Author : Aleksei Zakharov

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 16, 2025 Updated 0 Hours ago

भू-राजनीतिक बदलावों और व्यापार की बाधाओं ने भारत-बेलारूस के बीच संबंधों को दबाव में ला दिया है. ये स्थिति उस समय है जब दोनों पक्ष बहुपक्षीय भागीदारी और आर्थिक विविधता के माध्यम से संबंधों में नवीनता लाने का प्रयास कर रहे हैं.

भारत और बेलारूस: भटकती साझेदारी फिर से संतुलित करने की कोशिश!

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“मैं बेलारूस-भारत संबंधों की मौजूदा स्थिति से संतुष्ट नहीं हूं. सच कहूं तो भारत के साथ हमारे रिश्तों में गिरावट आई है, इसलिए भारत एक आसान मंज़िल नहीं है. लेकिन हमारे लिए भारत एक बहुत महत्वपूर्ण विदेशी आर्थिक साझेदार है. भारत एक बहुत विशाल बाज़ार है और हम वहां सोवियत संघ के समय से मौजूद हैं. हमें हर हाल में मुख्य क्षेत्रों में अपने संबंधों की बुनियाद तैयार करनी होगी.” ये बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको के शब्द हैं जिसके माध्यम से उन्होंने जनवरी 2024 में भारत में नवनियुक्त राजदूत मिखाइल क्रास्को को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं के बारे में बताया. संबंधों में गड़बड़ी की धारणा कथित तौर पर व्यापार में कमी से जुड़ी है. बेलारूस के इरादे साफ हैं: पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों को देखते हुए बेलारूस अलग-अलग देशों के साथ आर्थिक साझेदारी करना चाहता है और अपनी वस्तुओं के लिए नए बाज़ार तलाशना चाहता है. उसका एक प्रमुख लक्ष्य भारत को निर्यात बढ़ाना है जो वित्त वर्ष 2022-23 से तेज़ी से गिरा था. 

पीछे छूट चुका एक आर्थिक अवसर 

दिसंबर 2021 में अमेरिका ने बेलारूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया और उसके बाद यूरोपीय देशों ने. इसकी वजह से बेलारूस को बाल्टिक बंदरगाहों का उपयोग करने से रोक दिया गया. इससे प्रमुख सामानों जैसे कि उर्वरक के निर्यात के लिए गंभीर रुकावटें खड़ी हो गई हैं. 2022 से पहले बेलारूस की प्रमुख उर्वरक उत्पादक कंपनी बेलारूसकली हर साल लिथुआनिया के बंदरगाह क्लाइपेडा के ज़रिए 10-12 मिलियन टन पोटाशियम उर्वरक का निर्यात करती थी. लेकिन इस रूट तक पहुंच ख़त्म होने के बाद बेलारूस को नई सप्लाई चेन बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा जिससे वो पूरी तरह से रूस के परिवहन के बुनियादी ढांचे पर निर्भर हो गया. चूंकि फर्टिलाइज़र के निर्यात के लिए रूस के टर्मिनल की क्षमता सीमित है, ऐसे में निर्यात की मात्रा बेलारूस के निर्यातकों की उम्मीद को पूरा नहीं कर पाई है. वैसे तो रूस और बेलारूस ने रूस के मुरमांस्क क्षेत्र में बंदरगाह बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो विशेष रूप से बेलारूस के फर्टिलाइज़र और तेल उत्पादों का निर्यात करेगा, लेकिन ये परियोजना अभी डिज़ाइन और सर्वे के चरण में ही है और ये 2028 तक ही पूरा हो पाएगा. 

पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों को देखते हुए बेलारूस अलग-अलग देशों के साथ आर्थिक साझेदारी करना चाहता है और अपनी वस्तुओं के लिए नए बाज़ार तलाशना चाहता है. उसका एक प्रमुख लक्ष्य भारत को निर्यात बढ़ाना है जो वित्त वर्ष 2022-23 से तेज़ी से गिरा था. 

जब बात भारत-बेलारूस व्यापार की आती है तो साजो-सामान की चुनौतियों और भुगतान के मुद्दों ने बेलारूस से भारत के निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है, ये लगभग ठप सा पड़ गया है (रेखाचित्र 1 देखें). बेलारूस के साथ द्विपक्षीय व्यापार के टर्नओवर के लिए विशेष रूप से दर्द देने वाला  झटका था भारत के द्वारा उर्वरक के आयात में गिरावट जिसका हिस्सा किसी समय कुल व्यापार में 80 प्रतिशत से ज़्यादा होता था. वित्त वर्ष 2020-21 में भारत ने बेलारूस से 224 मिलियन अमेरिकी डॉलर के उर्वरक का आयात किया जो 2021-22 में बढ़कर 364 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया लेकिन 2023-24 में ये घटकर सिर्फ 50,000 अमेरिकी डॉलर और 2024-25 में 11 मिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया. वैसे तो भारत फार्मास्यूटिकल्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स का एक महत्वपूर्ण सप्लायर बना हुआ है लेकिन बेलारूस को भारत का निर्यात 60-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर के साधारण आंकड़े के इर्द-गिर्द ही घट-बढ़ रहा है. बेलारूस के द्वारा उर्वरक की सप्लाई में नाटकीय गिरावट और भारत के निर्यात में वृद्धि की कमी ने दोनों देशों को 1 अरब अमेरिकी डॉलर के व्यापार लक्ष्य से पीछे रखा है. ये लक्ष्य एक दशक पहले अंतर-सरकारी आयोग (IGC) ने निर्धारित किया था. 

रेखाचित्र 1. बेलारूस से भारत का आयात और निर्यात (2020-2025, मिलियन अमेरिकी डॉलर में) 

India And Belarus Recalibrating An Adrift Partnership

स्रोत: वाणिज्य विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार

पिछले कुछ वर्षों के दौरान दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय समझौते हुए हैं. अक्टूबर 2019 में बेलारूस की बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी बेल AZ ने 130 टन के 77 माइनिंग डंप ट्रक की सप्लाई के लिए कोल इंडिया लिमिटेड के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए. इसके दो साल बाद 240 टन की क्षमता वाले 96 माइनिंग ट्रक के लिए साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के साथ समझौता किया. 2021 से बेलारूस की कृषि मशीनरी बनाने वाली कंपनी मिंस्क ट्रैक्टर वर्क्स (MTW), भारत की कंपनी एरिशा एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौते के ज़रिए भारतीय बाज़ार में मौजूद है. भारत में कृषि उपकरणों के उत्पादन और असेंबलिंग से परे इस समझौते ने कंपनी को दक्षिण एशिया में अपनी मौजूदगी का विस्तार करने में सक्षम बनाया है, विशेष रूप से श्रीलंका को ट्रैक्टर की सप्लाई के माध्यम से. फरवरी 2025 में मिंस्क ऑटोमोबाइल प्लांट ने दिल्ली में अपना कार्यालय खोला ताकि “पुर्जों, कच्चे माल और मशीन टूल के भारतीय उत्पादकों के साथ कारोबारी संबंध बनाया जा सके.”

2023 में बेलारूस की सरकारी क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ग्रोदो एनर्जो ने गैस टर्बाइन की सप्लाई, सर्विसिंग और रखरखाव के लिए BHEL के साथ सहयोग को लेकर बातचीत की. हालांकि इस बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला.

बेलारूस की अर्थव्यवस्था में भारत का निवेश सीमित रहा है और एक अनुमान के मुताबिक ये लगभग 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर के आसपास है. भारत का ज़्यादातर निवेश फार्मास्यूटिकल्स सेक्टर में रहा है और 2016 में भारत ने बेलारूस में तीन संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) स्थापित कए. भारत ने बेलारूस को कई बार क्रेडिट लाइन (ज़रूरत के मुताबिक एक निश्चित सीमा तक फंड हासिल करने की सुविधा) भी मुहैया कराई है. 2012 में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) ने ग्रोद्नो पावर प्लांट को अपग्रेड करने की 55.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की परियोजना में गैस टर्बाइन को स्थापित करने और उसके रखरखाव का काम किया. इस परियोजना के लिए फंडिंग भारत के एग्ज़िम बैंक ने की थी. उसी साल भारत की तरफ से 5 करोड़ रुपये की क्रेडिट लाइन की सहायता से मिंस्क के हाई टेक्नोलॉजी पार्क में स्थापित एक डिजिटल लर्निंग सेंटर का उद्घाटन किया गया. 2015 में भारत सरकार ने बेलारूस के साथ साझा परियोजनाओं के लिए 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर की क्रेडिट लाइन का एलान किया. हालांकि उस समय से इसके लागू होने को लेकर और कोई जानकारी सामने नहीं आई है.  

2023 में बेलारूस की सरकारी क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ग्रोदो एनर्जो ने गैस टर्बाइन की सप्लाई, सर्विसिंग और रखरखाव के लिए BHEL के साथ सहयोग को लेकर बातचीत की. हालांकि इस बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला. ख़बरों के मुताबिक, 2023 में ही भारतीय कंपनियां बेलारूस की सरकारी कंपनी ग्रोद्नो अज़ोट में नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन का विस्तार करने के लिए 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक के निवेश की योजना बना रही थीं ताकि भारत को सप्लाई में वृद्धि की जा सके. लेकिन ये योजनाएं भी अभी तक साकार नहीं हो सकी हैं. 

हाशिये से परे राजनीतिक भागीदारी 

भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जिन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में बेलारूस की सदस्यता और BRICS में साझेदार के रूप में उसके दर्जे का समर्थन किया था. भारत और बेलारूस के बीच हाल के दिनों में बातचीत द्विपक्षीय भागीदारी के लिए बहुपक्षीय मंचों के महत्व को रेखांकित करती है. कई आधिकारिक बैठकें अब SCO, गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM), मनी लॉन्ड्रिंग एवं आतंकवाद के वित्त पोषण के ख़िलाफ़ यूरेशियन समूह (EAG), संयुक्त राष्ट्र (UN) और BRICS शिखर सम्मेलन में होती है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको के बीच आख़िरी बातचीत, जो कि संक्षिप्त थी और जिसे ‘निजी बातचीत’ कहा गया था, 2019 में किर्गिस्तान की राजधानी बिशकेक में SCO बैठक के दौरान हुई थी. दोनों देशों के बीच आख़िरी द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन 2017 में आयोजित किया गया था जब भारत-बेलारूस कूटनीतिक संबंधों की 25वीं सालगिरह का जश्न मनाने के लिए लुकाशेंको ने दिल्ली का दौरा किया था. हाल के वर्षों में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत में बढ़ोतरी देखी गई है. 2024 में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बेलारूस के विदेश मंत्री के साथ चार बार मुलाकात की: तत्कालीन विदेश मंत्री सर्जेई एलीनिक के साथ जनवरी और मार्च में; और वर्तमान विदेश मंत्री मकसिम रिज़हेनकोव के साथ जुलाई और सितंबर में. चूंकि बेलारूस के विदेश मंत्री भारत के लिए विशेष प्रतिनिधि और अंतर-सरकारी आयोग (IGC) के सह-अध्यक्ष भी हैं, ऐसे में बैठक के दौरान व्यापक मुद्दों पर बातचीत हुई जिनमें वैश्विक एवं क्षेत्रीय चिंताएं, व्यापार, औद्योगिक एवं तकनीकी सहयोग और शैक्षिक एवं लोगों के स्तर पर संबंध शामिल हैं. तीन साल के अंतराल के बाद दोनों पक्ष “निकट भविष्य में” कारोबारी शिखर सम्मेलन के साथ IGC का नया सत्र आयोजित करने की तैयारी कर रहे हैं. 

वैसे तो बेलारूस ने एक तटस्थ रवैया अपना रखा है लेकिन पाकिस्तान की कूटनीतिक भाषा को बेलारूस का खुलकर समर्थन- जैसा कि इस्लामाबाद में शरीफ और लुकाशेंको की बातचीत के बाद बेलारूस के बयान में देखा गया जिसमें कहा गया कि “सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीकों और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुसार करने की आवश्यकता है”- भारत में चिंता बढ़ा सकता है. 

लोगों के स्तर पर संबंधों में हाल के समय में नई तेज़ी आई है और जून 2024 में पहला द्विपक्षीय कॉन्सुलर संवाद आयोजित किया गया. बातचीत के दौरान वीज़ा नीति, आम लोगों एवं कानूनी संस्थानों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और श्रमिकों के प्रवासन के अवसरों पर ध्यान केंद्रित किया गया. बेलारूस की सरकारी एयरलाइंस बेलाविया अगस्त 2023 से मिंस्क और दिल्ली के बीच सीधी विमान सेवा का संचालन कर रहा है जिससे व्यावसायिक संबंधों को मज़बूती और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. वर्तमान में बेलारूस के विश्वविद्यालयों में लगभग 1,000 भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं जिनमें से ज़्यादातर छात्र मेडिकल का अध्ययन कर रहे हैं. 

आने वाले समय में राजनीतिक भागीदारी के लिए एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है. बेलारूस इस समय ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) की तरफ आर्थिक और राजनीतिक ध्यान दे रहा है. उसने पाकिस्तान के साथ अपने संबंध मज़बूत किए हैं जिसका सबूत नवंबर 2024 और अप्रैल 2025 में राष्ट्रपति लुकाशेंको और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के पारस्परिक दौरों से मिलता है. भारत-पाकिस्तान के बीच वर्तमान तनाव को देखते हुए बेलारूस की क्षेत्रीय कूटनीति की परख होने की संभावना है. वैसे तो बेलारूस ने एक तटस्थ रवैया अपना रखा है लेकिन पाकिस्तान की कूटनीतिक भाषा को बेलारूस का खुलकर समर्थन- जैसा कि इस्लामाबाद में शरीफ और लुकाशेंको की बातचीत के बाद बेलारूस के बयान में देखा गया जिसमें कहा गया कि “सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीकों और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुसार करने की आवश्यकता है”- भारत में चिंता बढ़ा सकता है. 

भारत के रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों के साथ-साथ भारत के साथ कारोबार करने की व्यावहारिकताओं को लेकर बेलारूस में गहन विशेषज्ञता की कमी, जिसका उल्लेख बेलारूस के विशेषज्ञों ने किया है, दोनों देशों के बीच गहरी भागीदारी को सीमित करने का एक और कारक हो सकता है. अतीत में बेलारूस के नेतृत्व ने भारतीय विदेश नीति को उस समय गलत ढंग से पेश किया जब राष्ट्रपति लुकाशेंको ने ये बयान दिया कि “अमेरिका, इंग्लैंड, भारत और ऑस्ट्रेलिया (शायद जापान और दक्षिण कोरिया के साथ) एक पैसिफिक नेटो बनाना चाहते हैं.” द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों की संभावना को पूरी तरह से साकार करने के लिए बेलारूस को भारत के सामरिक उद्देश्यों और भारतीय नीति निर्माण की बारीकियों को लेकर गहरी समझ और संवेदनशीलता का प्रदर्शन करना होगा. 

बेलारूस के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए भारत को यूरेशिया में अपनी विदेश नीति पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है. भारत के आकलन में पूर्वी यूरोप को फिर से महत्व मिलने के साथ सोवियत संघ के बाद के युग में भारत ने इस क्षेत्र में स्पष्ट रूप से अपनी सक्रियता बढ़ाई है. लेकिन मौजूदा दशक में बेलारूस को लेकर भारत की नीति में उच्च-स्तरीय दौरों और आर्थिक पहल की कमी देखी गई है. 

भारत और बेलारूस अपनी साझेदारी को रणनीतिक स्तर तक ले जा सकते हैं या नहीं, जिसकी अपील  बेलारूस ने की है, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि वो आर्थिक भागीदारी को मज़बूत बनाने की  बाधाओं से पार पाने, अधिक नियमित एवं ठोस राजनीतिक संवाद स्थापित करने और एक-दूसरे की विदेश नीति से जुड़ी आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समायोजित करने में सक्षम हैं या नहीं. 


अलेक्सी ज़खारोव ORF के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में फेलो हैं. 

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