डिसएंगेजमेंट, तनाव कम होने और सीमा पर तैनात सैनिकों की संख्या घटाने की रफ़्तार तेज़ रहेगी. पर, आपसी विश्वास बहाल करने में ज़्यादा वक़्त लगेगा.
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पूर्वी लद्दाख में गश्त लगाने के लिए भारत और चीन के बीच हुआ समझौता भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. 2020 में चीन की हरकतों की शुरुआत- यानी छह जगहों पर भारतीय सैनिकों के गश्त लगाने की राह में बाधाएं खड़ी करना और सीमा पर भारी तादाद में सैनिक तैनात करने के साथ ही भारत ने इन हालात से बहुत सधे हुए तरीक़े से निपटने की कोशिश की थी. एक तरफ़ तो भारत ने उन जगहों पर चीन को चुनौती दी, जहां उसने गश्त की राह में अड़ंगे लगाए हुए थे और सीमा पर अपनी तरफ़ से भी सैनिकों की भारी तादाद तैनात कर दी. इससे भारत के आक्रामक रुख़ के बजाय रक्षात्मक रवैये का संकेत मिला. वहीं दूसरी ओर भारत ने सख़्त और स्थिर कूटनीति के ज़रिए चीन पर अपने क़दम वापस खींचने का दबाव लगातार बनाए रखा.
एक तरफ़ तो भारत ने उन जगहों पर चीन को चुनौती दी, जहां उसने गश्त की राह में अड़ंगे लगाए हुए थे और सीमा पर अपनी तरफ़ से भी सैनिकों की भारी तादाद तैनात कर दी. इससे भारत के आक्रामक रुख़ के बजाय रक्षात्मक रवैये का संकेत मिला.
इस तरह और स्पैंगुर सो पर निगाह रखना आसान बनाने वाली कैलाश की चोटी पर क़ब्ज़ा करके भारत ने चीन पर सैन्य तरीक़े से भी दबाव बनाया. अपनी इन कोशिशों के ज़रिए भारत जुलाई 2022 तक चार जगहों पर गश्त की राह के रोड़ों का विवाद निपटा पाने में सफल रहा था. इन बिंदुओं को बफ़र ज़ोन में तब्दील कर दिया गया था, जहां दोनों में से कोई भी देश गश्त नहीं लगा सकता था. लेकिन, डेपसांग और डेमचोक के चारडिंग नाला में दो नाकेबंदियों का निपटारा कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हुआ. लेकिन, कुछ महीनों पहले अचानक हालात बदल गए और दोनों तरफ़ से कूटनीतिक प्रयासों में तेज़ी लाते हुए भारत और चीन एक ऐसे समझौते पर सहमत हो गए, जो नाकेबंदी के अन्य मोर्चों को लेकर हुई सौदेबाज़ी से कहीं बेहतर कहा जा रहा है.
पिछले हफ़्ते भारतीय अधिकारियों द्वारा जारी किए गए बयानों में संकेत दिया गया कि चीन और भारत, डेपसांग बल्ज और चार्डिंग नाले का विवाद सुलझा लेने में सफल रहे हैं. 21 अक्टूबर को जिस समझौते का एलान किया गया, वो शायद बहुस्तरीय है और इसको अलग अलग चरणों में लागू किया जाएगा. विदेश मंत्री एस जयसंकर ने दिल्ली में एक सम्मेलन के दौरान कहा कि पहले क़दम के तौर पर, ‘चीन के साथ डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है.’ विदेश मंत्री का ये बयान, विदेश सचिव विक्रम मिस्री द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में की गई इस घोषणा के बाद आया था कि, ‘भारत और चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त के लिए दोनों देशों के बीच एक समझौते पर सहमति बन गई है.’ विदेश मंत्री और विदेश सचिव दोनों ने कहा कि इस समझौते से 2020 में लद्दाख में जो परिस्थितियां पैदा हो गई थीं, उनका समाधान हो गया है.
सेना के सूत्रों के हवाले से आई ख़बरों में बताया गया है कि, ‘सोमवार को कोर कमांडर्स की मीटिंग के दौरान डिसएंगेजमेंट और साथ ही साथ गश्त करने की प्रक्रिया के तौर तरीक़ों को लेकर एक विस्तृत समझौते पर सहमति बन गई है.’ इसके नतीजे के तौर पर चीन ने जो नाकेबंदी कर रखी थी, उन्हें हटा लिया जाएगा और दोनों देश डेपसांग बल्ज और डेमचोक में आपसी तालमेल के साथ दोबारा गश्त शुरू कर देंगे. तो डेपसांग में भारत के सैनिक उस वाई जंक्शन के पास PP 10, 11, 11A, 12 और 13 पर गश्त लगा सकेंगे, जहां पर मार्च 2020 के बाद उन्हें जाने से रोका जा रहा था. इसके जवाब में चीन के सैनिक भी कुछ इलाक़ों में गश्त लगा सकेंगे, हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि ये इलाक़े कौन से होंगे.
चित्र 1: डेपसांग की नाकेबंदी

(स्रोत: गूगल अर्थ की मदद से लेखक द्वारा स्वयं तैयार किया गया)
इस बार के समझौते में जो बेहद अहम नई बात है, वो ये है कि इस महीने के आख़िर से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त को दोनों देश आपसी तालमेल के साथ करेंगे, ताकि दोनों के सैनिक एक दूसरे से टकराव की स्थिति में न आ सकें. स्रोतों ने ये भी कहा कि, ‘गश्त के बीच इतना फासला रखा जाएगा कि दोनों देशों के सैनिक एक दूसरे के आमने-सामने नहीं पड़ेंगे.’ एक और रिपोर्ट में बताया गया कि जैसे ही ये समझौता हुआ, उसके तुरंत बाद से दोनों देशों के सैनिकों ने वो तंबू और बने बनाए शेड हटाकर डिसएंगेजमेंट की शुरुआत कर दी थी, जिनका इस्तेमाल गाड़ियां, सैनिक और साज़-ओ-सामान रखने के लिए किया जा रहा था. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत और चीन के सैनिक 28-29 अक्टूबर तक सीमा पर अग्रणी मोर्चेबंदी से पीछे हट जाएंगे.
2020 में चीन ने छह जगहों पर नाकेबंदी करके भारतीय सैनिकों के गश्त लगाने का रास्ता रोक दिया था. ये ठिकाने पैंगॉन्ग सो झील का उत्तरी किनारा, गोगरा पोस्ट के पास PP17A, PP 15 का गोगरा हॉटस्प्रिंग्स वाला इलाक़ा, डेपसांग बल्ज में वाई जंक्शन और चार्डिंग नाले के थे. आख़िरी दो को छोड़ दें तो बाक़ी के मसले बातचीत के ज़रिए सुलझा लिए गए थे. जुलाई 2020 में गलवान और जुलाई 2022 में PP 15 के मसलों को सुलझा लिया गया था. लेकिन, इन सबी इलाक़ों में भारत और चीन ने 3 से 10 किलोमीटर चौड़ाई वाली बफ़र ज़ोन बनाई थी, जहां दोनों में से कोई भी देश गश्त नहीं लगा सकता था. मौजूदा समझौते में गश्त और डिसएंगेजमेंट दोनों ही शामिल हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो डेपसांग बल्ज और चार्डिंग नाले को लेकर हुए समझौते में हालात तब्दील हो गए हैं और चीन की नाकेबंदी हटा दी गई है. ये नाकेबंदी के दूसरे ठिकानों से कहीं आगे की बात है, क्योंकि ये इलाक़े अभी भी ‘गश्त नहीं लगा सकने’ वाले बफ़र ज़ोन बने हुए हैं.
कूटनीतिक बातचीत के पूरे दौर में भारत इस बात पर ज़ोर देता रहा था कि ‘डिसएंगेजमेंट’ के बाद ‘तनाव कम किया जाए’ और फिर सीमा पर तैनात ‘अतिरिक्त सैनिकों को हटाया जाए’, जिन्हें तनाव के बाद सीमावर्ती इलाक़ों में लगाया गया था.
कूटनीतिक बातचीत के पूरे दौर में भारत इस बात पर ज़ोर देता रहा था कि ‘डिसएंगेजमेंट’ के बाद ‘तनाव कम किया जाए’ और फिर सीमा पर तैनात ‘अतिरिक्त सैनिकों को हटाया जाए’, जिन्हें तनाव के बाद सीमावर्ती इलाक़ों में लगाया गया था. हालांकि, ये समझौता एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इसके तहत डेपसांग बल्ज और चार्डिंग नाला इलाक़े में अप्रैल 2020 वाली स्थिति दोबारा बहाल हो सकेगी. अगर ऐसी ही प्रक्रिया विवाद वाले अन्य क्षेत्रों में लागू की जा सके, तो भारत और चीन, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के सामान्य प्रबंधन की ओर लौट सकेंगे.
हालांकि, घड़ी की सुइयों को दोबारा मोड़ पाना आसान नहीं होगा. भारत और चीन, 1993, 1996, 2005 और फिर 2012 में आपसी विश्वास बढ़ाने वाले कई समझौते करके मोटे तौर पर LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में सफल रहे हैं. इन समझौतों के तहत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों की सेनाओं का बर्ताव नियंत्रित होता है. इसकी कामयाबी का एक उदाहरण ये था कि गलवान घाटी में हुए संघर्ष में बंदूकों का इस्तेमाल नहीं हुआ था, बल्कि लाठियों और पत्थरों का प्रयोग किया गया था. क्योंकि आपसी विश्वास बहाल करने वाले 1996 में हुए समझौते के मुताबिक़, बंदूकों का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर दिया गया था. इसके बावजूद, चीन की तरफ़ से समझौतों की अहम शर्तों का उल्लंघन किया गया था.
अधिकारियों के बयानों में कुछ ऐसी बातों की तरफ़ संकेत हैं कि ये समझौता यांगत्से जैसे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है, जहां भारत और चीन के सैनिकों के बीच दिसंबर 2022 में झड़प हुई थी. इसके अलावा आपसी तालमेल से गश्त करने जैसे नए क़दम, जिनको पहले पहल पूर्वी सेक्टर में प्रयोग किया गया था, उन्हें अब उन क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है, जहां भारत और चीन के दावे एक दूसरे से टकराते हैं और दोनों ही देश वहां पर गश्त लगाने का अधिकार जताते हैं.
ये अपेक्षा की जा रही है कि विशेष प्रतिनिधि ही अब चीन और भारत के मेल-मिलाप की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे, जिससे आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सीमित सियासी सैन्य और आर्थिक संबंधों में विस्तार देखने को मिल सकता है.
इस समझौते का सबसे अहम पहलू आपसी विश्वास की बहाली का है. सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस समझौते का एलान होने के बाद कहा था कि इस समझौते की मूल बात ये है कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच ‘विश्वास’ की बहाली हो. अप्रैल 2020 वाले हालात दोबारा बहाल करने की अपील करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा था कि भारत को डिसएंगेजमेंट, तनाव करने और फिर उसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के नियमित प्रबंधन के मसलों पर बहुत सावधानी से ग़ौर करना चाहिए. ये सारे काम अलग अलग चरणों में धीरे धीरे किए जा सकते हैं.
जहां तक डिसएंगेजमेंट, तनाव कम होने और सीमा पर तैनात सैनिकों की संख्या घटाने की रफ़्तार की बात है, तो वो तो तेज़ रफ़्तार से होता रहेगा. पर, आपसी विश्वास बहाल करने में ज़्यादा वक़्त लगेगा. इसके लिए, पूर्व में किए गए आपसी विश्वास बहाली (CBM) के समझौतों में बदलाव करने की ज़रूरत पड़ेगी. पिछले हफ़्ते कज़ान में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात का एक अहम नतीजा ये निकला था कि दोनों नेताओं ने सीमा विवाद को लेकर अपने अपने विशेष प्रतिनिधियों (SR) को जल्दी से जल्दी मुलाक़ात करने का निर्देश दिया था. भारत की ओर से विशेष प्रतिनिधि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोवल हैं, तो चीन की तरफ़ से विदेश मंत्री वांग यी हैं. दोनों विशेष प्रतिनिधियों की आख़िरी मुलाक़ात 2019 में हुई थी. ये अपेक्षा की जा रही है कि विशेष प्रतिनिधि ही अब चीन और भारत के मेल-मिलाप की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे, जिससे आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सीमित सियासी सैन्य और आर्थिक संबंधों में विस्तार देखने को मिल सकता है.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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