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Published on Jan 22, 2026 Updated 0 Hours ago

भारत की सुरक्षा जरूरतें उसके भूगोल और युद्ध परिस्थितियों से तय होती हैं. इस लेख से समझें कि स्ट्राइकर जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म क्यों भारतीय हालात में सीमित साबित हुए.

स्ट्राइकर से सबक: आयात से आगे सोचने का वक्त

भारतीय सेना (IA) द्वारा अमेरिकी निर्मित स्ट्राइकर आर्मर्ड पर्सनल कैरियर (APC) की खरीद को रद्द करने का हालिया निर्णय चौंकाने वाला नहीं है. परीक्षणों के बाद स्ट्राइकर को हटाने का मुख्य कारण यह माना जा रहा है कि ऊंचाई वाले इलाकों में, जहां हवा का घनत्व कम होता है, वहाँ इसके इंजन की शक्ति (हॉर्सपावर) पर्याप्त नहीं पाई गई. ऐसे में यह निर्णय और भी हैरान करने वाला लगता है कि जब स्वदेशी रूप से विकसित टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) का व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (ICV) पहले से ही परीक्षण में था, तब स्ट्राइकर को ट्रायल की अनुमति क्यों दी गई. पहले से ही संकेत थे कि स्ट्राइकर बिना बड़े बदलावों के उच्च-ऊंचाई युद्ध के लिए भारतीय सेना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता.

परीक्षणों के बाद स्ट्राइकर को हटाने का कारण यही माना जा रहा है कि कम हवा वाले ऊँचाई क्षेत्रों में इसकी इंजन क्षमता प्रभावी नहीं है.

बख्तरबंद प्लेटफॉर्म में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना

भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय (MoD) को विदेशी प्रणालियों के बजाय स्वदेशी जमीनी युद्धक वाहनों को प्राथमिकता देनी चाहिए. TASL द्वारा निर्मित IFV का प्रारंभिक संस्करण पहले ही सीमित संख्या में सेना और अर्धसैनिक बलों द्वारा उपयोग किया जा चुका है. टाटा WhAP 8x8 का सैनिक परिवहन संस्करण, जिसे इन्फैंट्री प्रोटेक्टेड मोबिलिटी व्हीकल कहा जाता है, 2022 से लद्दाख में तैनात है.

यह निर्णय और भी हैरान करने वाला लगता है कि जब स्वदेशी रूप से विकसित टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) का व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (ICV) पहले से ही परीक्षण में था, तब स्ट्राइकर को ट्रायल की अनुमति क्यों दी गई.

IFV के कई प्रकार होते हैं-कुछ चिकित्सा सहायता के लिए, कुछ रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर (CBRN) मिशनों के लिए और कुछ 30 मिमी ऑटो कैनन से लैस होते हैं. इसके बावजूद, भारतीय सेना स्वदेशी APC संस्करणों को अपनी आवश्यकताओं पर खरा उतरने का पूरा मौका नहीं दे रही है. विदेशी विकल्पों पर विचार करने से पहले देश के भीतर उपलब्ध सभी विकल्पों को आज़माना सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए. जमीनी युद्धक वाहन, मोबाइल तोपखाना और बख्तरबंद वाहन ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत की रक्षा उद्योग में पर्याप्त तकनीकी क्षमता मौजूद है.

विडंबना यह है कि भारत का रक्षा उद्योग नौसेना के लिए फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर और कॉर्वेट जैसे जटिल युद्धपोतों के निर्माण में अपेक्षाकृत अधिक सफल रहा है. इन प्लेटफॉर्मों का डिजाइन, निर्माण और एकीकरण उच्च तकनीकी क्षमता, दीर्घकालिक योजना और संस्थागत विश्वास की मांग करता है जिसे भारतीय नौसेना ने स्वदेशी उद्योग के साथ मिलकर विकसित किया है. इसी प्रकार, भारतीय वायुसेना ने अनेक तकनीकी चुनौतियों, समय और लागत से जुड़ी बाधाओं के बावजूद स्वदेशी रूप से विकसित तेजस हल्के लड़ाकू विमान को अपनाया. तेजस कार्यक्रम में देरी और आलोचनाओं के बावजूद वायुसेना का यह निर्णय स्वदेशी क्षमताओं में विश्वास और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

इसके विपरीत, भारतीय सेना का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अधिक सतर्क और आयात-उन्मुख दिखाई देता है. स्वदेशी विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद विदेशी प्लेटफॉर्मों के परीक्षण और मूल्यांकन का निर्णय इस मानसिकता को उजागर करता है. स्ट्राइकर बख्तरबंद वाहन के परीक्षण का फैसला यह संकेत देता है कि सेना ने स्वदेशी प्रणालियों को प्राथमिकता देने में वही उत्साह नहीं दिखाया, जैसा कि नौसेना और वायुसेना ने अपने-अपने क्षेत्रों में प्रदर्शित किया है.

स्वदेशी वाहनों के निर्यात की संभावनाएं

स्ट्राइकर पर विचार करना इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि TASL ने WhAP ICV का निर्यात भी किया है. कंपनी ने मोरक्को में उत्पादन इकाई स्थापित की है, जिसमें लगभग 30 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है. हाल ही में ग्रीस ने भी 8x8 वाहनों में रुचि दिखाई है. इसके अलावा, लद्दाख में WhAP की सीमित तैनाती पहले से ही हो चुकी है और बड़े ऑर्डर की संभावना है. ऐसे में विदेशी ICV की आवश्यकता लगभग समाप्त हो जाती है.

भारतीय वायुसेना ने अनेक तकनीकी चुनौतियों, समय और लागत से जुड़ी बाधाओं के बावजूद स्वदेशी रूप से विकसित तेजस हल्के लड़ाकू विमान को अपनाया. तेजस कार्यक्रम में देरी और आलोचनाओं के बावजूद वायुसेना का यह निर्णय स्वदेशी क्षमताओं में विश्वास और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

टाटा निर्मित ICV दो संस्करणों में उपलब्ध है-एक में 30 मिमी ऑटो कैनन, को-एक्सियल मशीन गन और ग्रेनेड लॉन्चर है जबकि दूसरे में BMP-2 ट्रेट लगा है. इसके कुछ प्रमुख उदाहरणों में ज़ोरावर लाइट बैटल टैंक (LBT) का विकासाधीन चेसिस शामिल है जो स्वदेशी रूप से निर्मित है, लेकिन इसका इंजन और 105 मिमी की मुख्य तोप फिलहाल आयातित हैं. आने वाले समय में ज़ोरावर के प्रोटोटाइप में उपयोग हो रहे अमेरिकी निर्मित कमिंस इंजन को हटाकर उसकी जगह 800 हॉर्सपावर का स्वदेशी इंजन लगाए जाने की योजना है. दोनों में और सुधार परीक्षणों के माध्यम से किए जा सकते हैं.

आयात पर निर्भरता सीमित करना

सेना को आयात पर तभी निर्भर होना चाहिए जब देश की रक्षा उद्योग आवश्यक क्षमताएँ देने में असमर्थ हो. पूर्ण स्वदेशीकरण हर क्षेत्र में संभव नहीं है. उदाहरण के लिए, ज़ोरावर लाइट बैटल टैंक का ढांचा स्वदेशी है, लेकिन इंजन और मुख्य तोप आयातित हैं, जिन्हें भविष्य में स्वदेशी विकल्पों से बदला जाएगा. अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक में भी कई विदेशी घटक हैं. इसके बावजूद, जमीनी युद्धक प्रणालियों में आत्मनिर्भरता हासिल करना बेहद जरूरी है, क्योंकि भारत अभी भी रूस पर काफी हद तक निर्भर है.

अंत में, रक्षा खरीद में रूस से अमेरिका की ओर झुकाव भी भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल नहीं हो सकता. विदेशी निर्भरता से आपूर्ति बाधित होने का खतरा रहता है, जैसा कि यूक्रेन युद्ध और कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिला. इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बाहरी आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भरता सेना की तैयारियों को प्रभावित कर सकती है. भारतीय सेना को ऐसे अतिरिक्त जोखिमों से बचना चाहिए जो उसकी संचालन क्षमता पर असर डालें.


कार्तिक बोम्मकंती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं.

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