Author : Nilanjan Ghosh

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Published on Jul 15, 2025 Updated 13 Days ago

विकासशील और संक्रमण के दौर से गुजर रहीं अर्थव्यवस्थाओं में थिंक टैंक किसी काम को नई सोच और नए तरीक़ों से करने वाले ऐसे केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं, जो अलग-अलग विषयों और मुद्दों का रचनात्मक हल निकालने की कोशिश करते हैं. इस प्रक्रिया में ये थिंक टैंक न केवल पेचीदा और परस्पर जुड़ी विकास चुनौतियों से निपटने के लिए ज़रूरी दृष्टिकोण को जन्म देते हैं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर व्यवस्थित और तर्कसंगत सोच को सामने लाते हैं.

विकासशील देशों में थिंक टैंकों की भूमिका: नीतियों से लेकर समाधान तक

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थिंक टैंक नीतिगत विश्लेषण और नीति निर्धारण में अहम भूमिका निभाते. इसके अलावा, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में नए विचारों के लिहाज़ से भी थिंक टैंक काफ़ी महत्वपूर्ण होते हैं. इसके बावज़ूद थिंक टैंक का औचित्य और इस सोच के पीछे का मकसद आज भी आसानी से समझ में नहीं आता है. भारत एक तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और यहां थिंक टैंक शब्द पिछले दो दशकों में ही सुनने में आया है. भारत में अक्सर थिंक टैंक का इस्तेमाल किसी ऐसे ख़ास संस्थान के संदर्भ किया जाता है, जो किसी विशेष सेक्टर में शोध कार्यों में सक्रिय होता है. सरकार की ओर से वित्तपोषित संस्थानों (जैसे कि कि भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा वित्तपोषित संस्थानों को) को सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान संगठन के रूप में माना जाने लगा था, जबकि उनमें से कुछ संस्थान खुद को यूनिवर्सिटी के तौर-तरीक़ों से नज़दीकी से जुड़ा हुआ मानते थे. हालांकि, आज के दौर के माडर्न थिंक टैंक न तो विश्वविद्यालय की तरह हैं और न उन पारंपरिक अनुसंधान संगठनों की तरह हैं, जो शैक्षणिक सवालों का जवाब देते थे, यानी क़रीब-क़रीब विश्वविद्यालय व्यवस्था के सहयोगी के तौर पर ही काम करते थे. एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्वविद्यालय और पारंपरिक शोध संस्थान अपने यहां डॉक्टरेट प्रोग्राम संचालित करते हैं और अक्सर ऐसे मुद्दों पर गहन मंथन करते हैं, जो अकादमिक रूप से तो महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक यानी ज़मीनी स्तर पर नीतियों के कार्यान्वयन के लिहाज़ से अप्रासंगिक होते हैं. इसके अलावा, इन संस्थानों के शोधार्थी और विशेषज्ञ अक्सर बंद कमरे के भीतर ही मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं और उसका जो भी निष्कर्ष निकलता है, से सिर्फ़ शिक्षा जगत के रिसर्च जर्नल्स में प्रकाशित किया जाता है. इतना ही नहीं, ये लोग खुद को इस प्रकार दर्शाते हैं, जैसे कि सिर्फ़ ये ही संबंधित विषय के ज्ञाता हैं और उन्हें ही उसके बारे में सबकुछ पता है, यानी वे खुद को आम लोगों से काबिल समझते हैं और कहा जा सकता है कि अपनी ही बनाई दुनिया को सच मानते हुए उसी में जीते हैं.

जबकि आज के दौरे के आधुनिक थिंक टैंक की बात की जाए, तो वे वर्तमान चुनौतियों और मुद्दों को अच्छे से समझते हुए आगे बढ़ते हैं, साथ ही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पारिस्थितिकी विषयों के साथ तालमेल स्थापित करते हुए भविष्य में पैदा होने वाली चुनौतियों पर चिंतन करते हैं और नीतिगत समाधान भी सुझाते हैं, साथ ही अपने विचारों को लगातार अपडेट भी करते रहते हैं. कहने का मतलब है कि वर्तमान दौर के जो थिंक टैंक हैं, वे न केवल नई-नई जानकारियों को सामने लाने का काम करते हैं, बल्कि नीतियों के निर्माण में भी अपने सुझाव देते हैं और नए विचारों को समाहित करते हुए अपनी मौज़ूदगी को साबित करते हैं. देखा जाए तो आधुनिक थिंक टैंक व्यावहारिक नीतिगत जानकारियों के स्रोत की तरह कार्य करते हैं और ऐसा करते हुए वे शिक्षा जगत, सरकारी तंत्र, राय-विचार की अगुवाई करने वालों और सिविल सोसाइटी के आपसी भंवरजाल को सुलझाते हुए एक मार्गदर्शक का भी काम करते हैं. इसीलिए, आज के जो भी थिंक टैंक हैं, वे अलग-अलग विषयों में जो भी शोध किया जाता है, उसके नतीज़ों को अपने विचार-विमर्श के जरिए ज़मीनी स्तर पर लागू करने का मज़बूत आधार तैयार करते हैं. ऐसा करते हुए ये थिंक टैंक किसी विषय के शोध के दौरान जो तथ्य और सिद्धांत सामने आते हैं और धरातर पर जो ज़रूरतें हैं, उनके बीच की दूरी को भी समाप्त करने का काम करते हैं. इस दौरान ये थिंक टैंक न केवल जानकारियों को आगे बढ़ाने के माध्यम बनते हैं, बल्कि किसी ख़ास मसले पर विचार-विमर्श की दिशा तय करने और रणनीतिक विकल्पों को प्रस्तुत करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, ये थिंक टैंक इस पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी मुद्दे के समाधान और किसी चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए ऐसे-ऐसे विकल्पों को प्रस्तुत करते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.

आधुनिक थिंक टैंक व्यावहारिक नीतिगत जानकारियों के स्रोत की तरह कार्य करते हैं और ऐसा करते हुए वे शिक्षा जगत, सरकारी तंत्र, राय-विचार की अगुवाई करने वालों और सिविल सोसाइटी के आपसी भंवरजाल को सुलझाते हुए एक मार्गदर्शक का भी काम करते हैं. 

इसीलिए, एक थिंक टैंक समाज, अर्थव्यवस्था, प्रकृति और पर्यावरण के बीच व्यावहारिक संबंधों पर आधारित सवालों पर शोध करता है और उन पर मंथन करता है. ज़ाहिर है कि इन मुद्दों से जुड़ी जो भी समस्याएं होती हैं, वे बेहद उलझी हुई होती हैं! जटिल समस्याओं का कोई सरल समाधान नहीं होता है, अगर इनका आसानी से हल निकल आता, तो ये समस्याएं जटिल नहीं रहती, बल्कि गणित के फार्मूलों की तरह इनका भी तत्काल समाधान निकाल लिया जाता. दरअसल, वास्तविक जीवन की समस्याएं इतनी पेचीदा होती हैं कि इनका कोई आसान समाधान नहीं होता है. यही वजह है कि जीवन से जुड़ी इन परेशानियों का हल निकालने के लिए नई सोच और नए तरीक़ों को तलाशना आवश्यक है. यानी हर समस्या का एक ख़ास तरह का हल निकालने की ज़रूरत होती है, न की कोई ऐसा समाधान निकाल लिया जाए, जो हर जगह और हर समय लागू हो. वर्तमान में आधुनिक थिंक टैंकों को इसी चुनौती से जूझना पड़ता है!

विकास नीति पर चिंतन

विकास अध्ययन का क्षेत्र बेहद अहम है और पिछले 50 वर्षों में यह एक स्वतंत्र नीति-शैक्षणिक अध्ययन के रूप में विकसित हुआ है. इस दिशा में जो भी शोध और अध्ययन किए गए हैं वे न्यूनीकरणवादी विकास चिंतन यानी विकास की जटिल प्रक्रिया को सरल घटकों में विभाजित करने से धीरे-धीरे विकासात्मक चिंतन की ओर बढ़ते गए हैं. इसके अलावा, इन चिंतनों में सभी की भागीदारी, सभी के लिए न्याय और समावेशिता का मुद्दा भी शामिल होने लगा है. यानी इसमें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और वित्तीय असमानता समेत, तमाम दूसरे क्षेत्रों में भेदभाव और असमानता पर चिंतन और उनका समाधान निकालने के प्रयास शामिल हो गए. ऐसे सभी विचार-विमर्शों और अध्ययनों की वजह से आख़िरकार ब्रुंडलैंड आयोग की सतत विकास की परिभाषा सामने आई और उसे अपनाने के साथ ही समाज में व्याप्त यह सारे मुद्दे और सारी दिक़्क़तें कहीं न कहीं उभर कर सामने आईं और इनके महत्व को समझा जाने लगा. हालांकि, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लिए 2030 एजेंडा निर्धारित होने के साथ डेवलपमेंट गवर्नेंस के सामने आने वाली चुनौतियां ज़्यादा अच्छी तरह से समझ में आने लगीं. ज़ाहिर है 2015 में  सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (MDGs) थे और सतत विकास लक्ष्य 2030 एजेंडा ने उसी की जगह ली थी. SDGs पर बारीक़ी से नज़र डाली जाए तो सामने आता है कि इनमें साफ तौर पर माना गया है कि विकास शासन में कई सारी चुनौतियां और समस्याएं हैं. जैसे कि SDGs में साफ झलकता है कि समानता, दक्षता, कुशलता और स्थिरता जैसे परस्पर विरोधी मुद्दों के बीत तालमेल स्थापित करना बड़ी चुनौती है. मोहन मुनसिंघे द्वारा प्रस्तुत किए गए सस्टेनॉमिक्स के फ्रेमवर्क में भी इन चुनौतियों के बारे में अच्छी तरह से उल्लेख किया गया है.

वैचारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, वो विश्वविद्यालयों या फिर विशेष प्रकार के आर्थिक अनुसंधान संस्थानों से नहीं मिल सकता है, क्योंकि वहां विचार एकीकृत नहीं होते हैं.

ज़ाहिर है कि जो भी सतत विकास लक्ष्य हैं उनका मकसद वैश्विक है, बावज़ूद इसके इन लक्ष्यों को हासिल करने में तमाम चुनौतियां हैं और विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों के लिए यह चुनौतियां काफ़ी व्यापक हैं. सबसे बड़ी चुनौती तो इन SDGs को हासिल करने के लिए वित्तपोषण, नीति-निर्माण, प्रबंधन और कार्यान्वयन की है. दरअसल, इन सबके लिए बेहतर और उन्नत विचारों की ज़रूरत होती है, लेकिन इसकी कमी के कारण तमाम दिक़्क़तें पेश आती हैं. यह सारी चुनौतियां देखा जाए तो विशेष रूप से नए लोकतांत्रिक देशों और बदलाव के दौर से गुजर रहे राष्ट्रों में थिंक टैंकों की अहमियत को और बढ़ाती हैं और इनकी ज़रूरत को सामने लाती हैं.

बेहतर व नया सोचने और करने की कमी या वैचारिक शून्यता

मुश्किल चुनौतियों से निपटने के लिए ज़रूरी सोच-समझ की कमी या कहा जाए कि नए और व्यावहारिक विचारों के प्रवाह में कमी, इस शब्द को राजनीतिक विज्ञानी थॉमस होमर-डिक्सन ने गढ़ा है. थॉमस होमर-डिक्सन इसे व्यापक स्तर पर उत्पादन के एक कारक के रूप में भी बखान करते हैं. इसके अलावा, वे विकसित और कम विकसित यानी विकासशील देशों के बीच उत्पादन में अंतर के लिए इसी वैचारिक शून्यता को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. ज़ाहिर है कि आज के दौर में दुनिया पर्यावरण से संबंधित मुद्दों, सामाजिक असमानता और आर्थिक अस्थिरता जैसी आपस में जुड़ी चुनौतियों से जूझ रही है. इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से ये चुनौतियां और मुश्किल हो जाती हैं. इन नई-नई समस्याओं के बीच गहरा संबंध कहीं न कहीं नई सोच और नए विचारों की ज़रूरत को सामने लाता है. यानी ऐसे वैचारिक नज़रिए की ज़रूरत को सामने लाता है, जिसमें तकनीक़ी और सामाजिक दोनों तरह की सोच समाहित हो. इन समस्याओं और उन्हें परिभाषित करने वाले विचारों की तीन सामान्य विशेषताएं हैं. पहली यह है कि वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान वर्तमान सोच के तौर-तरीक़ों से या कहें कि एक ही विषय पर ध्यान केंद्रित करने वाले दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता है. दूसरी प्रमुख बात है कि नए विचार और नई सोच ऐसी होनी चाहिए जो वर्तमान के साथ ही भविष्य में भी समस्याओं के निपटने में कारगर हो और जिसे बगैर किसी रुकावट के ज़मीनी स्तर पर भी लागू किया जा सके. तीसरी प्रमुख बात है कि जो विचार सामने रखा जा रहा और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में कारगर है, तो इसमें उन हालातों का भी सटीक जिक्र होना चाहिए, जिनमें उसे लागू करना ज़रूरी हो सकता है. इसके अलावा, उस वैचारिक समाधान की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए लोगों के बीच उसे बार-बार पहुंचाने और उन्हें बताने की ज़रूरत होगी.  

अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत बहु-विषयक थिंक टैंकों की भूमिका

अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले बहु-विषयक थिंक टैंक देखा जाए तो विकास की समस्याओं को अलग-अलग क्षेत्रों में शोध और विचार-मंथन के मज़बूत ढांचे के ज़रिए हल करके एक नए दृष्टिकोण को विकसित करने के लिहाज़ से एकदम मुफीद हैं. ये थिंक टैंक न केवल आंकड़ों का विश्लेषण करके और उन तक पहुंच स्थापित करके नीतिगत दायरे का विस्तार करते हैं, बल्कि इस प्रकार की परिस्थितियों को सामने रखकर उनका आकलन करते हैं, जो भविष्य में पैदा हो सकती हैं, साथ ही आम विचार-विमर्श में भी इन बातों को पहुंचाने का काम करते हैं. इससे व्यापक स्तर पर नीतियां बनाने में मदद मिलती है. एक समय ऐसा माना जाता था कि आर्थिक क्षेत्र में शोध करने वाले संगठन ही विकास से जुड़ी कुछ अहम समस्याओं के समाधान के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं. लेकिन आज की परिस्थितियों में यह बात सटीक नहीं बैठती है. क्योंकि आज के दौर में विकास प्रशासन में तमाम तरह की चुनौतियां हैं, जो बेहद जटिल भी हैं और अलग भी हैं. इसीलिए, इनका समाधान निकालने के लिए ऐसे उपायों को तलाशने की ज़रूरत है, जो इन सभी चुनौतियों का हल करने में सक्षम हों. जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा परिवर्तन से लेकर खाद्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की विकास चुनौतियां का सामना करने के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें विभिन्न हितधारकों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाए और अलग-अलग मुद्दों का भी पूरा ख्याल रखा जाए. एक और अहम बात यह भी है कि ये सारी समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं. जैसे कि भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक उथल-पुथल से आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर पड़ता है, साथ ही इससे विकास सहायता में भी रुकावटें आती हैं. इसके अलावा, इससे मंहगाई बढ़ती है और ग़रीबी व भुखमरी जैसे हालात पैदा होते हैं, जिससे मानव कल्याण को बहुत हानि पहुंचती है. यही कारण है कि इन जटिल समस्याओं का समाधान तलाशने के लिए एक एकीकृत नज़रिए की ज़रूरत है. यानी इन तमाम मुश्किलात से पार पाने के लिए जिस वैचारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, वो विश्वविद्यालयों या फिर विशेष प्रकार के आर्थिक अनुसंधान संस्थानों से नहीं मिल सकता है, क्योंकि वहां विचार एकीकृत नहीं होते हैं.

थिंक टैंक किसी समस्या के समाधान के लिए ज़मीनी सच्चाई के मुताबिक़ नीतियों के निर्माण में सहायता करते हैं. इतना ही नहीं, इससे नीतिगत निर्णय लेने में लोगों के दबाव के सामने झुकना नहीं पड़ता है और कोई भी ज़बरदस्ती निर्णय नहीं थोप सकता है.

अहम बात यह भी है कि बहु-विषयक थिंक टैंकों का दायरा सिर्फ़ नीतिगत समाधान प्रस्तुत करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे भी व्यापक है. थिंक टैंकों का एकीकृत नज़रिया ही देखा जाए तो ऐसे सिद्धांतों और दिशानिर्देशों को बनाने में सहायक होता है, जो विकासात्मक नतीज़ों को निर्धारित करते हैं. कहने का मतलब है कि यही नज़रिया कहीं न कहीं सशक्त नीतियों के निर्माण में सहायक होता है, यानी यह सिर्फ़ फौरी विचार-विमर्श नहीं होता है, बल्कि गंभीर किस्म का होता है और तथ्यात्मक होता है, जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

कुल मिलाकर अपने इसी दृष्टिकोण के चलते थिंक टैंक विकास प्रशासन से जुड़ी चर्चा-परिचर्चाओं की रूपरेखा तैयार करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. तमाम ऐसे मुद्दे, जिन्हें ख़ास तवज्जो नहीं दी जाती है, जैसे कि लैंगिक समानता, जलवायु अनुकूलन वित्त, मानव कल्याण में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की भूमिका और अंतर-पीढ़ीगत न्याय यानी विभिन्न पीढ़ियों के बीच साझा नैतिक ज़िम्मेदारियों से जुड़ी चिंताएं. ऐसा करके थिंक टैंक विकास के दायरे का विस्तार करते हैं और इसके लिए देखा जाए तो ज़रूरी नीतिगत प्राथमिकताओं को भी नए सिरे से निर्धारित करने का काम करते हैं. इतना ही नहीं, ये थिंक टैंक अपने शोध परिणामों, सार्वजनिक मंचों पर चर्चाओं और परामर्श कार्यशालाओं के ज़रिए ज़रूरी मुद्दों पर बहस को आगे बढ़ाते हैं, लोगों का उनके प्रति ध्यान खींचते हैं और ऐसा करके लोगों की सोच को बदलते हैं. ज़ाहिर है कि जब किसी मुद्दे पर विमर्श बढ़ जाता है और लोग उससे सहमत होने लगते हैं, तभी संस्थागत और सरकारी स्तर पर उससे जुड़े नीतिगत बदलाव देखने को मिलते हैं.

ऐसे देश जो कमज़ोर होते हैं और जो बदलाव के दौर से गुजर रहे होते हैं, ज़ाहिर है कि वहां की सरकारों की क्षमताएं सीमित होती हैं और वहां नीतियों को बनाने के लिए भी कोई ख़ास ढांचा नहीं होता है. ऐसे देशों में थिंक टैंक अक्सर औपचारिक नीति निर्माण करने वाले विभागों के विकल्प के तौर पर काम करते हैं. इन देशों में ये थिंक टैंक अपनी अहम भूमिका निभाते हुए लगातार पूरी दृढ़ता के साथ अपने विचारों को सामने रखते हैं. इससे नीतिगत विचार-विमर्श में त्वरित राजनीतिक लाभ की जगह पर दीर्घकालिक विकास उद्देश्यों को प्रमुखता देने में मदद मिलती है. उदाहरण के तौर पर आंकड़ों का विश्लेषण कर और हर तरह के हालात का विस्तृत आकलन करके निर्धारित किया गया नज़रिया ही यह बता सकता है कि कैसे एक बैराज (मान लीजिए, भारत के पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज) तलछट प्रवाह को रोक सकता है और डेल्टा इकोसिस्टम (इस मामले में, भारत का सुंदरबन डेल्टा) को प्रभावित कर सकता है. कहने का मतलब है कि थिंक टैंक अपने शोध के दौरान विश्वसनीय आंकड़ों को जुटाते हैं, पैदा हो सकने वाली परिस्थितियों के बारे में विस्तार से आकलन करते हैं और समस्या से निपटने में क्या लागत आएगी, उससे क्या फायदा होगा, इस सबका विस्तृत विश्लेषण करते हैं. इस प्रकार से थिंक टैंक किसी समस्या के समाधान के लिए ज़मीनी सच्चाई के मुताबिक़ नीतियों के निर्माण में सहायता करते हैं. इतना ही नहीं, इससे नीतिगत निर्णय लेने में लोगों के दबाव के सामने झुकना नहीं पड़ता है और कोई भी ज़बरदस्ती निर्णय नहीं थोप सकता है.

इसके अतिरिक्त, थिंक टैंक वैश्विक विकास सहयोग में भी अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं. ख़ास तौर पर सॉफ्ट पावर और रणनीतिक वैचारिक नेतृत्व में इनका योगदान बेहद अहम होता है. G20 और ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंचों पर यह अक्सर देखने को मिलता है. इन वैश्विक समूहों में थिंक टैंक से जुड़े विशेषज्ञ अपने विचारों और तथ्यों के ज़रिए विकास एजेंडा के निर्धारण में अक्सर अहम भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, ये थिंक टैंक इन वैश्विक समूहों में ग्लोबल साउथ के मुद्दों से जुड़े तथ्यों को सामने रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. वैश्विक दक्षिण के तमाम थिंक टैंक, ख़ास तौर पर भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में थिंक टैक वर्तमान में आर्थिक कूटनीति, टिकाऊ परिवर्तन और विकास वित्त के लिए वैकल्पिक फ्रेमवर्क प्रदान करके वैश्विक मंचों पर अपनी मज़बूत मौज़ूदगी दर्ज़ करा रहे हैं.

यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि एक थिंक टैंक को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, और पारिस्थितिक वातावरण में अपने अस्तित्व को अपने शोध व अपने काम की गंभीरता के ज़रिए आम विचार-विमर्श में लाए गए बदलाव से साबित करना होता है, न कि सरकार से अपनी नज़दीकी के ज़रिए. इन थिंक टैंकों की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि ये कितनी निष्पक्षता के साथ सरकारी विभागों और संस्थानों से तालमेल स्थापित करते हैं. ज़ाहिर है कि विकास कार्यों से जुड़ी जो भी चर्चाएं हैं वे न केवल बहुआयामी होती हैं, बल्कि उनमें विवादों की गुंजाइश भी बहुत ज़्यादा रहती है. ऐसे में नीति-निर्माण की प्रक्रिया में, विशेष रूप से भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में पेचीदा समस्याओं का विस्तृत आकलन करने और उनके समाधान के लिए नए और व्यापक शोध पर आधारित विचारों को प्रस्तुत करने के लिहाज़ से थिंक टैंकों की भूमिका और ज़्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है.


निलांजन घोष ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में विकास अध्ययन के वाइस प्रेसिडेंट हैं.

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