कामकाज का ‘गिग मॉडल’ भारत की अर्थव्यवस्था को नया आकार दे रहा है, लेकिन एल्गोरिदम के आधार पर काम का बंटवारा और कानूनी सुरक्षा का अभाव कामगारों के सामने चुनौतियां खड़ी कर रहा है. इससे नीति और शासन को लेकर महत्वपूर्ण सवाल पैदा होते हैं.
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कोविड-19 महामारी के बाद, दुनिया भर के श्रम बाजार में अभूतपूर्व बदलाव आया है, जिसे तकनीकी प्रगति का भरपूर साथ मिला. भारतीय अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रही. डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के उभरने से देश में नए रास्ते खुल रहे हैं और उत्पादों व सेवाओं के उत्पादन व वितरण का दायरा बढ़ रहा है. इस वज़ह से ऑनलाइन गिग कामगारों या फ्रीलांसरों (अस्थायी या कम समय की नौकरी करने वाले लोग) की मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी है. गिग प्लेटफ़ॉर्म भारत के शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में अहम अंग बनते जा रहे हैं, जिससे नियोक्ता और कर्मचारी के पारंपरिक संबंधों में कायम वर्षों पुरानी विषमताएं ख़त्म हो रही हैं. किराने के सामान की आपूर्ति, घरेलू कामकाज में मदद, देखभाल संबंधी सेवाओं से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक, और निजी व सार्वजनिक संस्थाओं में सुदूर जगहों से एक स्वतंत्र सलाहकार की हैसियत से काम करने तक, गिग कामगार हर व्यक्ति तक संसाधनों की पहुंच को एक नया आकार दे रहे हैं और सेवा वितरण का काम आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि, वे भारत की अर्थव्यवस्था में एक ज़रूरी हिस्से के रूप में बेशक मौजूद हैं, लेकिन उनसे जुड़ी नीतियों, जवाबदेही, श्रम कानून और ज़रूरी विधायी व्यवस्था को लेकर अब भी स्पष्टता नहीं है.
साल 2020 में, भारत के श्रम और रोज़गार मंत्रालय ने गिग कामगारों को ‘एक ऐसे व्यक्ति’ के रूप में परिभाषित किया है, ‘जो नियोक्ता और कर्मचारी के पारंपरिक संबंधों से अलग काम करता है या कामकाजी व्यवस्था में भाग लेता है और इसी तरह के काम से अपनी कमाई करता है.’ वर्ष 2022 में नीति आयोग ने ‘भारत में तेज़ी से बढ़ती गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया है कि भारत में गिग कामगारों की संख्या 2020-21 में 77 लाख थी, जो 2029-30 तक बढ़कर 2.35 करोड़ हो सकती है. घर-घर डिलीवरी करने और रोजाना के आवागमन में मदद करने जैसी ज़रूरी शहरी सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद, इस श्रम-बल का 98 प्रतिशत हिस्सा साल में 5,00,000 रुपये भी नहीं कमा पाता, इनमें से भी करीब 77.6 प्रतिशत गिग कामगार सालाना 2,50,000 रुपये या उससे कम कमाते हैं. हालांकि, उनकी कमाई काफी हद तक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म द्वारा एकतरफा नियंत्रित की जाने वाली एल्गोरिदम गणनाओं पर भी निर्भर करती है. वास्तव में, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ही उनके कामकाज की रेटिंग, काम का मूल्यांकन और आमदनी तय करते हैं. मनमर्जी काम करने का लुभावना ऑफर देकर इन कामगारों को न्यूनतम वेतन, वेतन सहित अवकाश, चिकित्सा बीमा और अन्य स्वास्थ्य लाभों व सुविधाओं जैसे ज़रूरी बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जाता है. कोरोना महामारी के दौरान बढ़-चढ़कर काम करने के बावजूद, गिग कामगारों को आज भी ज़रूरी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल रही. जैसे-जैसे शहरी और ग्रामीण इलाकों में आख़िरी छोर तक सेवाओं को पहुंचाने के लिए ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, इनके लिए शासन व्यवस्था सार्वजनिक संस्थाओं से अपारदर्शी एल्गोरिदम की ओर बढ़ चली है.
साल 2020 में, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता के माध्यम से भारतीय गिग कामगारों को पहली बार श्रम कानूनों में शामिल किया और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को अनिवार्य बनाया. इसी संदर्भ में, राजस्थान सरकार ने 2023 में एक ऐतिहासिक पहल की और ‘राजस्थान प्लेटफ़ार्म आधारित गिग कर्मकार (पंजीकरण एवं कल्याण) अधिनियम’ पारित किया, जिसके तहत एक कल्याण बोर्ड का गठन करने और इन कामगारों के कामकाज से जुड़े मानदंडों व परिवेश को नियमों के अंतर्गत लाने के लिए एक कल्याण कोष की स्थापना करने का प्रावधान किया गया. निश्चय ही, ये महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन इसमें ढांचा और क्रियान्वयन, दोनों ही मामले में लक्ष्य तक पहुंचना कठिन हो सकता है. आलोचकों ने तो इसकी कुछ सीमाओं का भी जिक्र किया है, जैसे- ‘प्राथमिक नियोक्ता’, ‘एग्रीगेटर’ यानी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और ‘गिग कामगार’ के बीच परिभाषा संबंधी अस्पष्टता; कल्याण बोर्ड के लिए प्राथमिक नियोक्ता और एग्रीगेटर से वसूले जाने वाले प्लेटफ़ॉर्म उपकर; एग्रीगेटर नियमों का पालन कर सकें, इसके लिए प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े कामगारों के अधिकारों का अभाव; और शिकायतों को दूर करने वाले तंत्र में अस्पष्टता, जो गिग कामगारों को बोर्ड के विरुद्ध शिकायत दर्ज करने की अनुमति तो देता है, एग्रीगेटर के विरुद्ध नहीं. साफ़ है, गिग कामगारों की बेहतरी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होने के बावजूद, राजस्थान का प्लेटफ़ॉर्म अधिनियम एक ‘टॉप-डाउन मॉडल’ (समस्या को समग्रता और व्यापकता में देखना, न कि क्षेत्रवार मुद्दों का समाधान करना) को ही आगे बढ़ाता है, जो इस व्यवस्था में नियंत्रण, मूल्य निर्धारण और एकतरफा नियम बनाने संबंधी विषमताओं को दूर करने के लिए एक नाकाफी प्रयास है.
कोरोना महामारी के दौरान बढ़-चढ़कर काम करने के बावजूद, गिग कामगारों को आज भी ज़रूरी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल रही.
विश्व स्तर पर, तमाम सरकारें गिग कामगारों की सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म द्वारा हो रहे शोषण को रोकने की दिशा में काम कर रही हैं. विधायिकाएं और अदालतें गिग कामगारों को ‘कर्मचारी’ या ‘आश्रित संविदाकार’ का दर्जा देने लगी हैं. इस मामले में 2021 का उबर बनाम असलम का मुकदमा ऐतिहासिक है, जिसमें ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उबर ड्राइवर- जिन्हें कंपनी स्वतंत्र संविदाकार मानती है- वास्तव में, ब्रिटेन के कानूनों के मुताबिक ‘कर्मचारी’ हैं और इसीलिए वे न्यूनतम वेतन और वेतन सहित छुट्टी जैसी बुनियादी सुरक्षा के हकदार हैं. इस तरह, इस फ़ैसलों में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि गिग कामगारों की असल समस्याओं को कानून में शामिल करना चाहिए, न कि कंपनियों द्वारा तय किए गए नियमों को. कई अन्य अदालतों ने भी इस फ़ैसले की तरह आदेश सुनाया है. स्पेन के ‘ले राइडर’ (कानून) में खाना बांटने वाले प्लेटफ़ॉर्म को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि वे चालकों (राइडर) से औपचारिक रोज़गार अनुबंध करेंगे, उनको एल्गोरिदम बताएंगे और उनके अधिकारों को अपनाएंगे. यूरोपीय संघ (EU) के मसौदा निर्देश में गिग काम को रोज़गार मानने का प्रावधान किया गया है, जब तक कि प्लेटफ़ॉर्म यह साबित न कर दे कि कामगार से उसका रोजगार संबंधी रिश्ता नहीं है. दक्षिण कोरिया के फेयर ट्रेड कमीशन ने पूर्वाग्रह मानसिकता के साथ एल्गोरिदम से छेड़छाड़ करने के कारण ‘राइड’, यानी आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनियों पर हाल ही में दंड लगाया है.
भारत विदेश में हो रहे इन प्रयासों के अनुसार अपने यहां भी गिग कामगारों की सुरक्षा, एल्गोरिदम में पारदर्शिता और उनके कामकाज को औपचारिक बनाने का प्रयास करते हुए एक कानूनी ढांचा बना सकता है. क्षेत्रवार नियम बनाने से मूल्य निर्धारण करने, कामकाजी माहौल को बेहतर बनाने और डाटा संचालित नियमों में सुधार लाने में मदद मिल सकती है. इससे खंड-खंड में बंटे राज्य श्रम कानूनों और राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी निगरानी के बीच जो खाई बनी हुई है, उसे भी ख़त्म किया जा सकता है.
गिग कामगारों की बेहतरी के लिए ज़रूरी है कि प्रौद्योगिकी, श्रम अधिकारों और शहरी शासन को आपस में जोड़ने वाला एक अंतर-क्षेत्रीय नज़रिया अपनाया जाए. प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक उपयोगिता के बीच के अंतर को ख़त्म करते हुए, गिग कामगारों को बड़े शहरी बुनियादी ढांचे में एक अनिवार्य अंग के रूप में शामिल करना होगा. चूंकि अंतिम छोर तक जुड़ाव में ये सहायक होते हैं, इसलिए सार्वजनिक उपयोगिता के अनुसार उनकी कार्यक्षमता को लेकर नियम बनाए जाने चाहिए.
उबर बनाम असलम का मुकदमा ऐतिहासिक है, जिसमें ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उबर ड्राइवर- जिन्हें कंपनी स्वतंत्र संविदाकार मानती है- वास्तव में, ब्रिटेन के कानूनों के मुताबिक ‘कर्मचारी’ हैं और इसीलिए वे न्यूनतम वेतन और वेतन सहित छुट्टी जैसी बुनियादी सुरक्षा के हकदार हैं.
इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण कदम यह भी हो सकता है कि इनके लिए समर्पित एक नियामक प्राधिकरण- प्लेटफ़ॉर्म यूटिलिटीज़ कमीशन (PUC) बनाया जाए, जो ठीक उसी तरह काम करे, जिस तरह केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CREC) या भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) जैसे आयोग काम करते हैं. PUC का काम मूल्य निर्धारण करना, एल्गोरिदम संबंधी जवाबदेही तय करना, सेवाओं का बंटवारा करना और श्रमिक अधिकारों का प्रबंधन करना होना चाहिए. इसके अलावा, गिग प्लेटफ़ॉर्म को कानूनी रूप से अपने कर्मचारियों को यह बताने के लिए भी मजबूर किया जाना चाहिए कि किस तरह कामगारों में काम बांटा जाता है और उनकी कमाई किस तरह तय की जाती है, क्योंकि एल्गोरिदम संबंधी पारदर्शिता ही इस व्यवस्था की निष्पक्षता की कुंजी है. डाटा आधारित भेदभाव को रोकने के लिए नियामकों और कामगारों, दोनों के लिए न सिर्फ सूचनाएं सुलभ होनी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे इसकी आसानी से जांच-पड़ताल कर सकें.
यह समय की मांग है कि खंडित कल्याणकारी योजनाओं से ऊपर उठकर अब अधिकारों, पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी के आधार पर तैयार नियमों की ओर कदम बढ़ाया जाए. इसके साथ ही उचित मूल्य निर्धारण, जवाबदेही और कामगारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इसमें इरादों की नहीं, बल्कि एक मज़बूत और सशक्त नियामक ढांचे की कमी है. गिग कामगारों को लेकर भारत के मौजूदा नज़रिये में ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को नियंत्रित करने के लिए संस्थागत अधिकार और नीतिगत कल्पनाशीलता का अभाव दिखता है. इसके लिए ज़रूरी है कि प्लेटफ़ॉर्म आधारित काम को सिर्फ़ तकनीक-संचालित सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि एक मुख्य बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जाए. डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियाद जो बनाकर रखते हैं, उन लोगों के काम के लिए एक अधिकार-आधारित और मज़बूत नियामक ढांचे की सख़्त ज़रूरत है. दया-भाव के बजाय कानून के माध्यम से ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को नियंत्रित करके भारत आने वाले दिनों में गिग कामगारों के लिए कहीं अधिक समावेशी, जवाबदेह और वैश्विक रूप से प्रासंगिक मॉडल तैयार कर सकता है.
(स्वाति प्रभु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं)
(प्रिशा बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता में रिसर्च इंटर्न हैं)
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Dr Swati Prabhu is a Fellow with the Centre for New Economic Diplomacy at Observer Research Foundation. Her research explores the idea of aid, role of ...
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