2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता दक्षिण अफ्रीका के लिए निर्णायक मोड़ है. इस लेख से समझिए कि यह मंच उसे किस तरह ग्लोबल साउथ में नेतृत्व और रणनीतिक स्वतंत्रता बढ़ाने का अवसर देता है.
जैसे ही भारत जनवरी 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने की तैयारी कर रहा है, दक्षिण अफ्रीका अपनी विदेश नीति के एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. प्रिटोरिया ने हाल ही में एक ऐसा वर्ष पूरा किया है जिसमें उसने कूटनीतिक नेतृत्व की मजबूत छाप छोड़ी, खासकर अपनी व्यापक रूप से सराही गई G20 अध्यक्षता के माध्यम से. इस दौरान दक्षिण अफ्रीका ने अफ्रीका से जुड़े मुद्दों-जैसे कर्ज राहत, जलवायु वित्त, विकास के लिए वित्तीय संसाधन और वैश्विक शासन में सुधार-को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाया. अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बीच भी, G20 अध्यक्षता ने यह दिखाया कि दक्षिण अफ्रीका समावेशी बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्ध है.
लेकिन अब जिस अंतरराष्ट्रीय माहौल में दक्षिण अफ्रीका को काम करना है, वह पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है. ट्रंप प्रशासन की वापसी, जो बहुपक्षीय संस्थाओं और गुटनिरपेक्ष मध्यम शक्तियों को लेकर संदेह रखता है और अफ्रीका के साथ अपने संबंधों में लेन-देन आधारित रवैया अपनाता है, ने उन देशों के लिए कूटनीतिक गुंजाइश को सीमित कर दिया है जो स्वतंत्र नीतिगत रास्ता अपनाना चाहते हैं.
ब्राज़ील की अध्यक्षता के बाद भारत ने 1 जनवरी 2026 को औपचारिक रूप से ब्रिक्स की कमान संभाली. ब्राज़ील के कार्यकाल में अधिक समावेशी और टिकाऊ वैश्विक शासन के लिए ग्लोबल साउथ के सहयोग पर जोर दिया गया. इस दौरान ब्रिक्स के विस्तारित सदस्यता ढांचे को मजबूत किया गया और कई ठोस परिणाम सामने आए, जिनमें रियो घोषणा, जलवायु वित्त पर पहली रूपरेखा घोषणा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन पर एक साझा वक्तव्य शामिल हैं. ये उपलब्धियां ऐसे समय में संस्थागत निरंतरता की मजबूत नींव बनीं, जब ब्रिक्स अपने विस्तार से जुड़े अवसरों और चुनौतियों से जूझ रहा है.
इस दौरान ब्रिक्स के विस्तारित सदस्यता ढांचे को मजबूत किया गया और कई ठोस परिणाम सामने आए, जिनमें रियो घोषणा, जलवायु वित्त पर पहली रूपरेखा घोषणा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन पर एक साझा वक्तव्य शामिल हैं
भारत ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा या डॉलर से दूरी जैसे अधिक कट्टर प्रस्तावों का समर्थन न करके समूह की विश्वसनीयता बनाए रखने में मदद की है. इससे ब्रिक्स उन मध्यम शक्तियों के लिए भी स्वीकार्य बना रहा है, जो किसी भू-राजनीतिक गुट में फंसने से बचना चाहती हैं. दक्षिण अफ्रीका के लिए भारत की अध्यक्षता ऐसे समय में संतुलन देने वाली भूमिका निभाती है, जब ब्रिक्स आंतरिक विविधता और बाहरी दबावों के कारण बोझिल होने का खतरा महसूस कर रहा है.
नई दिल्ली ने संकेत दिया है कि वह इसी आधार पर आगे बढ़ेगा और निरंतरता बनाए रखेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण की बात की है जो मजबूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर केंद्रित है तथा लोगों को केंद्र में रखने वाले विकास और मानवता-प्रथम वैश्विक शासन पर जोर देता है. भारत के राजदूत सुधाकर दलेला ने भी स्पष्ट किया है कि 2026 की अध्यक्षता निरंतरता, समेकन और सहमति के सिद्धांतों पर आधारित होगी-जो वैचारिक टकराव के बजाय व्यावहारिक बहुपक्षवाद को भारत की प्राथमिकता को दर्शाता है.
यह दृष्टिकोण दक्षिण अफ्रीका के लिए खास महत्व रखता है. भारत ब्रिक्स के भीतर एक अनोखी भूमिका निभाता है-वह ग्लोबल साउथ का नेतृत्वकर्ता भी है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा भी, जो सुधार का समर्थन करता है लेकिन टकराव से बचता है. ब्रिक्स की साझा मुद्रा या डॉलर-विरोध जैसे प्रस्तावों से दूरी बनाकर भारत ने समूह की विश्वसनीयता को बनाए रखा है और उसे उन मध्यम शक्तियों के लिए भी उपयोगी बनाए रखा है जो किसी बड़े शक्ति-संघर्ष में उलझना नहीं चाहतीं.
दक्षिण अफ्रीका की विदेश नीति लंबे समय से गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है. लेकिन अमेरिका में ऐसे प्रशासन की वापसी, जो बहुपक्षीय मंचों को लेकर अधिक संदेहपूर्ण है और गुटनिरपेक्ष मध्यम शक्तियों की नीतिगत प्राथमिकताओं को कम महत्व देता है, ने इस नीति को अपनाना अधिक महंगा बना दिया है. दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता पर वाशिंगटन की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया, बहुपक्षीय संस्थाओं के प्रति उसके बदले हुए रवैये और ब्रिक्स के प्रति अधिक टकरावपूर्ण दृष्टिकोण के साथ मिलकर यह दिखाती है कि नीतिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश लगातार सिमट रही है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ब्रिक्स को “अमेरिका-विरोधी गुट” बताया है और उसके सदस्यों के खिलाफ दंडात्मक आर्थिक कदमों की धमकी दी है, जो यह संकेत देता है कि अमेरिका अब ऐसे सामूहिक प्रयासों को हतोत्साहित करना चाहता है जो उसकी अगुवाई वाले ढांचे से बाहर हों.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण की बात की है जो मजबूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर केंद्रित है तथा लोगों को केंद्र में रखने वाले विकास और मानवता-प्रथम वैश्विक शासन पर जोर देता है.
ऐसे माहौल में भारत का ब्रिक्स नेतृत्व दक्षिण अफ्रीका के लिए खास महत्व रखता है. भारत की अपनी विदेश नीति भी रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संतुलन पर आधारित है, जिससे वह ब्रिक्स के भीतर एक संतुलनकारी भूमिका निभाता है. भारत वैचारिक टकराव के बजाय संस्थागत सुधारों पर जोर देता है. फिर भी, ब्रिक्स की अपनी सीमाएं हैं. हालिया विस्तार के कारण इसमें राजनीतिक प्राथमिकताओं और आर्थिक ढांचों की विविधता बढ़ी है, जिससे सहमति बनाना कठिन हुआ है और संस्थागत एकजुटता पर सवाल खड़े हुए हैं. ये आंतरिक चुनौतियां ऐसे समय में सामने आई हैं जब अमेरिका की विदेश नीति बहुपक्षीय सहयोग के बजाय द्विपक्षीय दबाव पर ज्यादा निर्भर होती जा रही है, जिससे दक्षिण अफ्रीका जैसे मध्यम देशों के लिए जोखिम बढ़ते हैं. लेकिन इसी वजह से सामूहिक मंचों की उपयोगिता भी बढ़ गई है. जब बाहरी माहौल अधिक लेन-देन आधारित हो जाता है, तब ब्रिक्स जैसे मंच समन्वय, संतुलन और राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए और अधिक जरूरी हो जाते हैं.
यह सोच दक्षिण अफ्रीका की नीतिगत बहसों में भी दिखाई देती है. साउथ अफ्रीकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स (SAIIA) जैसे थिंक टैंक लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि साझेदारियों में विविधता जरूरी है, लेकिन किसी भी बड़े शक्ति-संघर्ष में फंसने से बचना चाहिए. उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने का ब्रिक्स का मूल उद्देश्य-चाहे वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद हो या ब्रेटन वुड्स संस्थान-दक्षिण अफ्रीका की पारंपरिक कूटनीतिक प्राथमिकताओं से मेल खाता है. ऐसे समय में, जब विस्तार से जुड़ी जटिलताएं और कठिन वैश्विक माहौल ब्रिक्स की एकजुटता की परीक्षा ले रहे हैं, भारत का नेतृत्व निरंतरता और स्थिरता प्रदान करता है.
भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स के पश्चिम-विरोधी मंच बनने के बजाय, बातचीत और सहमति के जरिए स्वायत्तता साधने का मंच बनने की संभावना अधिक है. इससे दक्षिण अफ्रीका को प्रतिस्पर्धी वैश्विक गठबंधनों के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने की जगह मिलती है.
दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता ने यह दिखाया कि ग्लोबल साउथ का एक मध्यम देश सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक नियमों और विमर्श को प्रभावित कर सकता है. अफ्रीकी विकास की जरूरतों, कर्ज की कमजोरियों और जलवायु वित्त के सवालों को वैश्विक चर्चा के केंद्र में लाकर प्रिटोरिया ने महत्वपूर्ण नैतिक और कूटनीतिक पूंजी अर्जित की. अब चुनौती यह है कि वैश्विक ध्यान अन्य मुद्दों की ओर मुड़ने पर ये उपलब्धियां कमजोर न पड़ जाएं.
जब बाहरी माहौल अधिक लेन-देन आधारित हो जाता है, तब ब्रिक्स जैसे मंच समन्वय, संतुलन और राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए और अधिक जरूरी हो जाते हैं.
ब्रिक्स, G20 और 2025 में ब्राज़ील द्वारा आयोजित COP30 के बीच बढ़ता तालमेल इस अवसर को और मजबूत करता है. भारत ने संकेत दिया है कि वह इन प्रक्रियाओं के बीच तालमेल तलाशेगा, खासकर जलवायु वित्त और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शासन जैसे क्षेत्रों में. जलवायु वित्त का लंबे समय से समर्थक रहा दक्षिण अफ्रीका, इस तालमेल के जरिए उभरते वैश्विक ढांचों में अफ्रीकी चिंताओं को मजबूती से शामिल कर सकता है.
ब्रिक्स दक्षिण अफ्रीका के लिए सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंचों में से एक बना हुआ है. यह न केवल ग्लोबल साउथ के देशों के बीच समन्वय का मंच है, बल्कि अफ्रीका की आवाज़ और भूमिका को मजबूत करने का भी एक साधन है. भारत की अध्यक्षता प्रिटोरिया को एक समान सोच वाले साझेदार के साथ मिलकर ब्रिक्स को फिर से विकास, व्यावहारिक सहयोग और संस्थागत विश्वसनीयता पर केंद्रित करने का अवसर देती है-ये वे क्षेत्र हैं जहाँ दक्षिण अफ्रीका की कूटनीति पारंपरिक रूप से मजबूत रही है.
दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स मंच का उपयोग बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार, नए और नवाचारी वित्तीय साधनों, तथा वैश्विक आर्थिक शासन में अफ्रीका की मजबूत भागीदारी जैसे मुद्दों पर गति बनाए रखने के लिए कर सकता है.
यह दृष्टिकोण राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा की उस सोच से मेल खाता है, जिसमें वे दक्षिण अफ्रीका को एक “सेतु-निर्माता” के रूप में देखते हैं-ऐसा देश जो विभिन्न क्षेत्रों, हितों और वैचारिक मतभेदों के बीच मध्यस्थता कर सके. साथ ही, यह उस बढ़ती मांग के अनुरूप भी है कि दक्षिण अफ्रीका को ब्रिक्स का उपयोग केवल प्रतीकात्मक सदस्यता के रूप में नहीं, बल्कि अफ्रीकी औद्योगीकरण, ऊर्जा परिवर्तन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को आगे बढ़ाने के लिए अधिक रणनीतिक ढंग से करना चाहिए.
भारत की अध्यक्षता से मिलने वाले अवसर का पूरा लाभ उठाने के लिए, दक्षिण अफ्रीका को कुछ ठोस और व्यावहारिक प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए, जो दोनों देशों के हितों से मेल खाती हों.
असली प्रश्न यह है कि क्या दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स का रणनीतिक उपयोग कर पाएगा. इसके लिए केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि स्पष्ट रणनीति जरूरी है. भारत के व्यावहारिक नेतृत्व और अपनी G20 उपलब्धियों के सहारे, दक्षिण अफ्रीका रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है.
पहला, वैश्विक वित्तीय ढांचे में सुधार को केंद्र में रखना जरूरी है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में कोटा सुधार, न्यू डेवलपमेंट बैंक के विस्तार और प्रस्तावित ब्रिक्स मल्टीलेटरल गारंटी पहल जैसे प्रयासों के लिए भारत का समर्थन, विकास के लिए वित्त तक अधिक न्यायसंगत पहुंच की दक्षिण अफ्रीका की मांग से मेल खाता है. ये प्रयास अफ्रीका की कर्ज राहत और बेहतर ऋण साख की मांग को भी मजबूत करते हैं.
दूसरा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कौशल विकास सहयोग के अहम क्षेत्र हो सकते हैं. डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में भारत का अनुभव समावेशी विकास का एक व्यावहारिक मॉडल पेश करता है. प्रस्तावित G20–अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर जैसी पहलें, निर्भरता बढ़ाने के बजाय ज्ञान और कौशल हस्तांतरण के जरिए अफ्रीका की जनसांख्यिकीय और रोजगार संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकती हैं.
तीसरा, जलवायु वित्त और तैयारी को प्राथमिकता में बनाए रखना जरूरी है. ब्राज़ील के COP30 एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए, दक्षिण अफ्रीका भारत के साथ मिलकर न्यायसंगत ऊर्जा परिवर्तन के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और जलवायु लचीलापन बढ़ाने वाले ढांचे विकसित कर सकता है, जो ग्लोबल साउथ की वास्तविकताओं को दर्शाते हों.
भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता अपने आप में दक्षिण अफ्रीका को वैश्विक प्रभाव की गारंटी नहीं देती, लेकिन यह नेतृत्व, समय और संस्थागत अवसरों का एक महत्वपूर्ण संयोग जरूर है. ऐसे समय में, जब पारंपरिक वैश्विक शासन कमजोर पड़ रहा है और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, असली प्रश्न यह है कि क्या दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स का रणनीतिक उपयोग कर पाएगा. इसके लिए केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि स्पष्ट रणनीति जरूरी है. भारत के व्यावहारिक नेतृत्व और अपनी G20 उपलब्धियों के सहारे, दक्षिण अफ्रीका रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है.
आलिया वायेज़ एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय संबंध विश्लेषक हैं जो अफ्रीकी विदेश नीति और ब्रिक्स में विशेषज्ञता रखती हैं.
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Aaliyah Vayez is an international relations and political analyst specialising in African foreign policy, multilateral governance, and Global South geopolitics. She holds an MSc in ...
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