दवा जांच की दुनिया बदल रही है- जानवरों की जगह अब इंसानी शरीर जैसी तकनीकों से टेस्ट हो रहा है. जानें कैसे मानव-आधारित इस वैज्ञानिक क्रांति में भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है जिससे दवा विकास और ज्यादा सटीक हो सकता है.
दिसंबर 2025 में यूरोपीय संघ (EU) ने बायोटेक अधिनियम नाम का एक नया कानून शुरू किया. इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि दवाइयों और मेडिकल तकनीक बनाने के दौरान जानवरों पर प्रयोग करने की जगह ऐसे तरीके अपनाए जाएं जिनमें जानवरों का इस्तेमाल न हो. इसी तरह, नवंबर 2025 में यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक रोडमैप जारी किया, इसका उद्देश्य वैज्ञानिक शोध में जानवरों पर होने वाले परीक्षण को धीरे-धीरे खत्म करना और इंसानों पर आधारित नए और आधुनिक तरीकों से शोध को आगे बढ़ाना है.
दुनिया भर में नियम इसलिए बदल रहे हैं क्योंकि दवाओं की जांच के लिए लंबे समय से जानवरों का उपयोग होता रहा है लेकिन उनसे हमेशा इंसानों पर असर का सही पता नहीं चलता. 85 प्रतिशत से अधिक दवाएं जो पशुओं पर सुरक्षित और प्रभावी लगती हैं, मानव क्लिनिकल परीक्षणों के दौरान असफल हो जाती हैं. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पशु परीक्षण मानव शरीर में होने वाले विषाक्त प्रभावों का सही अनुमान नहीं लगा पाते. यह अंतर खासकर कैंसर, न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों और सूजन संबंधी बीमारियों में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है- जहाँ पशु मॉडल से क्लिनिकल कैंसर परीक्षणों तक सफल रूप से पहुँचने की औसत दर 8 प्रतिशत से भी कम है.
इसके विपरीत, कुछ आम दवाएँ जैसे एस्पिरिन, जो मनुष्यों में सुरक्षित मानी जाती हैं, पशुओं में गंभीर विषाक्त प्रभाव पैदा कर सकती हैं. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पशु परीक्षण कई बार गलत परिणाम दे सकते हैं. कभी जानवरों पर किए गए परीक्षण सुरक्षित दवाओं को असुरक्षित बता देते हैं और कभी इंसानों में होने वाली हानि का पता नहीं लगा पाते. अब नई तकनीकें जैसे 3D सेल सिस्टम, ओमिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैज्ञानिकों को मानव शरीर और बीमारियों को बेहतर समझने में मदद कर रही हैं, इसलिए सरकारें नई मानव-आधारित तकनीकों को बढ़ावा दे रही हैं.
दवाइयों और मेडिकल तकनीक बनाने के दौरान जानवरों पर प्रयोग करने की जगह ऐसे तरीके अपनाए जाएं जिनमें जानवरों का इस्तेमाल न हो. इसी तरह, नवंबर 2025 में यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक रोडमैप जारी किया, इसका उद्देश्य वैज्ञानिक शोध में जानवरों पर होने वाले परीक्षण को धीरे-धीरे खत्म करना और इंसानों पर आधारित नए और आधुनिक तरीकों से शोध को आगे बढ़ाना है.
यूके की यह पहल अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा जारी इसी तरह के रोडमैप के बाद आई है, जिसमें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानव-संबंधित और गैर-पशु विधियों से पशु परीक्षण को धीरे-धीरे बदलने की योजना बताई गई है. एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में, अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) ने हाल ही में घोषणा की कि वह उन शोध प्रस्तावों को फंड नहीं देगा जो केवल पशु मॉडल पर आधारित हों. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी हाल ही में जैविक उत्पादों की गुणवत्ता जांच के लिए पशु परीक्षण को हटाने या बदलने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं.
2024 में ब्राज़ील की सीनेट ने एक नया रासायनिक प्रबंधन कानून पारित किया, जिसमें पशु परीक्षण को ‘अंतिम विकल्प‘ तक सीमित किया गया है और पूरी तरह पशु-मुक्त तरीकों की ओर संक्रमण के लिए रणनीतिक योजना बनाने का प्रावधान किया गया है. पशु प्रयोगों को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकारें योजना बना रही हैं. ब्राज़ील के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार मंत्रालय के तहत नेशनल काउंसिल फॉर द कंट्रोल ऑफ एनिमल एक्सपेरिमेंटेशन (CONCEA) ने नियम बनाए हैं, जो गैर-पशु तरीकों को मान्यता देकर धीरे-धीरे उन्हें जरूरी बनाने की दिशा में काम करते हैं.
भारत में भी इस दिशा में कदम उठाए गए हैं. न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स (संशोधन) नियम, 2023 अब दवाओं की सुरक्षा और असर की जांच में ऑर्गन-ऑन-चिप और अन्य मानव-आधारित नई तकनीकों के उपयोग की अनुमति देते हैं. हाल ही में कई सरकारी वित्तीय संस्थाओं ने स्वदेशी मानव-केंद्रित तकनीकों के विकास और व्यावसायीकरण को तेज करने के लिए नई फंडिंग योजनाएँ भी जारी की हैं. कई देशों ने पशु परीक्षण को बदलने के लिए एक व्यवस्थित रणनीति बनाई है, जिसमें इस प्रक्रिया को तीन श्रेणियों या ‘तीन बास्केट‘ में विभाजित किया गया है. पहली श्रेणी में ऐसे परीक्षण हैं जहाँ गैर-पशु तकनीकें अभी लागू की जा सकती हैं. दूसरी में वे हैं जिन्हें कुछ समय में अपनाया जा सकता है. तीसरी श्रेणी में जटिल परीक्षण हैं, जिनके लिए लंबे समय तक शोध और विकास की जरूरत होगी.
‘बास्केट 1’ का एक मुख्य परीक्षण इंजेक्शन वाली दवाओं, मेडिकल उपकरणों या कच्चे पदार्थों में पायरोजेंस की जाँच करता है. इसमें थोड़ी मात्रा खरगोशों को दी जाती है; अगर उन्हें बुखार आता है, तो दूषित तत्व मौजूद माने जाते हैं.
अब नई तकनीकें जैसे 3D सेल सिस्टम, ओमिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैज्ञानिकों को मानव शरीर और बीमारियों को बेहतर समझने में मदद कर रही हैं, इसलिए सरकारें नई मानव-आधारित तकनीकों को बढ़ावा दे रही हैं.
इस परीक्षण की सटीकता पर सवाल हैं क्योंकि यह मनुष्यों के लिए पूरी तरह सही नहीं और परिणाम बदलते रहते हैं. अब मानव रक्त कोशिकाओं पर आधारित नई जाँच पायरोजेन्स का सही पता लगा सकती है.अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ (ईयू) की फार्माकोपिया संस्थाओं ने खरगोशों पर आधारित इस पुराने परीक्षण को हटाकर अधिक सटीक और मानव रक्त कोशिका आधारित जाँच को प्राथमिकता दी है. एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र, जिस पर अमेरिका और ब्रिटेन दोनों ने ध्यान दिया है, वह है लैब में बनाए गए प्रोटीनों की जाँच, जिन्हें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कहा जाता है. ये ऐसे प्रोटीन होते हैं जो शरीर में बीमार कोशिकाओं या अन्य लक्षित अणुओं को पहचानकर उन पर हमला कर सकते हैं. इनका उपयोग कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों सहित कई रोगों के इलाज में किया जा रहा है.
लेकिन क्योंकि ये अणु खास तौर पर मनुष्य के लक्ष्यों (जैसे मानव कोशिकाओं की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स या ग्रोथ फैक्टर्स) के लिए बनाए जाते हैं, इसलिए जानवरों पर इनका परीक्षण अक्सर सही परिणाम नहीं देता. 2006 में एक क्लिनिकल ट्रायल में, बंदरों पर सुरक्षित मानी गई एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ने छह मरीजों में अंग विफलता (ऑर्गन फेलियर) पैदा कर दी थी, जिससे इस तरह के जोखिम सामने आए. ब्रिटेन की सरकार ने घोषणा की है कि 2026 के अंत तक वह ऐसे उपचारों के लिए पहली बार मनुष्यों पर होने वाले क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति देने संबंधी दिशा निर्देश लागू करेगी, जिनके लिए उपयुक्त पशु मॉडल उपलब्ध नहीं हैं.
इन नई तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए लगातार योजना बनाकर काम करना होगा और उनके विकास, परीक्षण, मान्यता व उत्पादन के लिए अधिक निवेश करना पड़ेगा. दुनिया भर में फार्मा कंपनियाँ अब इन तरीकों से प्राप्त डेटा को नियामक मंजूरी के लिए प्रस्तुत कर रही हैं. ऐसे उदाहरणों और प्रोटोकॉल तक पहुँच, जहाँ इन तकनीकों का सफल उपयोग हुआ है, विभिन्न क्षेत्रों के बीच सीखने में मदद कर सकती है.
‘मेड-इन-इंडिया’ मानव-आधारित तकनीकों का विकास भारत में दवा विकास को तेज करने के साथ-साथ इसे इन उन्नत तकनीकों का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बना सकता है और वैश्विक मानकों में योगदान दे सकता है.
कई देश इसके लिए विशेष फंडिंग कार्यक्रम भी शुरू कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, National Institutes of Health (NIH) का 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर का Complement ARIE कार्यक्रम NAMs तकनीक के विकास केंद्र बनाने, नियामक ढाँचा तैयार करने और डेटा साझा करने की व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य रखता है. इसी तरह European Union ने भी इस क्षेत्र में बड़े निवेश किए हैं, जैसे €60 मिलियन का ASPIS क्लस्टर और €400 मिलियन का PARC कार्यक्रम, जिनका उद्देश्य रसायनों (जिसमें दवाइयाँ भी शामिल हैं) के जोखिम आकलन के लिए मानव-आधारित और नई पीढ़ी की तकनीकें विकसित करना है, ताकि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा की जा सके.
भारत में भी यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है. वर्तमान में भारत में 80 से अधिक प्रयोगशालाएं मानव-आधारित मॉडल विकसित कर रही हैं. उभरती तकनीकों के लिए आयोजित वैश्विक नियामक ज्ञान विनिमय मंच के तहत एक बहुपक्षीय परामर्श बैठक का आयोजन जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) ने किया. इसमें भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, जानवरों पर प्रयोगों के नियंत्रण और पर्यवेक्षण के लिए समिति, भारतीय मानक ब्यूरो और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने भाग लिया.
इस बैठक में भारत में उभरती मानव-आधारित तकनीकों के विकास से जुड़े नियामक चुनौतियों पर चर्चा की गई. BIRAC पशु-आधारित मॉडलों से नए सिस्टम की ओर बदलाव को भी सक्रिय रूप से समर्थन दे रहा है, जिनमें ऑर्गेनॉइड्स और माइक्रोफिज़ियोलॉजिकल सिस्टम्स शामिल हैं. ‘मेड-इन-इंडिया’ मानव-आधारित तकनीकों का विकास भारत में दवा विकास को तेज करने के साथ-साथ इसे इन उन्नत तकनीकों का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बना सकता है और वैश्विक मानकों में योगदान दे सकता है. चूँकि कई भारतीय फार्मा कंपनियाँ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए काम करती हैं, इसलिए इस क्षेत्र में तकनीकी प्रगति फार्मा उद्योग के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. मानव-आधारित नई तकनीकें बायोफार्मा उद्योग का अगला बड़ा कदम हैं जो दवा विकास को तेज और सटीक बना सकती हैं. यदि भारत में फंडिंग, नियमों में सुधार और मिलकर काम किया जाए तो भारत इस क्षेत्र में दुनिया का प्रमुख देश बन सकता है.
सूरत पर्वतम ह्यूमन वर्ल्ड में प्रोग्राम डायरेक्टर (रिसर्च एंड रेगुलेटरी साइंसेज) हैं.
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Surat Parvatam is a Program Director (Research and Regulatory Sciences) at Humane World. She works across biomedical research, chemical and agrochemical safety testing, vaccine batch ...
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