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Published on Apr 14, 2026 Updated 1 Days ago

एक समय की बात है- भारत और कनाडा CEPA ज़रिए साथ मिलकर बड़ा व्यापार करना चाहते थे लेकिन हर बार “सब कुछ परफेक्ट” करने की कोशिश में बात अटक जाती थी. समझिए किस तरह परफेक्ट नहीं बल्कि स्मार्ट और चरणबद्ध CEPA ही असली गेम-चेंजर है.

क्या अब आगे बढ़ेगा भारत–कनाडा CEPA?

भारत और कनाडा ने अपने आर्थिक समन्वय को औपचारिक व्यापार समझौते में बदलने के लिए करीब पंद्रह वर्षों तक प्रयास किए हैं. गहरे आर्थिक जुड़ाव का मज़बूत आधार होने के बावजूद ये प्रयास बार-बार विफल रहे. भारत के पास विशाल बाज़ार, टिकाऊ विकास, सेवा क्षेत्र का बड़ा आधार और लंबे समय तक बनी रहने वाली मांग है. कनाडा के पास स्थायी पूंजी, प्रौद्योगिकी, प्राकृतिक संसाधन और दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण संस्थागत निवेशक हैं. फिर भी, द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में उतार-चढ़ाव दिखता रहता है, क्योंकि दोनों में ऐसी प्रभावशाली वार्ताओं का अभाव है, जो राजनीतिक संवेदनशीलता को संभाल सके और उसे व्यापक प्रयासों में बाधा न बनने दे.

भारत और कनाडा को ऐसे आदर्श CEPA की ज़रूरत नहीं है, जिसमें हर कठिन मुद्दों का आदर्श हल हो, बल्कि उन्हें एक व्यावहारिक, समझदारी से तैयार और चरणबद्ध तरीके से लागू समझौते की ज़रूरत है, जो व्यावसायिक रूप से उपयोगी, राजनीतिक रूप से मान्य और संस्थागत रूप से टिकाऊ हो.

भारत–कनाडा CEPA: उम्मीदें, लेकिन अधूरी प्रगति

व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) को इसी नज़र से हमें देखना चाहिए और इस साल के अंत तक इस पर सहमति बनाने के विशेष प्रयास करने चाहिए. इसके लिए दोनों सरकारों को उन रवैयों को छोड़ना होगा, जिनमें पहले ही बहुत समय बीत चुका है. लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाना है. इसलिए, भारत और कनाडा को ऐसे आदर्श CEPA की ज़रूरत नहीं है, जिसमें हर कठिन मुद्दों का आदर्श हल हो, बल्कि उन्हें एक व्यावहारिक, समझदारी से तैयार और चरणबद्ध तरीके से लागू समझौते की ज़रूरत है, जो व्यावसायिक रूप से उपयोगी, राजनीतिक रूप से मान्य और संस्थागत रूप से टिकाऊ हो.

इतिहास से सबक: CEPA और EPTA की धीमी यात्रा

इसमें इतिहास से भी सबक लिया जा सकता है. CEPA प्रक्रिया को 2010 में उम्मीदों के साथ शुरू किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी गति धीमी पड़ गई. इसके बाद प्रारंभिक प्रगति व्यापार समझौते (EPTA) के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों में फिर से जान फूंकने की कोशिश की गई, लेकिन राजनीतिक तनावों के कारण कारोबारी गतिविधियों में बाधा आने लगी और यह प्रयास भी विफल हो गया. इसकी वज़ह से आर्थिक वार्ताएं राजनीतिक रुकावटों से प्रभावित होने लगीं.

व्यापार समझौते, तब संपन्न नहीं होते, जब सब कुछ सुलझ जाता है, बल्कि वे तब संपन्न होते हैं, जब आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सहमति बन जाती है.

ऐसा नहीं है कि दोनों देशों में विषमता है. व्यापार, सेवा, ऊर्जा प्रौद्योगिकी, शिक्षा और पूंजी प्रवाह, सबमें दोनों में पर्याप्त समानता रही है, जिस कारण एक गंभीर आर्थिक समझौते की ज़रूरत है. मगर कार्यप्रणाली एक बड़ी समस्या रही है. इस कारण वार्ताओं में अक्सर पूर्णता पाने की ही बात होती रही है, जबकि, व्यवहार में, जटिल व्यापार समझौते इसके ठीक उलट तरीके से संपन्न होते हैं. इसमें सरकार व्यावहारिक मामलों को अंतिम रूप देती है, राजनीतिक रूप से कठिन मामलों को किनारे करती है और वर्तमान की मुश्किलों व भविष्य की आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए कदम उठाती है. व्यापार समझौते, तब संपन्न नहीं होते, जब सब कुछ सुलझ जाता है, बल्कि वे तब संपन्न होते हैं, जब आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सहमति बन जाती है.

इसलिए साल के अंत तक CEPA को लागू करना अब भी संभव है, लेकिन तभी, जब दोनों पक्ष यह मान लें कि चरणबद्ध और सोच-विचार के साथ किया गया समझौता किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं होता. मौजूदा परिस्थितियों में यही एकमात्र विकल्प है. समझौते की व्यापक रूपरेखा इसी वर्ष तय कर लेनी चाहिए और जिन मुद्दों पर पहले ही सहमति बन चुकी है, उनको बिना किसी देरी के लागू किया जाना चाहिए. राजनीतिक रूप से संवेदनशील टैरिफ़ और नियामक दायित्वों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर भी सहमति बनानी चाहिए. साथ ही, सावधानीपूर्वक तैयार किए गए सुरक्षा उपायों व समीक्षा तंत्रों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए.

व्यापार समझौते: पूर्ण समाधान नहीं, पर्याप्त सहमति का खेल

उद्देश्य उम्मीदों को पूरा करना होना चाहिए. व्यापार समझौते इसलिए स्थायी नहीं होते कि वे शुरू में ही सभी कठिनाइयों को दूर कर देते हैं, बल्कि इसलिए होते हैं, क्योंकि वे सहमतियों को लागू करने का एक भरोसेमंद रास्ता तैयार करते हैं. भारत और कनाडा, दोनों के पास ऐसे क्षेत्र हैं, जिनको वे हल्के में नहीं ले सकते. कृषि अब भी एक संवेदनशील मसला है. कारोबारी आवागमन राजनीतिक रूप से विवादित विषय बना हुआ है. कुछ टैरिफ़ अब भी समस्याएं पैदा करती हैं. पारदर्शिता में असमानता है. निवेश कानूनी रूप से मुश्किल बना हुआ है. इनमें से किसी से बचा नहीं जा सकता. बड़ी व्यापार वार्ताओं में ऐसे क्षेत्र शामिल होते हैं, जिनकी रक्षा सरकारें किसी भी अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक सावधानी से करती हैं. मगर यहां गलती यह हुई है कि संवेदनशीलताओं को संस्थागत डिजाइन का आधार मानने के बजाय, गतिरोध का कारण मान लिया जाता है.

बड़ी व्यापार वार्ताओं में ऐसे क्षेत्र शामिल होते हैं, जिनकी रक्षा सरकारें किसी भी अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक सावधानी से करती हैं. मगर यहां गलती यह हुई है कि संवेदनशीलताओं को संस्थागत डिजाइन का आधार मानने के बजाय, गतिरोध का कारण मान लिया जाता है.

एक समझदारीपूर्ण CEPA की शुरुआत तुरंत भरोसा पैदा करने वाले कदमों से होनी चाहिए. सीमा शुल्क सहयोग, व्यापार सुगमता, मानकों में पारदर्शिता, प्रक्रियाओं में सरलता और संवेदनशीलता से संभाले जा सकने वाले वस्तु एवं सेवा क्षेत्र को हल्के-फुल्के विवादों की वज़ह से पीछे नहीं रखना चाहिए. इससे यह विश्वास पैदा होगा कि समझौता सिर्फ़ कूटनीतिक संकेत नहीं, बल्कि व्यावहारिक है. 

इसी तरह, टैरिफ़ से जुड़े जटिल मुद्दों को हल करने के प्रयास होने चाहिए. यदि कुछ उत्पादों के लिए सार्थक उदारीकरण को राजनीतिक रूप से संभव बनाने में पांच, सात या उससे अधिक वर्ष लगते हैं, तो इसका समझौते में साफ़-साफ़ ज़िक्र होना चाहिए. यदि कुछ ख़ास उत्पादों के लिए ऐसा करना शुरुआती दौर में कठिन हो, तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए, न कि उसे स्थायी बाधा बनने देना चाहिए.

आवाजाही के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए. कोई भी गंभीर आर्थिक साझेदारी तब तक प्रभावी रूप से काम नहीं कर सकती, जब तक व्यावसायिक यात्राएं कठिन और अनिश्चित बनी रहती हैं. सेवा क्षेत्र लोगों की आवाजाही पर निर्भर करता है. निवेश, अनुसंधान सहयोग, व्यावसायिक समस्याओं का समाधान, प्रौद्योगिकी साझेदारी भी इसी पर निर्भर करती है.

नियमों में स्पष्टता और गैर-टैरिफ़ बाधाओं में कमी करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है. पारदर्शिता आमतौर पर व्यावसायिक हित और वास्तविक निवेश के बीच एक सेतु का काम करती है. इसलिए एक अच्छे CEPA  से मानकों, गैर-टैरिफ़ बाधाओं और नियामक प्रक्रियाओं से जुड़े मसलों का समाधान होना चाहिए.

हालांकि, सबसे संवेदनशील मुद्दा निवेश से जुड़ा है. इसके लिए दोनों देशों को ठोस व्यवस्था करनी होगी. सवाल है कि निवेश से जुड़े ढांचे किस तरह बनाए जाएं? क्या इसे CEPA में पूरा संरक्षण मिलना चाहिए या द्विपक्षीय निवेश समझौते के माध्यम से इस पर अलग से बातचीत होनी चाहिए? दोनों देश इस मुद्दे पर अलग-अलग संस्थागत और कानूनी परंपराओं से विचार करते हैं, और इस अंतर को अनदेखा करने के बजाय स्वीकार किया जाना चाहिए.

समय की मांग

भारत में कनाडा की आर्थिक हिस्सेदारी सिर्फ़ पारंपरिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तक सीमित नहीं है. पोर्टफोलियो निवेश, सूचीबद्ध संपत्तियों, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश और अन्य आर्थिक मंचों के माध्यम से निवेश करने वाले कनाडाई पेंशन फंड्स भी काफ़ी अधिक अहमियत रखते हैं, इसलिए निवेश के मुद्दों पर अलग-अलग नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है.

हम इस काम में पहले ही काफ़ी वक्त गंवा चुके हैं, अब एक और साल बर्बाद नहीं कर सकते.

CEPA में निवेश प्रोत्साहन, पारदर्शिता, सुगमता, निवेशक सेवाओं और संस्थागत संवाद को लेकर सार्थक प्रावधान किए जा सकते हैं. इसके साथ-साथ द्विपक्षीय निवेश समझौते के माध्यम से परिभाषाओं, दायरे, पोर्टफोलियो कवरेज, विवाद-निपटान और निवेशकों के विश्वास व मेजबान देश के नियम लागू करने संबंधी अधिकारों के बीच संतुलन बनाने जैसे मुद्दे शामिल किए जाने चाहिए. इस प्रकार का विभाजन एक व्यापक व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने में मददगार होगा. भारत और कनाडा के संबंधों के लिए यह सोच इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कनाडाई पेंशन फंड स्थिर निवेशक हैं. 

यथार्थवादी रास्ता

साफ़ है, नई दिल्ली और ओटावा को इस साल के अंत तक चरणबद्ध CEPA को अंतिम रूप देने का लक्ष्य बनाना चाहिए. इसमें सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना चाहिए और व्यावसायिक कंपनियों के लिए आने-जाने की सुगम व्यवस्था होनी चाहिए. निवेश के मामले में दोनों को अलग-अलग नज़रिया अपनाना चाहिए और CEPA के भीतर सुविधा देने के बावजूद द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से विशेष सुरक्षा देनी चाहिए.

दोनों देशों के बीच व्यावहारिक समझौता होना ज़रूरी है, इसलिए चुनाव आदर्श CEPA और समझौतावादी CEPA के बीच नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यावहारिक CEPA के बीच होना चाहिए, जिसे अभी पूरा किया जा सकता है. हम इस काम में पहले ही काफ़ी वक्त गंवा चुके हैं, अब एक और साल बर्बाद नहीं कर सकते.


(राजदूत संजय कुमार वर्मा RIS के पूर्व अध्यक्ष, कनाडा में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और जापान व सूडान के पूर्व भारतीय राजदूत हैं)

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