अमेरिका के मुफ़्त अंतरिक्ष निगरानी डेटा पर भरोसा अब जोखिम भरा हो गया है. ये लेख बताता है कि क्यों भारत को अपना खुद का स्पेस ऑब्जेक्ट कैटलॉग बनाकर अंतरिक्ष सुरक्षा में आत्मनिर्भर होना चाहिए.
दो दशकों से अधिक समय से, अमेरिका दुनिया भर के उपग्रह संचालकों और शोधकर्ताओं सहित सभी लोगों को अंतरिक्ष परिस्थिति जागरूकता डेटा (SSA) मुफ़्त में उपलब्ध कराता रहा है. SSA वास्तव में वह आंकड़ा होता है जिसमें ट्रैक किए गए अंतरिक्ष पिंडों की सूची होती है, साथ ही अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) यानी अंतरिक्ष में संचालन की सुरक्षा, स्थिरता और निरंतरता को बढ़ाने के लिए कक्षा की गतिविधियों में समन्वय बनाने वाले तंत्र के लिए ज़रूरी संदेश भी उपलब्ध कराए जाते हैं. मगर हाल ही में अमेरिकी नीति में हुए बदलाव से अब इस मुफ़्त डेटा का पाना मुश्किल हो गया है.
दरअसल, 18 दिसंबर, 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कार्यकारी आदेश पारित किया जिसका नाम है ‘अमेरिकी अंतरिक्ष श्रेष्ठता सुनिश्चित करना’. इसमें पिछली अंतरिक्ष नीति में बदलाव करते हुए प्रमुख उपखंडों में ‘उपयोगकर्ता शुल्क से मुक्त’ के स्थान पर ‘व्यावसायिक और अन्य प्रासंगिक उपयोग के लिए’ शब्द जोड़े गए हैं. इस कारण अब रक्षा विभाग के कैटलॉग, SSA डेटा और STM सेवाओं के उपयोग में शुल्क लिया जा सकता है.
ट्रंप प्रशासन के अस्थिर रुख़ को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि अमेरिका शायद खुद ही SSA डेटा साझा करने संबंधी द्विपक्षीय समझौतों को रद्द कर दे और राष्ट्रीय सुरक्षा व मलबा नियंत्रण से जुड़े ज़रूरी डेटा सेवाओं को बंद करने का फ़रमान जारी कर दे.
SSA वास्तव में वह आंकड़ा होता है जिसमें ट्रैक किए गए अंतरिक्ष पिंडों की सूची होती है, साथ ही अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) यानी अंतरिक्ष में संचालन की सुरक्षा, स्थिरता और निरंतरता को बढ़ाने के लिए कक्षा की गतिविधियों में समन्वय बनाने वाले तंत्र के लिए ज़रूरी संदेश भी उपलब्ध कराए जाते हैं.
मुफ़्त SSA डेटा पर लगातार निर्भरता को लेकर भारत के नीति निर्माता, गैर-सरकारी संस्थाएं और सशस्त्र बलों के कर्मी लंबे समय से चिंतित रहे हैं. इसीलिए, ट्रंप प्रशासन का यह आदेश भारत के लिए चेतावनी है और उसे इसका स्वदेशी समाधान खोजना चाहिए, जो है- भारत स्पेस ऑब्जेक्ट कैटलॉग.
अंतरिक्ष की परिस्थितियों की जानकारी असैन्य और सैन्य अंतरिक्ष अभियानों का आधार होता है. विदेशी SSA डेटा पर निर्भरता उन देशों के लिए गंभीर ख़तरा पैदा कर सकती है, जिनके पास सीमित या नगण्य SSA क्षमता है. इसमें कोई सहयोगी देश अपनी क्षमताओं को छिपाने के लिए जान-बूझकर अपने उपग्रहों की वास्तविक स्थिति को छिपा सकता है या अपने खुफिया संग्रह संसाधनों की सुरक्षा के लिए शत्रु उपग्रहों से संबंधित डेटा को बाधित कर सकता है. संकट की स्थिति में, वह SSA डेटा की आपूर्ति पूरी तरह से बंद कर सकता है, ताकि दो पक्षों के विवाद में तीसरे के शामिल होने का मौक़ा न मिले.
इन सबके अलावा, मुफ़्त डेटा की अपनी तकनीकी सीमाएं भी होती हैं. अमेरिकी अंतरिक्ष कमान SSA डेटा टू-लाइन एलिमेंट्स (TLE) के रूप में साझा करता है, जो कैप्लरियन एलिमेंट्स में व्यक्त अंतरिक्ष वस्तुओं की अनुमानित कक्षीय स्थिति बताता है. TLE बेशक डेटा विज़ुअलाइज़ेशन और विश्लेषण के लिए उपयोगी है, लेकिन इसमें पिंडों की स्थिति में लगभग 1 किलोमीटर का अंतर हो सकता है, जिससे सटीक अभियानों में ये काम के नहीं माने जाते. वहीं, रूसी विम्पेल कैटलॉग हर सात दिनों में एक बार डेटा उपलब्ध कराता है, वह भी अपने देश के ख़ास प्रारूप में, जिससे अन्य डेटासेट के साथ इसके तालमेल में मुश्किलें पेश आती हैं.
10 सेंटीमीटर या उससे कम आकार के मलबे का पता लगाने, निकट स्थित वस्तुओं के बीच अंतर करने और अंतरिक्ष पिंड वाले कक्षाओं पर नज़र रखने में रडार, निष्क्रिय- RF सेंसर और टेलीस्कोप को सक्षम होने चाहिए. इन सेंसरों से मिलने वाले डेटा उन एल्गोरिदम को बेहतर बनाता है, जो किसी अंतरिक्ष पिंड पर लगने वाले बलों का सटीक मॉडल बनाते हैं
विदेशी SSA डेटा की इन राजनीतिक और तकनीकी ख़ामियों के कारण स्वदेशी SSA नेटवर्क और कैटलॉग की ज़रूरत महसूस हो रही है. भारत स्पेस ऑब्जेक्ट कैटलॉग को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने से अंतरिक्ष अभियान करने वाले देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के पालन में मदद मिलेगी और शायद ज़िम्मेदार व्यवहार को भी बढ़ावा मिलेगा.
एक SSA नेटर्वक और कैटलॉग रखरखाव तंत्र को संचालित करना कोई आसान काम नहीं होता, फिर चाहे उसका क्षेत्रीय कवेरज़ छोटा ही क्यों न हो. इसके लिए सेंसर और सॉफ़्टवेयर के बीच तालमेल बनाना पड़ता है. 10 सेंटीमीटर या उससे कम आकार के मलबे का पता लगाने, निकट स्थित वस्तुओं के बीच अंतर करने और अंतरिक्ष पिंड वाले कक्षाओं पर नज़र रखने में रडार, निष्क्रिय- RF सेंसर और टेलीस्कोप को सक्षम होने चाहिए. इन सेंसरों से मिलने वाले डेटा उन एल्गोरिदम को बेहतर बनाता है, जो किसी अंतरिक्ष पिंड पर लगने वाले बलों का सटीक मॉडल बनाते हैं और कक्षा तय करने में होने वाली अनिश्चितताओं को कम करने के लिए उन्नत सांख्यिकीय तरीकों का इस्तेमाल करते हैं.
भारत अभी नैनीताल में स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES) के खगोलीय दूरबीनों पर निर्भर है, जिन्हें भूस्थिर कक्षाओं में अंतरिक्ष निगरानी के लिए तैयार किया गया है. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित एक मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित पिंडों की निगरानी करता है. इन सेंसरों से मिलने वाले डेटा को बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) के स्पेस ऑब्जेक्ट्स ट्रैकिंग और विश्लेषण (NETRA) नियंत्रण केंद्र में भेजा जाता है, जहां ISRO के वैज्ञानिक और इंजीनियर लॉन्च विंडो, टकराव और सैटेलाइट के विफल होने के कारणों की पड़ताल करने के लिए देसी और विदेशी व्यावसायिक सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं.
दुर्भाग्यवश, अंतरिक्ष क्षेत्र के सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आज की क्षमताएं बहुत सीमित हैं. चूंकि हर साल भारी संख्या में सैटेलाइट लॉन्च किए जाते हैं, इसलिए निगरानी करने वाले अंतरिक्ष पिंडों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. चीन की बढ़ती सैन्य उपग्रह क्षमताओं को देखते हुए, जिनमें उसका हालिया प्रायोगिक मिलन और निकटता मिशन भी शामिल है, भारत के 53 सक्रिय उपग्रहों पर संभावित ख़तरों की निगरानी करना आवश्यक है. इसके लिए, भारत के नीति निर्माताओं को अपनी SSA के लिए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए-
इन सेंसरों से मिलने वाले डेटा को बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) के स्पेस ऑब्जेक्ट्स ट्रैकिंग और विश्लेषण (NETRA) नियंत्रण केंद्र में भेजा जाता है, जहां ISRO के वैज्ञानिक और इंजीनियर लॉन्च विंडो, टकराव और सैटेलाइट के विफल होने के कारणों की पड़ताल करने के लिए देसी और विदेशी व्यावसायिक सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं.
इन योजनाओं को लागू करने के लिए सबसे पहले नीति-निर्माताओं को भारत की अपनी SSA क्षमताओं की कमियां ढूंढनी होगी, अन्यथा भारत इस अत्यधिक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में पिछड़ सकता है, जो एक जोखिम भरा कदम होगा.
प्रणव आर सत्यनाथ अंतरिक्ष और रक्षा नीति शोधकर्ता हैं, जिनके पास उद्योग और अकादमिक क्षेत्र में आठ वर्षों का अनुभव है.
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Pranav R. Satyanath is a researcher focusing on arms control, nuclear strategy, and space policy. His research interests lie at the intersection of technology and ...
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