अभियान के लिए समर्थन के ठोस वादों की वकालत करता है. ये घटनाक्रम एक अस्थिर वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक सुसंगत भागीदार के रूप में टोक्यो के प्रति नई दिल्ली के विश्वास को गहरा करने के मकसद को भी रेखांकित करते हैं.
जापान के साथ इस गति को मजबूत करने के लगभग तुरंत बाद, मोदी ने तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग के साथ बातचीत की. इस मुलाकात ने चीन के साथ अपने संबंधों की भौगोलिक और रणनीतिक वास्तविकताओं की ओर प्रकाश डाला. हाल के महीनों में भारत-चीन सीमा पर तनाव कम हुआ है लेकिन संदेह की स्थिति सावधानीपूर्वक संभालने की आवश्यकता होगी. भारत ने यह साफ़ संकेत दिया है कि वह बीजिंग के साथ पूरी तरह से संबंध विच्छेद नहीं कर रहा है क्योंकि दोनों देशों की आर्थिक निर्भरता और BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय प्लेटफार्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं. इसलिए, शी के साथ मोदी का आउटरीच सुलह के बारे में कम और यह सुनिश्चित करने के बारे में अधिक था कि संवाद के चैनल खुले रहें जिससे भारत अन्य हिंद-प्रशांत के लोकतंत्रों के साथ अपनी सुरक्षा सहयोग को मजबूत करें और गलतफहमी के जोख़िमों को कम किया जा सके.
यह ड्यूल नीति एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रति भारत के सावधानीपूर्वक बढ़ते कदम को दर्शाती है. टोक्यो बैठक ने क्वाड जैसे लोकतांत्रिक गठबंधनों के भीतर नई दिल्ली की स्थिति को मजबूत किया है जिससे एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत के दृष्टिकोण को मजबूती मिली है. वहीं भारत के SCO में भागीदारी से संकेत मिलता है कि भारत उन प्लेटफार्मों को नहीं छोड़ेगा जहां चीन और रूस तीसरे देशों की ओर से प्रभाव बनाए रखते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि रणनीतिक विभाजनों में एक प्रासंगिक आवाज बनी रहे. इसलिए, मोदी की कूटनीति भारत को उन्नत लोकतंत्रों के लिए एक विश्वसनीय भागीदार और हिंद-प्रशांत में एक अपरिहार्य अभिनेता दोनों के रूप में प्रस्तुत करने में निहित थी.
यह “दोहरी कूटनीति” भारत की इस स्वीकार्यता को रेखांकित करती है कि हिंद-प्रशांत में इसके दीर्घकालिक हितों को किसी एक शक्ति की ओर विशेष झुकाव से प्रभावी ढंग से पूरा नहीं किया जा सकता. नई दिल्ली का झुकाव इस तरफ है कि किसी विशेष शक्ति की ओर झुकाव के बजाय "रणनीतिक स्वायत्तता" को सतत रूप से आगे बढ़ाया जाए.
जापान और चीन के साथ मोदी द्वारा बनाई जा रही नई व्यवस्था समय आधारित न होकर विविधीकरण की रणनीति को रेखांकित करती है. चीन के साथ संबंधों को नुकसान न पहुंचाते हुए, जापान के साथ संबंधों में और अधिक निवेश करके, नई दिल्ली का लक्ष्य रणनीतिक सहयोग को अधिकतम करना और एक ऐसे क्षेत्र में अपनी स्वायत्तता को मजबूत करना है जो बड़े रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता से भरा है.
मोदी-इशिबा बैठक भारत-जापान सहयोग को एक नई सिरे से सोचने का संकेत देती है जो एक स्थिर संबंधों के दौर से परिवर्तनकारी दौर की ओर बदलाव का संकेत देते हैं. यह बदलाव एक दशक तक असर रखने वाले एक बहु-क्षेत्रीय साझेदारी के लिए बन रहे आधार को मजबूत करने का काम करते हैं. अवसंरचनात्मक आधुनिकता, तकनीकी नवाचार, आर्थिक लचीलापन और रणनीतिक समीकरणों को और आगे ले जाती है. भारत की व्यापक हिंद-प्रशांत के नीति निर्धारण के लिए, यह जापान यात्रा रणनीतिक साझेदारी में विविधता लाने, लोकतांत्रिक कन्वर्जन्स को मजबूत करने और साझा मूल्यों और बुनियादी ढांचे पर टिकी एक बहुध्रुवीय क्षेत्रीय व्यवस्था को आकार देने के प्रति नई दिल्ली के इरादे को रेखांकित करती है.
प्रत्नश्री बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक एसोसिएट फेलो हैं.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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