Author : Georgi Asatryan

Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 26, 2025 Updated 18 Hours ago

भारत ने जिस प्रकार से पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका की तरफ से थोपे गए टैरिफ के दबाव का सामना करते हुए रूस के साथ अपने कच्चे तेल के आयात को जारी रखा है, उससे ज़ाहिर होता है कि कैसे  बाहरी दबावों के बावज़ूद कोई देश अपनी संप्रभुता की रक्षा कर सकता है और वैश्विक व्यवस्था को एक नया आकार दे सकता है.

तेल से डॉलर तक: कैसे भारत का प्रतिरोध बदल रहा है वैश्विक राजनीति का खेल

वैश्विक स्तर पर तमाम देशों के कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि महाशक्तियों का दबाव इनमें बहुत बड़ी भूमिका निभाता है और अक्सर इसके चलते ही ऐसे नतीज़े सामने आते रहे हैं, जो छोटे और कमज़ोर राष्ट्रों के मुताबिक़ नहीं रहे हैं. ज़ाहिर है कि ताक़तवर देशों के पास सैन्य शक्ति बहुत ज़्यादा होती है और उनकी आर्थिक ताक़त भी बहुत अधिक होती है, ऐसे में इन देशों के पास कमज़ोर और कम संसाधन वाले राष्ट्रों पर दबाव डालने, उन्हें तमाम मामलों में छूट देने के लिए बाध्य करने और अपने रणनीतिक मकसदों को पूरा करने के लिए उन्हें मज़बूर करने की क्षमता होती है. प्राचीन यूनानी इतिहासकार और राजनीतिक दार्शनिक थ्यूसीडाइड्स ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘दि हिस्ट्री ऑफ दि पेलोपोनेसियन वॉर’ यानी ‘पेलोपोनेसियन युद्ध का इतिहास’ में लिखा है कि "ताक़तवर वही करते हैं, जो उनकी शक्ति में है, और कमज़ोर वही सहते हैं, जो उन्हें सहना पड़ता है" उनकी इस बात से साबित होता है कि देशों के बीच ताक़त और दबाव का खेल हमेशा चलता रहता है. हालांकि, यह खेल हमेशा एक सा नहीं होता है, बल्कि ताक़त और दबाव के दांव-पेंच लगातार बदलते रहते हैं. इतिहास और वर्तमान में तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जहां कई देशों पर जब किसी ताक़तवर राष्ट्र का बाहरी दबाव पड़ा, तो वो उसके आगे झुका नहीं, बल्कि समझदारी से उसका सामना किया और उन हालातों में भी अपनी स्वतंत्र नीति का अनुसरण करते हुए न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की, बल्कि बेहतर रणनीतिक विकल्प अपनाकर मज़बूत भी हुए. कहने का मतलब है कि शक्तिशाली देश अपना दबदबा बनाने के लिए कमज़ोर देशों पर मनमाना प्रभाव जमाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई मामलों में कमज़ोर देश अपनी खुद की क्षमताओं के बल पर उन बाहरी दबावों का सामना करते हैं और सिर्फ़ सशक्त बनकर ही नहीं उभरते हैं, बल्कि अपने संप्रभुता और स्वतंत्रता को भी सशक्त करते हैं.

करवट लेती वैश्विक व्यवस्था 

वर्तमान दौर में वैश्विक व्यवस्था भारी उथल-पुथल से गुजर रही है. मौज़ूदा समय में एकध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था गुजरे जमाने की बात होती जा रही है और एक बहुकेंद्रीय वैश्विक व्यवस्था आकार ले रही है. यानी अब किसी एक देश के वर्चस्व का दौर समाप्त हो रहा है और वैश्विक स्तर पर शक्ति के कई केंद्र उभर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में यह परिवर्तन वैश्विक दक्षिण के देशों, ख़ास तौर पर ब्रिक्स देशों यानी ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका द्वारा अपनी स्वतंत्र विदेश नीतियां अपनाने और संप्रभुता को बरक़रार रखने के लिए अपनाए गए दृढ़ रवैये की वजह से दिखाई दे रहा है. ग्लोबल साउथ के देशों में भारत ने अपनी नीतियों में राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है और किसी भी दबाव में नहीं झुकने का हौसला दिखाया है. विशेष रूप से हालिया ऊर्जा नीतियों और ऊर्जा सेक्टर को लेकर लिए गए फैसलों में भारत की यह दृढ़ता साफ दिखती है. देखा जाए तो हाल के वर्षों में ऊर्जा व्यापार के मामले में भारत ने अपना रवैया बदला है और इससे जुड़ी नीतियों में ख़ासा बदलाव किया है. ज़ाहिर है कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भारत के क्रूड ऑयल के कुल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी क़रीब 1 प्रतिशत ही थी. यूक्रेन युद्ध के बाद इसमें ज़बरदस्त बढ़ोतरी दर्ज़ की गई और साल 2024 तक भारत द्वारा आयातित कच्चे तेल में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई. यानी रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश बन गया और इसने भारत के इराक़ व सऊदी अरब जैसे पारंपरिक क्रूड ऑयल आपूर्तिकर्ताओं को पीछे छोड़ दिया. निसंदेह रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाज़ारों की स्थिति में बदलाव हुआ है और इसी के चलते भारत को रूस से आपूर्ति होने वाले कच्चे तेल की मात्रा कई गुना बढ़ गई. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत को रूस से कम दामों पर तेल आयात का मौक़ा मिला और उसने इसका भरपूर लाभ उठाया.

थ्यूसीडाइड्स ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘दि हिस्ट्री ऑफ दि पेलोपोनेसियन वॉर’ यानी ‘पेलोपोनेसियन युद्ध का इतिहास’ में लिखा है कि "ताक़तवर वही करते हैं, जो उनकी शक्ति में है, और कमज़ोर वही सहते हैं, जो उन्हें सहना पड़ता है"

भारत ने साल 2024 में रूस से रोज़ाना लगभग 18 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया, जो कि उस अवधि के दौरान रूस के कुल तेल निर्यात का क़रीब 37 प्रतिशत था. सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के मुताबिक़ भारत ने वर्ष 2022 की शुरुआत से रूस से लगभग 13.39 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कच्चा तेल ख़रीदा है. इस अवधि के दौरान रूस को कच्चे तेल के निर्यात से होने वाली कुल आय में भारत को निर्यात से होने वाली आय की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से ज़्यादा रही है.

रूस से लगातार कच्चे तेल का आयात करने पर भारत के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है. इसमें 25 प्रतिशत स्टैंडर्ड टैरिफ और 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ शामिल है. अमेरिका के इस क़दम को कहीं न कहीं भारत को अपनी ऊर्जा व्यापार नीति में बदलाव के लिए मज़बूर करने की कोशिश माना जा रहा है. हालांकि, भारत की ओर से हमेशा कहा गया है कि उसे अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए दूसरे देशों के साथ आर्थिक साझेदारियां करने का पूरा अधिकार है. भारत ने पुरज़ोर तरीक़े से यह भी कहा है कि वह अपनी ऊर्जा नीति किसी राजनीतिक गठबंधन के बजाय बाज़ार की वास्तविकताओं, आर्थिक फायदे के विकल्पों और रणनीतिक ज़रूरतों के आधार पर तय करता है.

वाशिंगटन की ओर से उठाए गए क़दमों को भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने "अन्यायपूर्ण और औचित्यहीन" करार देते हुए साफ तौर पर कहा है कि भारत के लिए अपने राष्ट्रीय हित व आर्थिक सुरक्षा सर्वोपरि है और वह इसके लिए हर मुमकिन क़दम उठाएगा. रूस से कच्चा तेल ख़रीदने पर आलोचना करने वाले अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए भारत सरकार ने साफ लफ़्जों में कहा कि अमेरिका इस मामले में दोहरी नीति अपना रहा है. यानी एक तरफ अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम, पैलेडियम, उर्वरक और रासायनिक उत्पादों का आयात कर रहा है और दूसरी ओर भारत पर क्रूड ऑयल का आयात रोकने का दबाव बना रहा है, जो कि बिलकुल अनुचित है.

ऊर्जा से संप्रभुता की रक्षा

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि रूस के साथ भारत का क्रूड ऑयल आयात अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर उसके व्यावहारिक नज़रिए को ज़ाहिर करता है. इसके अलावा, इसके पीछे उसकी आर्थिक लाभ की सोच तो है ही, साथ ही रणनीतिक तौर पर भी भारत के लिए यह बेहद अहम है. दूसरे देशों के तमाम दबावों के बावज़ूद भारत ने न केवल रूस के साथ अपने ऊर्जा व्यापार को जारी रखा है, बल्कि ऐसा करके उसने संप्रभुता और राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को भी मज़बूत किया है. भारत का यह रवैया देखा जाए तो सैद्धांतिक रूप से पोस्ट-वेस्टर्न वर्ल्ड की धारणा को दिखाता है, जिसके मुताबिक़ पश्चिमी देशों के नियंत्रण वाली वैश्विक व्यवस्था कमज़ोर हो रही है और वैश्विक दक्षिण या पूर्व के नियंत्रण वाली व्यवस्था उसकी जगह ले रही है. यानी एक ऐसा बदलाव आकार ले रहा है, जिसमें भारत जैसी उभरती ताक़तों की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था निर्धारित करने में अहम भूमिका है.

वर्तमान दौर में वैश्विक व्यवस्था भारी उथल-पुथल से गुजर रही है. मौज़ूदा समय में एकध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था गुजरे जमाने की बात होती जा रही है और एक बहुकेंद्रीय वैश्विक व्यवस्था आकार ले रही है. यानी अब किसी एक देश के वर्चस्व का दौर समाप्त हो रहा है और वैश्विक स्तर पर शक्ति के कई केंद्र उभर रहे हैं. 

जिस प्रकार से भारत ने रूसी क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम पदार्थों के आयात को अपनी प्राथमिकता में रखा है, वो कहीं न कहीं दिखाता है कि ऊर्जा सुरक्षा भारत की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति के केंद्र में हैं और वह उसी के हिसाब से काम कर रहा है. भारत के एक वरिष्ठ राजनयिक ने हाल ही में बयान दिया था कि रूस ने भारत को "बेहद कम" दामों पर क्रूड ऑयल की आपूर्ति की है और इससे नई दिल्ली को अच्छा-ख़ासा आर्थिक फायदा हुआ है. यह भी कहा जाता है कि भारत और रूस के बीच क़रीब 90 प्रतिशत द्विपक्षीय लेन-देन रूबल और रुपये में होते हैं. इससे जहां दोनों देशों के बीच व्यापार में डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव का असर नहीं पड़ता है, वहीं इससे यह भी पता चलता है कि साउथ-साउथ व्यापार में क्षेत्रीय मुद्रा का उपयोग किया जा रहा है, जो व्यापार के नए तौर-तरीक़े विकसित करने की दिशा में बेहद अहम क़दम है.

डॉलर की जगह अपनी मुद्राओं में वित्तीय लेन-देन मौज़ूदा बदले हुए हालातों में बेहद अहम भी है और ज़रूरी भी है. दरअसल, भारत अपनी ज़रूरत के कच्चे तेल का क़रीब 85 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. ऐसे में रूस से किफायती क़ीमत पर मिलने वाले कच्चे तेल से भारत को आर्थिक तौर पर ख़ासा फायदा होता है और इससे उसके तेल आयातक देशों की सूची में विविधिता भी आती है. ज़ाहिर है कि यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस को अपने कच्चे तेल के निर्यात के लिए नए एशियाई बाज़ार मिले हैं और इससे वैश्विक ऊर्जा की आपूर्ति में व्यापक बदलाव आया है. ऐसे में भारत के लिए अपने क्रूड ऑयल आपूर्तिकर्ता देशों की सूची में रूस को जोड़ना बेहद अहम हो गया है.

ग्लोबल साउथ के देशों में आर्थिक स्वायत्तता को लेकर व्यापक विमर्श

भारत और रूस के बीच होने वाले व्यापार का वित्तीय लेन-देन अपनी राष्ट्रीय करेंसियों में करने का यह फैसला महज एक तकनीक़ी व्यवस्था या समन्वय नहीं है, बल्कि यह इससे कहीं बढ़कर है. देखा जाए तो यह एक प्रकार से जियो पॉलिटिक्स ऑफ मनी यानी ‘पैसों की भू-राजनीति’ को भी सामने लाता है. डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा में भुगतान करके नई दिल्ली ने जहां आर्थिक व्यावहारिकता को प्रदर्शित किया है, वहीं इसके ज़रिए यह भी जताने की कोशिश की है कि भारत अपनी वित्तीय संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध है. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक़ देशों द्वारा व्यापारिक लेनदेन में अपनी मुद्राओं का उपयोग वैश्विक स्तर पर बिखरी हुई मौद्रिक व्यवस्था को और अधिक प्रभावित करने में योगदान देता है. ज़ाहिर है कि बिखरी मौद्रिक व्यवस्था में डॉलर का वर्चस्व तो बना रहता है, लेकिन उसे तेज़ी से चुनौती मिलती है और उसके दबदबे में कमी आने लगती है. इस लिहाज़ से देखें तो रूस और भारत के बीच रूबल और रुपये में व्यापार केवल मज़बूत द्विपक्षीय रिश्तों को ही प्रकट नहीं करता है, बल्कि इसका प्रभाव इससे कहीं ज़्यादा है, जिसकी गूंज वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रही है. ग्लोबल साउथ के देशों में आर्थिक और व्यापारिक स्वायत्तता को लेकर व्यापक विमर्श चल रहा है, जिसमें कहा जा रहा है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं व्यापारिक लेनदेन के बहुपक्षीय तंत्र का निर्माण कर एकपक्षीय पारंपरिक कारोबारी तंत्र को चुनौती देना चाहती हैं. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ अमिताव आचार्य ने ऐसी व्यवस्था को ही "पदानुक्रमित उदार व्यवस्था" कहा है, यानी ऐसी व्यवस्था जिसमें पश्चिमी ताक़तें अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों को तय करती हैं. रूस व भारत के कारोबारी रिश्तों ने ऐसी विश्व व्यवस्था को चुनौती देने का काम किया है. इस तरह से देखें तो पास्परिक व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम करने के इस प्रयास को राजनीति से प्रेरित कार्रवाई माना जाना चाहिए, जिसके निहितार्थ केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा है.

रूस से कच्चा तेल ख़रीदने पर आलोचना करने वाले अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए भारत सरकार ने साफ लफ़्जों में कहा कि अमेरिका इस मामले में दोहरी नीति अपना रहा है. यानी एक तरफ अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम, पैलेडियम, उर्वरक और रासायनिक उत्पादों का आयात कर रहा है और दूसरी ओर भारत पर क्रूड ऑयल का आयात रोकने का दबाव बना रहा है, जो कि बिलकुल अनुचित है.

ब्लूमबर्ग की ख़बर के मुताबिक़ अमेरिका की ओर से भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ थोपने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात का सिलसिला फिर से शुरू कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों ने रूस से भारत के तेल आयात को अवैध ठहराने का प्रयास किया है. व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने पिछले दिनों फाइनेंशियल टाइम्स में अपने एक लेख में भारत द्वारा रूस से तेल ख़रीद पर ज़बरदस्त हमला बोला था. उन्होंने कहा था कि रूस से कच्चे तेल में अचानक बढ़ोतरी भारत की घरेलू मांग की वजह से नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे भारत की पेट्रोलियम लॉबी है, जिसे लाभ पहुंचाया जा रहा है. नवारो की तरह ही अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी कहा है कि रूस से कम दामों में मिलने वाले कच्चे तेल ने भारत के सबसे अमीर कारोबारियों और परिवारों की कमाई में ज़बरदस्त वृद्धि की है. उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से भारत के अमीर वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचाने का मामला है, क्योंकि वे रूस से सस्ता तेल ख़रीदकर बेचते हैं और मोटा मुनाफा कमाते हैं.

अमेरिकी मंत्रियों और अधिकारियों की ओर से की जा रही ये बयानबाज़ी और आलोचना देखा जाए तो उसकी दबाव बनाने वाली कूटनीति का ही हिस्सा है. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ जॉन मियर्सहाइमर और केनेथ वाल्ट्ज़ हमेशा से यह कहते आए हैं कि जो भी महाशक्तियां होती हैं, वे दूसरे राष्ट्रों पर दबाव बनाने और उन्हें अपने मन-मुताबिक़ नियंत्रित करने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करती हैं. हालांकि, भारत का मामला कुछ अलग है, जो दिखाता है कि बहुध्रुवीय व्यवस्था में महाशक्तियों के ये हथकंडे अब कारगर नहीं हो सकते हैं. अमेरिका की ओर से रूस से तेल आयात के ख़िलाफ़ भारत को लगातार टैरिफ़ बढ़ाने की धमकियां दी जा रही हैं, प्रतिबंध थोपने का दबाव बनाया जा रहा है और कूटनीतिक चालें भी चली जा रही हैं. लेकिन भारत इन धमकियों और दबावों के सामने झुका नहीं है, बल्कि नई दिल्ली ने लागत दक्षता यानी कम क़ीमत पर तेल ख़रीद और बाज़ार का लाभ उठाने की रणनीति अपनाई है और इसी के अनुसार अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव भी किया है.

रूस के साथ भारत के कच्चे तेल व्यापार का यह मामला कहीं न कहीं एक व्यापक प्रणालीगत बदलाव को सामने लाता है. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने इस तरह के परिवर्तन को "पोस्ट-वेस्टर्न वर्ल्ड" कहा है, यानी एक ऐसी व्यवस्था जहां पश्चिम और यूरोप का दबदबा कम होता है और दूसरी उभरती ताक़तें वर्ल्ड ऑर्डर को तय करती हैं. आज वैश्विक विकास में भारत की भूमिका बहुत अहम है और इस लिहाज़ से भारत एक स्वायत्त और संप्रभु ताक़त के रूप में दुनिया में खुद को मज़बूती के साथ स्थापित कर रहा है. इतना ही नहीं, मौज़ूद वक़्त में भारत जहां पश्चिमी देशों के दबाव का विरोध कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस और चीन समेत वैश्विक दक्षिण के दूसरे राष्ट्रों के साथ अपने रिश्तों और साझेदारियों को सशक्त कर रहा है. भारत के रुख़ में आया यह बदलाव आज न केवल अमेरिका की अगुवाई वाली वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को चुनौती दे रहा है, बल्कि उदार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा रहा है. भारत और रूस के बीच वर्तमान में लगातार मज़बूत हो रहा ऊर्जा सहयोग यह बताता है कि वैश्वीकरण का विकल्प अब सोचने वाली बात नहीं रह गई है, बल्कि यह संभव है और सामने दिखाई भी दे रहा है.


जॉर्जी असात्रियान (PhD) मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी और प्लेखानोव रसियन यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.




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