Published on May 21, 2019 Updated 0 Hours ago

भारत ने सतत विकास लक्ष्यों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है. सतत विकास लक्ष्य-7 सस्ती, विश्वसनीय, निर्बाध तथा आधुनिक ईँधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने से संबंधित है.

भारत के ग्रामीण घरों में स्वच्छ रसोई ईंधन की भागीदारी में बढ़ोतरी

सतत विकास लक्ष्य-7 के तीन संकेतकों में से एक है 2030 तक सभी परिवारों को भोजन पकाने का स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया जाना. लेकिन भारत के सतत विकास लक्ष्य डैशबोर्ड से पता चलता है कि देश में केवल 43.8 प्रतिशत घरों में ही स्वच्छ ईंधन का प्रयोग होता है, अर्थात् अगले 11 वर्षों में भारत को अभी 56 प्रतिशत घरों तक स्वच्छ रसोई ईंधन पहुंचाना है. जिन घरों में अभी स्वच्छ ईंधन का प्रयोग नहीं हो रहा है, उनमें से अधिकांश ग्रामीण इलाकों में हैं.

ग्रामीण भारत में ईंधन विविधता एक सामान्य प्रथा है, जिसमें कोई परिवार खाना पकाने के लिए एक से अधिक ईंधनों पर निर्भर करता है. इन ईंधनों में से एक प्राथमिक ईंधन बन जाता है. भारत की जनगणना (2011) के अनुसार 63% ग्रामीण परिवार खाना पकाने के प्राथमिक ईँधन के रूप में जलावन लकड़ी का उपयोग करते थे जबकि अन्य 23% परिवार फसलों के अवशेष और कंडे-उपले का उपयोग रसोई ईंधन के रूप में करते थे. केवल 11% ग्रामीण परिवार प्राथमिक खाना पकाने के ईंधन के रूप में तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का उपयोग कर रहे थे. ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद् (सीईईडब्ल्यू) ने 2015 से 2018 तक किए गए सर्वेक्षण के आधार पर निष्कर्ष निकाला था कि देश में ऊर्जा उपलब्धता की कमी से पीड़ित प्रमुख छह राज्यों में खाना पकाने के प्राथमिक ईंधन के रूप में एलपीजी का उपयोग करने वाले घरों की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत से बढ़ कर 37% हो गई थी (मई 2019, सीईईडब्ल्यू). दीपम, राजीव गांधी ग्रामीण एलपीजी वितरण योजना और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं के बावजूद प्राथमिक ईंधन के रूप में रसोई गैस के उपयोग में वृद्धि की दर धीमी रही है.

ग्रामीण भारत में ईंधन विविधता एक सामान्य प्रथा है, जिसमें कोई परिवार खाना पकाने के लिए एक से अधिक ईंधनों पर निर्भर करता है. इन ईंधनों में से एक प्राथमिक ईंधन बन जाता है. भारत की जनगणना (2011) के अनुसार 63% ग्रामीण परिवार खाना पकाने के प्राथमिक ईंधन के रूप में जलाऊ लकड़ी का उपयोग करते थे जबकि अन्य 23% परिवार फसलों के अवशेष और कंडे-उपले का उपयोग रसोई ईंधन के रूप में करते थे.

यह लेख 1980 के दशक के बाद से स्वच्छ रसोई ईंधन के लिए की गई पहलों के बीच तारतम्य स्थापित करते हुए सुझाव देता है कि ग्रामीण भारत के लिए डिज़ाइन की गई स्वच्छ ईंधन पहल को नए सिरे से देखा जाना चाहिए. ठोस ईंधन (जलावन लकड़ी, फसल अवशेष और गोबर के कंडों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामूहिक शब्द) आम तौर पर मुफ्त में उपलब्ध होता है, हालांकि उपयोगकर्ताओं को इनके संग्रहण और भंडारण के संदर्भ में प्रयास करने होते हैं. मिट्टी के पारंपरिक चूल्हे में ठोस ईंधन के जलने से घरेलू वायु प्रदूषण होता है, जो विशेष रूप से खाना पकाने में लगे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.

इस ख़ामी को दूर करने के लिए, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 1980 के दशक के दौरान बेहतर चूल्हा प्रौद्योगिकियों को लागू करने के लिए ठोस प्रयास शुरू हुए. लेकिन, बेहतर चूल्हा प्रौद्योगिकियों को लोकप्रिय बनाना चुनौतीपूर्ण बना रहा क्योंकि ज्यादातर लोगों ने नए चूल्हों की ओर जाने की बजाय अपनी भोजन निर्माण आवश्यकताओं के आधार पर उपकरणों और ईंधनों के उपलब्ध विकल्पों का स्थिति के अनुसार चयन करना प्रारंभ कर दिया. (रुइज़-मर्काडो, मासेरा, ज़मोरा, और स्मिथ, 2011). इन नए चूल्हों को अपनाने में इनकी उपयोग सुगमता तथा मरम्मत और टूट-फूट की स्थिति में बदली से संबंधित सेवाओं की उपलब्धता की भी भूमिका थी.

[1] 1990 के दशक में देश के विभिन्न क्षेत्रों में सौर ऊर्जा और बायोगैस पर आधारित स्वच्छ रसोई ईंधन के कार्यक्रम भी शुरू किए गए थे. रसोई में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के लिए घरेलू बायोगैस संयंत्रों को अपनाने, उनके प्रयोग और रखरखाव के मुद्दों की चुनौतियां बनी रहीं. खाना पकाने में लगने वाले समय के संदर्भ में सौर ऊर्जा से खाना पकाने की अपनी सीमाएं हैं. इस प्रकार, घरों में खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन पर निर्भरता बरकरार रही.

भारत में एलपीजी पर सब्सिडी 1960 के दशक के अंत में दी गई थी. ग्रामीण भारत में इसके उपयोगकर्ता और गैर-उपयोगकर्ता सभी इसे सुविधाजनक और खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन के रूप में स्वीकार करते रहे हैं. लेकिन, इसके साथ लगने वाले चूल्हे और सिलेंडर की लागत हमेशा इसे अपनाने की दिशामें प्रमुख बाधा के रूप में मौजूद रही. (गोल्डा और उर्पेलेनेन, 2018). इसके अलावा, एलपीजी आपूर्तिकर्ताओं के पास इसकी उपलब्धता और ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी कनेक्शन धारकों को खाली और भरे सिलेंडरों के परिवहन के दौरान आने वाली कठिनाइयां भी चुनौती के रूप में मौजूद रहीं.

[2] रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कंपैश्नेट इकॉनॉमिक्स द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि 90 प्रतिशत उज्ज्वला लाभार्थी अब भी प्राथमिक रसोई ईंधन के रूप में ठोस ईंधन का ही प्रयोग करते हैं. वर्ष 2016 में शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत गरीब महिलाओं को सब्सिडी वाले एलपीजी कनेक्शन प्रदान किए गए थे. (टाइम्स ऑफ इंडिया में 2 मई 2019 को प्रकाशित). इसके प्राथमिक कारण के रूप में एलपीजी की तुलना में ठोस ईंधन की उपलब्धता और उसके सस्ते होने का उल्लेख किया गया था.

ग्रामीण भारत में इसके उपयोगकर्ता और गैर-उपयोगकर्ता सभी इसे सुविधाजनक और खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन के रूप में स्वीकार करते रहे हैं. लेकिन, इसके साथ लगने वाले चूल्हे और सिलेंडर की लागत हमेशा इसे अपनाने की दिशा में प्रमुख बाधा के रूप में मौजूद रही.

ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टेरी) ने 1,000 ग्रामीण घरों में इंडक्शन चूल्हे के उपयोगकर्ताओं के प्राथमिक सर्वेक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाला था कि 84 प्रतिशत घरों में खाना पकाने के ईंधन के द्वितीय विकल्प के रूप में एलपीजी का स्थान बिजली ने ले लिया था लेकिन प्राथमिक ईंधन के रूप में ठोस ईंधन का ही इस्तेमाल जारी है. (बनर्जी, प्रसाद, रहमान, और गिल, 2016). उपयोगकर्ताओं ने इंडक्शन चूल्हे का उपयोग सुविधाजनक होने की बात भी कही. लेकिन, खाना पकाने के ईंधन विकल्प के रूप में बिजली का उपयोग करने के लिए बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है.

ग्रामीण भारत में 1980 के दशक के बाद से प्रदूषणमुक्त तरीकों से खाना पकाने की पहलों का मूल्यांकन करते हुए जो बात सामने आती है, वह यह है कि — लोग खाना पकाने के लिए सामान्यतः ठोस ईंधन पर निर्भर हैं और स्वच्छ ईँधन तथा प्रौद्योगिकी का उपयोग द्वितीयक/ तृतीयक विकल्प के रूप में करते हैं.

एलपीजी और इंडक्शन चूल्हे से जुड़ी सुविधाओं को महसूस करने के बावजूद ठोस ईंधन और पारंपरिक चूल्हे ही ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन और खाना पकाने की तकनीक के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय रहे. परिवारों को जलावन (लकड़ी) के संग्रह में असुविधा नहीं होती है, लेकिन अगर उन्हें जलाऊ लकड़ी खरीदने या जुटाने के लिए लंबी दूरी तक जाना पड़े तो वे इससे असंतुष्ट होते हैं (बकिया और उर्पेलेनेन, 2017).

अतीत से सबक लेते हुए हमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए खाना पकाने की प्रदूषणमुक्त प्रौद्योगिकी से संबंधित पहलों और उनके मूल्यांकन मानदंडों पर पुनर्विचार की जरूरत है. ऐसे कार्यक्रमों को एक से अधिक (दो या तीन) ईंधनों और प्रौद्योगिकी संयोजनों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इनमें से एक प्रौद्योगिकी खाना पकाने के मौजूदा तौर-तरीकों से मिलती-जुलती होनी चाहिए है और दूसरी स्वच्छ तकनीक आधारित होनी चाहिए. उदाहरण के लिए, एलपीजी के साथ एक उन्नत पारंपरिक चूल्हे पर आधारित कोई तकनीक पेश की जा सकती है. इन संयोजनों को क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली खाना पकाने की प्रौद्योगिकियों, घरों की आर्थिक स्थिति, स्वच्छ ईंधन के किफ़ायतीपन, ठोस ईंधन की उपलब्धता, एलपीजी रिफिलिंग स्टेशनों से कनेक्टिविटी और क्षेत्र में बिजली पहुंच के आधार पर पेश किया जा सकता है.

अतीत से सबक लेते हुए हमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए खाना पकाने की प्रदूषणमुक्त प्रौद्योगिकी से संबंधित पहलों और उनके मूल्यांकन मानदंडों पर पुनर्विचार की जरूरत है. ऐसे कार्यक्रमों को एक से अधिक (दो या तीन) ईंधनों और प्रौद्योगिकी संयोजनों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

इसी तरह स्वच्छ खाना पकाने की पहलों का मूल्यांकन मानदंड सापेक्ष होना चाहिए. आधारभूत से स्वच्छ और फिर सबसे स्वच्छ खाना पकाने की तकनीकों के उपयोग में वृद्धि को स्वच्छ रसोई पहलों की सफलता परिभाषित करने वाले मापदंडों में होना चाहिए.

ईंधन विकल्पीकरण एक आम बात है और रसोई गैस और इंडक्शन चूल्हे पर खाना पकाने की सुविधा को समझने के बावजूद ग्रामीण परिवारों में ठोस ईंधन पर निर्भरता बरकरार है. खाना पकाने के लिए बेहतर चूल्हों, बायोगैस और सोलर कुकर पेश किए जाने पर भी ग्रामीण घरों में पारंपरिक चूल्हे लौट आए. ऐसा होने के पीछे खाना पकाने के अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन और प्रौद्योगिकियों से संबंधित एक से ज्यादा कारण बाधा के रूप में सामने आते हैं. खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन का निरंतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए सुझाव है कि स्वच्छ ईंधन से संबंधित किसी भी पहल में दो से तीन स्वच्छ तकनीकों को पेश किया जाना चाहिए. ऐसा करने से ग्रामीण परिवारों के बीच उनकी मौजूदा आधारीय स्थिति की तुलना में स्वच्छ खाना पकाने की प्रौद्योगिकियों के वास्तविक उपयोग की हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी.


संदर्भ

बनर्जी एम., प्रसाद आर., रहमान आई. एच. और गिल बी. जनवरी 2016. इंडक्शन स्टोव्स ऐज़ ऐन ऑप्शनफॉर क्लीन कुकिंग इन रूरल इंडिया, एनर्जी पॉलिसी, 88, 159-167.

बकिया, एस. और उर्पेलेनेन, जे. जून 2017. ऐक्सेस टु मॉडर्न फ्यूल्स ऐंड सैटिस्फैक्शन विद कुकिंग अरेंजमेंट्स: सर्वे एविडेंस फ्रॉम रूरल इंडिया. एनर्जी फॉर सस्टेनेबल डेवेलपमेंट, 38, 34-47.

सीईईजडब्ल्यू. (मई 2019).

गोल्डा, सी. एफ., और उर्पेलेनेन, जे. नवंबर 2018. एलपीजी ऐज़ ए क्लीन कुकिंग फ्यूलछ एडॉप्शन, यूज़, ऐंड इम्पैक्ट इन रूरल इंडिया, एनर्जी पॉलिसी, 122, 395-408.

रुइज़-मर्काडो आई., मासेरा ओ., ज़मोरा एच., और स्मिथ के.आर. दिसंबर 2011. एडॉप्शन ऐंड सस्टेन्ड यूज ऑव इम्प्रूव्ड कुकस्टोव्स, एनर्जी पॉलिसी, 39 (12), 7557-7566.

टाइम्स ऑफ इंडिया. 2 मई 2019)


[1] उपयोगकर्ताओं के साथ लेखक की बातचीत पर आधारित.

[2] उपयोगकर्ताओं के साथ लेखक की बातचीत पर आधारित.

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