यह लेख बताता है कि कैसे भारत की 8.2 प्रतिशत GDP वृद्धि यह संकेत देती है कि बड़े संरचनात्मक सुधार अब असर दिखाने लगे हैं. बदलते वैश्विक माहौल के बावजूद भारत तेज़, स्थिर और सतत आर्थिक विकास के नए चरण में दाखिल हो चुका है.
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हैरानी की बात ये नहीं है कि वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर बढ़कर 8.2 प्रतिशत (पिछले साल की इसी तिमाही के दौरान 5.6 प्रतिशत की तुलना में और छह तिमाही में सबसे अधिक) हो गई बल्कि हैरानी की बात वास्तविक और सांकेतिक (नॉमिनल) GDP (जो कि केवल 8.7 प्रतिशत है) के बीच मामूली अंतर है. युद्ध से प्रभावित भू-राजनीति और ऊर्जा के स्रोतों में कमी से लेकर मनमाने टैरिफ से जुड़े हमले और अधिक ब्याज दर तक कई प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था ने विकास की ऐसी दर हासिल की है जिसकी बराबरी कोई दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं कर सकती. भारत का सर्विस सेक्टर 9.3 प्रतिशत की विकास दर के साथ सबसे आगे रहा, 7.6 प्रतिशत के साथ मैन्युफैक्चरिंग एवं कंस्ट्रक्शन सेक्टर ने दूसरा स्थान हासिल किया जबकि कृषि एवं खनन सेक्टर 2.9 प्रतिशत की विकास दर के साथ पीछे रहा.
0.25 प्रतिशत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक या महंगाई दर ने वास्तविक आर्थिक विकास को प्रभावित किया है. अगर महंगाई दर 2-3 प्रतिशत होती तो भारत की सांकेतिक GDP वृद्धि दहाई आंकड़े में पहुंच जाती. वैसे तो सामान्य महंगाई दर सांकेतिक है लेकिन सब्ज़ियों और दालों की कीमत में क्रमश: 27.6 प्रतिशत और 16.2 प्रतिशत की कमी आई है.
“विकास की ऐसी दर हासिल की है जिसकी बराबरी कोई दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं कर सकती.”
जब भारत को 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर वाली अर्थव्यवस्था (जो कि 10 ट्रिलियन डॉलर के रास्ते पर है) बताया जाता है तो इसका संदर्भ सांकेतिक GDP से होता है. अलग-अलग देशों के आर्थिक आकार की तुलना भी सांकेतिक GDP के आधार पर होती है. घरों, कंपनियों और सरकारों के लिए सांकेतिक गिनती किसी भी आंकड़े से जुड़ी शब्दावली की तुलना में अधिक वास्तविक लगती है. चाहे वेतन हो, टर्नओवर हो या जमा टैक्स हो, प्रभावी नामकरण सांकेतिक ही है. वास्तविक GDP बढ़ोतरी हमें अंतर्निहित आर्थिक स्थिति की मज़बूती के बारे में बताती है जबकि सांकेतिक GDP इसके ऊपर कीमत की एक परत चढ़ाती है. वास्तविक GDP में महंगाई को जोड़ दिया जाए तो वो करीब-करीब सांकेतिक GDP है.
एक संतुलन की आवश्यकता है और आज के समय में अर्थव्यवस्था को विकास और तेज़ करने के लिए महंगाई की खुराक की ज़रूरत है. सांकेतिक GDP वृद्धि की गेंद अब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पाले में है जिसे ब्याज दर ज़रूर कम करना चाहिए. रेपो रेट (जिस दर पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को उधार देता है) 5.50 प्रतिशत है. अपनी 3-5 दिसंबर 2025 की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में RBI रूढ़िवादी क्रमिकवाद की गति में खो सकता है जो विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कीमत में स्थिरता को बनाए रखने के लिए सितंबर 2016 के वैधानिक ढांचे से निर्देशित है.
कीमतें अब स्थिर हैं, कुछ मामलों में तो गिर भी रही हैं लेकिन अधिक ब्याज दर विकास के लिए रुकावट बन रही है. महंगाई दर बढ़ाने और अधिक विकास को बढ़ावा देने के लिए RBI के नीति निर्माताओं को नीतिगत दरों को कम करना चाहिए ताकि महंगाई दर 4 प्रतिशत पर आ सके जैसा कि अनिवार्य है.
अपनी तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार निरंतरता और दृढ़ विश्वास के साथ आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा रही है. पिछले दशक में केंद्र सरकार ने छोटे नीतिगत सुधारों के साथ कई बड़े संरचनात्मक सुधार भी लागू किए हैं. 21 नवंबर 2025 को सरकार ने चार श्रम संहिताओं को लागू करके सबसे कठिन सुधार किया है. ये सुधार कामगारों के हितों की रक्षा करते हुए उद्यमियों को मुश्किल अनुपालन (कंप्लाएंस) के बोझ के बिना अपना व्यवसाय शुरू करने या बढ़ाने में सक्षम बनाएगा.
2017 में मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) के माध्यम से अप्रत्यक्ष करों में सुधार किया जो संभवत: भारत का सबसे मुश्किल आर्थिक सुधार था. इसके तहत व्यापक नीति बनाने के लिए एक संवैधानिक संशोधन करना पड़ा, चार केंद्रीय कानून एवं 29 राज्य कानून (अब 28) बनाने पड़े और सात केंद्र शासित प्रदेशों (अब आठ) के लिए एक अधिसूचना जारी करनी पड़ी. इसने आठ केंद्रीय टैक्स और नौ राज्य टैक्स को एक GST में समेट दिया. पिछले पांच वर्षों के दौरान GST कलेक्शन दोगुना होकर 22 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए और अधिक कलेक्शन की उम्मीद है.
“इन सुधारों ने अपने-अपने ढंग से अधिक GDP विकास में योगदान दिया है.”
मई 2016 में लागू इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (दिवाला और दिवालियापन संहिता) ने 10 पुराने पड़ चुके कानूनों (जिनमें बीमार औद्योगिक कंपनियां विशेष प्रावधान अधिनियम शामिल है) में संशोधन करके दिवालियापन की स्थिति में समयबद्ध निपटारे को संभव बनाया है. ये कानून उद्यमियों को घाटे में चल रही कंपनी से बाहर निकलने की अनुमति देता है और अधिक कुशल व्यावसायिक माहौल की दिशा में ये एक महत्वपूर्ण कदम है. कानून लागू होने के बाद से 8,000 से ज़्यादा समाधान प्रक्रियाएं पूरी हुई हैं जिनका वसूली योग्य मूल्य 3.58 लाख करोड़ रुपये है.
कुछ और नीतिगत सुधारों में 2014 की प्रधानमंत्री जन-धन योजना शामिल है जिसने अभूतपूर्व पैमाने पर वित्तीय समावेशन मुहैया कराने का काम किया. इस योजना के तहत बैंकिंग सेवाओं से वंचित लोगों के लिए 1.5 करोड़ खाते खोले गए जिससे हर किसी को एक डेबिट कार्ड मिला और बीमा एवं पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं तक उनकी पहुंच हुई. 2025 में 57.1 करोड़ लाभार्थियों के खातों में कुल मिलाकर 2,74,863 करोड़ रुपये जमा थे.
भुगतान सुधारों (जिनकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी लेकिन जिन्हें लागू करने और बढ़ाने का काम नरेंद्र मोदी ने किया) ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाया है. ये इंफ्रास्ट्रक्टर इतना अच्छा और भारत के लोगों के इस्तेमाल के लिए इतना आसान है कि लेन-देन की कीमत लगभग हर दूसरे महीने अलग-अलग देशों की GDP के पार चली जाती है- जून 2020 में आइसलैंड, जुलाई 2021 में स्लोवेनिया, मार्च 2022 में ओमान, जुलाई 2023 में यूक्रेन और मार्च 2025 में फिनलैंड. वार्षिक आधार पर UPI लेन-देन की कीमत इटली, ब्राज़ील और कनाडा की GDP से ज़्यादा है.
आयुष्मान भारत योजना ने सबसे ग़रीब 10 करोड़ भारतीयों को विशेष स्वास्थ्य देखभाल प्रदान की है. कोविड-19 के दौरान संकटकालीन सुधारों के माध्यम से 20 लाख करोड़ रुपये (तत्कालीन GDP का 10 प्रतिशत) के वित्तीय प्रोत्साहन ने व्यवसायों को अपना काम जारी रखने में सक्षम बनाया. जन विश्वास 1.0 ने ऐसी रूप-रेखा प्रस्तुत की जिसके तहत आर्थिक अपराधों को अपराध के दायरे से बाहर रखा गया था लेकिन इसने 5,239 धाराओं में से केवल 113 को ही अपराधमुक्त किया. जन विश्वास 2.0 (जो संसद के शीतकालीन या बजट सत्र में पारित होने की संभावना है) से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. लगभग 1,500 पुराने पड़ चुके कानूनों को समाप्त कर दिया गया है; शीतकालीन सत्र में 120 और कानूनों के रद्द होने की उम्मीद है.
“कंपनियों और सरकारों के लिए सांकेतिक गिनती अधिक वास्तविक लगती है.”
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के द्वारा लगाए गए मनमाने टैरिफ के कारण 2025 में सरकार ने GST में बदलाव किया है. इसके तहत ज़्यादातर उत्पादों और सेवाओं को दो दरों (5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत) के तहत लाया गया है, वैसे स्लैब की कुल संख्या सात (शून्य, 0.25 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 40 प्रतिशत) है. इसके अलावा सरकार ने रेयर अर्थ चुंबकों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंज़ूरी दी है. ये इलेक्ट्रिक गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा उपकरणों के लिए महत्वपूर्ण घटक है.
पिछले 25 वर्षों से देश कृषि के क्षेत्र में जिन सुधारों पर बहस कर रहा है, अगर वो सुधार तीन कृषि कानूनों के माध्यम से लागू हो गए होते तो छोटे किसानों के लिए समृद्धि और सामर्थ्य का युग आता. राजनीतिक अर्थव्यवस्था की मजबूरियों और बड़े किसानों एवं बिचौलियों के द्वारा उन पर कब्ज़ा किए जाने के बाद भी उन तीन कानूनों को वापस लेना शायद मोदी सरकार की सबसे बड़ी नीतिगत गलती है.
एक और सुधार जो मोदी सरकार लाने में नाकाम रही है, वो है सरकारी नौकरों के द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी. प्रधानमंत्री ने अपने तीसरे कार्यकाल के पहले 100 दिनों में भ्रष्टाचार का मुकाबला करने के लिए बड़े फैसले लेने का वादा किया था. वो 100 दिन आए और चले भी गए लेकिन भ्रष्टाचार अभी भी जारी है. श्रम सुधारों या अप्रत्यक्ष कर सुधारों की तरह भ्रष्टाचार को लेकर भी पुरजोर कोशिश और राजनीतिक ज़ोर लगाने की आवश्यकता है. कम से कम NDA के शासन वाले राज्यों से इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयासों की उम्मीद की जाती है लेकिन ये कहीं दिख नहीं रहा है. अगर मोदी पिछले दिनों घोषित 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (जो सरकारी कर्मचारियों का वेतन, भत्ता, स्वास्थ्य एवं सेवानिवृत्ति लाभ में और बढ़ोतरी करता है) में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कड़े उपाय लागू कर दें तो इससे न केवल देश कम भ्रष्ट एवं अधिक कुशल बनेगा बल्कि राजनीतिक फायदा भी मिलेगा.
पीछे मुड़कर देखें तो इन सभी सुधारों ने अपने-अपने ढंग से अधिक GDP विकास में योगदान दिया है. इन सुधारों ने व्यवसाय करना आसान बनाया है, नौकरशाही की बाधाओं को दूर किया है और नीतिगत उपायों के ज़रिए धन का सृजन करने वालों (वेल्थ क्रिएटर्स) को समर्थन मुहैया कराया है. भारत को अभी लंबी दूरी तय करनी है. लेकिन पूरी दुनिया में भारत विकास का एक चमचमाता बिंदु बना हुआ है.
अंदरुनी सुधार जहां जारी हैं, वहीं भारत अपना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने पर भी काम कर रहा है. मौजूदा समय में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और यूरेशिया समेत 50 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत चल रही है. आख़िरी FTA जुलाई 2025 में यूनाइटेड किंगडम के साथ हुआ था.
वैसे अल्पकाल में न तो आर्थिक सुधार, न ही FTA अधिक GDP वृद्धि प्रदान करते हैं. एक बार सुधार लागू होने या FTA पर हस्ताक्षर होने के बाद प्राइवेट कंपनियों के द्वारा अपना काम-काज शुरू करने या क्षमता का विस्तार करने, नौकरियों का सृजन करने और फायदा पहुंचाने में समय लगता है. भारत की 8.2 प्रतिशत की वृद्धि हमें बताती हैं कि देरी का ये समय समाप्त हो गया है और अब विकास को गति देने का समय आ गया है.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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