यह साल एआई के लिए निर्णायक माना जा रहा है, जब दुनिया तकनीकी बढ़त के लिए नई होड़ में उतर चुकी है. जानिए, ऐसे समय में 2026 एआई इम्पैक्ट समिट भारत के लिए क्यों बेहद अहम साबित हो सकती है.
भारत 2026 एआई इम्पैक्ट समिट की मेजबानी ऐसे समय में कर रहा है, जब वैश्विक अस्थिरता बढ़ रही है और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी तेज़ हो रही है. प्रौद्योगिकी इस खंडित वैश्विक व्यवस्था को सहारा देने वाले प्रमुख स्तंभों में से एक बन गई है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आज सबसे प्रमुख और तेज़ी से व्यापक होती जा रही तकनीक है. 2029 तक डेटा स्टोरेज, कंप्यूटेशनल क्षमता और ऊर्जा आवश्यकताओं समेत इसके समर्थन के लिए ज़रूरी बुनियादी ढांचे में लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर का निवेश होने का अनुमान है. फिर भी, एआई के सामाजिक-आर्थिक लाभों को लेकर अनिश्चितताएं बनी हुई हैं. एआई क्षेत्र की इन्हीं आशंकाओं, बाधाओं और संभावित फायदों पर शिखर सम्मेलन में प्रमुखता से चर्चा होने की उम्मीद है.
एजीआई को एक ऐसी एआई के रूप में परिभाषित किया जो एक समझदार वयस्क व्यक्ति की बहुमुखी प्रतिभा और दक्षता से मेल खाता है. उन्होंने मानव बुद्धि को दस प्रमुख संज्ञानात्मक क्षेत्रों में विभाजित किया है जिसमें तर्क, स्मृति और बोध शामिल हैं. एआई प्रणालियों का मूल्यांकन करने के लिए उन मापदंडों को इस्तेमाल किया है जो मानवीय तर्क पर भी ख़रे उतरते हैं.
एआई की दुनिया में अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद 'आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस' (एजीआई) के जल्द आने के दावे बेहद भ्रामक हैं. अक्टूबर 2025 में, एरिक श्मिट और योशुआ बेंगियो सहित विभिन्न क्षेत्रों के 30 से अधिक प्रसिद्ध एआई विशेषज्ञों ने एजीआई की सटीक परिभाषा विकसित करने के लिए एक साथ मिलकर काम किया. उन्होंने एजीआई को एक ऐसी एआई के रूप में परिभाषित किया जो एक समझदार वयस्क व्यक्ति की बहुमुखी प्रतिभा और दक्षता से मेल खाता है. उन्होंने मानव बुद्धि को दस प्रमुख संज्ञानात्मक क्षेत्रों में विभाजित किया है जिसमें तर्क, स्मृति और बोध शामिल हैं. एआई प्रणालियों का मूल्यांकन करने के लिए उन मापदंडों को इस्तेमाल किया है जो मानवीय तर्क पर भी ख़रे उतरते हैं. इस फ्रेमवर्क को समकालीन मॉडलों पर लागू करने से एक बहुत ही ज़्यादा असंतुलित संज्ञानात्मक प्रोफ़ाइल का पता चलता है, जैसा कि चित्र 1 में दिखाया गया है. हालांकि, ये एआई प्रणालियां ज्ञान-प्रधान क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करती हैं लेकिन मूलभूत संज्ञानात्मक क्षमताओं, विशेष रूप से दीर्घकालिक स्मृति भंडारण में गंभीर कमियां दिखती हैं.
चित्र 1: सामान्य बुद्धिमत्ता का विश्लेषण करने वाला फ्रेमवर्क

स्रोत: सेंटर फॉर एआई सेफ्टी (CAIS), A Definition of AGI
इसके विपरीत, ख़बरों के मुताबिक, ओपनएआई के सीईओ सैम अल्टमैन ने 2024 में माइक्रोसॉफ्ट के साथ एक समझौते पर साइन किए थे. इस समझौते में एजीआई की प्राप्ति को ओपनएआई द्वारा 100 अरब डॉलर या उससे ज्यादा का लाभ अर्जित करने के रूप में परिभाषित किया गया था. ओपनएआई में माइक्रोसॉफ्ट की लगभग 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. लाभ-आधारित इस मापदंड के तहत भी, ओपनएआई द्वारा 2025 में सिर्फ 13 अरब डॉलर के राजस्व का अनुमान लगाया गया है, जबकि निवेश का पैमाना एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है. ऐसे में एजीआई में एक दीर्घकालिक संभावना बनी हुई है.
विश्व के अग्रणी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (एलएलएम) के बीच प्रतिस्पर्धात्मक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया गया है. इसमें उनकी रैंकिंग भी शामिल है, साथ ही उन कंपनियों और देशों को भी रैंक किया गया है जो इन्हें विकसित और इनका इस्तेमाल करते हैं. इन एलएलएम को शक्ति प्रदान करने के लिए ज़रूरी कंप्यूटेशनल क्षमता की असीमित मांग वर्तमान भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नवीनतम चुनौती बनकर उभरी है. एआई कंप्यूटिंग आपूर्ति श्रृंखला में, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का केंद्रीयकरण एक बड़ी चुनौती है. (चित्र 2). उदाहरण के लिए, अमेरिकी कंपनी एनवीडिया की ग्लोबल चिप मार्केट में लगभग 80-95 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. अमेरिकी हाइपरस्केल क्लाउड प्रदाता एनवीडिया के राजस्व का 40 प्रतिशत और वैश्विक क्लाउड कंप्यूटिंग बाजार का 70 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं.
चित्र 2: वैश्विक कंप्यूटिंग बाज़ार में केंद्रीयकरण

स्रोत: Epoch AI
भारत का विशाल और विविध बाज़ार, किफायती इंजीनियरिंग प्रतिभा, अंग्रेज़ी में कुशल कार्यबल, डेटा संप्रभुता और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इसे एआई के लिए आकर्षक स्थान बनाता है. सरकार ने एआई क्षेत्र में आ रहे बदलावों के हिसाब से नियम बना रही है जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अनुकूल साबित हो सकते हैं. हालांकि, 2025 के अंत तक गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न समेत बड़ी अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों ने भारत में 67.5 अरब डॉलर का निवेश किया है लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने कुछ ही हफ्तों पहले टिप्पणी की थी कि भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास के लिए अमेरिकी भुगतान क्यों कर रहे हैं?. नवारो का ये बयान, इस चिंता को उजागर करता है कि इस बाहरी मांग से अमेरिका में घरेलू बिजली की लागत बढ़ सकती है, शायद इसीलिए ट्रंप प्रशासन द्वारा संभावित 'कड़ी कार्रवाई' की चेतावनी भी दी गई है. यह बिडेन प्रशासन के जनवरी 2025 के उस फैसलों के बाद आया है, जिसमें भारत को अमेरिका में उत्पादित सबसे उन्नत एआई चिप्स के लिए पात्र साझेदार देशों की अपनी टियर-1 सूची से बाहर कर दिया गया था. इसके अलावा, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष के बीच, भारत को अमेरिका द्वारा आयोजित पहले पैक्स सिलिका शिखर सम्मेलन से बाहर रखा गया था. ये सम्मेलन दिसंबर 2025 में आयोजित हुआ था.
आम बजट 2026 से पहले पेश किया गया भारत का आर्थिक सर्वेक्षण भी इसी दृष्टिकोण को दोहराता है. हालांकि, इसके साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि भारत को "एप्लिकेशन-आधारित नवाचार, घरेलू डेटा का उत्पादक उपयोग, मानव पूंजी की प्रचुरता और सार्वजनिक संस्थानों के विकेंद्रीकृत प्रयासों के समन्वय की क्षमता" को प्राथमिकता देनी चाहिए.
ये उदाहरण इस बात को दिखाते हैं कि अगर ग्लोबल साउथ के देशों को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी है तो भारत जैसी उभरती तकनीकी शक्ति वाले देश को इस क्षेत्र में ज़्यादा काम करना होगा. भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और नियम तय करने वाली संस्थाओं और गठबंधनों में अपना स्थान अर्जित करना होगा. ऐसा करने के लिए, उसे अपने उच्च-तकनीकी क्षेत्र में लगातार और मिशन-आधारित निवेश की आवश्यकता है. सबसे ज़्यादा काम उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स, एआई कंप्यूटिंग क्षमता और एआई मॉडल्स की तैनाती में किए जाने की ज़रूरत है. भारत का लगभग 1.2 अरब डॉलर का इंडियाएआई मिशन उसके गंभीर इरादे का संकेत देता है. ये राशि लगभग उतनी ही है, जितना ओपनएआई जैसी कोई अमेरिकी कंपनी छह महीने में खर्च करती है. संप्रभु, समावेशी और उपयोग-केंद्रित इकोसिस्टम के उद्देश्य से 12 स्वदेशी मॉडलों के साथ अपने "पांच-स्तरीय एआई स्टैक" में भारत तेज़ी से प्रगति कर रहा है. इसके बावजूद, भारत को अभी भी अपने मूल ऊर्जा और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की ज़रूरत है.
स्मॉल एआई एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पर आधारित है. इसमें ऊर्जा, डेटा सेंटर, अत्याधुनिक चिप्स और स्टेट-ऑफ-द-आर्ट (एसओटीए) मूलभूत मॉडल जैसे कंप्यूटेशनल बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करने से बचा जाता है. इसके बजाय, यह संसाधनों के अधिकतम उपयोग और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं से मिलने वाली दक्षता का लाभ उठाता है. दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में सात कार्यकारी समूह बनाए गए थे. इसमें से कार्यकारी समूह 6 ने "एआई संसाधनों का लोकतंत्रीकरण" विषय पर चर्चा की, और वो इस वैकल्पिक दृष्टिकोण का का लाभ उठाने का लक्ष्य रखता है. इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं: 1) वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के रूप में एआई संसाधनों की सुलभता और सामर्थ्य को बढ़ावा देना, 2) एआई अवसंरचना के निर्माण और खुले नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को सुगम बनाना, और 3) स्थानीय एआई इकोसिस्टम को मज़बूत करने के लिए क्षमता निर्माण और ज्ञान के आदान-प्रदान का समर्थन करना. आम बजट 2026 से पहले पेश किया गया भारत का आर्थिक सर्वेक्षण भी इसी दृष्टिकोण को दोहराता है. हालांकि, इसके साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि भारत को "एप्लिकेशन-आधारित नवाचार, घरेलू डेटा का उत्पादक उपयोग, मानव पूंजी की प्रचुरता और सार्वजनिक संस्थानों के विकेंद्रीकृत प्रयासों के समन्वय की क्षमता" को प्राथमिकता देनी चाहिए.
एरिक श्मिट और मॉन्ट्रियल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योशुआ बेंगियो ने स्वायत्त एआई एजेंटों से संबंधित चिंताओं को उजागर किया है. योशुआ बेंगियो को 2018 के ट्यूरिंग पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, और उन्हें 'एआई का गॉडफादर' भी कहा जाता है. इन दोनों का कहना है कि उन्नत एआई मॉडल गुप्त रूप से गलत लक्ष्यों का पीछा करता है.
एरिक श्मिट समेत कई आलोचकों ने लंबे समय से एआई के विकास और तैनाती की वर्तमान दिशा से होने वाले संभावित नुकसानों के बारे में चेतावनी दी है. एरिक श्मिट गूगल के पूर्व सीईओ (2001-2011) रह चुके हैं, इसलिए उनकी चेतावनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. अगर उनकी सलाह पर काम किया गया तो ये एआई में वैश्विक असमानता को कम कर सकता है, वैज्ञानिक सफलताओं को गति दे सकता है और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण कर सकता है. इस शुरुआती आशावाद से आगे बढ़ते हुए, एरिक श्मिट अब 'दुष्ट एआई' से उत्पन्न ज़ोखिमों को प्रबंधित करने के लिए सुरक्षा उपायों की सक्रिय रूप से वकालत करते हैं. एरिक श्मिट और मॉन्ट्रियल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योशुआ बेंगियो ने स्वायत्त एआई एजेंटों से संबंधित चिंताओं को उजागर किया है. योशुआ बेंगियो को 2018 के ट्यूरिंग पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, और उन्हें 'एआई का गॉडफादर' भी कहा जाता है. इन दोनों का कहना है कि उन्नत एआई मॉडल गुप्त रूप से गलत लक्ष्यों का पीछा करता है. ये कमज़ोरी उन एआई मॉडल्स में देखी जा रही है, जो चैटबॉट और एजेंट जैसे उपकरणों का आधार हैं. ये एआई मॉडल “संदर्भ-आधारित योजना” के माध्यम से आत्म-संरक्षण के संकेत तेज़ी से प्रदर्शित कर रहे हैं. हाल ही में हुए शोध से पता चलता है कि इस तरह की साज़िशें रची जा रही हैं, जिससे सावधानी बरतने की इन अपीलों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. यही वजह है कि योशुआ के नेतृत्व में प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय एआई सुरक्षा रिपोर्ट के दूसरे संस्करण पर काफ़ी चर्चा हो रही है.
2022 में चैटजीपीटी लॉन्च किए जाने को 'एआई बूम' की शुरुआत माना जाता है. एआई ने तकनीकी, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में बहुत ध्यान खींचा है. कई पर्यवेक्षकों को यह उछाल डॉट-कॉम युग की याद दिलाता है, जब हर कोई इंटरनेट पर अपना दावा करने के लिए होड़ में था. हालांकि, बाद में आई मंदी ने उम्मीदों को कुछ हद तक कम कर दिया, लेकिन इंटरनेट ने अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई. आज इंटरनेट भी बिजली की तरह ही रोज़मर्रा की ज़रूरत बन गया है. आज दुनिया का ध्यान 'एआई लहर' का लाभ उठाने पर केंद्रित है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक जटिल क्षेत्र है, और इसका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है. हालांकि, सही मार्गदर्शन के साथ इसमें दुनिया बदलने की क्षमता है. ये अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक और मानवीय प्रगति की अगली पीढ़ी को बढ़ावा देगा, जिसे ‘बुद्धिमान प्रगति’ कहा जा सकता है.
राहुल बत्रा भू-राजनीतिक विश्लेषक हैं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स से जुड़े मामलों का काफ़ी अनुभव है.
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Rahul Batra is an independent consultant with extensive experience at the intersection of digital platforms and international affairs. He spent many years across Google’s global ...
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