हाइब्रिड और ट्रांसनेशनल शिक्षा से पढ़ाई अब सिर्फ़ विदेश जाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया भर के अवसर घर बैठे जुड़ने लगे हैं. भारत को अब नीतियों में बदलाव कर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो वैश्विक पहुंच और घरेलू मजबूती दोनों को साथ लेकर चले- जानें कैसे.
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भारत में शिक्षा पाने के लिए आने-जाने का मतलब हमेशा से छात्रों का विदेश जाना रहा है. वे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जाते रहे हैं. बेहतर संस्थानों में दाख़िला लेने, वैश्विक अनुभव प्राप्त करने और पढ़ाई के बाद बेहतर अवसर की संभावनाओं को देखते हुए हर साल लाखों की संख्या में भारतीय छात्र देश छोड़ रहे हैं.
हालांकि, अब स्थिति बदलने लगी है. शिक्षा के लिए आवाजाही का अर्थ अब किसी एक स्थान पर जाकर बस जाना नहीं रहा, बल्कि यह कई जगहों पर होने वाली, मॉड्यूलर और फैली हुई प्रक्रिया बनती जा रही है. इसमें छात्र एक ही डिग्री कोर्स के दौरान अलग-अलग संस्थानों, देशों और तरीकों का अनुभव करता है या फिर अपने देश में ही रहते हुए वर्चुअल माध्यमों और विदेशी कैंपस के ज़रिये अंतरराष्ट्रीय शिक्षा पाता है.
उच्च शिक्षा के उन सभी अध्ययन कार्यक्रमों, या पाठ्यक्रमों या शैक्षिक सेवाओं को TNE मॉडल का हिस्सा माना जाता है, जिसमें छात्र उस देश के नहीं होते, जहां शिक्षण संस्थान स्थित होते हैं, बल्कि दूसरे देश के होते हैं. इसके कई रूप हैं, इसलिए आइए, समझते हैं कि भारत इनसे किस तरह जुड़ रहा है.
इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि हाइब्रिड और ट्रांसनेशनल शिक्षा (TNE) मॉडलों के बढ़ते चलन से शिक्षा पर क्या-क्या असर पड़ रहा है और भारत को इसके लिए किस तरह की नीतियां बनानी चाहिए.
UNESCO और यूरोप कौंसिल के मुताबिक, उच्च शिक्षा के उन सभी अध्ययन कार्यक्रमों, या पाठ्यक्रमों या शैक्षिक सेवाओं (जिनमें दूरस्थ शिक्षा भी शामिल है) को TNE मॉडल का हिस्सा माना जाता है, जिसमें छात्र उस देश के नहीं होते, जहां शिक्षण संस्थान स्थित होते हैं, बल्कि दूसरे देश के होते हैं. इसके कई रूप हैं, इसलिए आइए, समझते हैं कि भारत इनसे किस तरह जुड़ रहा है.
तालिका 1- भारत में शिक्षा के विदेशी केंद्र
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मॉडल |
विवरण |
उदाहरण |
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शाखा परिसर |
विदेशी संस्थान द्वारा स्थापित और संचालित विदेशी परिसर, जो मेजबान देश के नियमों के अनुरूप डिग्री देते हैं. |
GIFT सिटी में डीकिन यूनिवर्सिटी और वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी के परिसर, साउथेम्प्टन यूनिवर्सिटी के परिसर (UGC 2023 नियमों के अनुरूप), साथ ही ज़ांज़ीबार और अबू धाबी में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के परिसर. |
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फ्रैंचाइज़ |
स्थानीय संस्थान विदेशी विश्वविद्यालय द्वारा तैयार कार्यक्रम संचालित करते हैं. |
हर्टफोर्डशायर यूनिवर्सिटी (ब्रिटेन)- INTI इंटरनेशनल कॉलेज सुबांग (मलेशिया) द्वारा मलेशिया में |
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ट्विनिंग |
छात्र अपने पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मेजबान देश में और दूसरा भागीदार विदेशी संस्थान में पूरा करते हैं. |
2022 के UGC नियमों के तहत तय ट्विनिंग व्यवस्थाएं; भारत के निजी विश्वविद्यालयों और |
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संयुक्त डिग्री |
भारतीय और विदेशी संस्थानों द्वारा संयुक्त रूप से दी जाने वाली डिग्री, जो साझा तौर पर तैयार किए गए पाठ्यक्रमों और शिक्षण व्यवस्था के तहत दी जाती है. |
UGC (अकादमिक सहयोग) विनियम, 2022 द्वारा इस व्यवस्था का विस्तार हो रहा है; IIT का यूरोपीय विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग ( |
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ड्यूल डिग्री |
एक साझा कार्यक्रम पूरा करने पर छात्रों को प्रत्येक भागीदार संस्थान से अलग-अलग डिग्रियां मिलती हैं. |
UGC विनियम 2022 द्वारा समर्थित; उदाहरण- ऑस्ट्रेलिया की डीकिन यूनिवर्सिटी, के साथ साझेदारी में सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पुणे (भारत) बी.टेक (जैसे- कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग) की |
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ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा |
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पूर्ण या आंशिक कार्यक्रमों का संचालन, जो अक्सर अंतरराष्ट्रीय सहयोग से होता है. |
SWAYAM में कई वैश्विक पाठ्यक्रम शामिल हैं; भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान भी अंतरराष्ट्रीय प्रमाण-पत्रों के लिए |
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हाइब्रिड/ मिश्रित पाठ्यक्रम |
एक ही कार्यक्रम में घरेलू अध्ययन, ऑनलाइन मॉड्यूल और आंशिक रूप से विदेश में पढ़ाई की व्यवस्था |
NEP 2020 लागू होने के बाद भारत के निजी विश्वविद्यालयों और वैश्विक साझेदारों के बीच |
उपरोक्त तरीके बताते हैं कि भारतीय छात्रों के लिए अब अंतरराष्ट्रीय शिक्षा कहीं ज़्यादा व्यापक हो गई है और इसमें बड़े संस्थागत सहयोग की ज़रूरत पड़ने लगी है. इसमें कोई विश्वविद्यालय औपचारिक, नीति-समर्थित पारिस्थितिकी तंत्र में साझेदारी और नेटवर्क के माध्यम से दूसरे देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़ जाता है. नीति-निर्माताओं के लिए, इस बदलाव का मतलब है, प्रतिस्पर्धा और नियम-कानूनों का विस्तार. अब देश केवल अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए ही प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे, बल्कि अपने ही देश में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था को आकार देने और उनका प्रबंधन करने के लिए भी होड़ कर रहे हैं.
जैसे-जैसे शिक्षा-प्रशासन का दायरा स्थिर संस्थानों के प्रबंधन से हटकर, विभिन्न क्षेत्रों के कार्यक्रमों, प्रदाताओं, प्रमाण-पत्रों और शिक्षार्थियों के निरंतर आवागमन के प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है, भारत के नीतिगत नज़रिये में भी इसी के मुताबिक बदलाव की ज़रूरत है.
अब उच्च गुणवत्ता वाली साझेदारियों की ओर हमें बढ़ना चाहिए, जो देश की घरेलू ज़रूरतों के अनुसार होनी चाहिए, जैसे- पाठ्यक्रमों को आधुनिक बनाना, फैकल्टी विकसित करना, डेटा एकीकरण और अनुसंधान व नवाचार को प्राथमिकता देना आदि.
पहला बदलाव- रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ना
भारत का अब भी ज़्यादातर ज़ोर नियम बनाने पर है, जिनमें सहयोगों को मंजूरी देने, दिशा-निर्देश जारी करने और प्रवेश को नियंत्रित करने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. अब उच्च गुणवत्ता वाली साझेदारियों की ओर हमें बढ़ना चाहिए, जो देश की घरेलू ज़रूरतों के अनुसार होनी चाहिए, जैसे- पाठ्यक्रमों को आधुनिक बनाना, फैकल्टी विकसित करना, डेटा एकीकरण और अनुसंधान व नवाचार को प्राथमिकता देना आदि. सतही फ्रेंचाइजी मॉडल की तुलना में ऐसी लंबी साझेदारियों को आगे बढ़ाना चाहिए, जिनमें संयुक्त अनुसंधान, बहु-विषयक मॉडल, उद्योगों से जुड़ी सामग्रियों और आधुनिक शिक्षा के अनुसार फैकल्टी के प्रशिक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाए.
दूसरा बदलाव- भौगोलिक सीमाओं से पार वैश्विक जुड़ाव
भारत ने एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (ABC) की मदद से भले ही राष्ट्रीय स्तर पर कर्ज़ का एक ढांचा बना लिया है, पर यह घरेलू ही है. इसका फैलाव भौगोलिक सीमाओं के बाहर होना चाहिए, ताकि छात्रों को विभिन्न संस्थानों में सहजता से आगे बढ़ाया जा सके. इसके लिए भारतीय और विदेशी संस्थानों को शामिल करने वाली एक मानकीकृत ऋण हस्तांतरण संरचना बनाने की ज़रूरत है, साथ ही डिग्री मान्यता के लिए भी स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए. इससे पोर्टेबिलिटी को आसान बनाने में मदद मिलेगी.
तीसरा बदलाव- समानता-आधारित डिजाइन तैयार करना
ऐसी नीतियां बननी चाहिए कि सीमा-पार पढ़ाई की सुविधा ज़रूरतमंदों को मिल सके और समावेशी, समानता के प्रति संवेदनशील शिक्षा तक वे पहुंच सके. जिन छात्रों के पास इसकी सुविधा नहीं है, उनके लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था होनी चाहिए और आवश्यकता-आधारित शुल्क संरचना बनाई जानी चाहिए. मध्यम स्तर के संस्थानों को, पूल्ड प्लेटफॉर्म या कंसोर्टिया (कई कंपनियों का समूह) जैसी व्यवस्थाओं से वैश्विक साझेदारियों के लिए आर्थिक सहायता, डिजिटल बुनियादी ढांचा और संस्थागत क्षमता दी जानी चाहिए.
चौथा बदलाव- परिणाम-आधारित, सीमा-पार गुणवत्ता की ओर बढ़ना
गुणवत्ता को लेकर भारत की सोच अब तक इनपुट या प्रवेश-आधारित रही है. इसमें गुणवत्ता का आकलन संस्थागत योग्यता या वैश्विक रैंकिंग के आधार पर किया जाता है. किंतु विदेशी शिक्षण संस्थानों के भारतीय परिसरों या हाइब्रिड पाठ्यक्रमों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो, इसके लिए भारत को UNESCO-OECD दवारा तय सिद्धांतों को अपनाना चाहिए और एक गुणवत्तापूर्ण समान ढांचा बनाना चाहिए.
ऐसी नीतियां बननी चाहिए कि सीमा-पार पढ़ाई की सुविधा ज़रूरतमंदों को मिल सके और समावेशी, समानता के प्रति संवेदनशील शिक्षा तक वे पहुंच सके. जिन छात्रों के पास इसकी सुविधा नहीं है, उनके लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था होनी चाहिए और आवश्यकता-आधारित शुल्क संरचना बनाई जानी चाहिए.
पांचवां बदलाव- डेटा-आधारित तंत्र द्वारा संचालन
सीमा-पार शिक्षा से हमें क्या हासिल होता है, इसकी निगरानी के लिए भारत में अभी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. इसलिए अब डेटा-आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम की ओर हमें बढ़ना चाहिए, जो अलग-अलग शिक्षार्थी समूहों (आय, लिंग, क्षेत्र के आधार पर) में पहुंच, सीखने के नतीजों और रोज़गार पाने की क्षमता में मौजूद कमियों को पहचान सके.
छठा बदलाव- समग्र प्रणालीगत बदलाव
ट्रांसनेशनल एजुकेशन में आप्रवासन, शिक्षा, आर्थिक नीति और कौशल विकास जैसे कई क्षेत्र भी परोक्ष रूप से शामिल हैं, इसलिए इससे जुड़ी नीतियों में समग्रता का ख़्याल रखा जाना चाहिए. इनमें प्राथमिकता वाले क्षेत्रों (AI, हरित कौशल) में राष्ट्रीय कौशल विकास और श्रम बाजार की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है.
साफ़ है, छात्रों के पलायन को रोकने से लेकर वैश्विक स्तर पर एकीकृत उच्च शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देने तक में, हमें अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा.
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा को लेकर भारत के मुख्यतः दो उद्देश्य रहे हैं- पलायन को कम करना और वैश्विक अनुभवों को बढ़ाना. ट्रांसनेशनल शिक्षा वाले मॉडल घरेलू आधार को वैश्विक एकीकरण से जोड़ते हैं, जिसमें छात्रों को घरेलू व्यवस्थाओं में ही बने रहने का मौका मिलता है. क्या अब हमें इसके लिए तैयार नहीं हो जाना चाहिए?
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Arpan Tulsyan is a Senior Fellow at ORF’s Centre for New Economic Diplomacy (CNED). With 16 years of experience in development research and policy advocacy, Arpan ...
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