भारत डिजिटल रुपया (CBDC) के जरिए पैसे को सिर्फ भुगतान का साधन नहीं बल्कि विकास और कल्याण का सीधा जरिया बना रहा है. पढ़ें कैसे UPI से आगे बढ़कर अब देश ऐसे सिस्टम बना रहा है जहाँ पैसा सीधे, तेज और नियंत्रित तरीके से लोगों तक पहुंचे.
भारत का डिजिटल वित्त के प्रति दृष्टिकोण एक अलग और विशिष्ट राह पर चला है. मौद्रिक अवसंरचना को आर्थिक बदलाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हुए, देश पारंपरिक प्रणालियों से आगे बढ़कर एक उन्नत डिजिटल इकोसिस्टम में परिवर्तित हुआ है. यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की सफलता ने इस बदलाव की मजबूत नींव रखी, जिससे डिजिटल लेनदेन आम जीवन का हिस्सा बन गए.
अब ध्यान केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDC) पर केंद्रित हो गया है. शुरुआती संकेत बताते हैं कि डिजिटल रुपया मौजूदा वित्तीय ढांचे के भीतर एक कार्यात्मक परत के रूप में स्थापित किया जा रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वर्तमान में एशिया और उन्नत यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के चार-पांच केंद्रीय बैंकों के साथ CBDC आधारित क्रॉस-बॉर्डर लेनदेन प्रणाली विकसित करने पर चर्चा कर रहा है. प्रस्तावित ढांचा थोक और खुदरा दोनों प्रकार के लेनदेन को कवर करेगा. इसी के साथ, फरवरी 2026 में गुजरात में भारत की पहली CBDC-आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की शुरुआत की गई, जिसमें प्रोग्रामेबल डिजिटल मुद्रा के माध्यम से लाभार्थियों को स्वचालित ग्रेन एटीएम के जरिए सब्सिडी वाला अनाज दिया जा रहा है. ये दोनों पहल-एक कूटनीतिक स्तर पर और दूसरी सार्वजनिक रूप से-यह संकेत देती हैं कि भारत की CBDC रणनीति अब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों आयामों में विस्तार ले रही है.
बॉर्डर पहल विशेष ध्यान देने योग्य है. भारत दुनिया में सबसे अधिक विदेशी रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देशों में से एक है. इसमें अमेरिका का योगदान 27.7 प्रतिशत है, इसके बाद यूएई (19.2 प्रतिशत), यूनाइटेड किंगडम (10.5 प्रतिशत), सऊदी अरब (6.7 प्रतिशत) और सिंगापुर (6 प्रतिशत) का स्थान है. मौजूदा रेमिटेंस प्रणाली जटिल, महंगी और धीमी है, जिसमें कई मध्यस्थ बैंक, अनुपालन जांच और मुद्रा विनिमय शामिल होते हैं, जिससे अंतिम प्राप्तकर्ता तक पहुंचने से पहले ही धन का मूल्य कम हो जाता है.
भारतीय रिजर्व बैंक वर्तमान में एशिया और उन्नत यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के चार-पांच केंद्रीय बैंकों के साथ CBDC आधारित क्रॉस-बॉर्डर लेनदेन प्रणाली विकसित करने पर चर्चा कर रहा है. प्रस्तावित ढांचा थोक और खुदरा दोनों प्रकार के लेनदेन को कवर करेगा.
ऐसे देश में जहां रेमिटेंस घरेलू आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है, खासकर केरल और बिहार जैसे राज्यों में, लेनदेन लागत में थोड़ी सी कमी भी बड़े स्तर पर प्रभाव डाल सकती है. CBDC आधारित निपटान प्रणाली सीधे लेनदेन से लागत और समय घटा सकती है, और भारतीय रिज़र्व बैंक की पहल इसकी स्पष्ट दिशा दिखाती है.
गुजरात की पहल दिखाती है कि कल्याण योजनाओं में प्रोग्रामेबल मनी का इस्तेमाल हो सकता है. यह ऐसी डिजिटल मुद्रा है, जिसमें पहले से तय होता है कि पैसा कैसे खर्च होगा. भारत इसे राशन प्रणाली में लागू करने की शुरुआत कर चुका है. CBDC आधारित PDS मौजूदा व्यवस्था-जैसे राशन कार्ड, कूपन और बिचौलियों-को हटाकर एक ऐसी प्रणाली लाता है, जिसमें लाभ सीधे डिजिटल मुद्रा में ही कोडित होता है. अन्नपूर्णा ग्रेन एटीएम, जो 35 सेकंड में 25 किलोग्राम अनाज दे सकता है, इसी प्रक्रिया का अंतिम बिंदु है. यह पूरी प्रक्रिया एक प्रोग्रामेबल डिजिटल टोकन से शुरू होती है, जिसे केवल निर्धारित वस्तु और मात्रा के लिए अधिकृत स्थान पर ही उपयोग किया जा सकता है. इसे न तो कहीं और इस्तेमाल किया जा सकता है, न बेचा जा सकता है और न ही बिचौलियों द्वारा हड़पा जा सकता है.
हालांकि प्रोग्रामेबल CBDC सभी प्रकार की गड़बड़ियों को पूरी तरह खत्म नहीं करता, लेकिन यह कई समस्याओं को एक साथ कम कर देता है. हर लेनदेन रिकॉर्ड होता है, उसका पता लगाया जा सकता है और वह शर्तों के अनुसार होता है-ये तीनों विशेषताएं मौजूदा प्रणाली में आसानी से संभव नहीं हैं.
फरवरी 2026 में गुजरात में भारत की पहली CBDC-आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसमें प्रोग्रामेबल डिजिटल मुद्रा के माध्यम से लाभार्थियों को स्वचालित ग्रेन एटीएम के जरिए सब्सिडी वाला अनाज दिया जा रहा है. ये दोनों पहल-एक कूटनीतिक स्तर पर और दूसरी सार्वजनिक रूप से-यह संकेत देती हैं कि भारत की CBDC रणनीति अब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों आयामों में विस्तार ले रही है.
भारत की PDS प्रणाली में लीकेज (रिसाव) लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है. कई राज्यों में अनाज के दुरुपयोग और गबन के मामले सामने आते रहे हैं, हालांकि पिछले दशक में सुधारों से स्थिति कुछ बेहतर हुई है. फिर भी, प्रोग्रामेबल CBDC इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित करने की क्षमता रखता है, क्योंकि इसमें लेनदेन पारदर्शी, ट्रैक करने योग्य और नियम-आधारित होते हैं.
प्रोग्रामेबल डिजिटल मुद्रा सिर्फ राशन तक सीमित नहीं है. इसे कौशल प्रशिक्षण, कृषि सब्सिडी और आवास योजनाओं में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां पैसा तय शर्तों पर ही मिले. इससे बीच में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार कम होते हैं. प्रणालीगत स्तर पर भी दक्षता में वृद्धि संभव है. शर्तों के आधार पर काम करने वाले स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स मैनुअल सत्यापन, विभागों के बीच तालमेल और बड़े कल्याणकारी कार्यक्रमों से जुड़े प्रशासनिक बोझ को कम कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, मध्यस्थ बैंकों की परतों को हटाने से लागत और समय दोनों में कमी आ सकती है, जिससे व्यक्तिगत रेमिटेंस प्राप्तकर्ताओं और संस्थागत भागीदारों दोनों को लाभ होगा.
हालांकि, चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. प्रोग्रामेबल मनी अपने स्वभाव से ही यह तय करती है कि धन का उपयोग कैसे किया जा सकता है, और यह नियंत्रण दोधारी तलवार की तरह काम करता है. उदाहरण के लिए, यदि कोई टोकन केवल चना खरीदने के लिए ही मान्य है, तो आपात स्थिति में उससे दवा नहीं खरीदी जा सकती. यानी, जो विशेषता गड़बड़ी को रोकती है, वही लाभार्थी की स्वतंत्रता को भी सीमित करती है. एक ऐसा कल्याणकारी तंत्र जो कुशलता से सेवाएं देता है और एक ऐसा तंत्र जो लाभार्थियों को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है-इन दोनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है.
गोपनीयता से जुड़े मुद्दे भी सामने आते हैं. CBDC के हर लेनदेन को सिद्धांततः ट्रैक किया जा सकता है. यह ट्रेसेब्लिटी जहां मनी लॉन्ड्रिंग और लीकेज को रोकने में मदद करती है, वहीं यह व्यक्तियों के आर्थिक व्यवहार का विस्तृत रिकॉर्ड भी तैयार करती है, जो सरकारी नियंत्रण वाले ढांचे में सुरक्षित रहता है. पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना को इसी मुद्दे पर लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है, जहां विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोग्रामेबिलिटी और ट्रेसेब्लिटी मिलकर वित्तीय निगरानी की क्षमता को काफी बढ़ा देते हैं. भारत का लोकतांत्रिक और नियामक ढांचा चीन से अलग है, फिर भी यह संरचना ऐसे सवाल उठाती है जिन पर गंभीर सार्वजनिक चर्चा जरूरी है.
भारत यह समझना चाहता है कि क्या प्रोग्रामेबल मनी से कल्याण योजनाओं की पुरानी कमियों को दूर किया जा सकता है. अभी स्थिति उम्मीद भरी है, लेकिन तकनीक शुरुआती दौर में है. सही नियम और निगरानी से इसके जोखिम कम किए जा सकते हैं. भारत जैसे देश में, जहां लीकेज रोकना, सस्ता रेमिटेंस और अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाना चुनौती है, यह एक बड़ा अवसर है.
साइबर सुरक्षा एक और महत्वपूर्ण चिंता है. यदि CBDC प्रणाली राष्ट्रीय रजिस्ट्रियों, संपत्ति रिकॉर्ड, राशन अधिकार और पहचान डेटाबेस से जुड़ी हो, तो किसी भी साइबर हमले के परिणाम व्यापक हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में यह केवल वित्तीय नुकसान नहीं रहेगा, बल्कि कल्याणकारी संकट बन सकता है, जो लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है.
भारत की CBDC यात्रा पर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी. क्रॉस-बॉर्डर पहल अभी चर्चा के चरण में है और गुजरात में PDS का प्रयोग केवल एक राज्य तक सीमित पायलट है. एक सफल प्रयोग से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर लागू, मजबूत और भरोसेमंद प्रणाली बनने तक का रास्ता लंबा है. भारत के तकनीक-आधारित कल्याण सुधारों का इतिहास सफलताओं के साथ-साथ चुनौतियों से भी भरा रहा है.
फिर भी, यह स्पष्ट है कि भारत CBDC को केवल वित्तीय साधन के रूप में नहीं, बल्कि विकास के उपकरण के रूप में देख रहा है. कई देशों में डिजिटल मुद्रा को सिर्फ भुगतान आसान बनाने या मौद्रिक नीति के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन भारत इसे विकास की समस्याओं के समाधान के रूप में भी देख रहा है. भारत यह समझना चाहता है कि क्या प्रोग्रामेबल मनी से कल्याण योजनाओं की पुरानी कमियों को दूर किया जा सकता है. अभी स्थिति उम्मीद भरी है, लेकिन तकनीक शुरुआती दौर में है. सही नियम और निगरानी से इसके जोखिम कम किए जा सकते हैं. भारत जैसे देश में, जहां लीकेज रोकना, सस्ता रेमिटेंस और अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाना चुनौती है, यह एक बड़ा अवसर है. सफलता तकनीक से ज्यादा उसके सही लागू होने पर निर्भर करेगी.
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Sauradeep is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy, and Technology at the Observer Research Foundation. His experience spans the startup ecosystem, impact ...
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