आज कनेक्टिविटी की बहस सिर्फ सड़क या रेल बनाने की नहीं रह गई है. यह तय करने की लड़ाई है कि भविष्य का आर्थिक और राजनीतिक नक्शा कैसा होगा. चीन ढांचा बना रहा है, रूस अपने नेटवर्क बचाना चाहता है, अमेरिका और यूरोप नए रास्ते तलाश रहे हैं और भारत भी अपनी पहुंच मजबूत करने में लगा है. मध्य एशिया अब इस बड़े खेल का अहम केंद्र बन चुका है.
यह लेख 'रायसीना एडिट 2026' श्रृंखला का हिस्सा है।
मध्य एशिया में कनेक्टिविटी अब सिर्फ सड़क, रेल या पुल बनाने का मामला नहीं रह गया है. यह अब असर और ताकत की राजनीति से जुड़ गया है कि रास्ते कौन बनाएगा, नियम कौन तय करेगा और इस इलाके के देशों की रणनीतिक दिशा किसके असर में तय होगी. जमीन से घिरे होने के बावजूद मध्य एशिया की अहमियत बहुत है. यहां प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, लेकिन ढांचा अभी भी कमजोर है. इसीलिए यह इलाका अलग-अलग वैश्विक ताकतों के कनेक्टिविटी मॉडल की परीक्षा का मैदान बन गया है. चीन, रूस, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका अपने-अपने तरीके से यहां मौजूद हैं. अब भारत भी इस खेल में धीरे-धीरे जगह बना रहा है. साथ ही कुछ स्थानीय और छोटे विकल्प भी उभर रहे हैं.
मध्य एशिया में चीन की रणनीति बड़े ढांचे और भारी निवेश पर टिकी है. वह डिजिटल और भौतिक ढांचा खड़ा करके कनेक्टिविटी बढ़ाता है. इसमें लॉजिस्टिक्स हब, पाइपलाइन, रेल लाइन और अब फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क वगैरह शामिल हैं. चीन औपचारिक सैन्य गठजोड़ बनाने के बजाय फंडिंग, मालिकाना हक और तकनीकी मानकों के जरिए अपना रुतबा बढ़ाता है. वक्त के साथ यह ढांचा ऐसी निर्भरता पैदा करता है जिसे बदलना आसान नहीं होता. एक बार बन जाने के बाद इन्हें हटाना या बदलना बेहद मुश्किल होता है. कई परियोजनाएं ऐसी हैं जिनसे दोनों पक्षों को फायदा होता है, लेकिन लंबे समय में अक्सर चीन ही मोटा मुनाफा उठाता है.
मध्य एशिया में कनेक्टिविटी अब सिर्फ सड़क, रेल या पुल बनाने का मामला नहीं रह गया है. यह अब असर और ताकत की राजनीति से जुड़ गया है कि रास्ते कौन बनाएगा, नियम कौन तय करेगा और इस इलाके के देशों की रणनीतिक दिशा किसके असर में तय होगी.
इस असमानता को चीनी कर्ज और बढ़ा देता है. मध्य एशिया के कई देशों पर चीन का कर्ज इतना ज्यादा है कि उसे चुकाने में उन्हें दशकों लग सकते हैं. लेकिन इससे चीनी निवेशकों को खास चिंता नहीं होती. उन्हें उम्मीद रहती है कि भविष्य में उन्हें अहम खनिज परियोजनाओं और संसाधनों तक पहुंच मिल जाएगी, खासकर उस समय जब जियो-पॉलिटिकल खोज और खनन के नए दौर शुरू होंगे. पहले से कई खनन परियोजनाओं में उनकी मौजूदगी और लोकल प्रॉडक्शन फैसिलिटी उन्हें आने वाले समय में भी मजबूत स्थिति में रखती है.
यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने भी मध्य एशिया की अहमियत को बढ़ा दिया है. इस संघर्ष ने सिर्फ यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को नहीं बदला, बल्कि यह भी दिखा दिया कि रूस आधारित यूरेशिया की कनेक्टिविटी कितनी अस्थिर हो सकती है. इस वजह से कई देशों ने अपने व्यापार और परिवहन के रास्तों में विविधता लाने की कोशिश शुरू कर दी है.
रूस अभी भी मध्य एशिया को अपने प्रभाव वाले क्षेत्र का हिस्सा मानता है. वह इसे अपनी रणनीतिक ढाल और आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखता है. उसकी सोच पुराने ढांचे और संस्थाओं पर आधारित है, जैसे यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन. रूस “सॉफ्ट कनेक्टिविटी” पर जोर देता है, जैसे सीमा शुल्क का तालमेल, साझा नियम और एकीकृत बाजार. इसके जरिए वह इस इलाके को अपने आर्थिक ढांचे से जोड़े रखना चाहता है.
मध्य एशिया के देश अब सिर्फ रूस या चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहते. वे अलग-अलग देशों के साथ जरूरत के हिसाब से साझेदारी कर रहे हैं. अमेरिका का C5+1 ढांचा इसी बदलती रणनीति की एक मिसाल बनकर सामने आया है.
लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों और ट्रांजिट में आने वाली बाधाओं ने रूस की विश्वसनीयता को कमजोर किया है. इससे उसका प्रभाव कम हुआ है और दूसरे देशों के लिए जगह बनी है. शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में भी यह फर्क साफ दिखता है. चीन तेज निवेश और बड़े ढांचे की पेशकश करता है, जबकि रूस पुराने रिश्तों और सुरक्षा सहयोग पर भरोसा करता है. इस असंतुलन को मध्य एशिया के देश भी अच्छी तरह समझते हैं. कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान अब अपने विकल्पों को नए सिरे से देख रहे हैं.
रूस और चीन के अलावा मध्य एशिया के देश अब दूसरे देशों के साथ भी समझौते कर रहे हैं. वे किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने के बजाय जरूरत के हिसाब से साझेदारी कर रहे हैं. अमेरिका का C5+1 ढांचा इसी सोच को दिखाता है.
अमेरिका का ध्यान बड़े विजन से ज्यादा व्यावहारिक सौदों पर रहता है. उसका टारगेट दुर्लभ खनिजों तक पहुंच बनाना, रूस को दरकिनार करने वाले व्यापारिक रास्तों को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना है. C5+1 के तहत यह सहयोग अहम खनिजों की सप्लाई चेन, मिडिल कॉरिडोर के लिए व्यापार और सीमा शुल्क तालमेल को बढ़ावा के साथ सुरक्षा सहयोग के रूप में सामने आया है.
इसी वजह से कनेक्टिविटी की बहस अब सिर्फ सड़क या रेल की नहीं रह गई है. यह पूरे क्षेत्र की व्यवस्था और भविष्य की दिशा तय करने का सवाल बन चुकी है.
इस तरह कनेक्टिविटी को विकास के बड़े एजेंडे के बजाय व्यावहारिक फायदे हासिल करने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इससे रूस और चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश होती है, जबकि बड़े ढांचागत प्रॉजेक्ट की जिम्मेदारी से बचा जाता है.
भारत का नजरिया कई मामलों में यूरोपीय यूनियन के ग्लोबल गेटवे कार्यक्रम से मिलता-जुलता है. दोनों ही टिकाऊ ढांचे, मानकों और देशों की संप्रभुता के सम्मान पर जोर देते हैं. लेकिन भारत की रणनीति अपनी भौगोलिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण अलग भी है.
भारत कनेक्टिविटी को प्रभुत्व का साधन नहीं मानता. वह इसे मजबूती, विविधता और रणनीतिक आजादी बढ़ाने के रास्ते के रूप में देखता है. इंटरनेशनल नॉर्थ–साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चाबहार बंदरगाह जैसे प्रॉजेक्ट इसी सोच का हिस्सा हैं. इनके जरिए भारत मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है, वह भी ऐसे रास्तों से जो भू-राजनीतिक दबाव से अपेक्षाकृत मुक्त हों.
भारत अपने साझेदारों के साथ बातचीत में संप्रभुता, पारदर्शिता, आर्थिक टिकाऊपन और स्थानीय भागीदारी जैसे सिद्धांतों पर जोर देता है. यही बातें मध्य एशियाई देशों के साथ साझा घोषणाओं में भी दिखाई देती हैं.
बाहरी ताकतों के अलावा मध्य एशिया के देशों ने खुद भी कुछ पहल की हैं. इनका मकसद बड़े दिखावटी प्रॉजेक्ट नहीं, बल्कि व्यावहारिक सुधार है. CAREC जैसे कार्यक्रम कॉरिडोर की कार्यक्षमता, सीमा प्रक्रियाओं, सीमा शुल्क तालमेल और डिजिटल व्यापार को आसान बनाने पर ध्यान देते हैं. 2001 से अब तक CAREC के तहत लगभग 51 अरब डॉलर के 270 से ज्यादा क्षेत्रीय प्रॉजेक्ट शुरू किए गए हैं. इनमें से अधिकतर परिवहन ढांचे को बेहतर बनाने से जुड़े हैं. इससे ट्रांजिट समय घटता है, परिवहन लागत कम होती है और अलग-अलग कॉरिडोर के बीच तालमेल बढ़ता है.
यह तरीका चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से अलग है. वहां अक्सर फंडिंग, निर्माण और संचालन एक ही बाहरी ताकत के हाथ में होता है. इसके उलट मध्य एशिया की स्थानीय पहल राष्ट्रीय नियंत्रण, धीरे-धीरे सुधार और नियमों के तालमेल पर जोर देती है. इससे अलग-अलग विदेशी मॉडल को स्थानीय ढांचे के भीतर एडजस्ट करना आसान हो जाता है और लंबी अवधि की निर्भरता कम रहती है.
चीन की बेल्ट एंड रोड पहल जहां बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट्स पर टिकी है, वहीं मध्य एशिया के कई देश छोटे लेकिन व्यावहारिक सुधारों के जरिए अपनी कनेक्टिविटी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. रणनीति साफ है-किसी एक ताकत पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अलग-अलग साझेदारियों के बीच संतुलन बनाना
फिर भी इन देशों की अपनी क्षमता सीमित है. इसलिए आने वाले समय में कनेक्टिविटी का भविष्य बाहरी साझेदारियों से ही प्रभावित होगा. फिलहाल सबसे बेहतर स्थिति वही मानी जा रही है जिसमें कई रास्ते और कॉरिडोर एक साथ मौजूद रहें, और क्षेत्रीय देश अलग-अलग साझेदारों के बीच संतुलन बनाए रखें. लेकिन यह संतुलन तभी टिकेगा जब बड़ी ताकतें ढांचागत परियोजनाओं को राजनीतिक हथियार में न बदलें. आगे चलकर अलग-अलग मॉडल साथ-साथ चलते रहेंगे. चीन ढांचा बनाएगा, रूस संस्थागत नेटवर्क को मजबूत करेगा, यूरोप नियमों पर जोर देगा, अमेरिका साझेदारी बनाएगा और भारत सिद्धांतों पर आधारित पहुंच की बात करेगा. इसी वजह से कनेक्टिविटी की बहस अब सिर्फ सड़क या रेल की नहीं रह गई है. यह पूरे क्षेत्र की व्यवस्था और भविष्य की दिशा तय करने का सवाल बन चुकी है.
एलिका किजेकोवा कर्टिन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस और सिक्योरिटी के कोर्स और मेजर की हेड हैं, और ह्यूमैनिटीज फैकल्टी में लेक्चरर भी हैं.
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Alica Kizekova is the Course and Major Lead in International Relations and Security, and a Lecturer in the Faculty of Humanities at Curtin University, Western ...
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